Cricket Field: क्रिकेट एक बल्लेबॉल का खेल है जो आम तौर पर गोल या अंडाकार आकार के घास के मैदान पर खेला जाता है। इस मैदान के केंद्र में 22 गज (लगभग 20 मीटर) लंबी सीधी पिच होती है, जिसके दोनों सिरों पर विकेट (तीन स्टम्प) लगे होते हैं। खेल के दौरान एक टीम बल्लेबाज़ी करती है और दूसरी टीम फिल्डिंग (क्षेत्ररक्षण) करती है।
बल्लेबाजी टीम के दो खिलाड़ी (एक स्ट्राइकर और एक नॉन-स्ट्राइकर) पिच पर होते हैं, जबकि फिल्डिंग करने वाली टीम के ग्यारह खिलाड़ी मैदान पर फैलकर गेंद को पकड़ने या रोकने का प्रयास करते हैं। गेंदबाज़ (Bowler) गेंद फेंकता है और उसके साथ शेष 10 फिल्डर(Cricket Field) मिलकर कोशिश करते हैं कि बल्लेबाज़ द्वारा मारी गई गेंद को रोका जाए या कैच पकड़ा जाए, ताकि रन बनने से रोके जा सकें या बल्लेबाज़ को आउट किया जा सके।
फिल्डिंग करने वाली टीम में विकेटकीपर (Wicket-keeper) भी शामिल होता है, जो विकेट के पीछे खड़े होकर कैच पकड़ने व स्टम्पिंग करने के लिए तैयार रहता है। विकेटकीपर एकमात्र ऐसा खिलाड़ी है जिसे गेंद पकड़ने के लिए विशेष दस्ताने और पैड पहनने की अनुमति होती है। कुल मिलाकर क्रिकेट मैदान(Cricket Field) पर इन खिलाड़ियों की पोज़ीशन और भूमिका मिलकर खेल को रोचक बनाती है।
बल्लेबाजों की पोज़ीशन्स और उनकी भूमिकाएँ(Cricket Field)
क्रिकेट में बल्लेबाजों की पोज़ीशन से तात्पर्य उनके बल्लेबाजी क्रम और भूमिकाओं से है। प्रत्येक टीम की पारी में बल्लेबाजी करने का एक निर्धारित क्रम (Batting Order) होता है। आम तौर पर पारी की शुरुआत करने वाले दो बल्लेबाज़ ओपनर (Opener) कहलाते हैं।
ओपनर का काम नई गेंद का सामना करना और टीम को ठोस शुरुआत देना होता है। टेस्ट मैचों में ओपनर संयम से खेलते हैं, ताकि गेंद की स्विंग और तेज़ी को संभाल सकें, जबकि वनडे और T20 में कई ओपनर तेज़ शुरुआत कर रन गति बढ़ाने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के लिए, सुनील गावस्कर जैसे बल्लेबाज़ टेस्ट में रक्षणात्मक शुरुआत के लिए जाने जाते थे, जबकि वीरेंद्र सहवाग आक्रामक ओपनिंग के लिए प्रसिद्ध थे।
बल्लेबाजी क्रम में तीसरे नंबर पर आने वाला बल्लेबाज़ अक्सर वन-डाउन या नंबर 3 बल्लेबाज़ कहलाता है। इसकी भूमिका पारी को संभालना होती है – अगर जल्दी विकेट गिर जाए तो टिककर खेलना और यदि ओपनर्स अच्छी शुरुआत दें तो उसे बरक़रार रखना।
मध्य क्रम में चौथे से छठे नंबर तक के बल्लेबाज़ होते हैं, जिन्हें मिडल-ऑर्डर (Middle order) कहा जाता है। मध्यक्रम के बल्लेबाज़ पारी को आगे बढ़ाते हैं और पारी के मध्य में स्पिन तथा मीडियम तेज गेंदबाज़ों का सामना करते हैं। ये खिलाड़ी स्थिति के मुताबिक कभी आक्रामक तो कभी रक्षणात्मक खेल दिखाते हैं। (Cricket Field)
उदाहरण के लिए, राहुल द्रविड़ मध्यक्रम में धैर्यपूर्वक लंबी पारी खेलने के लिए जाने जाते थे, जबकि महेंद्र सिंह धोनी और युवराज सिंह जैसे बल्लेबाज़ मध्यम ओवरों में संभलकर खेलकर आखिरी ओवरों के लिए तेजी बचाते थे। (Cricket Field)
पारी के अंतिम हिस्से में सातवें से नीचे के बल्लेबाज़ निचला क्रम या टेलएंडर (Tail-ender) कहलाते हैं। इनमें ऑलराउंडर और गेंदबाज़ शामिल होते हैं जिनसे अपेक्षा होती है कि वे जरूरत पड़ने पर कुछ रन जोड़ें या किसी विशेषज्ञ बल्लेबाज़ का साथ दें। टी20 और वनडे में कुछ टीमों में विशेष फिनिशर (Finisher) भी होते हैं – जैसे कि धोनी – जिनका काम अंत के ओवरों में तेजी से रन बनाकर मैच समाप्त करना होता है। (Cricket Field)
