neera arya

Neera Arya: नीरा आर्य का जन्म 5 मार्च 1902 को उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले के खेकड़ा नगर में हुआ था। उनके पिता सेठ छज्जूमल एक प्रतिष्ठित व्यवसायी थे, जिन्होंने सुनिश्चित किया कि नीरा को अच्छी शिक्षा मिले – इसलिए उन्होंने Neera Arya और उनके भाई बसंत को कोलकाता में पढ़ने भेजा।

बचपन से ही Neera Arya के मन में देशभक्ति की ज्योत जल चुकी थी और युवावस्था तक आते-आते वह भारत के आज़ादी के आंदोलन से गहराई से प्रभावित हो चुकी थीं। आगे चलकर शिक्षा पूरी करने के बाद नीरा ने आज़ाद हिंद फ़ौज की महिला इकाई रानी झाँसी रेजीमेंट में एक सिपाही के रूप में भर्ती होकर देश की सेवा करने का संकल्प लिया।

पारिवारिक रूप से देखें तो एक ओर पिता देशभक्त विचारों का समर्थन करते थे, वहीं दूसरी ओर उन्होंने समाज के दबाव में आकर Neera Arya का विवाह एक ब्रिटिश अधिकारी से करवाने का निर्णय लिया था। यह विरोधाभास आगे चलकर नीरा के जीवन को नाटकीय मोड़ देने वाला था।

Neera Arya: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका

Neera Arya ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक अद्वितीय एवं साहसिक भूमिका निभाई। आज़ाद हिंद फ़ौज की सिपाही के रूप में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिस्सा लिया और असाधारण बहादुरी दिखाई।

देश की आज़ादी के लिए लड़ते हुए उन्हें कैद और अमानवीय यातनाओं तक का सामना करना पड़ा, लेकिन फिर भी उनके इरादे डिगे नहीं। राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानने वाली नीरा ने परिवार से बढ़कर देश को चुना – देशहित में उन्होंने अपने पति तक का बलिदान करने से संकोच नहीं किया।

इस त्याग और वीरता के कारण नीरा आर्य स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक मिसाल बन गईं। वे उन गुमनाम नायकों में गिनी जाती हैं जिनकी बदौलत देश को आज़ादी मिली।

Neera Arya: भारतीय राष्ट्रीय सेना (आज़ाद हिंद फ़ौज) में शामिल होने का कारण और भूमिका

ब्रिटिश राज की गुलामी से देश को मुक्त कराने का जुनून Neera Arya में कूट-कूट कर भरा था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के क्रांतिकारी विचारों और “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” जैसे आव्हान ने नीरा को गहराई से प्रेरित किया। देशभक्ति की इसी प्रबल भावना के चलते नीरा ने सशस्त्र संघर्ष का मार्ग चुनते हुए आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल होने का निश्चय किया।

अपने पिता द्वारा कोलकाता में दिलाई गई शिक्षा और उस दौर के राष्ट्रवादी माहौल ने भी उन्हें आज़ादी की लड़ाई की ओर आकर्षित किया होगा। अंतत: द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब नेताजी ने आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन किया, तो नीरा आर्य ने आगे बढ़कर उसमें भर्ती होने का साहस दिखाया।

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आजाद हिंद फ़ौज की रानी झाँसी रेजीमेंट (महिला बटालियन) में एक सैनिक के रूप में Neera Aryaने प्रशिक्षण प्राप्त किया और सेना में अहम जिम्मेदारियाँ निभाईं। अपनी कर्तव्यनिष्ठा और साहस के दम पर उन्होंने खुद को जल्द ही एक भरोसेमंद सिपाही साबित कर दिया।

नेताजी बोस को नीरा पर इतना विश्वास था कि उन्होंने Neera Arya को ख़ुफ़िया विभाग में देश के लिए जासूसी करने का विशेष कार्य सौंपा। इस तरह नीरा आर्य को आज़ाद हिंद फ़ौज की पहली महिला जासूस बनने का गौरव प्राप्त हुआ – यह उपाधि स्वयं सुभाष चंद्र बोस द्वारा उन्हें दी गई थी।

