Ahilyabai Holkar

Ahilyabai Holkar: जन्म, परिवार और प्रारंभिक जीवन

अहिल्याबाई होलकर(Ahilyabai Holkar) का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के चौंडी गाँव (अहमदनगर) में हुआ था। उनके पिता मानकोजी राव शिंदे उस गाँव के मुखिया (पटेल) थे। अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) किसी राजघराने में नहीं, बल्कि एक साधारण ग्रामीण (धांगड़ पशुपालक) परिवार में पली-बढ़ीं।

उस दौर में लड़कियों की औपचारिक शिक्षा प्रचलित नहीं थी, फिर भी बाल्यावस्था में ही उन्होंने घर के द्वार पर बैठकर पढ़ना-लिखना सीखा और पिता ने भी उन्हें शिक्षित करने में योगदान दिया। उनकी इसी ज्ञान-पिपासा ने भविष्य में उनके नेतृत्व क्षमता की नींव रखी।

बहुत कम आयु में अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) का विवाह मराठा सेनापति मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव होलकर से तय हुआ। केवल 8 वर्ष की उम्र में एक मंदिर में पूजा करते समय मल्हारराव की नज़र अहिल्या पर पड़ी और उनके सौम्य व्यक्तित्व से प्रभावित होकर मल्हारराव ने अहिल्या का रिश्ता अपने बेटे से तय कर दिया।

लगभग 14 साल की आयु (वर्ष 1733) में उनका विवाह खंडेराव से हुआ। विवाह के बाद उन्होंने एक पुत्र मलेराव (जन्म 1745) और एक पुत्री मुक्ताबाई (जन्म 1748) को जन्म दिया।

सन् 1754 में कुम्हेर के युद्ध के दौरान तोप के गोलों की चपेट में आकर पति खंडेराव का निधन हो गया। उस समय प्रचलित रीति के अनुसार अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) से सती होने की अपेक्षा थी, किंतु ससुर मल्हारराव होलकर ने दृढ़ता से उन्हें सती होने से रोका। मल्हारराव ने विधवा बहू को आत्मदाह की आग में झोंकने की बजाय राज्यकार्य और सैन्य संचालन का प्रशिक्षण दिया।

अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) ने भी इस विश्वास को सार्थक किया – उन्होंने ससुर के अभियानों के दौरान राज्य की बागडोर संभाली और शासन-कला में निपुणता प्राप्त की। मल्हारराव और अहिल्याबाई के बीच पत्राचार से भी सिद्ध होता है कि उन्होंने प्रशासनिक ज्ञान एवं कुशलता विकसित कर ली थी।

Ahilyabai Holkar: शासनकाल और प्रमुख कार्य

1766 में मल्हारराव होलकर की मृत्यु हुई, तब अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) के इकलौते पुत्र मलेराव ने राजगद्दी संभाली परंतु वह मानसिक रूप से अस्वस्थ था और एक वर्ष के भीतर 1767 में उसका भी निधन हो गया। पुरूष उत्तराधिकारी के अभाव में कुछ दरबारियों ने सलाह दी कि होलकर वंश में से किसी बालक को गोद लेकर राजा बनाया जाए, जिससे वास्तविक सत्ता सलाहकारों के हाथ रहे।

लेकिन अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) ने इस छल को भांप लिया और मराठा पेशवा से स्वयं शासन की अनुमति और समर्थन प्राप्त कर लिया। इस प्रकार वे 1767 में इंदौर राज्य (मालवा क्षेत्र) की शासक बनीं और 1795 में अपने निधन तक शासन करती रहीं। उस युग में एक महिला द्वारा राज्य की बागडोर संभालना अभूतपूर्व था, किंतु अपने सुशासन द्वारा अहिल्याबाई ने स्वयं को सिद्ध किया।

राज्यकार्य संभालते ही अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) ने प्रशासन को सुचारु रखने हेतु महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने मल्हारराव होलकर के दत्तक पुत्र तुकोजीराव होलकर को होलकर सेना का प्रधान सेनापति नियुक्त किया, जिन्होंने आगामी 28 वर्षों तक निष्ठा से उनका साथ दिया।

अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) ने प्रशासनिक केन्द्र इंदौर से हटाकर पवित्र नर्मदा तट स्थित महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया, ताकि वे शांति से राजकार्य और आध्यात्मिक साधना दोनों कर सकें। उनके शासनकाल को होलकर वंश का स्वर्णयुग माना जाता है, जो शांति, स्थिरता एवं प्रगति से चिह्नित था। उन्होंने अपने दक्ष कूटनीतिक कौशल और लोकहितैषी नीतियों से मालवा को खुशहाल बनाया।

अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) प्रतिदिन स्वयं राजदरबार में जनता की फ़रियाद सुनती थीं और उन्हें न्याय दिलाती थीं। उन्होंने पर्दा प्रथा का त्याग किया और आम प्रजा की पहुँच में रहीं, जिससे जनता निःसंकोच अपने शासक तक अपनी बात ले जा सके। न्यायिक व्यवस्था के तहत अलग से न्यायालय स्थापित किए गए जहाँ नागरिकों के विवाद सुलझाए जाते थे।

अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) की निगाह में राजसत्ता सेवा का माध्यम थी – वे प्रजा को अपने परिवार की तरह मानती थीं और प्रजा की भलाई को सर्वोपरि रखती थीं। शासन संचालन में उन्होंने विवेकपूर्ण कठोरता और करुणा का संतुलन बनाए रखा, जिससे प्रजा उनमें अटूट विश्वास रखती थी।

आर्थिक दृष्टि से भी उनका शासनफल उल्लेखनीय रहा। उन्होंने कृषि एवं व्यापार को बढ़ावा दिया। मालवा कपास उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था, जिसका व्यापर फलने-फूलने लगा। अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) ने महेश्वर और इंदौर को मुख्य व्यापार केंद्र बनाया तथा दूर-दूर से कारीगर, बुनकर और शिल्पियों को बसने का निमंत्रण दिया।

खुद मलवा के बाहर गुजरात के जूनागढ़ से भी कुछ विशेषज्ञ बुनकर परिवार महेश्वर लाए गए, जिनकी सहायता से स्थानीय वस्त्र उद्योग को नई पहचान मिली। महेश्वर में पटलून (टेक्सटाइल) उद्योग की स्थापना हुई और यहीं से प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ी उत्पादन की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी जारी है और जिसे अब भौगोलिक संकेतक (GI) दर्जा मिला है।

Ahilyabai Holkar: समाज के लिए योगदान (धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक)

रानी अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) सिर्फ एक कुशल प्रशासक ही नहीं थीं, बल्कि धार्मिक आस्था, सामाजिक सुधार और संस्कृति संरक्षण में भी उनका बड़ा योगदान है। आध्यात्मिक रूप से वे शिवभक्त थीं और हर दिन पूजा-पाठ करती थीं, लेकिन उनकी भक्ति केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं थी।

उन्होंने धर्म के वास्तविक अर्थ – लोककल्याण – को समझा और अपने कार्यों से सिद्ध किया कि प्रभु की सेवा का मार्ग प्रजा की सेवा से होकर जाता है। उनके राज में प्रजा की भलाई को परम धर्म माना गया।

धार्मिक एवं सांस्कृतिक योगदान: अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) ने भारत भर में फैले अनेक तीर्थस्थलों का उद्धार कराया। 18वीं सदी में विदेशी आक्रमणों एवं उपेक्षा के कारण कई प्राचीन मंदिर नष्ट-भ्रष्ट हो चुके थे या जर्जर अवस्था में थे। अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) ने अपने धन से अनेकों मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया, जिनमें भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से दो प्रमुख ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ (वाराणसी) और सोमनाथ (गुजरात) के मंदिर शामिल हैं।

उन्होंने न सिर्फ अपने राज्य महाराष्ट्र-मालवा में, बल्कि उत्तर से दक्षिण तक पवित्र स्थलों पर मंदिर, घाट और धर्मशालाएँ बनवाईं। वाराणसी में गंगा तट पर स्थित अहिल्या घाट और वहां स्थापित उनकी प्रतिमा आज भी उनके योगदान की याद दिलाते हैं। माना जाता है कि अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) जहाँ भी जाती थीं, एक छोटी शिवलिंग मूर्ति सदैव साथ रखती थीं और प्रत्येक यात्रा को भगवान की सेवा का अवसर मानती थीं।

सामाजिक सुधार एवं जनकल्याण: अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) होलकर सामाजिक दृष्टि से काफी प्रगतिशील थीं। उन्होंने उस दौर में स्त्री शिक्षा का समर्थन किया जब लड़कियों की शिक्षा दुर्लभ थी। वे स्वयं अनौपचारिक रूप से शिक्षित हुईं और स्त्रियों को ज्ञान हासिल करने हेतु प्रेरित किया।

