जगन्नाथ मंदिर रथ यात्राजगन्नाथ मंदिर रथ यात्रा

भारत गणराज्य के उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर, हिंदुओं के चारों धामों में से एक है. ऐसा माना जाता है कि इंसान को अपने जीते-जी एक बार प्रभु जगन्नाथ जी की यात्रा श्रद्धापूर्वक अवश्य ही कर लेनी चाहिए क्योंकि इससे उसे मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है और वह जन्म और मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो सकता है.

उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर विशाल होने के साथ-साथ पुराना और सांस्कृतिक रूप से भी आदरणीय है. यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार भगवान श्री कृष्ण का मंदिर है. यहाँ करोड़ों की संख्या में हर साल भक्त अपने स्वामी का दर्शन करने आते है. पुरी रथ यात्रा इसलिए भी विशेष है क्योंकि, इस दिन भक्त अपने आराध्य के दर्शन मंदिर में नहीं बल्कि रथ यात्रा के दौरान आराम से करते हैं.

पुरी की रथ यात्रा जगन्नाथ बाबा के भक्तों के लिए एक विशेष महत्व रखती है. ऐसे में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के समय पूरा पुरी एक त्योहार के सांचे में ढला हुआ लगता है. जहाँ भगवान जगन्नाथ के भक्त संसार के हर कोने से इस त्योहार में सम्मिलित होने के लिए पुरी आते हैं.

यह भव्य रथ यात्रा प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को निकाली जाती है. वहीं इस भव्य यात्रा का समापन शुक्ल पक्ष के 11वें दिन जगन्नाथ जी की पुरी मंदिर में वापसी के साथ पूर्ण होता है.

ऐसे में यह भी देखने को मिलता है कि जो भक्त देश विदेश के इस यात्रा में सम्मिलित नहीं हो पाते हैं वे भगवान जगन्नाथ की झाँकियाँ पुरी के अलावा अन्य स्थानों(यूरोप, रूस, न्यू-यॉर्क आदि विदेशों ) पर भी निकाली जाती हैं.

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भगवान जगन्नाथ, बालभद्र और सुभद्रा के रथ के बारे में विशेष

रथ यात्रा के, लगभग एक महीने पहले से ही बालभद्र, सुभद्रा और जगन्नाथ के रथ को बनाने का कार्य, पीढ़ियों से रथ यात्रा पर्व के लिए रथ को तैयार करने वाले कारीगर महीनों पहले ही रथ बनाने के कार्य में लग जाते हैं. ये कारीगर परंपरा के अनुसार दोनों भाई और बहन सुभद्रा के लिए रथ का निर्माण पहले से चले आ रहे निश्चित रूप में ही करते हैं और उनमें कोई भी बदलाव किसी भी रूप में नहीं किया जाता है.

ऐसे में भगवान जगन्नाथ, बालभद्र और सुभद्रा जी के रथ का निर्माण प्रत्येक वर्ष एक ही प्रकार का रहता है लेकिन इन तीनों के रथों के सांचों से, भगवान जगन्नाथ, बालभद्र और सुभद्रा जी के रथ को पहचाना जा सकता है जो कि पुरी के रथ यात्रा के शुरुआत से ही निश्चित है. आइये जानते हैं कि ऐसे क्या अंतर है जिससे भगवान जगन्नाथ, बालभद्र और सुभद्रा जी के रथ का आप आसानी से पहचान सकते हैं……

  • मई में पुरी के रथ यात्रा का निर्माण प्रारंभ हो जाता है.
  • रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी होती हैं और तीनों के रथ अलग-अलग रूप में निर्मित किए जाते हैं। जगन्नाथ मंदिर से रथ यात्रा में सबसे आगे बलरामजी का रथ, उसके बाद देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है।
  • पुरी के रथ यात्रा में सबसे बड़ा रथ(नंदी-घोष या गरुण ध्वज) भगवान जगन्नाथ का होता है. उनके रथ में कुल 16 लकड़ी के पहिए लगाए जाते हैं. वहीं रथ के ऊँचाई की बात करें तो इस रथ की ऊँचाई साढ़े तेरह मीटर रहती है. इस रथ का निर्माण कुल 832 लकड़ी के टुकड़ों से किया जाता है. जगन्नाथ जी के रथ का अनावरण(exposure) लाल और पीले रंग का होता है.
  • बालभद्र या दाऊ भइया के रथ(बाल-ध्वज) में कुल 14 पहिए लगाए जाते हैं. इनके रथ की ऊँचाई 13.2 मीटर और रथ का अनावरण लाल और नीला होता है.
  • वहीं भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा जी के रथ(पद्म रथ या दर्प-दलन) की ऊँचाई 12.9 मीटर होती है. इनके रथ में कुल 12 पहिए लगाए जाते हैं और इनके रथ का आवरण लाल और काले रंग का होता है.
  • इन रथों को बनाने की प्रक्रिया पहले से ही निश्चित है जिसमें कोई भी परिवर्तन नहीं किया जाता है और कारीगर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसी प्रक्रिया का प्रयोग पुरी के रथ यात्रा के रथ को तैयार करने के लिए करते हैं.

