कुछ कहने को नहीं करने की कला हैं श्री कृष्णPhoto by Ethan Adhikary Utpal on <a href="https://www.pexels.com/photo/close-up-photo-of-radha-and-krishna-statues-8051165/" rel="nofollow">Pexels.com</a>

श्री कृष्ण कुछ कहने को नहीं करने की कला हैं, उन्हें सिर्फ कर्म करके ही प्राप्त किया जा सकता है. न की उनके नाम पर डींगे हाँककर या ढोंग रचकर. वे संसार के हर काल और कण में विद्यमान हैं बशर्ते आपके अंदर उस कण को समाहित करने की क्षमता और श्री कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम मन से अंकुरित होना चाहिए.

प्रेम का तात्पर्य आज वाले प्रेम से नही है जहाँ कार्य पूर्ण होते ही सामने वाले को छोड़ दिया जाए, प्रेम वो भी नहीं जिसमें प्रभु के नाम पर गलत वीडियो, लेखन या अन्य सामग्री परोसी जाए जिसके बारे में उसे खुद सटीक जानकारी न हो या भ्रमित करने वाली हो.

वास्तव में कहा जाए तो भगवान से भक्त का प्रेम तभी हो सकता है जब वह छलावे से अभी-भूत न होकर, उनके नाम पर पब्लिसिटी के चक्कर में न पड़कर उन्हें माँ यशोदा जैसा प्रेम करें, गोपियों जैसा उन्हें अपना सर्वस्व माने और मीरा के धुन जैसा हरि नाम का सुमिरन करें ताकि प्रभु आपके पास खुद खींचे आने के लिए मजबूर हो सके.

श्री कृष्ण केवल प्रेम के भूखे

यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि आपको, आपके लगाए गए पौधे के अनुरूप ही फल प्राप्त होता है इमली लगाने पर आपको आम का स्वाद उस पेड़ के फल से नहीं मिल सकता है. ठीक ऐसे ही, आपके द्वारा किए गए कर्म भी श्री कृष्ण को प्राप्त करने का रास्ता हो सकता है जिसपर चलकर आप, उनके(श्री कृष्ण) समस्त कलाओं का आनंद वास्तविक ऋषि, मुनियों और तपस्वियों की तरह ले सकते हैं.

परंतु इसके लिए आपका सही फल(रास्ता) का चुनाव करना बहुत आवश्यक है ताकि भ्रमित संसार में आपको, अपने जीवन का लक्ष्य और उस लक्ष्य तक पहुँचाने वाले साधन तक पहुँचने वाले मार्ग में बाधा उत्पन्न न हो ऐसे में आपको पहले ही उस फल को प्राप्त करने में आने वाली समस्याओं के लिए इंतजाम कर लेना आवश्यक है.

इसके बावजूद भी जरूरी नहीं है कि उनका सानिध्य आपको मिले ही. क्योंकि उनको पाना आसान तो नहीं है पर, जैसा की कहा गया है कि, कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा… अर्थात कलयुग में भगवान का सच्चे मन से स्मरण भी आपको प्रभु के समीप ले जा सकता है.

परंतु इसके लिए आपको करना होगा अपने लालच का त्याग, अपने धन का त्याग, आपको प्यार करने वालों का त्याग और इन जैसे अन्य लोभ-कारी वस्तुओं का त्याग जो आपको प्रभु श्री कृष्ण के मार्ग से भटकाती हो छोड़ना पड़ सकता है. जो कि वर्तमान समय के वातावरण को देखकर कम ही लगता है कि ऐसा कोई कर सकता है .

लेकिन, सच्चे मन से प्रभु श्री कृष्ण का नाम लेना और उनका स्मरण करना आज भक्ति से ज्यादा ढोंग और दिखावे या लूटने का जरिया बन गया है. आज के जीवित प्राणियों के लिए प्रभु का सच्चे मन से नाम लेना साँप के फन के समान हो गया है जिसका प्रयोग पब्लिसिटी पाने के लिए और इंटरनेट जाल पर वायरल होने के लिए ज्यादा हो रहा है. जिससे गत वर्षों में कुछ कहने को नहीं करने की कला हैं श्री कृष्ण के छवि पर गलत प्रभाव पड़ने का आशंका है.

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