उन्होंने (Ahilyabai Holkar) दरबार में प्रतिभाशाली विद्वानों, कवियों और कलाकारों को संरक्षण दिया, जिनमें खुशालीराम, मराठी कवि मोरोपंत और शाहीर अनंतफंदी जैसे कई नाम शामिल हैं। इन विद्वानों के माध्यम से धर्मग्रंथों के अध्ययन, प्रवचन और कला साहित्य को बढ़ावा मिला। रानी ने राज्य में धार्मिक सहिष्णुता बनाए रखी और प्रजा के सभी समुदायों की भलाई के लिए काम किया।

अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) ने कई कुप्रथाओं का विरोध किया। पति की मृत्यु के बाद सती न होने का उनका निर्णय अपने आप में एक उदाहरण था, जिससे विधवा महिलाओं को नई जिंदगी देने की सोच को बल मिला। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और अनेक अनाथ बालिकाओं व विधवाओं के पुनर्विवाह की व्यवस्था करवाई।

साथ ही, उन्होंने (Ahilyabai Holkar) सती प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ अपने राज्य में माहौल बनाया। समाज के कमजोर तबकों के प्रति भी उनका दृष्टिकोण उदार था – भील, गोंड जैसी जनजातियों और तथाकथित निम्न जाति के लोगों के उत्थान के लिए उन्होंने कदम उठाए। उनकी नीतियों ने समाज में समरसता लाने और हाशिए पर पड़े लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने में मदद की।

Ahilyabai Holkar: मंदिर एवं अन्य संरचनाओं का निर्माण

अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar) अपने जनहितकारी निर्माण कार्यों के लिए विशेष रूप से जानी जाती हैं। उन्होंने अपने शासनकाल में अनेकों मंदिर, धर्मशालाएँ, कुएँ, सड़कें और दुर्ग बनवाए या उनका जीर्णोद्धार करवाया।

राज्य की संपदा को उन्होंने व्यक्तिगत विलास पर खर्च न कर लोककल्याण पर लगाए रखा, जिसके चलते पूरे भारत में उनके निर्माण कार्य दिखाई देते हैं। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) द्वारा बनवाए या सुधार करवाए गए प्रमुख मंदिरों में शामिल हैं:

  • वाराणसी (उत्तर प्रदेश): काशी विश्वनाथ मंदिर – जिसे मुगल काल में नष्ट कर दिया गया था, उसका पुनर्निर्माण अहिल्याबाई ने 1777-1780 के बीच कराया। गंगा नदी पर पक्के घाट भी बनवाए, जिनमें एक घाट का नाम आज “अहिल्या घाट” है।
  • प्रभास पट्टन, सोमनाथ (गुजरात): सोमनाथ महादेव मंदिर – अहमद शाह अब्दाली के समय खंडित इस ज्योतिर्लिंग मंदिर को 1783 में उन्होंने दोबारा प्रतिष्ठित कराया। वर्तमान भव्य सोमनाथ मंदिर (1950 के बाद निर्मित) से पहले जो मंदिर था, वह अहिल्याबाई की देन माना जाता है।
  • एलोरा (महाराष्ट्र): घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर – देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में से अंतिम ज्योतिर्लिंग मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य अहिल्याबाई ने करवाया। यह मंदिर औरंगाबाद जिले में स्थित है।
  • गया (बिहार): विष्णुपद मंदिर – पौराणिक भगवान विष्णु से जुड़े इस मंदिर का पुनर्निर्माण भी अहिल्याबाई द्वारा कराया गया, जिससे गया एक प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में विकसित हुआ।
  • हरिद्वार एवं ऋषिकेश (उत्तराखंड): गंगा घाट तथा मंदिर – अहिल्याबाई ने हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे तीर्थ स्थानों पर यात्रियों के लिए घाट एवं धर्मशालाएँ बनवाईं और मंदिरों को दान दिया।
  • द्वारका (गुजरात) एवं बद्रीनाथ (उत्तराखंड): इन दूरवर्ती तीर्थों पर भी उन्होंने धर्मशालाओं और मंदिर परिसरों के पुनरोद्धार में सहयोग दिया। माना जाता है कि बद्रीनाथ धाम की यात्रा को सुगम बनाने हेतु रास्ते में सुविधाओं का प्रबंध उनके द्वारा किया गया।