भगवान जगन्नाथ की तबियत क्यों खराब हो जाती है और उनके तबियत को ठीक करने के लिए क्या किया जाता है….

भगवान जगन्नाथ की यात्रा ज्येष्ठ यानी मई-जून के महीने में पूर्णिमा के दिन स्नान कार्यक्रम के साथ रथ यात्रा के समारोह का विधिवत प्रारंभ होता है. पूर्णिमा के दिन तीनों मूर्तियों को नहलाने के लिए मंदिर से बाहर लाया जाता है.

भगवान के भक्तों और जयकारों के बीच इन मूर्तियों को 108 घड़ों के पानी से स्नान कराया जाता है. नतीज-तन ऐसी मान्यता है कि इन्हें सर्दी-जुखाम हो जाता है. जिसके चलते इन मूर्तियों का 15 दिन तक एक मरीज के भांति देख-रेख किया जाता है.

इन 15 दिनों के लिए भगवान जगन्नाथ के कपाट उनके भक्तों के लिए बंद रहते हैं. ऐसे में भगवान के पास मंदिर का मुख्य पुजारी सेवा के लिए उनके पास रहते हैं. वही उनसे भोग लगवाते हैं और वही उन्हें शृंगार करवाते हैं और वही उन्हें दवा देते हैं. इन दिनों भगवान के लिए सादा भोग ही बनाया जाता है. भगवान जगन्नाथ की तबियत खराब होने के पीछे एक मान्यता ये भी है कि वे भक्तों का ज्यादा प्रेम और देखभाल पाने के लिए बीमार होना उचित समझते हैं.

खैर 15 दिन के देखभाल के बाद उन सभी स्वास्थ्य ठीक हो जाता है और अगले दिन अपने रथों पर सवार होकर अपने मौसी गुंडीचा के मंदिर, घूमने निकल पड़ते हैं.

वहीं वैज्ञानिक कारण को माने तो उस समय पुरी में इस समय बहुत गर्मी रहती है. ऐसे में गर्मी में परेशानी न हो इसलिए मुख्य जगन्नाथ मंदिर के कपाट को कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है.

गुंडीचा मंदिर और भगवान जगन्नाथ के मंदिर से, रथ यात्रा का संबंध और संबंधित क्रिया-कलाप

  • गुंडीचा मंदिर जाने से पहले पुरी का राजा पालकी में बैठकर इनके रथ के पास आता है. प्रतीकात्मक रूप से वह इन रथों को सोने के झाड़ू से साफ करता है. ऐसा माना जाता है कि इस रस्म और इससे जुड़े धर्म-कर्म से अमीर और गरीब के बीच भेदभाव को दूर करने का प्रयास किया जाता है. और, यह बताने का प्रयास किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति गरीब हो या अमीर भक्ति रस में डूब कर और सांसारिक माया त्याग कर ही भगवान को प्राप्त कर सकता है. उसकी सांसारिक आय केवल माया की एक डोर है और प्रभु के चरण सेवा में ही उसका मोक्ष है.
  • राजा के द्वारा रस्म आदायगी के बाद रथ यात्रा का विधिवत शुरुआत होता है.
  • रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के साथ उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी होती हैं और तीनों के रथ निर्मित किए जाते हैं। रथ यात्रा में सबसे आगे बलरामजी का रथ, उसके बाद देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है।
  • ऐसा माना जाता है कि शुरुआत में भगवान जगन्नाथ मौसी के घर जाने में आना-कानी करते हैं ऐसे में उन्हें मनाने के लिए प्रभु के जयकारों के साथ-साथ गीत गाया जाता है.
  • भगवान जगन्नाथ की मौसी हैं माँ गुंडीचा, इसलिए वे वहाँ अपने भाई और बहन के साथ सैर करने गुंडीचा मंदिर यानी मौसी के घर जाते हैं. भगवान जगन्नाथ, भाई बलराम और बहन सुभद्रा जी का रथ संध्या बेला तक मौसी के घर पहुँच जाता है.
  • जहाँ वे सात दिनों तक मंदिर में विश्राम करते हैं. इस समय तीनों भाइयों- बहनों की मूर्तियाँ मौसी के घर में ही सुशोभित रहती हैं.
  • आषाढ़ के 10वें दिन पुनः मुख्य मंदिर के पास ले जाया जाता है और इस वापसी यात्रा को बाहुड़ा यात्रा कहा जाता है. वहीं गुंडीचा मंदिर में 9 दिनों के दर्शन को आरब दर्शन के रूप में जाना जाता है. इन 9 दिनों का धार्मिक रूप से संबंध बहुत ही अहम और फलदायी माना जाता है. इस यात्रा को उल्टा रथ यात्रा भी कहा जाता है.
  • रथ यात्रा के दिन अनेक भक्त उपवास भी रखते हैं और उनसे (भगवान से ) अनजाने में हुए गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं.

