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छायांकन का सिद्धान्त

Principles Of Cinematography

छायांकन- photography {This post is follow up(LEAD) of Principle of Photography Post} अगर गूगल में एक ही नाम से दो पोस्ट, पोस्ट हो जाए तब गूगल का AI दोनों पोस्ट को नेगलेक्ट कर सकता है…

छायांकन, फोटोग्राफी का एक विकसित रूप है, जिसके अंतर्गत स्क्रीन पर उभर या पड़ रही छवियों को इस प्रकार से संगठित कर एक साथ उतारा जाता है। जैसे कि वे छवियां चल रही हो परंतु वास्तव में यह लिए गए फोटोज को एक साथ सीक्वेंस में जोड़ कर मोशन रूप में सामने स्क्रीन पर लाने की विधा है।

फोटोग्राफी, सिनेमाटोग्राफी का सबसे छोटी इकाई है। ऐसा इसलिए क्योंकि एक फोटो अपने आप मे पूर्ण हो सकती है परंतु छायांकन के दौरान उसमें अलग-अलग शॉट्स लगाए जाते हैं जिसके अंदर कई निरंतर फ़ोटो की तस्वीरें एक साथ होती हैं। ऐसे में कई निरंतर ली गई फ़ोटो शॉट का निर्माण और कई शॉट्स मिलकर सीक्वेंस का निर्माण और बाद में एक पैटर्न के रूप में मूवी, फ़िल्म या मोशन विजुअल्स का निर्माण सम्पन्न होता है।

अब आइए छायांकन के सिद्धान्त को जानते हैं

छायांकन के सिद्धांत के विवाद को लेकर आज दो गुट बन गए है। एक गुट में यह माना जाता है कि सिद्धान्त का प्रयोग करके कोई भी निर्देशक आगे बढ़ सकता है। वहीं दूसरा गुट(group) ऐसा भी है जो छायांकन के सिद्धांतों को निर्देशक का गुलाम मानते हैं जो कि निर्देशकों द्वारा ही बनाये गए हैं। परंतु आज के इस युग मे अगर देखा जाए तो टेक्नोलॉजी और शिक्षा के जाल ने लगभग एक बड़े वर्ग को अपने तरफ आकर्षित किया है। ऐसे में डिजिटल कैमरे आने से और उन्हें अच्छे से प्रयोग करने के लिए इस क्षेत्र में बहुत लोग आए। लेकिन उनको इन सिद्धान्तो का पता हो, इस बात पर कोई स्पष्टता हो ही इस पर संदेह हमेशा ही बना रहता है।

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वास्तव में यह निर्देशक और उनके क्रू मेंमबर पर ही आधारित होता है कि वे किसपर प्रकार का छायांकन करना पसंद करते हैं। इसके लिए कहा भी जाता है कि कोई फ़िल्म छायाकार के सोच की तरफ इशारा करती है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं और मुगले-आज़म मूवी को लेते हैं जिसके निर्देशक नौशाद अली जी थे।

इनके ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ गाने के शीशे वाले शॉट्स को लिया जा सकता है जिसमें उन्होंने शीशों की मदद से ऐसा पॉइंट ऑफ व्यू(POV) रखा है जिसको देखकर कोई भी वाह वाह कर उठे थे। गाने का लिरिक्स है ‘झुक न सकेगा इश्क़ हमारा चारो तरफ है उनका नज़ारा’ इसके बाद शीशे में केवल अनारकली के चित्र का दिखना। जाहिर सी बात है कि यह निर्देशक के ही गुण थे जो 1960 में अपनी कहानी कह रहे थे।

यही पॉइंट ऑफ व्यू और कम्पोजीशन मदर इंडिया मूवी में भी देखने को मिलता है। असल मे कहा जाए तो इस फ़िल्म के बाद तो ऐसा लगता है कि लगभग 15 वर्षों तक इसी फॉर्मेट में कई फिल्में बनी।

अब हमें शायद अपने विषय पर वापस आ जाना चाहिए ताकि विषय को बिना किसी परेशानी के समझा जा सके।

सिनेमेटोग्राफ के सिद्धान्त को जानने से पहले यह जान लें कि सिद्धान्त का महत्व क्या है और इनकी जरूरत क्यों है। तो है स्पष्ट कर दें कि सिद्धान्त रोडमैप तैयार करने का काम करते है जिसका अनुसरण कर के आप अपने संबंधित क्षेत्र में उच्च स्थान या शौहरत प्राप्त कर सकते हैं। पर यहाँ छायांकन की बात करें तो यह कला का एक रूप है और कला के अंदर हर वक़्त, हम समय कुछ न कुछ अपडेट(अद्यतित) होता रहता है। जिसके अंतर्गत कई प्रिंसिपल मौजूद हैं। ऐसे में आपको समझना होगा कि कौन सा सिद्धान्त कब प्रयोग हुआ और कौन सा नहीं हुआ।