ऐसे फिनिशर बल्लेबाज़ अपनी ताकत के अनुसार चौके-छक्के लगाते हैं, इसलिए दूसरी टीम के फिल्डर अक्सर आखिरी ओवरों में सीमा रेखा (बाउंड्री) पर फैले रहते हैं ताकि बड़े शॉट को रोका जा सके। कुल मिलाकर, बल्लेबाज़ों की ये विविध भूमिकाएँ टीम को रणनीति बनाने में मदद करती हैं और प्रत्येक पोज़ीशन (Cricket Field) का खेल पर विशेष प्रभाव होता है।
गेंदबाज़ों की पोज़ीशन्स और रणनीतियाँ(Cricket Field)
गेंदबाज़ (Bowler) टीम का वह खिलाड़ी होता है जो बल्लेबाज़ को आउट करने या रन रोकने के उद्देश्य से गेंद फेंकता है। एक क्रिकेट मैदान (Cricket Field) पर एक समय में केवल एक ही गेंदबाज़ गेंदबाजी छोर से गेंद फेंकता है, जबकि दूसरा छोर बल्लेबाज़ी छोर (जहाँ स्ट्राइकर बल्लेबाज़ खड़ा है) होता है। गेंदबाज़ अपनी रन-अप लेकर क्रीज़ तक आता है और तय की गई लाइन के पीछे से गेंद फेंकता है। गेंदबाज़ों की दो मुख्य श्रेणियाँ होती हैं: तेज़ गेंदबाज़ और स्पिन गेंदबाज़।
तेज़ गेंदबाज़ आम तौर पर 22 गज की पिच को तेज रफ्तार से पार करके विकेट की ओर बाउंस कराते या स्विंग कराते हुए गेंद फेंकते हैं। उनकी रणनीति बल्लेबाज़ को गति और उछाल से चकमा देकर कैच कराने या बोल्ड/एलबीडब्ल्यू आउट करने की रहती है। (Cricket Field)
तेज गेंदबाज़ों के लिए कप्तान शुरुआत में आम तौर पर 2-3 स्लिप जैसे करीबी कैचिंग फिल्डर तैनात करते हैं, ताकि गेंद का किनारा (edge) लगने पर कैच लिया जा सके। उदाहरणतः डेल स्टेन या जसप्रीत बुमराह जैसे तेज गेंदबाजों की गेंदबाज़ी के दौरान स्लिप में कई फिल्डर रखे जाते हैं क्योंकि उनके गेंदों पर बल्ले का बाहरी किनारा लगने की संभावना ज्यादा रहती है।
स्पिन गेंदबाज़ अपेक्षाकृत धीमी गति से गेंद को उंगलियों (ऑफ स्पिन) या कलाई (लेग स्पिन) की मदद से घुमाते हैं। स्पिनरों की रणनीति गेंद को टर्न (मोड़) करा के बल्लेबाज़ को चकमा देने की होती है, ताकि बल्लेबाज़ गलत शॉट खेले और नजदीकी फिल्डरों को कैच का मौका मिले।
ऑफ स्पिनर दाएं हाथ के बल्लेबाज़ के लिए गेंद को अंदर की ओर घुमाता है, जबकि लेग स्पिनर बाहर की ओर टर्न कराता है। स्पिनरों के लिए कप्तान आमतौर पर स्लिप, शॉर्ट लेग या सिली पॉइंट जैसे नज़दीकी फिल्डर रखते हैं, खासकर टेस्ट मैच में, ताकि डिफेंसिव शॉट से निकला हल्का किनारा या पैड-बल्ले से उछली गेंद कैच हो सके। (Cricket Field)
महान लेग स्पिनर शेन वॉर्न अपने दौर में आक्रामक फिल्ड सेट करने के लिए मशहूर थे – वे गेंदबाज़ी करते वक्त बल्लेबाज़ के आसपास कई फिल्डर लगवाते थे (जैसे स्लिप, गली, शॉर्ट लेग) ताकि दबाव बनाकर विकेट लिया जा सके। हालांकि, सीमित ओवरों के मैच में बल्लेबाज़ तेज़ी से रन बनाने की कोशिश करते हैं, इसलिए उतने ज्यादा नज़दीकी फिल्डर रखना व्यवहारिक नहीं होता और गेंदबाज़ को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ता है। (Cricket Field)
कुल मिलाकर, गेंदबाज़ अपनी गति, लाइन-लेंथ और फिल्ड सेटिंग(Cricket Field) के अनुसार रणनीति बनाता है। एक ओपनिंग गेंदबाज़ (नई गेंद गेंदबाज़) स्विंग या उछाल का फायदा उठाकर शुरू में विकेट निकालने की कोशिश करता है, जबकि डेथ ओवर (अंतिम ओवर) का गेंदबाज़ यॉर्कर या स्लोअर गेंद फेंककर रन गति नियंत्रित करने की कोशिश करता है। इस प्रकार विभिन्न गेंदबाज़ अपनी-अपनी पोज़ीशन (जैसे नई गेंद या बीच के ओवर या डेथ ओवर) में खास रणनीति अपनाते हैं और कप्तान उसी अनुसार फिल्ड सेट करता है। (Cricket Field)