लक्ष्मी जी पाँचवे दिन(हेरा पंचमी के दिन) तोड़ती हैं भगवान जगन्नाथ के रथ का पहिया

भगवान जगन्नाथ और रुक्मिणी का विवाह हुआ था. रुक्मिणी मां लक्ष्मी का ही रूप हैं. ऐसे में भगवान जगन्नाथ के बिना बताएं मौसी के घर जाने के कारण वह नाराज हो जाती है. नाराज पत्नि लक्ष्मी जी 5वें दिन भगवान जगन्नाथ का रथ तोड़ती हैं.

ऐसे में गुंडिचा मंदिर जाने के लिए मां लक्ष्मी ने अपने सेवकों को विमान तैयार करने का आदेश दे दिया है. बता दें कि, सेवक विमान को तैयार करते हैं. मां लक्ष्मी का यह विमान उनके सेवक कंधों पर रखकर गुंडिचा मंदिर ले जाते हैं.

इस परंपरा के पीछे की मान्यता है कि मां लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ, भाई बलदेव और बहन सुभद्रा के साथ मौसी के घर न ले जाने से नाराज होकर पांच दिन बाद वहां जाती है. पति से नाराज देवी लक्ष्मी उनके रथ का पहिया तोड़ देती हैं.

भगवान जगन्नाथ घर का दरवाजा बंद कर लेते हैं ऐसे में नाराज लक्ष्मी जी उनके रथ का पहिया तोड़ देती है. गुंडिचा और पुरी जगन्नाथ मंदिर के सभी पुजारी मिलकर इस परंपरा को निभाते हैं.

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का समापन

  • बहुरा यात्रा के हो जाने के बाद भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और बड़े भाई दाऊ के साथ पुरी के अपने मंदिर पहुँच जाते हैं.
  • इस समय ये तीनों मूर्तियाँ अपने रथ पर ही विराजमान रहती हैं.
  • यह रस्म एकादशी के दिन (11वें दिन) पूर्ण की जाती है. इस रस्म के दौरान उन्हें रथ पर ही सुनहरे वस्त्र एवम् स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाता है.
  • मंदिर में पुनः स्थापित करने से पहले निलाद्री बिजे रस्म किया जाता है. इस रस्म के बाद गर्भगृह में जगन्नाथ बाबा के साथ बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र विराजित हो जाते हैं.
  • इसी के साथ लगभग तीन सप्ताह तक चलने वाला ये धार्मिक उत्सव समाप्त हो जाता है.

