Contents hide
1) उपभोक्तावादी संस्कृति के फलस्वरुप मीडिया में आए बदलाव, गेटकीपिंग और बुलेट सिद्धांत( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)
1.4) जन माध्यमों का स्वरूप और प्रकार, जन माध्यमों की कार्यशैली, उद्देश्य व अपेक्षाएँ, आधुनिक जनसंचार माध्यम के अध्ययन की विधियां तथा माध्यमों की प्रस्तुति की समीक्षा
1.6) जनमाध्यमों की सैद्धान्तिकी: अभिप्राय एवं आवश्यकता, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में जनमाध्यम सैद्धांतिकी की भूमिका, जनमत निर्माण में भूमिका, मनोशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय और मार्क्सवादी सैद्धान्तिकी, लोकतांत्रिक भागीदारी का सिद्धांत
1.7) मनोशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय और मार्क्सवादी सैद्धान्तिकी–

उपभोक्तावादी संस्कृति के फलस्वरुप मीडिया में आए बदलाव, गेटकीपिंग और बुलेट सिद्धांत( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)

उपभोक्तावादी संस्कृति के फलस्वरुप मीडिया में आए बदलाव,  गेटकीपिंग का सिद्धांत और बुलेट सिद्धांत

( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)

उपभोक्तावादी संस्कृति के फलस्वरुप मीडिया में आए बदलाव- 

●औद्योगिक घरानों का आगमन  

●मीडिया पैशन से प्रोफेशन हो गया  

●पाठक, उपभोक्ता बन गए  

Advertisements

●तकनीकी बदलाव हुए  

●सूचनाओं का भंडार बढ़ा 

●भाषागत बदलाव  

●कंटेंट (विषय वस्तु) में बदलाव  

●टीआरपी बेस्ड सिस्टम  

●विज्ञापनों की भरमार  

●मुनाफे का सिद्धांत  

●ग्रामीण

–परिवेश हाशिए पर


गेटकीपिंग का सिद्धांत और बुलेट सिद्धांत


गेटकीपिंग का सिद्धांत– मीडिया में आने वाला कंटेंट हमेशा फिल्टर होकर लोगों तक पहुंचता है, यही इस सिद्धांत का मूल है। यह सिद्धांत जर्मन मनोवैज्ञानिक कर्ट लेविन( Kurt Lewin) द्वारा दिया गया जिसमें उन्होंने बताया कि संचार की हर प्रक्रिया में एक गेटकीपर होता है जो तय करता है कि कौन-सी जानकारी दर्शक/श्रोता तक पहुंचानी है। इसमें सूचना को फिल्टर किया जाता है। उसमें आवश्यक बदलाव किए जाते हैं।

रिपोर्टर का काम सिर्फ संस्थान में खबर पहुंचाना है, उसके बाद खबर को किस नजरिए से लोगों तक पहुंचाया जाएगा, उसका क्या एंगल होगा, यह सब काम गेटकीपर करता है। गेटकीपर की भूमिका में हम संपादक को मान सकते हैं। गेटकीपिंग की प्रक्रिया के जरिए संवेदनशील सूचना, जिससे दंगे हो सकते हैं और विरोधाभासी सूचनाओं को हटाने या रोकने का काम किया जाता है। ऐसा करने से सूचनाएं सही होकर पाठकों तक पहुंचती हैं। गेटकीपिंग में सूचना देने का तरीका चरणबद्ध होता है। इसे चैनल थ्योरी भी कहते हैं।


बुलेट थ्योरी- इसे हाइपोडर्मिक नीडल थ्योरी (hypodermic niddle theory) भी कहते हैं। इसमें हम खबर जिस अर्थ में प्रापक तक पहुँचाना चाहते हैं, उसी अर्थ में पहुंचती है यानी उद्देश्य वही रहता है। इसमें सूचना में किसी भी प्रकार का परिवर्तन करने वाला कोई भी गेटकीपर नहीं होता है। जैसे बंदूक से गोली निकलने के बाद सीधे अपने उद्देश्य तक पहुंचती है उसी तरह बुलेट थ्योरी में कोई भी सूचना सीधे उसके पाठक तक जस की तस पहुंचती है। इस थ्योरी का अधिकतर प्रयोग एजेंडा सेटिंग के लिए किया जाता है। हेराल्ड लासवेल ने अपनी किताब ” Propaganda techniques during the world war 1947″ में बुलेट थ्योरी का जिक्र किया है।