हम इन सिद्धान्तों पर बात करने जा रहे हैं:-

  1. कैमरा एंगल
  2. कैमरा मूवमेंट
  3. फ्रेमिंग
  4. पॉइंट ऑफ व्यू
  5. कलर्स
  6. नेगेटिव स्पेस
  7. लेयरिंग

1. कैमरा एंगल( कैमरा कोण)

किसी भी फ़िल्म की निर्माण से पहले यह सुनिश्चित कर लिए जाता है कि फ़िल्म का परिप्रेक्ष्य(PERSPECTIVE) क्या है और उसी आधार पर कैमरे के कोण का निर्धारण किया जाता है। मसलन किसी को लाचार दिखाना है तो कैमरा संबंधित ऑब्जेक्ट से ऊपर ही रखा जाएगा। कहने का तात्पर्य है कि कैमरा एंगल का अनुसरण(आप ऊपर एम्बेड यूट्यूब वीडियो के मुगले-आज़म फ़िल्म के गाने को देख सकते हैं) कर सकता है, उसके अनुसार जानकारी भी सामने ला सकता है या किसी बिंदु पर यह टिक भी सकते हैं। आज कल ग्राफ़िक्स के मदद से भी मूड सेट किया जा सकता है। आप sssssss phir koi hai के थीम को देलह सकते हैं। इसी प्रकार से कई विशेष स्थिति में निम्न कोण का प्रयोग किया जाता है। ज्यादातर कैरेक्टर को प्रभावी दिखाने के लिए ऐसा होता है। पर आजकल दर्शकों के दिमाग के साथ छेड़छाड़ करने के लिए सिद्धान्तो का अपने तरीके से प्रयोग किया जाने लगा है।

2. कैमरा मूवमेंट

कैमरा मूवमेंट यानी कैमरे का चलना एक रुके हुए कैमरा के मुकाबले एडिट करना या रिकॉर्ड करना कठिन होता है। परंतु ये फ़िल्म में नाटकीयता लाने के काम के साथ-साथ उसमें एक ग्राफिक्स संरचना का जायका भी प्रदान करते हैं। किसी फिल्म में शूटिंग के दौरान गतिशील शॉट संपादित शॉट्स के स्थान पर प्रयोग किये जाते हैं तो इसका तात्पर्य निर्देशक द्वारा दर्शकों को यथार्थवादी(realism) की अनुभूति करवाना है। ताकि दर्शक उससे अपने आप को जोड़ सकें। कैमरा मूवमेंट की बात करें तो इसके तीन मुख्य प्रकार हैं:- पैनिंग, क्रेनिंग और ट्रैकिंग। पैनिंग तब होता है जब कैमरा बिना अपने पोजीशन से मूव हुए किसी ऑब्जेक्ट को फॉलो करता है। इसके अंतर्गत कैमरा लेफ्ट टू राइट और राइट टू लेफ्ट मूव करता है। क्रेनिंग तब होती है जब कैमरा को क्रेन पर रखा जाता है और उससे किसी शॉट में विभिन्न प्रकार की फ्रेमिंग का निर्माण किया जाता है ताकि उसमें विविधता आये और वे बोझिल न लगें। इसके अन्तर्गत हाई शॉट, लो शॉट, ओपन शॉट और बंद फ्रेमिंग शॉट लिए जाते हैं। ट्रैकिंग के अंतर्गत उन शॉट्स को लिया जाता है जिसमे कैमरा गतिशील होते हुए शॉट के सब्जेक्ट को फॉलो करता है। (हम कैमरा मूवमेंट को किसी और पोस्ट में समझेंगे)।

3. फ्रेमिंग

सिनेमैटोग्राफी में, फ्रेमिंग से तात्पर्य फ्रेम में तत्वों को व्यवस्थित करने के तरीके से है। अनिवार्य रूप से कैमरा क्या देखता है। जिस तरह से अभिनेता बाधक होते हैं, और दृश्य के माध्यम से आगे बढ़ते हैं, और डिज़ाइन सेट करते हैं, ये सभी चीजें फ़्रेमिंग में एक भूमिका निभाती हैं। दूसरे शब्दों में एक फ्रेम फिल्म या वीडियो की एकल छवि है। फ़्रेमिंग (एक शॉट) में फ़्रेम की एक श्रृंखला की दृश्य सामग्री की रचना करना शामिल है जिसे कि एक ही दृष्टिकोण से देखा जाता है, अर्थात, एक निश्चित कैमरा। फ्रेम वह शब्द है जिसका उपयोग पटकथा लेखक, किसी व्यक्ति या वस्तु के फ़्रेमयुक्त शॉट में प्रवेश करने को इंगित करने के लिए करते हैं।