भगवान जगन्नाथ मंदिर के बारे में कुछ रोचक जानकारी

  • जगन्नाथ रथ यात्रा को अन्य नामों से भी जाना जाता है…. जैसे– घोष यात्रा, दशावतार यात्रा, नवादिना यात्रा और गुंडीचा यात्रा.
  • पुरी की रथ यात्रा सबसे भव्य आयोजनों में से एक है. यहाँ दुनिया के कोने-कोने से पर्यटक सम्मिलित होने आते हैं.
  • इनके रथों के सजावट और निर्माण का कार्य एक महीने पहले से ही शुरू हो जाता है.
  • पुरी की रथ यात्रा शुरू होने से पहले राजसी जुलूस निकाला जाता है जिसके अंतर्गत पुरी का राजा रथों के गलियारे को सोने के झाड़ू से साफ करता है.
  • रथ यात्रा में सबसे आगे बलराम-जी का रथ, उसके बाद देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है।
  • हर 12 वर्ष के बाद प्रतिमा बदली जाती है. ऐसा इसलिए क्योंकि मूर्तियों को अंतिम प्रतिस्थापन समारोह के 8वें, 12वें या 19वें वर्ष के बाद ही बदला जा सकता है, लकड़ी से बनी या आध्यात्मिक रूप से कहें तो इस धरती पर बनी किसी भी चीज में परिवर्तन और क्षय होने का खतरा होता है। और ऐसा करने के लिए, केवल वही वर्ष चुना जाता है जिसमें हिंदू चंद्र कैलेंडर में अधिक-मास या एक अतिरिक्त महीना होता है।
  • “ब्रह्म पदार्थ” —प्रतिमा बदलने के बाद भगवान जगन्नाथ के दिल के स्थान पर “ब्रह्म पदार्थ” (जगन्नाथ पुरी की मूर्तियों के मूल में एक रहस्यमय पदार्थ है जिसे “ब्रह्म पदार्थ” कहा जाता है।) मंदिर के पुजारियों द्वारा आँख पर और हाथ पर लाल पट्टी बाँधकर पुराने मूर्ति से यह पदार्थ निकालकर नए मूर्ति में दिल के स्थान पर पीछे से डाल दिया जाता है.
  • मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण ने अपना देह त्याग किया तो उनका अंतिम संस्कार किया गया था. उनका बाकी शरीर तो पंच तत्वों में मिल गया लेकिन उनका दिल सामान्य और जिंदा रहा. (ये मान्यता है कि जिस व्यक्ति ने भगवान के पैर में तीर मारा था और अंतिम संस्कार किया था वह उससे पहले श्री राम के अवतार में बाली था जिसे श्री रामचन्द्र ने सुग्रीव की सहायता और राज-पाठ वापस करने के लिए मारा था. इसलिए जब उसने कृष्ण भगवान के पैर में तीर मारा और अपनी गलती के लिए माफी माँगने कृष्ण भगवान के पैरों में गिर गया तो माधव ने कहा कि तुमने कोई पाप नहीं किया है वरनं ये तो मेरे किये का फल मुझे दिया है. मान्यता ये भी है कि वही व्यक्ति आगे चलकर विश्ववसु के रूप में सबर कबीले का मुखिया बना. इसलिए माधव इस कबीले के कुल देवता भी हैं. )
  • ऐसा भी माना जाता है कि माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा का एक सिर महादेव की हथेली से चिपक गया था और वह यहीं आकर गिरा था, तभी से यहां पर महादेव की ब्रह्म रूप में पूजा करते हैं। शंख के तीसरे वृत्त में मां विमला और नाभि स्थल में भगवान जगन्नाथ रथ सिंहासन पर विराजमान है।
  • वहीं मंदिर के इतिहास की बात की जाए तो इस मंदिर का सबसे पहला प्रमाण महाभारत के वन-पर्व में मिलता है।
  • इकलौता ऐसा मंदिर जहाँ तीन भाई-बहन एक साथ मंदिर में विराजमान हैं.
  • मन से पूरी रथ यात्रा में प्रयोग होने वाली रस्सी को छूने मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है.
  • वर्तमान समय में, केवल हिंदुओं को ही मंदिर के गर्भगृह में देवताओं की पूजा करने की अनुमति है और विदेशियों यानी भारत के बाहर के लोगों को भी मंदिर में प्रवेश करने की मनाही है। ऐसा मंदिर के सिंह द्वार (मुख्य प्रवेश द्वार) पर एक चिन्ह द्वारा स्पष्ट रूप से कहा गया है: “केवल हिंदुओं को अनुमति है।” ऐसे में समय-समय पर यह बहस का कारण भी बना रहता है.
  • ऐसा माना जाता है कि जगन्नाथ मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंगा राजवंश के राजा अनातवर्मन चोडगंगा देव द्वारा किया गया था।
  • पुरी के जगन्नाथ मंदिर को ‘यामानिका तीर्थ’ कहा जाता है , जहां हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की उपस्थिति के कारण पुरी में मृत्यु के देवता ‘यम’ की शक्ति समाप्त या क्षीण हो जाती है ।
  • पुरी के जगन्नाथ मंदिर का ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है. इस संबंध में प्रचलित कहानी हनुमान जी जुड़ी है. मंदिर समुद्र के समीप स्थित है. पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र की लहरों की आवाज के कारण भगवान विष्णु को आराम करने में दिक्कत होती थी.
  • यह भी आश्‍चर्य है कि प्रतिदिन सायंकाल मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। ध्वज भी इतना भव्य है कि जब यह लहराता है तो इसे सब देखते ही रह जाते हैं।
  • जगन्नाथ पुरी मंदिर के ऊपर से हवाई जहाज नहीं उड़ते हैं क्योंकि मुख्य रूप से पुरी किसी भी उड़ान मार्ग के अंतर्गत नहीं आते हैं और ऐसा नीलचक्र की उपस्थिति के कारण होता है। नीलचक्र एक आठ धातु चक्र है जिसे जगन्नाथ मंदिर पुरी के ऊपर रखा गया है।

भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा में की जाने वाली रस्में

  • छेरा पहरा रस्म– रथ यात्रा वाले दिन तीनों रथों को निकलने से पहले इस रस्म को पूरा किया जाता है. इस रस्म के दौरान पुरी का राजा सोने की झाड़ू से रथ के गलियारे में झाड़ू लगाता है. इसके बाद भक्त इस रथ को 3 किलोमीटर रस्सी के सहारे गुंडीचा मंदिर तक खींच कर ले जाते हैं. शाम तक ये रथ जगन्नाथ मंदिर से, गुंडीचा मौसी के घर पहुँच जाते हैं.
  • सुना बेसा रस्म (11वें दिन)– इस रस्म में भगवान को स्वर्ण आभूषण पहनाया जाता है.
  • अधर पना रस्म– इस दिन कुएं से निकाले गए पानी में मक्खन, पनीर, शक्कर, केला, जायफल, काली मिर्च और अन्य मसालों को डालकर पना तैयार किया जाता है. और, इस पने को भगवान को पिलाया जाता है. यह रस्म मौसी के घर से लौटने के बाद अगले दिन पूर्ण की जाती है.
  • नीलाद्री बाजे– दस दिनों के पर्व की सबसे आखिरी रस्म है. इसी के साथ पुरी रथ यात्रा के पर्व का समापन हो जाता है. इस रस्म में भगवान, जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में एक बार फिर अपने रत्न सिंहासन पर विराजमान हो जाते हैं.

जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास

जगन्नाथ रथ यात्रा का प्रारंभ कैसे शुरू हुआ, वास्तव में इसपर कोई प्रमाणिक साक्ष्य मौजूद नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि हिंदू सभ्यता से जुड़े कई साक्ष्य नालंदा विश्वविद्यालय में संरक्षित रखे हुए थे. जिसे आक्रमणकारियों ने समय-समय पर नष्ट कर दिया गया था. और, उनसे संबंधित ज्ञानियों को मौत के घाट उतार दिया था.

खैर फिर भी मौखिक क्रिया-कलाप के चलते एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक कई रूपों में जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास लिए हमारे समक्ष उपस्थित है. जिसे लेख के माध्यम से आपके समक्ष लिखने जा रहा हूँ…..

  1. कुछ लोगों का मानना है कि सुभद्रा अपने माइके आती हैं और अपने भाइयों से नगर भ्रमर के लिए इच्छा जाहिर करती हैं. तब, भगवान श्री कृष्ण , बलराम समेत सुभद्रा के साथ रथ में सवार होकर नगर में घूमने जाते हैं. इसी के बाद रथ यात्रा का पर्व शुरू हुआ.
  2. गुंडीचा मंदिर में स्थित देवी, भगवान श्री कृष्ण की मौसी हैं जो इन्हें अपने घर आने का निमंत्रण देती हैं. भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा अपने मौसी के घर 10 दिन रहते हैं.
  3. भगवान श्री कृष्ण के मामा कंश उन्हें मथुरा बुलाते हैं. इसके लिए कंश गोकुल में सारथी के साथ रथ भिजवाता है. भगवान श्री कृष्ण अपने भाई और बहन के साथ रथ में सवार होकर मथुरा आते हैं. जिसके बाद से रथ यात्रा के पर्व की शुरुआत हुई.
  4. श्री कृष्ण ने इस दिन मामा कंश को मार के अपने भाई और बहन के साथ मथुरा में रथ यात्रा करते हैं.
  5. श्री कृष्ण की रानियाँ माता रोहिणी से रासलीला सुनाने को कहती हैं. माता रोहिणी को लगता है कि गोपियों के साथ-साथ कृष्ण के बारे में सुभद्रा को नहीं सुनना चाहिए. इसलिए वह उन्हें कृष्ण और बलराम के साथ रथ यात्रा के लिए भेज देती हैं. तभी वहाँ नारद जी प्रकट होते हैं. तीनों को एक साथ देखकर वे प्रसन्न चित्त हो जाते हैं और प्रार्थना करते हैं कि इन तीनों के ऐसे ही दर्शन हर वर्ष होते रहें. भगवान ने उनकी प्रार्थना सुन ली और प्रत्येक वर्ष इन तीनों के दर्शन होते रहते हैं.

जगन्नाथ मंदिर की आलौकिक कहानी

बहुत समय पहले की बात है. मध्य भारत में मालवा नाम का एक राज्य हुआ करता था. इस राज्य के राजा इंद्रद्युम्न थे. इंद्रद्युम्न के पिता का नाम सुमति था. इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे. उनके मन में हमेशा से ये इच्छा रहती थी कि किसी तरह उन्हें भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन हो जाए तो उनका जीवन सफल हो जाए.

एक समय की बात है कि उनके महल में एक ज्ञानी ऋषि पहुँचे और राजा से बोले, हे राजन्! तुम भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त और उपासक हो. लेकिन क्या तुम उड़ीसा में पूजे जाने वाले भगवान विष्णु के दिव्य रूप नील-मादव के बारे में जानते हो? ऋषि के मुख से ऐसी बातें सुनकर राजा इंद्रद्युम्न बोलते हैं कि ब्राम्हण! मै तो इस विषय में अभी तक अज्ञानी रहा हूं. परंतु कृपा करके बताइए कि मेरे आराध्य देव के इस रूप को उड़ीसा में कहाँ पूजा जाता है.

इसके जवाब में ऋषि बोले कि मुझे भी उस स्थान के बारे में पता नहीं है. मैंने इसलिए आपसे पूछा कि, शायद आप, भगवान विष्णु के इस मंदिर के बारे में कुछ जानते हों. मगर लगता है कि मेरी खोज यूँ ही जारी रहेगी. हाँ, आप इस मंदिर को खोजने में मेरी सहायता कर सकते हैं. इसके बाद ऋषि ने राजा से आज्ञा ली और राजा ने भी उन्हें सम्मान पूर्वक महल से विदा किया.

इधर जब ऋषि चले गए तब , राजा इंद्रद्युम्न ने अपने मुख्य पुजारी विद्यापति को महल में बुलाया और उन्हें आदेश दिया कि वे उड़ीसा जाएं. और उड़ीसा जाकर उस जगह का पता लगाएं जहाँ भगवान विष्णु के दिव्य रूप नील मादव की पूजा की जाती है. राजा के आदेश को मानकर विद्यापति उड़ीसा के लिए यात्रा पर निकल पड़े और कुछ दिनों बाद उड़ीसा पहुँच गए. वहाँ उन्हें पहुँचकर अपने गुप्तचरों से पता चला कि सबर कबीले के लोग नील मादव की पूजा करते हैं.

