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भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई महत्वपूर्ण आंदोलन हुए, लेकिन 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन और उसमें दिया गया महात्मा गांधी का नारा—“करो या मरो”—इतिहास का वह क्षण था जिसने आज़ादी की जंग की दिशा ही बदल दी। यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि देश के हर नागरिक के लिए जीवन-मरण का आह्वान था।

पृष्ठभूमि: द्वितीय विश्व युद्ध और भारत की स्थिति

ब्रिटिश साम्राज्य की कमजोरी

1940 के दशक की शुरुआत में विश्व द्वितीय विश्व युद्ध की आग में झुलस रहा था। ब्रिटेन खुद को बचाने में व्यस्त था और उसकी आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक शक्ति कमजोर हो रही थी।

भारत का योगदान और नाराजगी

ब्रिटिश सरकार ने भारत से बिना अनुमति लाखों सैनिक युद्ध में भेजे और देश के संसाधनों का भारी दोहन किया। भारतीय नेताओं को न तो कोई परामर्श दिया गया और न ही स्वतंत्रता का आश्वासन। इससे भारतीय जनमानस में असंतोष और गुस्सा गहराता गया।

भारत छोड़ो आंदोलन की नींव

क्रिप्स मिशन की असफलता

1942 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं को कुछ संवैधानिक प्रस्ताव देने के लिए क्रिप्स मिशन भेजा, लेकिन इसके प्रस्ताव केवल युद्ध के बाद स्वतंत्रता पर विचार करने तक सीमित थे। यह भारतीय जनता और नेताओं को स्वीकार्य नहीं था।

गांधीजी का स्पष्ट संदेश

क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद गांधीजी ने महसूस किया कि अब समय आ गया है जब अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए स्पष्ट और निर्णायक दबाव डाला जाए।

‘करो या मरो’ का ऐतिहासिक आह्वान

गोवालिया टैंक मैदान, 8 अगस्त 1942

8 अगस्त 1942 को मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक हुई। यहीं महात्मा गांधी ने ऐतिहासिक भाषण दिया और ‘करो या मरो’ का नारा गूंजा।

नारे का अर्थ

“करो” का मतलब था—स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए पूरी शक्ति से प्रयास करो, और “मरो” का अर्थ—अगर आज़ादी न मिले तो प्राणों की आहुति देने से पीछे मत हटो।

आंदोलन का देशव्यापी असर

जनता का उत्साह और एकता

इस नारे ने पूरे भारत में आज़ादी की आग को प्रज्वलित कर दिया। शहरों, गाँवों और कस्बों में लोग स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन करने लगे।

हड़तालें और बहिष्कार

रेलवे, डाक-तार सेवाएँ, सरकारी दफ्तर—सब जगह कामकाज ठप हो गया। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार तेज हो गया।

नेताओं की गिरफ्तारी

गांधीजी, नेहरू, पटेल, मौलाना आज़ाद सहित लगभग सभी शीर्ष नेताओं को उसी रात गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद आंदोलन रुका नहीं, बल्कि और उग्र हो गया।

अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनविद्रोह

ग्रामीण क्षेत्रों में विद्रोह

गाँवों में किसानों ने अंग्रेजी अधिकारियों को खदेड़ दिया और तिरंगा फहराया। बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल और महाराष्ट्र में यह आंदोलन विशेष रूप से उग्र था।

भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियाँ

नेताओं के जेल में होने पर अज्ञात क्रांतिकारियों ने भूमिगत होकर अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त अभियान चलाए—रेल की पटरियाँ उखाड़ी गईं, टेलीफोन लाइनें काटी गईं।

अंग्रेजों की उलटी गिनती

ब्रिटिश सरकार की दुविधा

द्वितीय विश्व युद्ध के बीच इतने बड़े जनविद्रोह को दबाना ब्रिटिश सरकार के लिए कठिन हो गया।

अंतरराष्ट्रीय दबाव

अमेरिका और अन्य मित्र राष्ट्र भी भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में बोलने लगे, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य पर दबाव और बढ़ गया।

गांधीजी के नारे की विरासत

प्रेरणा का स्रोत

“करो या मरो” आज भी साहस, बलिदान और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। यह नारा आज़ादी की लड़ाई के इतिहास में अमर है।

आधुनिक समय में प्रासंगिकता

आज के समय में भी यह नारा हमें बताता है कि जब कोई लक्ष्य महत्वपूर्ण हो, तो पूरे मन से, बिना पीछे हटे, उसे पाने के लिए प्रयास करना चाहिए।

निष्कर्ष: आज़ादी की अंतिम सीढ़ी

“करो या मरो” आंदोलन ने ब्रिटिश हुकूमत को यह अहसास करा दिया कि अब भारत पर राज करना संभव नहीं है। यहीं से आज़ादी की उलटी गिनती शुरू हुई और मात्र पाँच साल बाद, 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया।

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