फील्डिंग पोज़ीशन्स का विस्तृत वर्णन(Cricket Field)
क्रिकेट में फिल्डिंग पोज़ीशन से आशय उन स्थानों से है जहां कप्तान अपने फिल्डरों को मैदान पर तैनात करता है। कुल 11 में से एक खिलाड़ी विकेटकीपर और एक गेंदबाज़ अनिवार्य होते हैं, शेष 9 फिल्डर मैदान में विभिन्न स्थानों पर खड़े होते हैं। कौन सा फिल्डर कहाँ खड़ा होगा यह स्थिति, बल्लेबाज़ और मैच की रणनीति पर निर्भर करता है, और कप्तान अपने सहयोगियों से चर्चा कर के कभी भी (गेंद डाली जाने से पहले) फिल्डरों की जगह बदल सकता है। (Cricket Field)
समय-समय पर क्रिकेट में कुछ मानक फिल्डिंग पोजीशन्स स्थापित हुए हैं। इनमें से कुछ पोजीशन लगभग हर पारी में देखने को मिलते हैं, जबकि कुछ विशेष परिस्थिति में ही उपयोग होते हैं। अधिकांश फिल्डिंग पोज़ीशन के नाम बल्लेबाज़ को केंद्र मानकर रखे गए हैं।
उदाहरण के लिए, “कवर” या “मिड-विकेट” जैसे नाम यह बताते हैं कि वह फिल्डर बल्लेबाज़ से किस दिशा और कोण पर खड़ा है। इसी तरह “लेग साइड” और “ऑफ साइड” शब्द दर्शाते हैं कि मैदान के बल्लेबाज़ के लेग (पैर) की ओर वाले हिस्से को लेग साइड या ऑन साइड कहा जाता है और विपरीत हिस्से को ऑफ साइड कहते हैं।
दाएँ हाथ के बल्लेबाज़ के लिए उसका बायाँ भाग लेग साइड होगा और दायाँ भाग ऑफ साइड; जबकि बाएँ हाथ के बल्लेबाज़ के लिए यह उल्टा होगा। (Cricket Field)
इसके अलावा फिल्डिंग पोज़ीशन के नाम के आगे लगे विशेषण जैसे “लॉन्ग” (Long), “डीप” (Deep), “शॉर्ट” (Short), “सिली” (Silly), “फॉरवर्ड” (Forward) या “बैकवर्ड” (Backward) यह बताते हैं कि फिल्डर बल्लेबाज़ से कितनी दूरी पर या किस कोण पर है। (Cricket Field)
मसलन, “डीप” का अर्थ है बाउंड्री की तरफ दूर, “शॉर्ट” का मतलब करीब, “सिली” बहुत ज्यादा करीब (लगभग बल्लेबाज़ के बिल्कुल पास), “बैकवर्ड” मतलब बल्लेबाज़ को पार करके पीछे की ओर, और “फॉरवर्ड” यानी बल्लेबाज़ के सामने की ओर। इन शब्दों के उच्चारण से ही किसी भी स्थिति का सटीक नाम बनता है। उदाहरण के लिए “डीप स्क्वायर लेग” का अर्थ हुआ लेग साइड पर बल्लेबाज़ के स्क्वायर (समकोण) पर, काफी दूरी (बाउंड्री के पास) पर स्थित फिल्डर।
ऊपर के चित्र में दाएँ हाथ के बल्लेबाज़ के लिए मैदान पर प्रमुख फिल्डिंग पोजीशन्स दिखाए गए हैं (30-यार्ड के इनरसर्कल को दर्शाने वाले गोले के साथ)। बल्लेबाज़ के बाएँ हाथ की दिशा (ग्रीन रंग के दाएँ हिस्से में) लेग साइड या ऑन साइड कहलाती है, और दाएँ हाथ की दिशा (चित्र में बाएँ, जहाँ “Off side” लिखा है) ऑफ साइड कहलाती है।
मैदान के भीतर के भाग को इनफील्ड (Infield) और बाहरी भाग को आउटफील्ड (Outfield) कहा जाता है। इनफील्ड आमतौर पर 30-गज के घेरे के भीतर का क्षेत्र होता है, जहां करीबी फिल्डर व रन-बचाने वाले फिल्डर तैनात रहते हैं, जबकि आउटफील्ड सीमा रेखा के पास का क्षेत्र है जहां लंबे शॉट रोकने के लिए फिल्डर खड़े रहते हैं।
इनफील्ड में करीबी कैचिंग पोज़ीशन(Cricket Field)