इसमें प्रापक अपने विवेक का इस्तेमाल करना बंद कर देता है और संचालक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह संचार के एकरेखीय मॉडल पर काम करती है, जिसमें किसी भी प्रकार की बाधा नहीं होती है। इसमें दर्शक या पाठक पर मनचाहा प्रभाव छोड़ा जा सकता है और यही इसकी भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण बना देती है। हमारी खबर किस रूप में आने वाली है, यह निर्भर करता है कि हमारा संचारक कौन है। बुलेट थ्योरी को प्रभावी बनाने के लिए 2 शर्ते आवश्यक हैं-

1) जनमाध्यम की शक्ति 

2) श्रोताओं का अत्यधिक तत्पर, संदेश के लिए बेहद उत्सुक होना


इस थ्योरी की आलोचना यह है कि संप्रेषित संदेश भले ही समान रूप से सभी प्रापकों तक पहुंचता है लेकिन हर व्यक्ति पर संदेश का प्रभाव समान नहीं होता है।

माध्यम शोध,फीडबैक और फीड फॉरवर्ड,पाठक, श्रोता, दर्शक सर्वेक्षण संबंधी अध्ययन,( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)

माध्यम शोध

माध्यम शोध मीडिया के विषयों पर केंद्रित शोध होता है। यह संप्रेषण पर आधारित होता है। इसमें आम जनता को महत्वपूर्ण घटनाओं से अवगत कराया जाता है। यह लक्षित समूह केंद्रित होता है। माध्यमिक शोध ने सामाजिक शोध को एक नया आयाम दिया है, हालांकि यह अभी पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाया है। यह अभी विकासशील स्थिति में है। यह व्यवहारिक व क्रियात्मक शोध है। इस पर शोध प्रशिक्षण, मूलतः मीडिया संस्थानों तथा अन्य संस्थानों तक ही सीमित है । मीडिया शोध में संबंधित तथ्यों व घटनाओं के संदर्भ में ज्ञान प्राप्त करने या उनकी व्यवस्थित जांच परीक्षण के लिए वैज्ञानिक पद्धति द्वारा व्यवस्थित खोज की जाती है।


फीडबैक और फीड फॉरवर्ड

( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)


फीडबैक– संचार की प्रक्रिया में फीडबैक उस प्रतिक्रिया को कहते हैं जो संदेश प्राप्त करने के बाद प्रापक, संचारक को देता है। प्रतिपुष्टि यह स्पष्ट करती है कि संचारक द्वारा प्रेषित संदेश प्राप्त तथा सही रूप से स्पष्ट किया गया है कि नहीं।


फीडबैक के प्रकार-संदेश के प्रभाव के आधार पर- सकारात्मक प्रतिपुष्टि और नकारात्मक प्रतिपुष्टि।स्रोत के आधार पर प्रत्यक्ष प्रतिपुष्टि और अप्रत्यक्ष प्रतिपुष्टि।


 सकारात्मक प्रतिपुष्टि का मतलब है कि प्रापक द्वारा संदेश का सही अर्थ ग्रहण कर लिया गया है और प्रापक उस बात से संतुष्ट है। वहीं नकारात्मक प्रतिपुष्टि का अर्थ है कि प्रापक द्वारा या तो सही से अर्थ ग्रहण नहीं किया गया है अथवा उसे संदेश पसंद नहीं आया।प्रत्यक्ष प्रतिपुष्टि में संचारक प्रापक के सामने ही होता है, अथवा किसी माध्यम से उससे जुड़ा हुआ होता है और उसे प्रतिपुष्टि तुरंत मिलती है। अप्रत्यक्ष प्रतिपुष्टि में प्रतिपुष्टि सामने से नहीं मिलती है और इसमें कुछ समय लगता है।


फीड फॉरवर्ड– फीड फॉरवर्ड यानी वक्ता की संचार के संदर्भ में आगामी तैयारी। विचार संचारित करने से पहले, प्रापक पर पड़ने वाले प्रभाव को सोचना ही फीड फॉरवर्ड कहलाता है। इसमें भविष्य को ध्यान में रख कर बोलना और वर्तमान में बोली गई बात का क्या प्रभाव पड़ेगा, यह सोचना शामिल होता है। श्रोता की प्रतिक्रिया क्या होगी, यह ध्यान में रख कर बोलना फीड फॉरवर्ड कहलाता है।