आज़ाद हिंद फ़ौज में नीरा की भूमिका सिर्फ एक सैनिक तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने मुखबिर (ख़ुफ़िया एजेंट) और यहां तक कि नेताजी की अंगरक्षक के रूप में भी सेवाएं दीं। अपनी बहादुरी और निष्ठा के कारण Neera Arya को फ़ौज में कप्तान के पद तक पदोन्नत किया गया था। कुल मिलाकर, आज़ाद हिंद फ़ौज में नीरा आर्य की भूमिका एक समर्पित योद्धा और जासूस की थी, जिन्होंने हर जिम्मेदारी को पूरी लगन से निभाया।

Neera Arya: जासूसी कार्यों का विवरण और नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंध

आजाद हिंद फ़ौज के ख़ुफ़िया विभाग में Neera Arya ने कई साहसिक जासूसी अभियानों को अंजाम दिया। अपने संस्मरणों में नीरा लिखती हैं कि एक बर्मी-भारतीय युवा सहयोगी सरस्वती राजामणि के साथ मिलकर उन्होंने लड़कों का वेश धरकर अंग्रेज़ अधिकारियों केbungले तथा सेना छावनियों में जासूसी की।

वे दोनों बालक जैसे कपड़े पहनकर अंग्रेज़ अफ़सरों के घरों और सैन्य कैंपों की ख़बरें जुटाती थीं, और यह महत्वपूर्ण सूचनाएँ नेताजी बोस तक पहुंचाती थीं। एक बार उनकी टीम का एक गोरखा साथी दुर्गामल्ल अंग्रेजों द्वारा पकड़ लिया गया। तब नीरा और सरस्वती ने एक साहसिक योजना बनाई – उन्होंने रात के अँधेरे में अलग भेष (यहाँ तक कि एक हिजड़े का रूप) बनाकर ब्रिटिश शिविर में प्रवेश किया और पहरे पर तैनात सिपाहियों को नशीला पदार्थ खिलाकर बेहोश कर दिया। इस तरह वे अपने साथी दुर्गामल्ल को बंदीगृह से आज़ाद कराने में सफल रहीं।

भागते समय दुश्मन की गोली सरस्वती के पैर में लगी, फिर भी तीनों ने हिम्मत नहीं हारी और जंगल में तीन दिन तक एक पेड़ पर छिपकर जान बचाई। जब ये तीनों सुरक्षित आज़ाद हिंद फ़ौज के कैंप लौटे तो नेताजी ने उनकी बहादुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसी मिशन के बाद नेताजी ने Neera Arya को रानी झाँसी रेजीमेंट में कैप्टन और सरस्वती को लेफ्टिनेंट के पद पर पदोन्नति दी, तथा नीरा को अपनी सुरक्षा का अतिरिक्त दायित्व भी सौंपा।

इन घटनाओं से स्पष्ट है कि बतौर जासूस नीरा आर्य ने ब्रिटिश सेनाओं से गुप्त सूचनाएँ निकालने, साथी क्रांतिकारियों को बचाने और नेताजी तक खुफिया जानकारियाँ पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Neera Arya और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बीच अटूट विश्वास और सम्मान का संबंध था। नीरा, बोस को आदर्श नेता मानते हुए उनकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहीं, वहीं बोस भी नीरा की वफ़ादारी को बखूबी पहचानते थे। इस संबंध की परीक्षा उस समय हुई जब स्वयं नीरा के पति ने नेताजी की जान के लिए खतरा पैदा किया।

दरअसल, Neera Arya का विवाह एक ब्रिटिश सीआईडी अधिकारी श्रीकांत जयरंजन दास से हुआ था। वैचारिक मतभेद के चलते यह रिश्ता शुरू से तनावपूर्ण था – नीरा देश के लिए समर्पित थीं जबकि श्रीकांत ब्रिटिश हुकूमत के वफ़ादार अधिकारी थे। जैसे ही श्रीकांत को पता चला कि नीरा गुप्त रूप से नेताजी बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज के साथ जुड़ी हैं, वह उन पर नज़र रखने लगा और बोस का पता जानने की कोशिश करने लगा।