कुछ फिल्डिंग पोजीशन खास तौर पर बल्लेबाज़ से बेहद करीब होती हैं और इनका उद्देश्य रन रोकने से ज्यादा कैच द्वारा विकेट लेना होता है । ऐसे स्थानों को कैचिंग पोजीशन कहा जाता है। इनमें प्रमुख हैं: स्लिप (Slip), गली (Gully), शॉर्ट लेग (Short Leg), सिली पॉइंट (Silly Point) आदि।

स्लिप फिल्डर विकेटकीपर के बगल में, कीपर से थोड़ी दूरी पर तिरछे पीछे की ओर खड़ा होता है। तेज़ गेंदबाज़ की गेंद पर यदि बल्लेबाज़ के बल्ले का बाहरी किनारा लगकर गेंद निकलती है तो स्लिप में खड़े फिल्डर का काम उस किनारे को लपकना होता है। (Cricket Field)
आम तौर पर पहली स्लिप (कीपर के तुरंत बगल) के पास दूसरी स्लिप, तीसरी स्लिप आदि कतार में खड़े किए जा सकते हैं जिन्हें सामूहिक रूप से स्लिप कॉर्डन कहते हैं। गली पोजीशन स्लिप से थोड़ी दूर ऑफ साइड में पॉइंट की दिशा में होती है – यानि स्लिप और पॉइंट के बीच का क्षेत्र। गली का फिल्डर भी कैच लेने के लिए तैयार रहता है, खासकर तब जब बल्लेबाज़ ऊँचा शॉट खेले या गेंद किनारा लेकर स्लिप से दूर जाए। (Cricket Field)
शॉर्ट लेग फिल्डर बल्लेबाज़ के पैड के पास लेग साइड में करीब खड़ा होता है (आम तौर पर हेलमेट पहनकर रक्षा के साथ), ताकि स्पिनर की गेंद पर बल्ले-पैड से उछलती गेंद को लपक सके। सिली पॉइंट (या सिली मिड-ऑफ/मिड-ऑन) बेहद करीब खड़े फिल्डरों को कहते हैं – ये लगभग बल्लेबाज़ के कुछ ही मीटर दूरी पर ऑफ साइड (सिली पॉइंट) या मिड-ऑन/मिड-ऑफ की दिशा में खड़े होते हैं। (Cricket Field)
“सिली” शब्द इंग्लिश में इस जोखिमपूर्ण करीबी पोजीशन के लिए प्रयोग होता है, क्योंकि यहां खड़े होना साहस का काम है। इन सभी करीबी फिल्डिंग स्थानों का मुख्य उद्देश्य बल्लेबाज़ की गलती पर तुरंत कैच पकड़कर उसे आउट करना है, न कि रन रोकना।
विकेटकीपर और स्लिप में खड़े तीन फिल्डर अगली गेंद का इंतज़ार कर रहे होते हैं। विकेटकीपर (Wicket-keeper) सीधे गेंदबाज़ के सामने, स्टम्प के पीछे झुका हुआ रहता है, जबकि उसके बगल में पहली, दूसरी और तीसरी स्लिप के फिल्डर तैनात हैं। तेज़ गेंदबाज़ की गेंद पर बैट का किनारा लगने पर गेंद विकेटकीपर या स्लिप्स के पास तेज़ी से जाती है, इसलिए ये सभी फिल्डर हर गेंद पर चौकन्ने रहते हैं। स्लिप में खड़े इन फिल्डरों का आपसी अंतराल इतना रखा जाता है कि कोई किनारा निकलने पर एक-दूसरे से टकराए बिना डाइव लगाकर भी कैच लिया जा सके। (Cricket Field)
प्रमुख ऑफ साइड पोज़ीशन्स (पॉइंट, कवर, मिड-ऑफ आदि)
पॉइंट (Point) वह स्थान है जो बल्लेबाज़ के बिलकुल ऑफ साइड में, विकेट से लगभग सीधा समकोण बनाते हुए होता है। पॉइंट पर खड़ा फिल्डर आम तौर पर 30 गज के घेरे के पास या उससे थोड़ा अंदर खड़ा रहता है और कट या पॉइंट की दिशा में मारे गए शॉट्स को रोकने की कोशिश करता है।
अक्सर एक बैकवर्ड पॉइंट भी होता है जो बल्लेबाज़ से थोड़ा पीछे की ओर (गली की तरफ) रहता है, ताकि पीछे की ओर कट या ऊँचा किनारा रोक सके। महान फिल्डर जोंटी रोड्स अक्सर पॉइंट पर फुर्तीले डाइव लगाकर चौके रोकने और रन आउट करने के लिए मशहूर थे। आज के दौर में भी रविंद्र जडेजा जैसे तेज तर्रार खिलाड़ी पॉइंट और कवर क्षेत्र में अपनी तीव्र थ्रो से बल्लेबाज़ों को रन लेने से डराते हैं।(Cricket Field)
कवर (Cover) फिल्डिंग पोजीशन ऑफ साइड पर पॉइंट और मिड-ऑफ के बीच के क्षेत्र को कहते हैं। कवर पर खड़ा फिल्डर बल्लेबाज़ के सामने ऑफ साइड में इस कोण पर रहता है कि वह ड्राइव करके मारे गए शॉट (कवर ड्राइव) को रोक सके।
