Akbar and Rani Durgavati

Akbar and Rani Durgavati: जरा सोचिए… एक बादशाह, जो पढ़ना-लिखना जानता ही नहीं था, लेकिन दुनिया भर के धर्मगुरुओं को बुलाकर घंटों बहस सुनता था। और दूसरी तरफ एक रानी, जिसके पास न बड़ी फौज थी, न तोपें। फिर भी उसने कहा था, कि अपमान की जिंदगी से अच्छा है सम्मान की मौत। ये दोनों आमने-सामने आए साल 1564 में, जबलपुर के पास, नरई के एक तंग दर्रे में।

तो इस वीडियो में हम समझेंगे: रानी दुर्गावती थीं कौन? उनका राज्य इतना खास क्यों था कि मुगलों की नजर उस पर पड़ी? आसफ खान ने हमला कैसे किया? नरई के मैदान में आखिरी दिन क्या हुआ? और उसी अकबर की जिंदगी के वो पहलू भी, जो हमें स्कूल की किताबों में एक साथ नहीं मिलते: उसकी महानता भी और उसके काले पन्ने भी। वीडियो आखिर तक देखिएगा, क्योंकि कहानी का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा अंत में है।(Akbar and Rani Durgavati)

भाग 1: रानी दुर्गावती कौन थीं

अब शुरू से शुरू करते हैं। दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को चंदेल राजवंश में हुआ। यह वही चंदेल वंश है जिसने खजुराहो के मंदिर बनवाए। उनके पिता का नाम कीरत राय बताया जाता है, और जन्मस्थान आम तौर पर कालिंजर का किला माना जाता है। हालांकि कुछ जगह महोबा भी लिखा मिलता है, इसलिए इस पर थोड़ा मतभेद है।

1542 में उनकी शादी गोंड राजवंश के दलपत शाह से हुई। गोंड राज्य को उस वक्त गढ़ा-कटंगा कहा जाता था। बता दें कि गोंड कोई छोटा-मोटा राज्य नहीं था। जंगलों, पहाड़ों और नर्मदा के बीच बसा, अमीर और अपनी मर्जी का मालिक।

फिर आया 1550 के आसपास का वो मोड़। दलपत शाह का निधन हो गया। बेटा वीर नारायण अभी छोटा था। ऐसे में रानी ने रोने-धोने की जगह राज्य की बागडोर खुद थाम ली। यानी एक विधवा रानी, एक नाबालिग बेटा, और चारों तरफ ताकतवर पड़ोसी। जरा सोचिए, कितना भारी बोझ रहा होगा।

भाग 2: सिर्फ योद्धा नहीं, राज चलाना भी जानती थीं

अब समझ लेते हैं कि रानी ने राज कैसे चलाया। उन्होंने आधार कायस्थ और मान ठाकुर जैसे समझदार मंत्रियों के साथ मिलकर राज्य की व्यवस्था संभाली। कई तालाब और झीलें बनवाईं, विद्वानों को सहारा दिया, और कई मुस्लिम अधिकारियों को ऊंचे पद दिए। सीधी बात, उनका राज्य धर्म देखकर नहीं, काबिलियत देखकर चलता था।

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपनी राजधानी सिंगौरगढ़ से हटाकर चौरागढ़ कर दी। चौरागढ़ सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच था, यानी दुश्मन के लिए पहुंचना आसान नहीं।

और ये फैसला बेवजह नहीं था। मालवा के शासक बाज बहादुर ने उनके राज्य पर हमला किया था, और रानी ने उसे हरा दिया। जी हाँ, वही बाज बहादुर, जो रानी रूपमती की प्रेम कहानी के लिए मशहूर है। इस जीत के बाद रानी का नाम दूर-दूर तक फैल गया। लेकिन कहावत है ना, “जहाँ फूल होते हैं, वहाँ भौंरे भी मंडराते हैं।” जहाँ दौलत होती है, वहाँ नजरें भी पड़ती हैं।

भाग 3: उधर अकबर का साम्राज्य बढ़ रहा था

अब आपको बताते हैं कि मुगल क्या कर रहे थे। 1562 में मालवा मुगल साम्राज्य में मिल गया। मतलब अब गोंडवाना की सीमा सीधे मुगलों से जा लगी। दूसरी तरफ रीवा के राजा को भी मुगल सेनापति ने हराया था।

यह मुगल सेनापति था ख्वाजा अब्दुल मजीद, जिसे इतिहास में आसफ खान के नाम से जाना जाता है, और वो उस वक्त कड़ा-मानिकपुर का हाकिम था। कई स्रोत कहते हैं कि गोंडवाना की दौलत देखकर उसके मुँह में पानी आ गया, और उसने बादशाह से इजाजत लेकर चढ़ाई कर दी। यानी ये सिर्फ सीमा का झगड़ा नहीं था। ये एक फैलता हुआ साम्राज्य बनाम एक आजाद राज्य की लड़ाई थी।

