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यह दिन कोई सामान्य दिन नही है ; प्रभु श्री राम की प्राण प्रतिष्ठा, भारत के आत्मा की प्रतिष्ठा के साथ आज कहीं न कहीं भारत की सांस्कृतिक आज़ादी के रुप में देखी जा रही है…

हमारे राष्ट्र मन्दिर में हमारी पहचान प्रभु श्री राम की प्राण प्रतिष्ठा अरबों लोगों की आकांक्षा का प्रतिफल है..

प्रभु राम का दूसरा वनवास आज पूर्ण हुआ, यह दिन दीपोत्सव का दिन है।

दुनियां के हर धर्म, पंथ में देवालय का अपना विशेष महत्व है .भारत की सनातनी परंपरा में मन्दिर का उल्लेख तो हमें शतपथ ब्राह्मण में मिलने लगता है आगे अपने देवता को एक मूर्त रूप देकर उनकी आराधना करना और उसके माध्यम से जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष* को प्राप्त करने के लिए *भक्ति* का श्वेतांबर उपनिषद में वर्णन है.

सनातन संस्कृति में मन्दिर सिर्फ़ आराध्य के पूजन के स्थल ही नहीं रहे हैं अगर आप दक्षिण भारत का इतिहास देखेंगे तो आपको पता चलेगा कैसे द्रविड़ शैली के मन्दिर भारत की संस्कृति के साथ ही शिक्षा, न्याय शास्त्र और कई समाजिक आयोजनों के केन्द्र रहे हैं. उस समय मन्दिर, तत्कालीन वैभव, तकनीक और कुशल शिल्पकला के भी प्रमाण रहे हैं…

आज भी पद्मनाभ मन्दिर, एहोल के दुर्गा मन्दिर, कोणार्क के सूर्य मन्दिर आदि अपनी विशिष्ट तकनीकी कौशल से इंजीनियरों को चकित कर देते हैं..

प्रभु राम के मंदिर निर्माण के साथ ही आज अवधपुरी अपनी विकास यात्रा पर निकल चुकी है सूर्य वंश का सूर्य अब पुनश्च बादल की छटाओं को हटाकर कर प्राची दिशा से उदित हो चुका है. संस्कृति की शिथिलता के निशा का अंत होकर वैभव और रामराज के उषाकाल का आरंभ दिखने लगा है.

आज अयोध्या के विकास को देखकर ऐसा लगता है मानो अयोध्या आने वाले समय में भारत की ही नहीं विश्व की सांस्कृतिक राजधानी बनने वाली है.

मन्दिर के बन जाने से आर्थिक विकास का जो मार्ग खुलेगा उससे आने वाले दिनों में अयोध्या की दिशा और दशा ही बदल जायेगी.

आज इस शुभ दिन पर जब प्रभु अपने गृह में स्थापित हो रहे हैं तो इस अमृत काल से नए संकल्प की शुरूआत होगी.

इस लेख के माध्यम से मैं युवाओं से अपील करना चाहूंगा कि वे अपने व्यक्तिगत जीवन में उन्नति के साथ-साथ अपनी विशिष्ट संस्कृति को भी उतना ही महत्व दें, पश्चिम के विचारधारा को ही आधुनिक नहीं मानें. इन दोनों के बीच के अंतर को समझना आज बहुत जरूरी है, आधुनिकता हमारे सनातन संस्कृति में कूट- कूट कर भरी है और रही बात विकृतियों की तो ये किस समाज में नहीं हैं और काल दर काल इसे दूर किया ही गया है..

अगर आपको भ्रम है की पश्चिम का समाज आधुनिक है तो उसकी यात्रा को समझिए हमारे उपनिवेश बनाए जाने की परिणीति ही उसऔद्योगिक क्रांति का आधार बनी जिसका दंभ आज लोग भरते हैं इन चीजों को पढ़िए, समझिए और अपने संस्कृति पर गर्व कीजिए.

आप संस्कृति को भी सीमित दायरे में मत देखिए इस भारत भूमि पर रहने वाले हर व्यक्ति की संस्कृति भारतीय संस्कृति है , दुःख तब होता है जब हमारे धर्म के ही लोग इससे इतर होते जाते हैं और इसे हेय दृष्टि से देखते हैं.

जबकि कई सारे मुस्लिम ,बौद्ध, सिक्ख और जैन अपनी पहचान को हमारी संस्कृति से जोड़कर देखते हैं .

बुद्ध, महावीर और नानक यहीं के हैं. रही बात बुत शिकन करने का उन्माद लिए कुछ अतातायी तो वे भी काल के गाल में समा गए पर हमारी पहचान न मिटा सके.