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एक दिन अवसर पाकर श्रीकांत ने नीरा का पीछा किया जब वह नेताजी से मुलाक़ात करने जा रही थीं। श्रीकांत ने अचानक नेताजी पर गोली चला दी, जो सौभाग्य से नेताजी को न लगकर उनके ड्राइवर को जा लगी। अपने नेता पर आने वाले खतरे को भांपते ही नीरा तत्काल कार्रवाई पर उतर आईं – उन्होंने पास में मौजूद रिवॉल्वर या संगीन उठाकर अपने ही पति श्रीकांत पर प्राणघातक वार कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।

Neera Arya के इस साहसिक कदम से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जान बच गई। एक ओर Neera Arya जैसी पत्नी ने देश हेतु अपने पति का बलिदान दे दिया, तो दूसरी ओर नेताजी ने भी इस त्याग को सलाम किया। कहते हैं कि नेताजी ने नीरा की देशभक्ति को सम्मान देते हुए प्यार से उन्हें “नागिनी” (सर्पिणी) की संज्ञा दी थी, मानो वह देश के दुश्मनों के लिए प्राणघातक सर्प बन गई हों।

इस घटना के बाद नेताजी ने स्वयं नीरा को आज़ाद हिंद फ़ौज की पहली महिला जासूस होने का औपचारिक दर्जा दिया। नीरा और नेताजी का यह रिश्ता गुरु-शिष्य जैसा था – नीरा के लिए नेताजी के आदेश सर्वोपरि थे, और नेताजी के लिए नीरा एक विश्वासपात्र सहयोगी थीं जिन पर उन्हें गर्व था।

Neera Arya: गिरफ्तारियाँ, यातनाएं और जेल में जीवन

अपने पति की हत्या कर नेताजी को सुरक्षित बचाने के बदले में Neera Arya को ब्रिटिश हुकूमत के कोप का भागी बनना पड़ा। उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर ब्रिटिश सरकार ने राजद्रोह और अपने अधिकारी की हत्या के आरोप में कड़ी सज़ा सुनाई। 1945 के आस-पास जब आज़ाद हिंद फ़ौज का अभियान मंद पड़ गया था, अंग्रेजों ने नीरा को कोलकाता की जेल में बंद रखने के बाद दंड स्वरूप कुख्यात सेलुलर जेल, अंडमान (काला पानी) भेज दिया।

कैद में अंग्रेज अफसरों ने नीरा पर दबाव डालने की हर कोशिश की – उनसे कहा गया कि अगर वह आज़ादी के आंदोलन के नेताओं (खासकर नेताजी सुभाष बोस) की जानकारी अंग्रेज़ों को दे दें तो उन्हें माफ़ी या ज़मानत दी जा सकती है। लेकिन नीरा आर्य अपने सिद्धांतों पर अटल रहीं और दुश्मन के आगे झुकने से इनकार कर दिया।

एक प्रसंग के अनुसार, पूछताछ के दौरान नीरा ने एक अंग्रेज़ जेलर के चेहरे पर थूक तक दिया जब उसने नेताजी के बारे में उगलवाने की कोशिश की। नीरा की इस अडिग निष्ठा ने ब्रिटिश अधिकारियों को क्रोधित कर दिया और उन्होंने नीरा को घोर अत्याचार देकर तोड़ने का प्रयास किया।

Neera Arya को जेल में अमानवीय यातनाएँ दी गईं, जैसे कि:

  • अंधेरी कोठरी और शारीरिक यातना: उन्हें एक बदबूदार, तंग अंधेरी कोठरी में बंद रखा जाता था और एक हाथ ऊपर बांधकर घंटों लटकाया जाता था, जब तक कि वह बेहोश न हो जाएं। गंदे पानी के कुछ घूंटों के अलावा पीने को कुछ न मिलता था।
  • धार्मिक अपमान: नीरा आर्य आर्य समाजी थीं और शाकाहारी थीं, लेकिन जेल में उनके विश्वास को ठेस पहुँचाने के लिए पहरेदारों ने जबरन उन्हें सड़ा-गला मांस खिलाया। यह कदम सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक यातना का हिस्सा था।
  • डुबो-डुबोकर मारना: उनसे बात उगलवाने के लिए कई बार पानी में डुबकी लगाकर दम घोटने जैसी यातना दी गई और बेहोशी की हालत तक पहुंचाया गया। इसके अलावा निर्वस्त्र कर कोड़े बरसाए गए, जिससे उनका शरीर जख्मी हो गया।
  • क्रूर अंगभंग: हद तो तब हुई जब लगातार मना करने पर गुस्साए जेलर ने लोहे के पंजे (चिमटे) से नीरा के स्तनों को नोचकर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया। इस हृदयविदारक अत्याचार के बावजूद नीरा ने दुश्मन को एक शब्द भी नहीं बताया।

इन तमाम नारकीय यातनाओं के बाद भी अंग्रेज़ Neera Arya से कोई भी गुप्त सूचना उगलवाने में नाकाम रहे – नीरा ने अंत तक किसी नेता या आंदोलन से जुड़ी जानकारी नहीं बताई। जब ब्रिटिश अधिकारी समझ गए कि नीरा को तोड़ा नहीं जा सकता, तो उन्होंने क्रोधवश एक भयावह कदम उठाया।

Neera Arya को बेहोशी की अवस्था में लोहे के पिंजरेनुमा चक्री यातना यंत्र पर बांधकर तब तक घुमाया गया जब तक उनके शरीर की हड्डियाँ चटकने लगीं और वह पूरी तरह बेहोश होकर निष्प्राण-सी हो गईं। फिर अंग्रेज सैनिकों ने नीरा के बेहोश शरीर को एक सुनसान द्वीप पर ले जाकर फेंक दिया ताकि वह वहीं तड़प-तड़पकर दम तोड़ दें।

हालांकि भाग्य को कुछ और ही मंज़ूर था। जब नीरा आर्य को होश आया तो अपने आपको अंडमान के एक अनजान जंगल वाले टापू पर पाया, जहां चारों तरफ़ आदिवासी लोग घिरे थे।

शुरू में उन वनवासियों को नीरा अजीब लगीं, लेकिन नीरा ने डरने के बजाय का जाप किया जिसे सुनकर आदिवासियों ने उन्हें देवदूत समझकर सहारा दिया। कुछ दिन उनके बीच रहकर नीरा ने उनकी भाषा-बोली कुछ सीखी और उन्हें अपने साथ हुए अत्याचार और आज़ादी की लड़ाई की कहानी सुनाई। वे आदिवासी भी अंग्रेज़ों से नफ़रत करते थे, लिहाज़ा उन्होंने दिल खोलकर नीरा की मदद की।

वहां के लोगों ने नीरा को वापस मुख्यभूमि पर भेजने के लिए एक मजबूत नाव बनाकर दी और यात्रा के लिए खाना-पानी आदि का इंतज़ाम भी कर दिया। नीरा आर्य ने उन सहृदय आदिवासियों को धन्यवाद दिया और नाव पर सवार होकर समुद्र के रास्ते भारत की ओर रवाना हुईं।

लंबी यात्रा के बाद आखिरकार नीरा हैदराबाद शहर के तट पर पहुँचीं, जहां पहुंचकर उन्हें पता चला कि इस बीच भारत स्वतंत्र हो चुका है। इस प्रकार मौत के मुँह से निकलकर नीरा आर्य एक नई आशा के साथ स्वदेश लौटीं।

Neera Arya: स्वतंत्रता के बाद उनका जीवन और मृत्यु

भारत को 15 अगस्त 1947 को आज़ादी तो मिल गई थी, लेकिन नीरा आर्य की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी। अंग्रेज़ जाते-जाते हैदराबाद रियासत को रज़ाकारों और निज़ाम के हवाले छोड़ गए थे, जहाँ भारतीय संघ में विलय के विरुद्ध आंदोलन चल रहा था।