विद्यापति बिना देर किये, सबर कबीले के मुखिया विश्व वासु के पास नील मादव की मूर्ति देखने की आग्रह लेकर पहुँचे. लेकिन, विश्व वासु ने इस आग्रह को सिरे से खारिज कर दिया. ऐसा सुनकर विद्यापति सोच में पड़ गए क्योंकि उन्हें किसी भी कीमत पर उस मूर्ति को दिखना था और राजा को उसके बारे में सूचना देनी थी.

ऐसे में विद्यापति ने मन में ठान लिया कि वे वह दिव्य स्थान देख कर ही जाएंगे. जिसके चलते वे कुछ दिन वहीं ठहरने के लिए अडिग हो गए. वहाँ रहते हुए उन्हें पता चला कि विश्व वासू ही नील मादव के उपासक हैं और किसी गुफा में इष्ट देवता को छिपा रखा है. ऐसे में एक बार फिर वे सबर कबीले के मुखिया के पास गए और उनसे वहाँ ले जाने के लिए विनती किया. परंतु विश्व वासु अपने फैसले से तस-से-मस नहीं हुए.

वहीं विद्यापति को वहाँ रहते हुए, कबीले के मुखिया की बेटी से और मुखिया की बेटी को विद्यापति से प्यार हो गया. ऐसे में उन्होंने परिवार का रजामंदी से शादी के बंधन में बध गए. शादी के कुछ समय बाद विद्यापति ने अपने पत्नी से अपने पिता जी को नील-मादव के दर्शन कराने के लिए मनाने को कहा. पत्नी धर्म का पालन करते हुए बेटी ने पिता से विनती की.

पुत्री के विनती और प्रेम के कारण कबीले के मुखिया ने एक शर्त( आँख पर पट्टी बाँधकर वहाँ ले जाया जाएगा) के साथ विद्यापति को नील-मादव के दर्शन कराने का वादा कर लिया. विद्यापति भी झट से मुखिया के शर्त को मान लिया. अगले दिन आँख पर पट्टी बाँध कर कबीले का मुखिया विद्यापति को नील-मादव की गुफा में ले गया. (वहीं चलाकी से विद्यापति ने सरसो के दाने अपने जेब में रख रखे थे, उन दानों को पूरे रास्ते वे गिराते गए ताकि बाद में राजा को श्री कृष्ण के दर्शन करवा कर, राजा के आज्ञा को पूर्ण कर सके.)

जब विद्यापति की आँख, गुफा में पहुँच कर नील-मादव के सामने मुखिया ने खोली तो विद्यापति उस मूर्ति को दख कर दंग ही रह गए और उसे देखते ही रहे. अगले दिन वे मुखिया के घर से अपने पत्नी के साथ विदा होकर महल आ गए और राजा को संपूर्ण कहानी से अवगत करा के नील-मादव के बारे में बताया. इसी के साथ ये भी बताया कि वे रास्ते में सरसो के दाने डालते हुए गए हैं ताकि गुफा में पहुँचने और दर्शन करने में कोई परेशानी न हो.

राजा इंद्रद्युम्न ये बात सुनकर बहुत खुश हुए और वहाँ जाने की तैयारी करने लगे. जल्द ही वे अपनी सवारी के साथ उस गुफा में विद्यापति के सरसो के दानों के सहारे उस गुफा में पहुँच गए. परंतु वहाँ उन्होंने देखा कि नील-मादव की मूर्ति गायब हो गयी थी. राजा इससे बहुत दुखी हुए और निरास होकर अपने महल लौट आए.

भक्त की दशा को देखकर भगवान, एक रात राजा को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि राजन! वे एक दिन उनको दर्शन अवश्य देंगे परंतु, इसके लिए उन्हें उनके लिए एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाना होगा और पुरी के समुद्र में तैर रहे लकड़ी के टुकड़े से उनके मूर्ति का निर्माण कराना होगा. राजा ने इस स्वप्न के बारे में अपने मंत्रियों को बताया, तो सारे मंत्रियों ने राजा से भगवान को लिए मंदिर बनाने और पुरी के समुद्र में तैर रहे लकड़ी के टुकड़े को ढूढ़ने के लिए सैनिकों को भेजने के लिए कहा.

राजा ने मंदिर बनवाने का कार्य शुरू करवा दिया और सैनिक उस लकड़ी के टुकड़े को ढूढ़ने में लग गए जो पुरी के समुद्र में तैर रहा हो. उधर मंदिर का निर्माण पूरा किया जा रहा था और इधर लकड़ी का टुकड़ा समुद्र में तैरता हुआ सैनिकों को मिल गया. परंतु, उस टुकड़े को कोई भी सैनिक समुद्र से निकाल भी न सका. तब सबर कबीले का, वहीं मुखिया आये और उन्होंने अकेले ही उस टुकड़े को निकालकर मंदिर के प्राण-गण में लाकर रख दिया.