एक इतिहास के शिशु विद्यार्थी के रुप में मैनें विकृत इतिहास को भी पढ़ा जिसे वामपंथ के ठेकेदारों ने लिखा साथ ही प्राचीन इतिहास और संस्कृति के गौरव को भी पढ़ा. हमारे महाकाव्य काल को काल्पनिक बता कर टूट पूंजिए इतिहासकारों ने जो स्तुति गान सल्तनत काल और मुगल काल की करी उसका चतुर्थांश भी हर्ष, कृष्णदेव राय, शिवाजी,विक्रमादित्य जैसे राजाओं और उनके शासन का नहीं किया इससे हमारी एक पीढ़ी अपने को हीन भावना से ग्रस्त समझने लगी पर अब धुंध हट रहा है.

यहां तक कि इस्लामी शासकों में जैनुल आबेदीन जैसे शासकों की उपेक्षा की गई जो अपने दायरे में अकबर जैसे बादशाह से कई गुना बेहतर था.. खैर, इसपर चर्चा की जाए तो घंटो बात हो सकती है लेकिन, देश के हर व्यक्ति को यह जानना होगा अब भारत और गुलामी नहीं सह सकता है .

मैं हमेशा से कहता हूं ईरानी, शक, पहलव से शुरू हुई भारत की सांस्कृतिक लूट की परंपरा अंग्रजों तक प्रत्यक्ष रुप से चली है और उनके बाद भी उनके अनुयायी आज उस मंतव्य को पूरा करने में लगे रहते हैं पर आज देश सांस्कृतिक रूप से चेतनशील हो रहा है अपनी संस्कृति को नेपथ्य में समझकर पश्चिम को ही आधुनिकता का पर्याय माने वाला युवा आज अपने विरासत और गौरव को समझने लगा है और कहीं ना कहीं यही सांस्कृतिक चेतना स्वामी विवेकानंद भारत में लोगों के अंदर देखना चाहते थे.

बात आज की करते हैं. 1528 के उस समय की कल्पना कीजिए जब एक राक्षस ने हमारे सनातन के सूर्य का मन्दिर विध्वंस किया होगा क्या स्थिति रही होगी उस समय लोगों की ?कितने आहत हुए होंगे लोग ?उसकी कल्पना ही करने से ही रूह कांप जाती है पर समय बदला दशा बदली,आज शुभ दिन आया है.

500 सालों के संघर्ष के बाद आज प्रभु पुनः वापस आए हैं.

राम आ गए हैं तो हमें रामतत्व को समझने की जरुरत है ,अगर इतिहास की गूढ़ व्याख्या की जाए तो हमें मिलता है कि पृथु, मनु,मांधाता, हरिश्चंद्र ,भागीरथ, दिलीप, रघु और दशरथ की परंपरा के क्रम में राम भारतीय संस्कृति की पहचान हैं.

एक तरफ जहां मनु ने प्रथम मनुष्य के पद को सुशोभित किया, भागीरथ ने जीवन दायिनी गंगा का अवतरण कराया, हरिशचंद्र ने सत्य के लिए सब त्याग दिया उसी परंपरा में प्रभु राम ने एक मनुष्य के रूप में हमें मनुष्यता सिखाया.

अपने सामाजिक संबंधों और परिवार के बीच कैसा व्यवहार किया जाना चहिए इसमें राम से बड़ा कोई उदाहरण नहीं हो सकता है यहां तक कि समाज के सबसे पिछड़े और अपने शत्रु से व्यवहार को भी मर्यादित कर उन्होंने हमें मार्ग दिखाया. निजी तौर पर मेरा मानना है राम की पहचान के बिना भारत शून्य है. इसलिए कहा गया है राम जीवन की प्रथम पाठशाला हैं और कृष्ण उनके आगे की यात्रा…

कहने को तो इतना कुछ है कि समय और शब्द कम पड़ जायेंगे..

अपने इष्ट प्रभु राम से इस शुभ दिन यही प्रार्थना करूंगा..

सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।

हे प्रभु! आप समस्त मानव जाति का कल्याण करें जो भटके हुए लोग हैं उनको सद्बुद्धि दें|

अपनी कृपा अपनी प्रजा पर बनाए रखें, क्योंकि हमारे राजा कल भी आप ही थे नाथ! आज भी आप ही हैं और जब तक सृष्टि है आप ही हमारे राजा हैं|

आप मनुष्यत्व से देवत्व की यात्रा हैं|

This post is written by Alok Kumar Mishra…

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