स्वतंत्रता के बाद Neera Arya ने हैदराबाद रियासत को भारत में मिलाने के प्रयासों (हैदराबाद मुक्ति आंदोलन 1948) में भी भाग लिया। आर्य समाज द्वारा चलाए गए सत्याग्रह में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और हैदराबाद के निज़ाम के ख़िलाफ़ जनजागरण किया। उस समय हैदराबाद में मज़हबी उन्माद चरम पर था, फिर भी नीरा आर्य ने आर्य समाजी होते हुए अपने माथे पर तिलक लगाना नहीं छोड़ा।

तिलक देखकर कुछ कट्टरपंथी गुंडों ने उन पर हमला किया और फूलों की टोकरियाँ तोड़ दीं, लेकिन नीरा अपने विश्वास पर अटल रहीं और डटी रहीं। हैदराबाद की स्थानीय महिलाएं Neera Arya के साहस से इतनी प्रभावित थीं कि प्यार से उन्हें “पेदम्मा” (तेलुगु में बड़ी मां या सम्मानित माता) कहकर पुकारती थीं। इस तरह नीरा आर्य ने आज़ादी के बाद भी देश को एकसूत्र में बाँधने के संघर्ष में योगदान दिया।

अपने जीवन के आखिरी वर्षों में नीरा आर्य गुमनामी और गरीबी में रहीं। उन्होंने न किसी से मदद माँगी, न स्वतंत्रता सेनानी होने का कोई विशेष लाभ उठाया। एक बार अपने जन्मस्थल खेकड़ा (बागपत) गांव भी लौटीं, तो पुराने परिचितों में से केवल क्रांतिकारी करन सिंह तोमर ने उन्हें पहचाना और सरकारी पेंशन/सहायता दिलवाने की पेशकश की।

परन्तु Neera Arya ने विनम्रतापूर्वक यह कहते हुए मना कर दिया कि उन्होंने आज़ादी की लड़ाई सरकार से इनाम पाने के लिए नहीं लड़ी थी। स्वाभिमानी नीरा ने शेष जीवन आत्मनिर्भर रहकर बिताने का निश्चय किया। हैदराबाद शहर में ही एक लकड़ी की छोटी झोपड़ी बनाकर रहने लगीं और गुज़ारे के लिए सड़क किनारे फूल बेचने का काम करने लगीं। उनकी झोपड़ी सरकारी ज़मीन पर थी, जिसे बाद में प्रशासन ने हटाकर उन्हें बेघर कर दिया।

उम्र ढलने के साथ उनकी सेहत भी गिरने लगी थी। एक दिन दुर्बलता और तेज़ बुखार के कारण नीरा सड़क पर बेहोश होकर गिर पड़ीं। संयोगवश उधर से गुजर रहे पत्रकार तेजपाल सिंह धामा और उनकी पत्नी मधु ने उन्हें इस हालत में देखा तो तुरंत अस्पताल पहुँचाया।

अस्पताल में भर्ती होने पर जब तेजपाल सिंह ने उनकी पुरानी फ़ाइलें और दस्तावेज़ देखे, तब जाकर उन्हें एहसास हुआ कि जिसके लिए वे मदद कर रहे हैं, वह कोई आम बुजुर्ग महिला नहीं बल्कि भारत की स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन नीरा आर्य हैं। होश में आने पर तेजपाल जी के अनुरोध पर नीरा ने उन्हें अपने जीवन संग्राम की अधूरी कहानी संक्षेप में सुनाई।

दुर्भाग्यवश, भर्ती होने के कुछ ही दिनों बाद 26 जुलाई 1998 को हैदराबाद के चारमीनार स्थित उस्मानिया अस्पताल में नीरा आर्य ने आख़िरी साँस ली। उस समय उनकी आयु 96 वर्ष थी। अंत समय में उनके पास अपना कहने को कोई नहीं था – वह बीमार, असहाय अवस्था में संसार से विदा हुईं।

उनकी मृत्यु के बाद अस्पताल प्रशासन ने भी उनके पार्थिव शरीर को ज्यादा देर रखने में रुचि नहीं दिखाई और स्थानाभाव बता कर बाहर रख दिया था। तब तेजपाल सिंह धामा और उनके कुछ सहयोगियों ने आगे आकर नीरा आर्य की अंतिम क्रिया विधिपूर्वक संपन्न करवाई। इस तरह देश की आज़ादी के लिए अदम्य संघर्ष और अत्याचार झेलने वाली यह वीरांगना गुमनाम दशा में संसार से चली गई।