अब मुद्दा ये फँसा कि मूर्ति बनाएगा कौन क्योंकि शाही कारीगर की एक भी छेनी उस लकड़ी पर कोई भी असर नहीं कर रहा था. ऐसे में माना जाता है कि, स्वर्ण निर्माता और कुशल कारीगर बूड़े व्यक्ति के भेस में राजा के पास आए और मूर्ति बनाने के लिए राजी हो गए. लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी की वे यह मूर्ति 21 दिन में बनाकर तैयार कर देंगे ऐसे में उन्हें कोई भी मूर्ति बनाते न देखे और इस बीच उस कमरे में कोई भी नहीं जाएगा, दरवाजा बाहर से बंद रहेगा.

राजा ने कारीगर के शर्त को मान कर यह फरमान जारी कर दिया कि उस कमरे में कोई नहीं जाएगा जहाँ वह कारीगर मूर्ति बना रहा था और वह कमरा भी बाहर से 21 दिन के लिए बंद रहेगा. ऐसे में लगातार हर दिन छेनी-हथौड़े की अवाज़ आती रही परंतु 15वें दिन कमरे से आवाज आना बंद हो गया.

उस दिन जब राजा कि पत्नी गुंडीचा रानी वहां से निकली तो उन्हें उस रूम से कोई भी सुनाई नहीं दिया. ऐसे में वह डर गई और सोचने लगी कि कहीं वह कारीगर मर न गया हो.

इस बात से परेशान होकर वह राजा के पास गयीं. राजा भी डर गए और अपने शर्तों को भूलकर और चेतावनियों को दरकिनार करके मंदिर का दरवाजा खोलने की अनुमति सैनिकों को दे दी. जब कमरा खुला तो बूढ़ा व्यक्ति गायब हो चुका था. वहीं तीन मूर्तियाँ अधूरी पड़ी हुई थी.

भगवान नील-माधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। ऐसे में भगवान विष्णु की इच्छा मानकर वैसे ही आधी बनी मूर्तियों को स्थापित करने का फैसला किया.

तब से लेकर अब तक जगन्नाथ भगवान उसी अधूरे रूप में विद्यमान हैं. और उनकी मूर्ति जब बनाई जाती है और 12 वर्ष बाद बदली जाती है तो वह भी अधूरी ही रहती है.

कहीं-कहीं अन्य कहानी भी जगन्नाथ मंदिर के बारे में विख्यात है—

राजा के सपने में भगवान ने दर्शन देकर कहा कि निलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है. जिसे नील-मादव के नाम से जाता है. तुम एक मंदिर बनवाकर मेरे उन मूर्तियों की स्थापना करो.

ऐसे में राजा ने अपने सेवकों को भेजकर उन मूर्तियों को लाने को कहा. वर्तमान में वे मूर्तियाँ आज भी स्थापित हैं और ऐसा माना जाता है कि आज भी उनका दिल धड़कता है. उन्हें बुखार भी आता है और दवा देने पर वे ठीक भी हो जाते हैं.

भक्त सालबेग और भगवान जगन्नाथ का संबंध

हर साल उड़ीसा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा के दर्शन करने देश विदेश से लाखों-करोड़ों भक्त एकत्रित होते हैं। इस आयोजन में शामिल होने वाले भक्त हमेशा एक बात से जरूर हैरान रहते हैं, वो बात यह है कि हर साल भगवान जगन्नाथ जी का रथ अपनी यात्रा के दौरान थोड़ी देर के लिए एक मुस्लिम की मजार पर रोका जाता है।

यह मंजर देख हर एक भक्त इस रहस्य के पीछे की सच्चाई जानने को उत्सुक रहता है। बताया जाता है कि जिस मुस्लिम की यह मजार है उसका नाम सालबेग था औऱ वह भगवान जगन्नाथजी का अनन्य भक्त था।

मंदिर के पुजारी और शहरवासी बताते हैं कि सालबेग यहीं का रहने वाला था। उसकी मां हिंदू थी और पिता मुस्लिम थे। यह उस समय की घटना है जब भारत पर मुगलों का शासन था।

सालबेग भी मुगल सेना में एक सैनिक के पद पर था। बताते हैं कि सालबेग प्रारंभ से ही मुस्लिम धर्म को मानता था, मगर उसके जीवन में घटी एक घटना ने उसे भगवान जगन्नाथ का भक्त बना दिया।

एक बार सालबेग के माथे पर गंभीर चोट लग गई थी। इस चोट के कारण एक बड़ा घाव हो गया, जिसका इलाज किसी भी हकीम और वैद्य के पास नहीं मिल रहा था। सालबेग ने हर जगह दिखा लिया था, मगर उसका जख्म ठीक नहीं हो रहा था। इस गंभीर घाव के कारण ही उसे मुगल सेना से भी निकाल दिया गया।

परेशान और हताश सालबेग दुखी रहने लगा। तब उसकी माता ने उसे भगवान जगन्नाथ जी की भक्ति करने की सलाह दी। सालबेग ने भी अपनी माता के बताए अनुसार भगवान जगन्नाथ जी की अनन्य भक्ति की।

सालबेग भगवान जगन्नाथजी की भक्ति में इतना खो गया था कि वो दिन-रात पूजा-अर्चना और भक्ति करने लगा। इसी भक्ति और पूजा-अर्चना के चलते सालबेग को मानसिक शांति और जीवन जीने की शक्ति मिलने लगी।