यदि यही फिल्डर थोड़ा और सीधा (विकेट के सामने की ओर) खड़ा हो तो उसे एक्स्ट्रा कवर कहा जाता है, और अगर थोड़ा पॉइंट की ओर हो तो कवर-पॉइंट कहा जा सकता है। डीप कवर या डीप एक्स्ट्रा कवर उन्हीं जगहों पर बाउंड्री के पास खड़े फिल्डर होते हैं, जिनका काम चौके रोकना या कैच पकड़ना होता है।
मिड-ऑफ़ (Mid-off) और मिड-ऑन (Mid-on) दो महत्वपूर्ण पोज़ीशन हैं जो क्रमशः बल्लेबाज़ के ऑफ साइड और लेग साइड पर लगभग सीधे सामने की ओर, पिच के पास स्थित होती हैं। ये फिल्डर लगभग 15-30 गज की दूरी पर गेंदबाज़ के करीब खड़े रहते हैं। मिड-ऑफ गेंदबाज़ के दाहिनी ओर (यदि गेंदबाज़ दाएँ हाथ से गेंद फेंक रहा है) ऑफ साइड पर रहता है, जबकि मिड-ऑन गेंदबाज़ के बाईं ओर लेग साइड पर।
इनका काम सीधा आया हुआ जोर का शॉट (सीधा ड्राइव) रोकना है। अगर बल्लेबाज़ गेंद को हवा में सीधा खेलता है तो मिड-ऑन/मिड-ऑफ़ के फिल्डर कैच लेने के लिए तैयार रहते हैं। “लॉन्ग ऑन” और “लॉन्ग ऑफ” इन्हीं पोजीशन्स के गहरे (डीप) रूप हैं, जो बाउंड्री के पास मिड-ऑन/मिड-ऑफ़ की सीध में खड़े होते हैं। लॉन्ग ऑन/ऑफ का फिल्डर ऊंचे लगने वाले शॉट्स को बाउंड्री पर कैच करने या चौका-छक्का रोकने के लिए तैनात रहता है। (Cricket Field)
प्रमुख लेग साइड पोज़ीशन्स (स्क्वायर लेग, मिड-विकेट, फाइन लेग आदि)
लेग साइड पर फिल्डिंग पोजीशन्स भी बल्लेबाज़ के कोण के अनुसार कई नामों से जानी जाती हैं। स्क्वायर लेग (Square Leg) पोजीशन बल्लेबाज़ के पैड की सीध में लेग साइड पर, लगभग 90° के कोण पर होती है। स्क्वायर लेग पर खड़ा फिल्डर आम तौर पर अंपायर के करीब या थोड़ा पीछे खड़ा रहता है और लेग साइड पर खेले गए शॉट्स (जैसे पुल या हुक) को रोकने या कैच करने के लिए तैयार रहता है।
यदि यह फिल्डर बल्लेबाज़ से और दूर बाउंड्री के पास हो तो उसे डीप स्क्वायर लेग कहा जाएगा। डीप स्क्वायर लेग सीमारेखा पर उन ऊँचे शॉट्स को रोकता है जो लेग साइड में स्क्वायर दिशा में मारे जाएं (जैसे स्पिनर को स्वीप शॉट)। स्क्वायर लेग के थोड़ा आगे (बल्लेबाज़ के ओर सीधा) अगर फिल्डर हो तो उसे फॉरवर्ड स्क्वायर लेग और पीछे की तरफ हो तो बैकवर्ड स्क्वायर लेग भी कहा जा सकता है, हालांकि प्रचलित शब्द स्क्वायर लेग ही रहता है, जिसकी स्थिति से थोड़ा आगे-पीछे फिल्डर स्थिति बदल सकते हैं। (Cricket Field)
मिड-विकेट (Mid-wicket) एक महत्वपूर्ण लेग साइड पोजीशन है जो मिड-ऑन और स्क्वायर लेग के बीच के क्षेत्र में होती है। मिड-विकेट पर खड़ा फिल्डर बल्लेबाज़ के सामने लेग साइड में इस कोण पर रहता है कि वह ऑन ड्राइव या लेग साइड के फ्लिक/पुल शॉट को रोक सके। (Cricket Field)
डीप मिड-विकेट बाउंड्री के पास इसी क्षेत्र में होता है, जो खासकर टी20/वनडे में चौके-छक्के रोकने या कैच लेने के लिए तैनात रहता है। मिड-विकेट और स्क्वायर लेग के बीच बाउंड्री पर एक अनौपचारिक मज़ाकिया नाम काउ कॉर्नर (Cow Corner) भी प्रचलित है, जो गहरे मिड-विकेट क्षेत्र को कहते हैं – आमतौर पर क्लब क्रिकेट में वहाँ गेंद जाने पर कहते थे कि “गायों के चरने का क्षेत्र” है, लेकिन आधुनिक क्रिकेट में इस क्षेत्र में अक्सर कैच लेने के लिए खिलाड़ी तैनात रहते हैं।(Cricket Field)