पाठक, श्रोता, दर्शक सर्वेक्षण संबंधी अध्ययन-


मीडिया प्रभाव मापने के लिए अलग-अलग क्षेत्र अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। जैसेे- समाचार पत्र-पत्रिकाएं, पाठक सर्वेक्षण कराती हैं। टेलीविजन चैनल पीपुल्स मीटर, डायरी विधि, जनमत सर्वेक्षण तरीकों से सर्वेक्षण करवाते हैं।  


1) पाठक सर्वेक्षण– 

पाठक सर्वेक्षण के अंतर्गत मुद्रित व ऑनलाइन पत्र- पत्रिकाएं शामिल हैं। निम्नलिखित जानकारियां लेने के उद्देश्य से, प्रकाशन संस्थान रीडरशिप सर्वे कराते हैं-प्रसार संख्या/ पाठक संख्या,पाठक विवरण,पाठकों की जीवन शैली,विषयों की पसंद-नापसंद,सामग्री की पसंद-नापसंद,पाठक- गैर पाठक,उपयोग व संतुष्टि|


महत्व– विज्ञापन प्राप्ति के लिए,  खुद की प्रासंगिकता एवं ब्रांड वैल्यू तय करने के लिए।


दर्शक-श्रोता अनुसंधान- ज्यादातर रेडियो या टीवी नेटवर्क में अपने शोध प्रकोष्ठ यानी Research Cell होते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शोध की ओर पहला कदम बढ़ाने वाले प्रसारक नहीं विज्ञापनदाता थे। दूरदर्शन में अनुसंधान के लिए दर्शक अनुसंधान एकांश (ऑडियंस रिसर्च यूनिट) और आकाशवाणी में श्रोता अनुसंधान एकांश (ऑडियंस रिसर्च यूनिट) है। 


2) दर्शक अनुसंधान और टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट-  दर्शक अनुसंधान विधि दो तरीके से पूर्ण की जा सकती है- डायरी विधि, मीटर विधि


डायरी विधि- इसमें रैंडम नमूना लिया जाता है। साक्षात्कार लेने वाले, डायरी को विभिन्न परिवारों में दे आते हैं और भरने का तरीका समझा देते हैं। दर्शक टीवी पर जो भी देखता है वह डायरी में भर देता है। डायरी विधि की समय सीमा 7 से 15 दिन होती है। टेलीफोन सर्वे भी एक प्रकार से डायरी विधि ही है। 


मीटर विधि– टीवी सेट के तारों को मीटर से जोड़ना, फिर जितनी देर टीवी चलता है मीटर उसके हर मिनट का विवरण दर्ज करता है। तीन चीजें अंकों के साथ सेट करते हैं- चैनल संख्या, शुरुआत का समय और समाप्ति का समय। यह महंगी प्रक्रिया है और कई महीनों तक चलती है। इसमें शोध संस्था के कंप्यूटर, ऑटोमेटिक ढंग से डायल करते हैं और पूरी जानकारी पाते हैं। इस प्रक्रिया में 6 महीने से 2 साल तक का समय लगता है।


टेलीविजन रेटिंग- डायरी व मीटर विधि से निम्नलिखित निष्कर्ष निकालते हैं-रेटिंग–  यह दर्शकों की संख्या का माप है ना कि लोकप्रियता का। टीवी देखने वाले परिवार-  हाउस ऑफ यूजिंग टेलीविजन टारगेट ऑडियंस रेटिंग प्वाइंट– विज्ञापन टारगेट ऑडिएंस तक पहुंचा या नहीं। यह विज्ञापन की पहुंच देखने के लिए किया जाता है। पहुंच व बारंबारताकार्यक्रम की रैंकिंगदर्शकों की हिस्सेदारी

3) ओपिनियन पोल- किसी समाचार पत्र या चैनल द्वारा अपनी लोकप्रियता जानने या  किसी विषय पर लोगों की राय जानने के लिए जनमत सर्वेक्षण कराए जाते हैं। जनमत सर्वेक्षण फील्ड सर्वे, टेलीफोन सर्वे और प्रत्यक्ष साक्षात्कार विधि का प्रयोग करके करवाए जा सकते हैं।