एक खुला या बन्द फ्रेमिंग यह निर्धारित करने का कार्य करता है कि दर्शक संबंधित छवि के अवधि के दौरान उसमें शामिल है या नहीं। इसी के साथ ओपेन फ्रेमिंग तब की जाती है जब मूवी में सब्जेक्ट और सिचुएशन सेट नहीं होते, सामान्यतः यह फिल्मिंग के clearity लाने के लिए किया जाता है। (मदर इंडिया को उदाहरण के रूप में ले सकते हैं)। ज्यादातर ओपेन फ्रेमिंग वित्तचित्र बनाने के दौरान प्रयोग में लाए जाते हैं। जबकि क्लोज फ्रेमिंग का प्रयोग तब किया जाता है जब सब्जेक्ट्स अपने निर्धारित रूप में स्थित होते हैं। जिसके चलते ओपन फ्रेमिंग दर्शकों को ज्यादा यथार्थ लगते हैं और क्लोज्ड फ्रेमिंग ठहरा हुआ और रुका हुए लगता है।

4. POV(पॉइंट ऑफ व्यू)

दृष्टिकोण: विशेष रूप से एक दृश्य या फिल्म की शूटिंग की एक विधि का वर्णन करने में उपयोग किया जाता है जो किसी दृश्य में सामग्री या चरित्र के प्रति निर्देशक या लेखक के दृष्टिकोण को व्यक्त करता है। सीधे अगर कहें तो POV वह विधि है जिसके अंतर्गत छायांकन करने वाले छायाकार और लेखक के सोच को उजागर करता है कि वह संबंधित विषय को किस रूप में दर्शकों के सामने लाना चाहते थे। यह बात अलग है कि कई बार उनके पॉइंट ऑफ व्यू फ़िल्म के चित्रण से नहीं मिलते है जिसके चलते अर्थ का अनर्थ होने में देर नहीं लगता।

फर्स्ट, सेकंड और थर्ड पर्सन के रूप में पॉइंट्स ऑफ व्यू का वर्णन किया जा सकता है। फर्स्ट पर्सन के अन्तर्गत मैं और हम आते हैं, द्वितीय पर्सन के अंतर्गत यु यानी तुम आते हो वहीं थर्ड पर्सन के अंतर्गत वह(लड़की/लड़का), यह, वे शब्दो का प्रयोग किया जाता है। आप इसके लिए PK, 3 IDIOTS, तारे ज़मीन पर, DEEWAR जैसी फिल्मों को देख सकते हैं। वैसे आप मुगले-आज़म फ़िल्म से भी POV को समझ सकते हैं।

5. Colours(रंग)

एक निर्देशक अपनी फिल्म में जिन रंगों का उपयोग करता है, उससे उसे चित्रों के माध्यम से कहानियां सुनाने में मदद मिलती है। एक फिल्म निर्माता के रूप में, आप रंग सिद्धांत का उपयोग समय में एक अवधि को विकसित करने के लिए कर सकते हैं, और इसी के साथ कुछ घटित होने से पहले आप दर्शक को संकेत कर सकते हैं, चरित्र चित्रण को बढ़ा सकते हैं, या एक समग्र मूड सेट कर सकते हैं। रंगीन सिनेमा पैलेट किसी फिल्म के दर्शकों के अनुभव को सीधे प्रभावित करते हैं।इसका कारण यह है कि रंग माहौल बनाता है, भावनाओं को बढ़ाता है और प्रतीकवाद को बढ़ाता है।

इसी कारण एक निर्देशक द्वारा रंग संयोजनों का उपयोग फिल्म की दुनिया में एक मूड या माहौल पैदा करने के लिए करता है या कर सकता है। शांत, असंतृप्त रंगों का उपयोग उदासी का वातावरण बनाने के लिए किया जा सकता है, समृद्ध साग और पृथ्वी के स्वर संतुलन और सहजीवन की भावना पैदा कर सकते हैं, और स्पेक्ट्रम के गर्म छोर पर जीवंत रंग एक फिल्म में ऊर्जा और तीव्रता ला सकती हैं।

6. नेगेटिव स्पेस

7. लेयरिंग

वीडियो शब्दावली के अंतर्गत, लेयरिंग एक वीडियो प्रोजेक्ट टाइमलाइन में मीडिया तत्वों का ढेर है जो एक साथ कई तत्वों के प्लेबैक को सक्षम करता है। सबसे आम लेयरिंग प्रभाव स्प्लिट स्क्रीन लेआउट का है जिसमें एक ही समय में वीडियो के कई ‘विंडो’ चल रहे होते हैं। आर्डर को व्यवस्थित और उसमें संसोधन करके  उनको पुनर्व्यवस्थित करना और प्रत्येक क्लिप को घुमाकर पुन: व्यवस्थित करके, एक संपादक संगीत वीडियो बनाया जा सकता है, बंपर और टीज़र के लिए आकर्षक वीडियो मोंटाज बन सकता है।

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