इनके अतिरिक्त, अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) ने अपने राज्य में भी निर्माण कार्य कराए। महेश्वर नगरी को उन्होंने एक सुसज्जित राजधानी के रूप में विकसित किया। महेश्वर के दुर्ग (किले) का मुख्य द्वार आज “अहिल्या द्वार” कहलाता है और किले के भीतर का राजमहल भी उनके शासनकाल में बना था।

इंदौर में पुरातन होलकर राजमहल (राजवाड़ा) की नींव उनके काल में पड़ी, हालांकि उसका विस्तार उनके उत्तराधिकारियों ने किया। उन्होंने कई कुओं और बावड़ियों का निर्माण करवाया ताकि आम जनता और यात्रियों को पीने का पानी मिले।

साथ ही, लंबी यात्राओं को सुगम बनाने के लिए सड़कों का जाल बिछवाया और पुराने मार्गों की मरम्मत करवाई। दूर-दराज़ के तीर्थस्थलों तक सड़कें बनने से यात्रियों और व्यापारियों दोनों को लाभ हुआ। इस प्रकार, रानी अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) के निर्माण कार्यों ने न केवल धर्मावलंबियों की आस्था को पुनर्जीवित किया, बल्कि जनता के दैनिक जीवन को भी सुविधाजनक बनाया।

Ahilyabai Holkar: व्यक्तित्व और नेतृत्व शैली

अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar) के व्यक्तित्व में विनम्रता, करुणा और दृढ़ता का अद्भुत संगम था। एक तरफ़ वे गहरी धार्मिक आस्था रखती थीं – प्रतिदिन शिव की उपासना करतीं, व्रत-त्योहार निभातीं और अपने साथ एक छोटा शिवलिंग धारण रखती थीं – तो दूसरी तरफ़ वे मानती थीं कि सच्ची भक्ति प्रजा की सेवा में निहित है।

उनका कहना था कि राजा जो कुछ भी भोग करता है, वह वस्तुतः प्रजा का दिया हुआ ऋण है जिसे सेवा करके चुकाना होता है। इसी विचार से प्रेरित होकर वे हर समय लोकहित के कार्य में लगी रहीं।

नेतृत्व शैली की बात करें तो अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) बिल्कुल लोकमतवादी शासक थीं। वे प्रजा की बात सुनने और समस्याओं का समाधान करने को शासन का मुख्य धर्म मानती थीं। हर रोज़ सुबह दरबार में आम लोग अपनी अर्जी लेकर आ सकते थे और रानी स्वयं धैर्यपूर्वक सबकी बातें सुनती थीं।

उनके निर्णय न्यायसंगत और तटस्थ होते थे, चाहे मामला बड़े ज़मींदार का हो या किसी सामान्य किसान का। अहिल्याबाई ने अपने व्यवहार से यह सुनिश्चित किया कि जनता को उनसे भय नहीं, बल्कि एक आत्मीय जुड़ाव महसूस हो। वह अपने राज्य की प्रजा को पुत्रवत स्नेह करती थीं और स्वयं को लोकसेवक मानती थीं, न कि शासक मात्र।

अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) की नेतृत्व क्षमता उनके दृढ़ संकल्प और साहस में दिखाई देती है। जीवन में उन्होंने अनेक व्यक्तिगत दुःख सहे – कम उम्र में विधवा होना, युवा पुत्र एवं बाद में बेटी को खोना, परिवार के कई सदस्यों की मृत्यु देखना – लेकिन हर विपत्ति का सामना उन्होंने धैर्य और हिम्मत से किया।

इन दुखों ने उनके कर्तव्य-पथ से उन्हें डिगाया नहीं, बल्कि प्रजा के प्रति उनकी करुणा को और गहरा किया। कठिन परिस्थितियों में भी राज्य का संचालन उन्होंने कुशलता से किया। एक महिला शासक होने के नाते शुरुआत में कुछ विरोध का सामना करना पड़ा, पर अपने न्यायपूर्ण प्रशासन द्वारा उन्होंने आलोचकों को शांत किया।

उन्होंने साबित किया कि नेतृत्व, बुद्धिमत्ता और करुणा किसी एक लिंग की बपौती नहीं हैं। उनके समकालीन लोग उनके उदार हृदय और जनकल्याण के कार्यों से इतने प्रभावित थे कि अपने जीवनकाल में ही जनता उन्हें “देवी” कहकर सम्मानित करने लगी थी। सरल जीवन, उच्च विचार और निस्वार्थ सेवा की मूरत बनकर अहिल्याबाई ने सचमुच अपने नाम “पुण्यश्लोक देवी” को चरितार्थ किया।