Neera Arya: उन्हें मिला या न मिल सका सम्मान

Neera Arya जैसी वीर महिला को उसके जीवनकाल में वो सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थीं। आज़ादी के बाद शुरुआती दशकों में सरकार या समाज ने उनके योगदान को लगभग भुला ही दिया था। उन्हें ना तो स्वतंत्रता सेनानी होने पर कोई बड़ा पुरस्कार सम्मान मिला, ना पद्म पुरस्कार जैसी किसी आधिकारिक उपाधि से नवाज़ा गया, और ना ही उन्होंने स्वयं कभी कोई पेंशन या आर्थिक लाभ लेने की कोशिश की।

दरअसल नीरा ने आजीवन बिना किसी लालच के देश की सेवा की और बदले में सम्मान की अपेक्षा नहीं रखी – शायद इसीलिए वह अपनी गुमनाम गरीबी भरी ज़िंदगी को भी मुस्कुराकर जीती रहीं। आज़ादी के तुरंत बाद अधिकतर INA (आज़ाद हिंद फ़ौज) के सैनिकों को तो माफ़ी मिल गई थी, पर नीरा आर्य को अपने पति (जो ब्रिटिश अफसर था) की हत्या के आरोप के कारण ब्रिटिश सरकार ने अंत तक रिहा नहीं किया और कठोर सज़ा दी।

स्वतंत्र भारत की सरकार ने भी उन्हें कोई औपचारिक मान्यता नहीं दी। यही वजह है कि नीरा आर्य का नाम इतिहास के पन्नों में दबकर रह गया और वह लंबी अवधि तक गुमनाम नायिका बनी रहीं।

हालांकि हाल के वर्षों में स्वतंत्रता संग्राम में उनके अद्वितीय योगदान को फिर से पहचान मिलने लगी है। आज नीरा आर्य को आज़ाद हिंद फ़ौज की पहली महिला जासूस के रूप में सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। भारत सरकार ने आज़ादी के 75 वर्ष पूर्ण होने पर चलाए गए “आजादी का अमृत महोत्सव” अभियान में नीरा आर्य को देश की उन_unsung_ हीरो (गुमनाम वीरांगनाओं) में शामिल किया है जिनके बलिदान को राष्ट्र नमन करता है।

Neera Arya के नाम पर राष्ट्रीय स्तर पर एक पुरस्कार की स्थापना भी की गई है। Neera Arya पुरस्कार हर साल ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जिसने समाज या देश के लिए उल्लेखनीय कार्य किया हो। इस पुरस्कार के पहले प्राप्तकर्ता छत्तीसगढ़ के अभिनेता अखिलेश पांडे बने, जिन्हें एक भव्य समारोह में यह सम्मान प्रदान किया गया। इसी तरह केरल राज्य में भी एक सड़क का नाम नीरा आर्य के सम्मान में रखा गया है।

आज़ादी के दशकों बाद आखिरकार राष्ट्र को नीरा आर्य जैसे अनसंग हीरो की याद आई है और उनकी विरासत को सहेजा जा रहा है। उनकी जीवनगाथा पर कविताएं लिखी गई हैं और अब तो एक फीचर फ़िल्म भी बनकर तैयार है, जो जल्द ही रिलीज़ होगी। मशहूर फ़िल्मकार रूपा अय्यर ने नीरा आर्य के जीवन पर आधारित इस बायोपिक का निर्देशन किया है, जिसका उद्देश्य नई पीढ़ी को नीरा आर्य की वीरता से रूबरू कराना है।

नि:संदेह, यह Neera Arya के प्रति देश का श्रद्धांजलि ही है कि इतने वर्षों बाद सही, लेकिन उनकी कहानी को सुनने और सराहने का सिलसिला शुरू हुआ है। नीरा आर्य का त्याग, साहस और देशभक्ति सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

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