सपने में भगवान ने सालबेग को दिए दर्शन

मुस्लिम होने के कारण सालबेग को मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता। ऐसे में वह मंदिर के बाहर ही बैठकर भगवान की भक्ति करने लगता। ऐसा माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ जी उसे सपने में आकर दर्शन दिया करते। भगवान उसे सपने में आकर घाव पर लगाने के लिए भभूत देते और सालबेग सपने में ही उस भभूत को अपने माथे पर लगा लेता। उसके लिए हैरान करने वाली बात यह थी कि उसके माथे का घाव सचमुच में ठीक हो गया था।

क्यों, आज भी रुकती है वापस जाते हुए जगन्नाथ मंदिर की रथ यात्रा सालबेग के मजार पर

मुस्लिम होने के कारण सालबेग कभी भी भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन नहीं कर पाया और उसकी मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से पहले सालबेग ने कहा था, “यदि मेरी भक्ति में सच्चाई है तो मेरे प्रभु मेरी मजार पर जरूर आएंगे।” मृत्यु के बाद सालबेग की मजार जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर के रास्ते में बनाई गई थी।

इसके कुछ महीने बाद जब जगन्नाथजी की रथयात्रा निकली तो सालबेग की मजार के पास आकर भगवान का रथ रुक गया और लाख कोशिशों के बाद भी रथ इंचभर आगे नहीं बढ़ा। तभी पुरोहितों और राजा ने सालबेग की सारी सच्चाई जानी और भक्त सालबेग के नाम के जयकारे लगाए। जयकारे लगाने के बाद रथ चलने लगा। बस तभी से हर साल मौसी के घर जाते समय जगन्नाथजी का रथ सालबेग की मजार पर कुछ समय के लिए रोका जाता है।

भक्त सालबेग के भजन, आज भी लोगों नहीं भूले

भक्त सालबेग सारा जीवन मंदिर के बाहर बैठकर ही भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन की आस लगाए रहता था। वह रोज भगवान की जय-जयकार करता हुआ और भावों से भरा हुआ तुरंत जगन्नाथजी के मंदिर की तरफ उनके दर्शनों के लिए दौड़ पड़ता। मगर मुस्लिम होने के कारण उसे मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता।

ऐसे में वह मंदिर के बाहर बैठकर ही भगवान की भक्ति करने लगता है। प्रभु का नाम जपता है और उनके भजन लिखता है। धीरे-धीरे उसके भजन अन्य भक्तों की जुबान पर भी चढ़ने लगते। लोग बताते हैं कि सालबेग के बनाए भगवान के भजन लोगों को आज भी याद हैं।

जगन्नाथ रथ यात्रा देखने कैसे पहुँचे?

अगर आप भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा को देखने का प्लान बना रहे हैं और भगवान की भक्ति में खो जाना चाहते हैं, तो आपको बता दें कि यहाँ पर आप ट्रेन, बस, फ्लाइट या फिर अपने साधन से जा सकते हैं.

फ्लाइट से

यदि आप फ्लाइट से पावन भूमि जाना चाहते हैं तो आपको बता दें कि…….

  • वहाँ के लिए निकट-तम हवाई अड्डा भुवनेश्वर हवाई अड्डा है.
  • इस हवाई अड्डे से पूरी करीब 53 किलोमीटर की दूरी पर है.
  • एयरपोर्ट से निकलकर आप टैक्सी, कैब आदि वाहन को बुक करके मंदिर जा सकते हैं.

ट्रेन द्वारा कैसे जाएं

ट्रेन द्वारा जगन्नाथ पुरी जाकर रथ यात्रा देखना चाहते हैं तो ऐसे में ये उपाय आपके लिए कारगर है….

  • मंदिर के पास ही पूरी रेलवे स्टेशन है.
  • यह रेलवे स्टेशन ईस्ट कोस्ट रेलवे का अंतिम स्टेशन है.
  • यहाँ के लिए एक्सप्रेस और अन्य सूपर फास्ट ट्रेनें आसानी से मिल जाती हैं.
  • ये ट्रेनें नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, अहमदाबाद, तिरुपति और अन्य प्रमुख स्थानों से बनकर चलती हैं.

सड़क मार्ग से….

यदि आप सड़क मार्ग से मंदिर पहुँचना चाहते हैं, तो ऐसे में आप रोडवेज का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. जगन्नाथ पुरी के लिए यहाँ से सबसे निकटतम बस स्टैंड गुंडीचा मंदिर के करीब स्थित है. यह रास्ता भुवनेश्वर और कटक से सीधा जुड़ा हुआ है. आप पुरी मंदिर, आराम से इस बस स्टैंड पर उतरने के बाद 10 से 15 मिनट में पहुँच सकते हैं बशर्ते वह समय पर्व का न हो.

( धार्मिक मान्यता पर आधारित… गलती या त्रुटि मिलने पर कृपया हमें CONTACT US के माध्यम से बताएं…)

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