Ahilyabai Holkar

Ahilyabai Holkar: निधन और विरासत

लगभग तीन दशकों तक आदर्श शासन देने के बाद 13 अगस्त 1795 को 70 वर्ष की आयु में रानी अहिल्याबाई होलकर का निधन हो गया। उनका अंतिम समय इंदौर में बीता। उनकी मृत्यु के बाद होलकर राजवंश की गद्दी तुकोजीराव होलकर (जिन्हें अहिल्याबाई ने दत्तक पुत्र समान मानकर सेनापति बनाया था) ने संभाली।

तुकोजीराव ने दो साल बाद राजपाट अपने पुत्र को सौंप दिया, और आगे चलकर होलकर राज्य अंततः अंग्रेज़ों के प्रभुत्व में आ गया। लेकिन अहिल्याबाई के सुशासन की स्मृति सदैव के लिए इतिहास में दर्ज हो गई।

अहिल्याबाई होलकर (Ahilyabai Holkar) की विरासत भारतीय जनमानस में आज भी जीवंत है। उनकी राजधानी महेश्वर में स्थित किला और राजमहल ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित हैं, जहाँ पर्यटक उनकी शासन-कला से परिचित होते हैं। महेश्वर दुर्ग के मुख्य द्वार “अहिल्या द्वार” से प्रवेश करते ही उनका सादा सिंहासन (नीम की लकड़ी की निम्न चौकी, जिस पर रेशमी छतरी लगी थी) आज भी दर्शन के लिए रखा है, जो उनकी सादगीपूर्ण राजशैली का प्रतीक है।

देश के अनेक संस्थानों और स्थानों का नामकरण अहिल्याबाई के सम्मान में किया गया है। इंदौर का प्रमुख विश्वविद्यालय “देवी अहिल्या विश्वविद्याल (Devi Ahilya Vishwavidyalaya) उनके नाम पर है, वहीं मध्य प्रदेश में इंदौर का हवाई अड्डा भी “देवी अहिल्याबाई होलकर अंतर्राष्ट्रीय विमानतल” कहलाता है। महाराष्ट्र सरकार ने सोलापुर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर “पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर विश्वविद्यालय” रखा है।

भारत सरकार ने 1996 में उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था, और 2022 में उनकी स्मृति में एक विशेष सिक्का भी जारी किया गया था (इसके अतिरिक्त 2025 में उनकी 300वीं जयंती पर ₹300 का सिक्का जारी किया गया, जिसका वर्णन आगे है)। अहिल्याबाई की याद में हर साल उनके जन्मदिवस पर समारोह होते हैं, विशेषकर इंदौर और महेश्वर में उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।

इतिहासकार और राष्ट्रीय नेता भी अहिल्याबाई (Ahilyabai Holkar) के व्यक्तित्व की प्रशंसा करते रहे हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब The Discovery of India में अहिल्याबाई को “असाधारण महिला” (a remarkable woman) कहा है। 19वीं सदी के अंग्रेज़ अधिकारी John Malcolm ने भी Central India पर लिखे अपने संस्मरणों में अहिल्याबाई के प्रशासन की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।

आधुनिक साहित्य और कला में भी उनकी गाथा अमर है – 2017 में लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा महाजन द्वारा लिखित नाटक मातोश्री तथा हाल ही में एक टीवी धारावाहिक “पुण्यश्लोक अहिल्या बाई” ने उनके जीवन को जन-जन तक पहुंचाया है। ये सब प्रमाण हैं कि अहिल्याबाई होलकर भारतीय इतिहास में लोकसेवा, धर्मपरायणता और स्त्रीशक्ति की प्रतीक रूप में युगों-युगों तक स्मरणीय रहेंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हालिया बयान

हाल ही में, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहिल्याबाई होलकर की विरासत को नमन करते हुए एक महत्वपूर्ण संबोधन दिया है। 31 मई 2025 को अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जयंती के अवसर पर भोपाल में आयोजित “लोकमाता देवी अहिल्याबाई महिला सशक्तीकरण महासम्मेलन” में प्रधानमंत्री मोदी ने उनके आदर्शों की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने अहिल्याबाई को भारत की विरासत की महान संरक्षक बताया और कहा कि केंद्र सरकार आज “नागरिक देवो भव” के मंत्र पर कार्य कर रही है, जो अहिल्याबाई के दर्शन से प्रेरित है।