एक बात साफ कर दें कि सेना के सही आंकड़ों पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। कहीं मुगलों की ओर करीब 10,000 घुड़सवार लिखे मिलते हैं, लेकिन इसे पक्का मानकर मत चलिए। बस इतना तय है कि मुगल सेना बड़ी थी, ट्रेनिंग वाली थी और उसके पास भारी तोपें थीं। रानी के पास कम सैनिक थे और पुराने हथियार।

भाग 4: नरई का युद्ध, पहला दिन

अब आते हैं इस कहानी के सबसे अहम हिस्से पर। रानी को पता था कि खुले मैदान में वो नहीं जीत सकतीं। उनके मंत्री आधार ने भी मुगल ताकत के बारे में चेताया। लेकिन रानी ने झुकना नहीं चुना। कहा जाता है कि रानी ने कहा था, कि अपमानजनक जीवन जीने से बेहतर है सम्मान से मर जाना। इन शब्दों की सटीक भाषा पर हम पक्का दावा नहीं कर सकते, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार की साइट तक पर ये भाव उनके नाम से दर्ज है।

लड़ाई के लिए उन्होंने चुनी नरई। एक तरफ पहाड़ियां, दूसरी तरफ गौर और नर्मदा नदी। मतलब एक तंग रास्ता, जहाँ बड़ी सेना भी खुलकर नहीं फैल सकती।

पहले दिन उनके फौजदार अर्जुन दास मारे गए। तब रानी ने खुद कमान संभाली। जैसे ही मुगल सैनिक घाटी में घुसे, गोंड सैनिकों उन पर टूट पड़े और उन्हें घाटी से बाहर खदेड़ दिया। मानिए या न मानिए, पहला दिन रानी के नाम रहा।

फिर रानी ने रात में हमला करने का सुझाव दिया ताकि दुश्मन संभल न पाए। पर उनके सलाहकार राजी नहीं हुए। और यही वो चूक थी, जिसकी कीमत अगली सुबह चुकानी पड़ी।(Akbar and Rani Durgavati)

भाग 5: आखिरी दिन

रात भर में आसफ खान ने अपनी भारी तोपें मंगवा लीं। अगली सुबह रानी अपने प्रिय हाथी सरमन पर सवार होकर मैदान में उतरीं। उनके साथ बेटा वीर नारायण भी था। कहा जाता है कि उसने मुगलों को तीन बार पीछे धकेला, लेकिन फिर बुरी तरह घायल हो गया और उसे सुरक्षित जगह ले जाना पड़ा।

फिर रानी को एक तीर कान के पास लगा, दूसरा गर्दन में। वे बेहोश हो गईं। होश आया तो हालात साफ थे। महावत ने कहा, “रानी, यहाँ से निकल चलिए।” पर रानी ने इनकार कर दिया। दुश्मन के हाथों जिंदा पकड़ी जाने से अच्छा था अपने हाथों से जान दे देना। उन्होंने अपनी कटार निकाली और खुद को खत्म कर लिया। तारीख थी 24 जून 1564। आज इसे बलिदान दिवस के रूप में याद किया जाता है।

उसके बाद क्या हुआ? बताते चलें कि लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई। कुछ स्रोतों के मुताबिक वीर नारायण ने चौरागढ़ के किले से कुछ समय तक मुकाबला किया, पर अंत में मारे गए, और किले की महिलाओं ने जौहर कर लिया। यानी गोंड राज्य का पतन हो गया।

भाग 6: अब असली सवाल, अकबर कैसा इंसान था?

यहाँ एक सवाल उठता है। जिस अकबर की सेना ने ये किया, उसे हम “महान” भी तो कहते हैं। तो सच क्या है? अब समझाते हैं, क्योंकि जवाब “दोनों” है।

पहला पहलू: पढ़ना न जानने वाला जिज्ञासु।

अकबर औपचारिक रूप से निरक्षर था। फिर भी 1575 में फतेहपुर सीकरी में उसने “इबादतखाना” बनवाया, जहाँ अलग-अलग धर्मों के विद्वान आकर चर्चा करते थे। पहले सिर्फ मुस्लिम विद्वान थे, बाद में हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई सब बुलाए गए। उसने “सुल्ह-ए-कुल” यानी सबके साथ शांति का विचार अपनाया। और 1582 में दीन-ए-इलाही शुरू किया।

एक भ्रम दूर कर दें। दीन-ए-इलाही कोई बाकायदा नया धर्म नहीं था, न उसकी कोई किताब थी, न पुरोहित। ये ज्यादातर एक छोटा सा नैतिक समूह था, जिसमें अकबर के चुनिंदा दरबारी शामिल हुए। उनकी गिनती को लेकर अलग-अलग स्रोतों में अलग संख्या मिलती है, करीब 18 से 21, पर इतना तय है कि ये बहुत छोटा रहा। यानी इसे किसी पर थोपा नहीं गया।