फाइन लेग (Fine Leg) लेग साइड पर वह पोजीशन है जो विकेट से पीछे की ओर, लेग साइड की बाउंड्री के पास होती है। यह लगभग विकेटकीपर के पीछे लेग साइड में 45° कोण पर स्थित होती है। फाइन लेग का फिल्डर तेज गेंदबाज़ के लिए अक्सर बाउंड्री पर खड़ा किया जाता है, ताकि लेग ग्लांस या विकेट के पीछे की ओर लगने वाले किनारों को रोक सके।
यदि फाइन लेग बहुत पास है तो उसे शॉर्ट फाइन लेग या बस “45” (क्योंकि 45 डिग्री पर) कहा जा सकता है। लेग साइड पर ही एक लेग स्लिप और लेग गली जैसी करीबी पोजीशन भी होती हैं, जो ऑफ साइड की स्लिप/गली की तरह ही होती हैं मगर बल्लेबाज़ के लेग साइड पीछे की ओर। ये कम ही इस्तेमाल होती हैं, आमतौर पर तब जब गेंदबाज़ लेग स्टंप लाइन पर गेंद डालकर बल्लेबाज़ से गलती करवाना चाहे।(Cricket Field)
थर्ड मैन (Third man) ऑफ साइड पर एक पोजीशन है जो विकेट से पीछे की ओर, कीपर से दूर ऑफ साइड बाउंड्री के पास होती है। थर्ड मैन का काम तेज़ गेंदबाज़ की गेंद पर बल्ले का किनारा लगकर गए तेज़ गेंद (एज) को रोकना या कैच लेना है।
आम तौर पर पहली स्लिप, दूसरी स्लिप, गली के बाद “थर्ड मैन” चौथे रक्षक के तौर पर होता है (इसलिए तीसरे रक्षक के बाद का “थर्ड मैन” नाम पड़ा)। आधुनिक क्रिकेट में थर्ड मैन लगभग हर समय बाउंड्री पर तैनात किया जाता है, विशेषकर सीमित ओवरों में, ताकि अनचाहे किनारों से चौके न जाएँ।
उसी प्रकार ऑफ साइड बाउंड्री पर पॉइंट के पीछे की ओर एक डीप पॉइंट या स्वीपर कवर नामक पोजीशन होती है। स्वीपर शब्द आम तौर पर उन आउटफील्डरों के लिए इस्तेमाल होता है जो चौके बचाने के लिए बाउंड्री पर झाड़ू की तरह स्वीप करते हुए गेंद को मैदान के अंदर रोकते हैं। जैसे डीप कवर, डीप पॉइंट या डीप मिड-विकेट पर खड़े खिलाड़ी। “स्वीपर कवर” विशेष रूप से डीप एक्स्ट्रा कवर में खड़े फील्डर को कहा जाता है जो पूरे ऑफ साइड बाउंड्री को कवर करता है। (Cricket Field)
उपरोक्त सभी फिल्डिंग पोज़ीशन मिलकर मैदान को इस तरह संरचित करती हैं कि गेंद मैदान पर कहीं भी जाए, उसे रोकने या लपकने के लिए कोई न कोई फिल्डर मौजूद हो। एक कुशल कप्तान स्थिति के अनुसार फिल्डरों(Cricket Field) को सही जगह खड़ा करके रन रोकने और विकेट लेने की संभावनाएं बढ़ा देता है।
विभिन्न प्रारूपों में फील्डिंग पोज़ीशन्स में अंतर(Cricket Field)
क्रिकेट के तीनों प्रमुख प्रारूप – टेस्ट, वनडे (ODI) और टी20 – में खेलने की परिस्थितियाँ और रणनीतियाँ भिन्न होती हैं, जिसका असर फिल्ड सेटिंग पर भी पड़ता है।
टेस्ट क्रिकेट में कोई सीमित ओवर नहीं होते, इसलिए फिल्डिंग साइड शुरू में अधिक आक्रामक रह सकती है। नई गेंद से जब तेज़ गेंदबाज़ गेंदबाजी करता है, तो कप्तान आम तौर पर 3-4 स्लिप, गली और शॉर्ट लेग जैसे करीबी कैचिंग फिल्डर लगाता है ताकि Edges पर विकेट मिल सके। (Cricket Field)
टेस्ट मैच में रन गति नियंत्रण से ज्यादा विकेट लेना महत्वपूर्ण होता है, इसलिए आप अक्सर बल्लेबाज़ के आसपास कई फिल्डर देखेंगे। स्पिनरों के लिए टेस्ट में स्लिप, शॉर्ट लेग, सिली पॉइंट जैसी पोज़ीशन रखना आम बात है, खासकर जब पिच से टर्न मिल रहा हो। फिल्डर सीमा रेखा पर कम और बल्लेबाज़ के पास ज्यादा होते हैं क्योंकि रन बनाने की रफ़्तार धीमी होती है और विकेट लेना प्राथमिक उद्देश्य।(Cricket Field)
दूसरी तरफ वनडे और टी20 जैसे सीमित ओवरों के प्रारूप में रन गति नियंत्रित करना अहम होता है। इन प्रारूपों में पावरप्ले (Powerplay) नाम का नियम होता है जो शुरुआत के ओवरों में फिल्डिंग प्रतिबंध तय करता है ।