उन्होंने स्मरण दिलाया कि अहिल्याबाई के अनुसार शासक को प्रजा की सेवा ऐसे करनी चाहिए मानो वह ईश्वर की ही सेवा हो – “जो कुछ भी हमें मिला है, वो जनता द्वारा दिया गया ऋण है, जिसे हमें चुकाना है” यह कथन उद्धृत कर मोदी ने जनसेवा के प्रति अहिल्या के दृष्टिकोण को रेखांकित किया। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि लोकमाता अहिल्याबाई ने प्रभु-सेवा और जन-सेवा को कभी अलग नहीं माना और यही भावना आज उनकी सरकार की नीतियों का आधार है।

मोदी ने अपने संबोधन में रानी अहिल्याबाई द्वारा किए गए धार्मिक एवं सांस्कृतिक संरक्षण कार्यों का भी विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा भारत की संस्कृति, मंदिरों और तीर्थस्थलों को विध्वंस का सामना करना पड़ा, तब अहिल्याबाई ने आगे बढ़कर काशी विश्वनाथ सहित देश भर में अनेकों मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया और हमारी सांस्कृतिक विरासत को संभाला।

प्रधानमंत्री ने काशी (वाराणसी) का व्यक्तिगत संदर्भ देते हुए कहा कि जिस नगरी (काशी) में अहिल्याबाई ने इतने विकास कार्य कराए, उसी काशी ने आज उन्हें अपना सांसद चुनकर सेवा का अवसर दिया है। काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थापित अहिल्याबाई की प्रतिमा की ओर इशारा करते हुए उन्होंने श्रद्धा व्यक्त की कि दर्शनार्थियों को महादेव के साथ-साथ अहिल्याबाई के दर्शन भी वहीं होते हैं।

मोदी ने अहिल्याबाई को राष्ट्र निर्माण में नारी शक्ति के अमूल्य योगदान का प्रतीक बताया और कहा कि उनका जीवन यह सबूत है कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो विपरीत परिस्थितियों में भी महान पद प्राप्त किए जा सकते हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि आज भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों से लेकर सभी बड़े अभियानों में महिलाओं की अग्रणी भूमिका है, जिसका बीजारोपण ऐतिहासिक रूप से ऐसी ही महान नारियों ने किया था।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने गृह राज्य गुजरात से अहिल्याबाई के जुड़ाव का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि अहिल्याबाई ने महेश्वर में वस्त्र उद्योग स्थापित करने के लिए गुजरात के जूनागढ़ से बुनकर परिवारों को आमंत्रित किया था, जिनकी बदौलत महेश्वरी साड़ी का उत्पादन शुरू हुआ। यह उल्लेख करते हुए मोदी ने कहा कि माहेश्वरी साड़ी आज कई परिवारों की आजीविका का आधार बन गई है और यह अहिल्याबाई की दूरदर्शिता का प्रमाण है।

इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने देवी अहिल्याबाई की स्मृति में कुछ स्मृति-चिन्ह भी राष्ट्र को समर्पित किए। एक विशेष डाक टिकट और ₹300 मूल्य का स्मारक सिक्का जारी किया गया, जो उनकी 300वीं जयंती को चिह्नित करता है।

साथ ही प्रधानमंत्री ने भोपाल में आयोजित प्रदर्शनी का अवलोकन किया जिसमें अहिल्याबाई के जीवन, कार्यों और भारतीय समाज-संस्कृति में उनके योगदान को दर्शाया गया था। अपने उद्बोधन के अंत में नरेंद्र मोदी ने भावुक होते हुए कहा कि देवी अहिल्याबाई होलकर का नाम सुनते ही मन में श्रद्धा का भाव उमड़ पड़ता है और उनके महान व्यक्तित्व के बारे में बोलने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं

उन्होंने देशवासियों का आह्वान किया कि अहिल्याबाई होलकर के जीवन से प्रेरणा लेते हुए हम सब भी समाज और राष्ट्र की सेवा के लिए स्वयं को समर्पित रखें। प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य ने अहिल्याबाई होलकर के आदर्शों को एक बार फिर राष्ट्रीय मंच पर उजागर किया है और सिद्ध किया है कि उनकी विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 250 साल पहले थी।

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