Dr. MR Srinivasan: भारत के प्रमुख परमाणु वैज्ञानिक डॉ. एमआर श्रीनिवासन के निधन के साथ ही देश ने विज्ञान के एक ऐसे स्तंभ को खो दिया, जिसने देश को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाई। उनका जीवन, उपलब्धियां और योगदान पूरे भारत के लिए प्रेरणा और गौरव का विषय रहे हैं।
Dr. MR Srinivasan: प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
डॉ. एमआर श्रीनिवासन का जन्म 5 जनवरी, 1930 को कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में हुआ था। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मैसूर के इंटरमीडिएट कॉलेज में हुई, जहां उन्होंने अंग्रेजी के साथ संस्कृत भाषा को भी शिक्षा का माध्यम बनाया। साल 1950 में उन्होंने बेंगलुरु स्थित एम. विश्वेश्वरैया इंजीनियरिंग कॉलेज से मकैनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की।
इसके बाद वर्ष 1952 में उन्होंने इसी संस्थान से मास्टर्स डिग्री पूरी की। उच्च शिक्षा के लिए श्रीनिवासन कनाडा गए और मॉन्ट्रियल की प्रतिष्ठित मैकगिल यूनिवर्सिटी से गैस टर्बाइन टेक्नोलॉजी में विशेषज्ञता के साथ पीएचडी हासिल की।
Dr. MR Srinivasan: परमाणु ऊर्जा विभाग में कदम
डॉ. श्रीनिवासन ने साल 1955 में मात्र 25 वर्ष की उम्र में परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) से अपने करियर की शुरुआत की। उन्होंने अपने लगभग पांच दशकों के लंबे करियर में भारत की परमाणु ऊर्जा की यात्रा को दिशा देने में अहम योगदान दिया।
Dr. MR Srinivasan: देश के पहले परमाणु रिएक्टर ‘अप्सरा’ में योगदान
1950 के दशक में भारत ने अपने पहले परमाणु रिएक्टर ‘अप्सरा’ का निर्माण शुरू किया था। इस परियोजना का नेतृत्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने किया था। इस ऐतिहासिक परियोजना में युवा डॉ. श्रीनिवासन की भूमिका महत्वपूर्ण रही। वर्ष 1956 में ‘अप्सरा’ ने काम करना शुरू किया, जो भारत की परमाणु ऊर्जा यात्रा का पहला महत्वपूर्ण कदम था।
Dr. MR Srinivasan: तारापुर परमाणु ऊर्जा स्टेशन का निर्माण
1960 के दशक में डॉ. श्रीनिवासन ने तारापुर में भारत के पहले न्यूक्लियर पावर प्लांट की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। डॉ. भाभा के निर्देशन में तारापुर स्टेशन की स्थापना और परिचालन में उनका तकनीकी नेतृत्व बेहद महत्वपूर्ण रहा।
Dr. MR Srinivasan: कलपक्कम परमाणु ऊर्जा परिसर की स्थापना
डॉ. श्रीनिवासन कलपक्कम में भारत के अत्याधुनिक और व्यापक परमाणु ऊर्जा परिसर की स्थापना टीम का प्रमुख हिस्सा रहे। वर्ष 1967 में वह मद्रास परमाणु ऊर्जा स्टेशन के प्रोजेक्ट इंजीनियर नियुक्त हुए, जिसने भारत की परमाणु ऊर्जा में आत्मनिर्भरता के द्वार खोले।
Dr. MR Srinivasan: न्यूक्लियर पावर बोर्ड के अध्यक्ष और NPCIL का गठन
वर्ष 1974 में श्रीनिवासन को DAE के पावर प्रोजेक्ट डिवीजन का निदेशक नियुक्त किया गया। वर्ष 1984 में उन्होंने न्यूक्लियर पावर बोर्ड के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला। उनके नेतृत्व में भारत के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का संचालन और प्रबंधन उत्कृष्ट ढंग से किया गया।
साल 1987 में उन्होंने न्यूक्लियर पावर बोर्ड को न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) में परिवर्तित किया और इसके पहले अध्यक्ष बने। उनके कार्यकाल में भारत में 18 परमाणु संयंत्रों की स्थापना हुई। इनमें से सात ने काम करना शुरू कर दिया था, सात निर्माणाधीन थे, और चार की योजना तैयार थी।
Dr. MR Srinivasan: भारत की आत्मनिर्भरता में महत्वपूर्ण योगदान
1974 में भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया, जिसके परिणामस्वरूप कनाडा ने भारत के साथ सहयोग बंद कर दिया। ऐसी मुश्किल घड़ी में डॉ. श्रीनिवासन ने भारत की परमाणु ऊर्जा नीति को मजबूती से संभाला और विदेशी सहयोग के बिना भारत को परमाणु ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम किया। उन्होंने विशेष रूप से प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर्स (PHWR) के विकास और संचालन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई, जो आज भी भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की रीढ़ हैं।
Dr. MR Srinivasan: पुरस्कार और सम्मान
डॉ. एमआर श्रीनिवासन के असाधारण योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया:
- 1984 में पद्मश्री
- 1990 में पद्म भूषण
- 2015 में पद्म विभूषण
उनकी वैज्ञानिक दूरदृष्टि और समर्पण ने उन्हें “भारत का परमाणु शिल्पकार” की उपाधि दिलाई।
Dr. MR Srinivasan: अन्य महत्वपूर्ण भूमिकाएं
अपने वैज्ञानिक करियर के अतिरिक्त, डॉ. श्रीनिवासन ने देश की नीति निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने:
- 1996 से 1998 तक योजना आयोग के सदस्य के रूप में सेवाएं दीं।
- 2002 से 2005 और पुनः 2006 से 2008 तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रहे।
- 2002 से 2004 तक कर्नाटक के उच्च शिक्षा टास्क फोर्स के अध्यक्ष रहे।
चिकित्सा और कृषि क्षेत्र में योगदान
डॉ. श्रीनिवासन के प्रयासों से परमाणु ऊर्जा का प्रयोग चिकित्सा और कृषि जैसे क्षेत्रों में भी होने लगा। परमाणु तकनीक के जरिए कैंसर के इलाज और फसलों की उपज बढ़ाने के लिए नए प्रयोग शुरू हुए, जिससे लाखों भारतीय नागरिक लाभान्वित हुए।
भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा
डॉ. श्रीनिवासन ने विज्ञान, परिश्रम और देशभक्ति को एक सूत्र में पिरोया। उनका मानना था कि “विज्ञान और कड़ी मेहनत से कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।” उनकी विरासत और योगदान भारत के भावी वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे।
डॉ. एमआर श्रीनिवासन ने भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में विश्व के मानचित्र पर स्थापित किया, जिसका लाभ आने वाली पीढ़ियां भी प्राप्त करती रहेंगी।
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