फिल्मों में cinematography द्वारा, कहानी सुनाने या बताने का तात्पर्य यह नहीं है कि उसमें केवल सामने, ऑब्जेक्ट में हो रही गतिविधियों को ही रिकॉर्ड करने की एक कला है। वास्तव में फिल्मों का निर्माण करने से पहले यानी डायरेक्टर, कैमरा पर्सन, लाइटिंग मैन आदि मुकाम हासिल करने तक लंबे समय के लिए आपको अपने आप को गहन प्रैक्टिस और हर वस्तु या परिवेश पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत होगी जो एक छायाकार को छायांकन के दौरान काम आ सकती है। अगर इस मुकाम को कोई व्यक्ति प्राप्त कर ले और उसका सही से पालन करे तो वह अर्थहीन फ़िल्म मेकिंग से बचकर एक महान सिनेमेटोग्राफर बन सकता है । दूसरे शब्दों में कहें कि सिनेमेटोग्राफर वह शिल्पकार हो सकता है जो कि किसी मूर्ति को इस प्रकार के ढांचे में पिरोने का प्रयास करता है ताकि देखने वाले वाह-वाह कर उठें।
आइए अब सिनेमेटोग्राफ की परिभाषा जानते हैं….
छायांकन की परिभाषा को देखें तो “यह चलचित्र बनाने की एक विधा है”। पर छायांकन(cinematography) को समझने के लिए इसकी परिभाषा के और आगे हमें सफर करना होगा।
वास्तव में छायांकन(cinematography) वह कला है जिसके अन्तर्गत किसी ऑब्जेक्ट(विषय) मे लगातार हो रहे बदलाव को कौशल के साथ एक सांचे में ढाल कर उसे मोशन पिक्चर या फ़िल्म या मूवी के रूप में दृश्य कहानी के रूप में सामने लाना है। हालांकि, अगर देखा जाए तो , छायांकन वह विधा है जिसके अन्तर्गत कलाकृति(object) के प्रकाश को या तो वैज्ञानिक माध्यम से छवि संवेदन पर या रासायनिक रूप से फ़िल्म पर उतारने के एक क्रिया है।
छायांकन उन छवियों का निर्माण है जो एक दर्शक स्क्रीन पर देखता है। इसके अंतर्गत शॉट्स को एकरूपता और तारतम्यता के रूप में लगाया जाता है जिससे एक कहानी में सामंजस्य बैठाया जा सके।
एक छायाकार की भूमिका क्या है?
एक छायाकार, फोटोग्राफी के निदेशक के रूप में भी जाना जाता है, कैमरा और लाइटिंग क्रू का प्रभारी होता है। इनके ऊपर फ़िल्म के रंग, रूप, प्रकाश व्यवस्था और हर एक शॉट को अंतिम रूप देने की जिम्मेदारी होती है। फ़िल्म का निर्देशक और छायाकार एक साथ मिलकर फ़िल्म के काम को आगे बढ़ाते हैं, क्योंकि, एक छायाकार का यह कर्तव्य होता है कि वह निर्देशक के पसंद और न पसंद का ख्याल रखे, यही बात निर्देशक पर भी लागू होती है। अगर निर्देशक और छायाकार में मनमुटाव हो जाए तब या तो फ़िल्म फ्लॉप होने की संभावना है या फिर फ़िल्म ही न बन पाए।
इसके साथ अगर किसी मूवी का बजट बहुत कम है तो ऐसे समय मे एक छायाकार कैमरा ऑपरेटर के रूप में कार्य कर सकता है।
छायांकन(cinematography) और फोटोग्राफी में क्या अंतर है?
वास्तव में देखा जाए तो छायांकन और फोटोग्राफी में बहुत ज्यादा अन्तर नहीं है। एक फोटोग्राफर, जो कि केवल एक फ़ोटो लेता है(उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री संग्रहालय की बाहरी फोटो), अपने आप मे सम्पूर्ण हो सकता है, परंतु एक छायाकार शॉट्स के बीच और शॉट्स के समूहों के बीच संबंधों से संबंधित है। अब यहाँ पर एक उदाहरण से दोनों को एक साथ समझने का प्रयास करते हैं। एक फोटोग्राफर कोई फ़ोटो खींचता है पर किसी कारण के कारण वह फ़ोटो साफ नही दिखती ऐसे में वह इस फ़ोटो को हटा कर एक और फ़ोटो लेने का प्रयास करेगा ताकि उसे साफ फ़ोटो मिल सकें। वहीं छायाकार शायद उससे कोई संदेश या आगे आने वाले चित्र का इशारा दे रहा हो जो उसके कहानी का भाग हो।
कहने का तात्पर्य यह है कि एक फोटोग्राफर के लिए कोई तस्वीर खराब हो सकती है परंतु वह तस्वीर छायाकार के लिए फ़िल्म की शैली और उसके एकीकरण की तरफ संकेत करती है।
छायांकन, फोटोग्राफी का एक विस्तृत रूप है. जिसके अंतर्गत किसी ऑब्जेक्ट की निरंतर रूप से ली गई फोटो को इस प्रकार से सिक्वेंस में ढाला जाता है जिससे वे चलचित्र के रूप में दिखती हैं. उदाहरण के लिए शॉन एण्ड शीप( ब्रिटिश टेलिविजन सीरीज). यही काम आज के डिजिटल कैमरा भी करते हैं लेकिन अद्यधित रूप में हम सब के समक्ष है.
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