उदाहरणतः, ODI मैच में पहले 10 ओवर में अधिकतम 2 फिल्डर ही 30-गज के घेरे के बाहर हो सकते हैं । ओवर 11 से 40 के बीच अधिकतम 4 खिलाड़ी बाहर जा सकते हैं, और अंतिम 10 ओवर (41-50) में 5 फिल्डर तक घेरे के बाहर रखे जा सकते हैं। इसी प्रकार T20 में पहले 6 ओवर (पावरप्ले) में 2 से ज्यादा फिल्डर बाहर नहीं होते, उसके बाद शेष ओवरों में 5 फिल्डर बाहर रह सकते हैं। (Cricket Field)
इन नियमों के कारण वनडे/टी20 की शुरुआत में फिल्डर्स को ज्यादातर 30-यार्ड सर्कल के अंदर रखना पड़ता है। इसलिए आमतौर पर सिर्फ 1 या 2 स्लिप रखी जाती है (कभी-कभी कोई स्लिप नहीं), और बाकी फिल्डर एकदिवसीय में इनफील्ड में रन रोकने हेतु तैनात होते हैं। जैसे-जैसे पारी आगे बढ़ती है और पावरप्ले खत्म होता है, कप्तान धीरे-धीरे ज्यादा फिल्डरों को सीमा रेखा पर भेज सकता है। (Cricket Field)
मध्य ओवरों में स्पिन या मीडियम पेस गेंदबाज़ी के समय 4 फिल्डर बाहर रखे जाते हैं, जैसे डीप स्क्वायर लेग, डीप कवर, लॉन्ग ऑन, लॉन्ग ऑफ, डीप मिड-विकेट इत्यादि, ताकि चौकों-छक्कों को रोका जा सके।
पारी के आखिरी ओवरों (death overs) में लगभग पाँच फिल्डर बाउंड्री पर तैनात रहते हैं, क्योंकि बल्लेबाज़ ताबड़तोड़ बड़े शॉट खेलने की कोशिश करते हैं। आप अक्सर इन ओवरों में थर्ड मैन, फाइन लेग, डीप स्क्वायर लेग, डीप मिड-विकेट, लॉन्ग ऑन/ऑफ जैसे सभी स्थानों पर खिलाड़ियों को तैनात देखेंगे, ताकि चारों तरफ बाउंड्री रोकी जा सके।
टी20 में तो फिल्ड सेटिंग और भी ज़्यादा रक्षात्मक हो जाती है क्योंकि सिर्फ 20 ओवर में रन बनते हैं। छह ओवर के पावरप्ले के बाद अधिकांश फिल्डर बाउंड्री पर चले जाते हैं। फिर भी चतुर कप्तान स्थिति के अनुसार कभी-कभी आक्रामक सेटिंग(Cricket Field) लगाते हैं – जैसे नए बल्लेबाज़ के आते ही शुरू में एक स्लिप या शॉर्ट लेग रखना, भले ही यह टी20 हो, ताकि तुरंत विकेट लिया जा सके।
कुल मिलाकर, टेस्ट में जहाँ फिल्डर विकेट के आसपास ज्यादा दिखते हैं, वहीं ODI/T20 में मध्य और अंत के ओवरों में फिल्डर बाउंड्री पर फैले नजर आते हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फिल्डिंग प्रतिबंधों ने खेल को तेज़ बनाया है और बल्लेबाज़ों को बड़े शॉट खेलने के लिए प्रोत्साहित किया है, जिसके जवाब में फिल्डिंग टीम को रक्षात्मक पोज़िशनें अपनानी पड़ती हैं। फिर भी, अच्छी कप्तानी वही है जो समय-समय पर फिल्ड सेटिंग में बदलाव कर बल्लेबाज़ को चकित कर सके और मौके मिलने पर आक्रामक मुद्रा में लौट आए।
प्रसिद्ध खिलाड़ियों के उदाहरण और उनकी रणनीतियाँ(Cricket Field)
क्रिकेट इतिहास में कई खिलाड़ियों ने अपनी अद्भुत फिल्डिंग, गेंदबाजी रणनीति और बल्लेबाजी कौशल से उदाहरण पेश किए हैं, जिनसे फिल्ड पोज़िशन के महत्त्व का पता चलता है।
राहुल द्रविड़ को टेस्ट क्रिकेट में सबसे भरोसेमंद स्लिप फिल्डरों में गिना जाता है। उन्होंने अपने करियर में 210 कैच लपके, जो टेस्ट इतिहास में किसी गैर-विकेटकीपर द्वारा सबसे अधिक कैच हैं। द्रविड़ ने स्लिप में रहते हुए कठिन से कठिन कैच को भी आसानी से पकड़ने की कला विकसित की थी, जिसके चलते उन्हें “द वॉल” कहा जाता था।
उनकी इसी क्षमता के कारण भारतीय कप्तान कई बार द्रविड़ को पहली स्लिप पर तैनात कर गेंदबाज़ों के लिए एक मज़बूत कैचिंग कॉर्डन बना पाते थे।