दूसरा पहलू: तूफानी रफ्तार।

1573 में गुजरात में बगावत हुई। अकबर फतेहपुर सीकरी से निकला और बहुत कम दिनों में अहमदाबाद पहुंच गया। कई पुराने ब्योरों में इसे करीब 9 दिन की रफ्तार बताया गया है, जबकि आप कुछ जगह 11 दिन भी पढ़ेंगे। पक्का आंकड़ा भले अलग हो, पर बात वही है कि बागियों को अकबर के आने की भनक तक नहीं थी।

तीसरा पहलू: काला पन्ना।

अब वो हिस्सा, जो असहज है। 1567-68 में चित्तौड़ की घेराबंदी हुई। बताया जाता है कि अकबर ने अपनी बंदूक “संग्राम” से किले के रक्षक जयमल को गोली मारी, और उसके बाद किले का पतन हो गया। मुगल दरबारी इतिहास और बाद के कई इतिहासकार दर्ज करते हैं कि उसके बाद अकबर ने आम लोगों के कत्लेआम का हुक्म दिया। आमतौर पर आंकड़ा 30,000 का बताया जाता है। हालांकि इस संख्या पर विद्वानों की राय एक जैसी नहीं है, इसलिए इसे “लगभग” ही कहना ठीक है।

और 1601 में असीरगढ़ के किले को अकबर ने सिर्फ ताकत से नहीं, बल्कि चालाकी और रिश्वत के जरिए भी हासिल किया। साथ ही कुछ स्रोतों में किले के भीतर महामारी फैलने का जिक्र भी है। यानी वही अकबर, जो एक तरफ सबको साथ बिठाने की बात करता था, दूसरी तरफ साम्राज्य के लिए बेहद सख्त फैसले भी लेता था।

भाग 7: जब अपने ही बेटे ने तोड़ दिया

अब इस कहानी का अंत सुनिए, जो और भी अजीब है। अकबर का बड़ा बेटा सलीम, जो आगे चलकर जहाँगीर बना। सलीम ने बगावत की, इलाहाबाद में अपना दरबार लगा लिया। और उसकी सबसे बड़ी जलन थी अबुल फ़ज़ल से।

अबुल फ़ज़ल कौन थे? अकबर के सबसे करीबी दोस्त, सलाहकार, “नवरत्न” में से एक, और “अकबरनामा” के लेखक। सलीम को शक था कि अबुल फ़ज़ल बादशाह के कान भरेंगे और उसके खिलाफ कदम उठवाएंगे।

अगस्त 1602 में अबुल फ़ज़ल दक्कन से लौट रहे थे। नरवर के पास ओरछा के बुंदेला सरदार वीर सिंह देव की टुकड़ी ने उन पर घात लगाकर हमला किया और उनकी हत्या कर दी। कहा जाता है कि ये सलीम के उकसावे पर हुआ, और उनका कटा सिर सलीम के पास भेजा गया। खबर सुनकर अकबर टूट गया। स्रोत बताते हैं कि दरबार में किसी की हिम्मत नहीं हुई उसे ये बात बताने की, और जब पता चला तो वो कई दिनों तक किसी से मिला नहीं, गहरे शोक में रहा।

सोचिए, जो बादशाह दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य चला रहा था, वो अपने ही घर के षड्यंत्र को रोक नहीं पाया।

तो इस पूरी कहानी का निचोड़ क्या है?(Akbar and Rani Durgavati)

एक तरफ रानी दुर्गावती, जिन्होंने अच्छा शासन भी किया और आखिर में जान देकर भी झुकना नहीं चुना। आज जबलपुर का विश्वविद्यालय उनके नाम पर 1983 से है, और 1988 में भारत सरकार ने उनके नाम का डाक टिकट भी जारी किया। दूसरी तरफ अकबर, जो न पूरा हीरो था, न पूरा खलनायक। एक ही आदमी में सहनशीलता भी थी और बेरहमी भी।

इतिहास अक्सर हमें एक रंग में दिखाया जाता है। पर असल इतिहास में लोग काले-सफेद नहीं, बल्कि कई रंगों के होते हैं। रानी दुर्गावती की बहादुरी को याद करने के लिए अकबर को झूठा बनाना जरूरी नहीं, और अकबर की खूबियां गिनने के लिए रानी की कुर्बानी को छोटा करना भी जरूरी नहीं।

अब आपसे एक सवाल: आपको क्या लगता है, क्या हम इतिहास के किरदारों को “अच्छा” या “बुरा” कहने के बजाय उन्हें उनके अच्छे-बुरे दोनों कामों के साथ देख सकते हैं? कमेंट में जरूर बताइए।

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