दूसरी ओर, जोंटी रोड्स जैसे दक्षिण अफ्रीकी खिलाड़ी ने 90 के दशक में दिखा दिया कि पॉइंट और कवर जैसे स्थानों पर फिल्डिंग से मैच का रुख बदला जा सकता है। रोड्स को विश्व के महानतम फिल्डरों में से एक माना जाता है – 1992 विश्व कप में उनकी एक अविस्मरणीय डायरेक्ट थ्रो ने इंज़माम-उल-हक़ को रनआउट करके फिल्डिंग के महत्व पर नया प्रकाश डाला।
आधुनिक क्रिकेट में भारत के रविंद्र जडेजा ऐसे ही एक उत्कृष्ट फिल्डर हैं जिन्हें पिछले दशक का भारत का सर्वश्रेष्ठ फिल्डर कहा गया है। जडेजा की तेज़ रफ्तार, सटीक थ्रो और कैच लेने की क्षमता ने कई मुकाबलों में विरोधी टीम के रन रोककर या विकेट निकालकर फर्क पैदा किया है। (Cricket Field)
गेंदबाज़ी रणनीति में भी महान खिलाड़ियों के उदाहरण फिल्ड सेटिंग(Cricket Field) से जुड़े हैं। ऑस्ट्रेलिया के लेग स्पिनर शेन वॉर्न आक्रामक फिल्ड सेट करने के लिए मशहूर थे। वे कप्तान से करीबी फिल्डर (स्लिप, शॉर्ट लेग, सिली पॉइंट) रखने की मांग करते थे ताकि अपने स्पिन के जाल में फँसकर बल्लेबाज़ ज़रा सी चूक करें तो तुरंत कैच आउट हों। उनकी गेंदबाजी में अक्सर एक-दो स्लिप और लेग साइड पर शॉर्ट लेग दिखते थे, जिससे बल्लेबाज़ पर दबाव बनता था।
इसके विपरीत, सीमित ओवर क्रिकेट में भारतीय तेज गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार या जसप्रीत बुमराह जैसे गेंदबाज़ डेथ ओवरों में ज्यादातर फिल्डर बाउंड्री पर तैनात रखते हुए यॉर्कर गेंदों से रन रोकने की रणनीति अपनाते हैं। वे बल्लेबाज़ को बड़ा शॉट खेलने के लिए मजबूर करते हैं और डीप में खड़े फिल्डरों के जरिए कैच निकलवाने की कोशिश करते हैं।
बल्लेबाजी की बात करें तो महेंद्र सिंह धोनी एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने फिनिशर की भूमिका को परिभाषित किया। धोनी जब क्रीज़ पर होते थे, तो विरोधी कप्तान लगभग सभी फिल्डर बाउंड्री पर लगा देते थे क्योंकि धोनी लंबे छक्के लगाने के लिए प्रसिद्ध थे। धोनी ने भी इसको ध्यान में रखकर अक्सर गैप (फिल्डरों के बीच की खाली जगह) में चौके बटोरने या सीधे बाउंड्री(Cricket Field) के ऊपर से छक्का मारने की रणनीति बनाई।
इसी तरह विराट कोहली मध्य ओवरों में गैप में दौड़कर तेज दो रन लेने की कला में माहिर हैं, जिसके लिए वे फिल्ड सेटिंग को भांपकर गेंद को ऐसी जगह खेलते हैं जहां फिल्डर तक तुरंत न पहुंच सकें।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि क्रिकेट में फिल्डिंग पोज़िशन और खिलाड़ियों की रणनीति का गहरा संबंध है। एक महान कप्तान फिल्डरों को सही स्थान पर रखकर गेंदबाज़ की ताकत और बल्लेबाज़ की कमजोरी के मुताबिक मैदान सजाता है। कुशल बल्लेबाज़ फिल्डरों की सजावट देखकर गैप खोजते हैं और रन बनाते हैं। (Cricket Field)
श्रेष्ठ फिल्डर अपनी चुस्ती और चालाकी से असंभव दिखने वाले कैच या रनआउट संभव बनाते हैं। क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में सफलता के लिए खिलाड़ियों को अपनी पोज़िशन की समझ और रणनीति में लगातार सुधार करना पड़ता है। इस प्रकार, क्रिकेट मैदान पर प्रत्येक पोज़िशन – चाहे वह बल्लेबाज़ी क्रम में हो, गेंदबाज़ी में हो या फिल्डिंग(Cricket Field) में – खेल के नतीजे को प्रभावित करने की क्षमता रखती है, और यही क्रिकेट को रोमांचक और रणनीति से भरपूर खेल बनाता है।
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