मीडिया शोध संस्थाएँ- 

IRS (Indian Readership Survey),नील्सन मीडिया रिसर्च, ORG-MARG, CSDS (Center for voting opinion and trends In Election Research),C VOTER- (Center for voting opinion and trends in Election Research)

 

जन माध्यमों का स्वरूप और प्रकार, जन माध्यमों की कार्यशैली, उद्देश्य व अपेक्षाएँ, आधुनिक जनसंचार माध्यम के अध्ययन की विधियां तथा माध्यमों की प्रस्तुति की समीक्षा

( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)

जनसंचार माध्यम- 

किसी संदेश/ सूचना को जब माध्यम का प्रयोग करके बड़ी संख्या में लक्षित समूह पहुंचाया जाता है तो वह माध्यम जनसंचार माध्यम कहलाता है। या ऐसा माध्यम, जिसके द्वारा किसी संदेश को एक बड़ी संख्या तक पहुंचाया जाता है तो उसे जनसंचार माध्यम कहते हैं। उदाहरण- रेडियो, टीवी, लोकनृत्य, सोशल मीडिया, लोकगीत, नाटक आदि।

जन माध्यमों का स्वरूप और प्रकार– जनमाध्यम मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं- पारंपरिक जनसंचार माध्यम और आधुनिक जनसंचार माध्यम

पारम्परिक जनसंचार माध्यम में लोकगीत, लोकनृत्य, लोककथाएं, लोकगाथा और लोकनाटक शामिल हैं।वही आधुनिक जनसंचार माध्यम को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है- मुद्रित माध्यम, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम और न्यू मीडिया। मुद्रित माध्यमों में सूचना छपे हुए रूप में होती है। उदाहरण- समाचार पत्र-पत्रिकाएं और पेम्पलेट आदि। इलेक्ट्रॉनिक जनसंचार माध्यम में लक्षित वर्ग तक सूचना सिग्नल अथवा तार वाले माध्यम से पहुंचती है। उदाहरण- रेडियो और टेलीविजन।न्यू मीडिया यानी संचार का नया रूप, इसमें सूचना वेब सर्फिंग तथा संचार की अति उन्नत तकनीक के जरिए अपने लक्ष्य तक पहुंचती है। इसमें इंटरनेट, ईमेल, टेलीफोन को शामिल किया जाता है।

जनमाध्यमों की कार्यशैली, उद्देश्य व अपेक्षाएं- 

जनमाध्यमों की कार्यशैली- 


●जनमाध्यमों की पहुँच का दायरा विस्तृत होता है इसलिए जनमाध्यम को ऐसी सूचना प्रसारित करनी चाहिए जो एक बड़े स्तर तक लोगों को प्रभावित करें और उनके हित में हो।


●इसके लिए विषयों का चुनाव सामाजिक स्तर पर होना चाहिए यानी कि राजनीति से ज्यादा समाज से जुड़े मुद्दों को तरजीह दी जानी चाहिए।


●जनमाध्यम को अपने तीन प्रमुख काम मनोरंजन, सूचना और शिक्षा से हमेशा जुड़े रहना चाहिए।


●जन माध्यमों की कार्यशैली का सबसे विशेष अंग, इसका समसामयिक मुद्दों से जुड़ाव है। समाज में जो भी घटनाएं घट रही हैं, उन्हें सीधे तौर पर लोगों के बीच रखना चाहिए ताकि समाज में यदि गलत घटनाएं हो रही है तो समाज सतर्क हो जाए और अगर अच्छी घटनाएं घट रही है तो समाज इन्हें अपनाए।


जनमाध्यमों का उद्देश्य ( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)

●सूचित करना 

●शिक्षित करना 

●जागरूक करना  

●स्वस्थ मनोरंजन करना  

●जनमत निर्माण करना  

●लोकतंत्र में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना 

●समाज को उचित दिशा देकर संगठित करना 

●लोकतंत्र की हर संस्था की निगरानी करना यानी वॉच डॉग की भूमिका में रहना 

●लोगों को उनके अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्य भी बताना। 

●समाज को सकारात्मकता की ओर ले जाना

●किसी भी घटना को आम लोगों के सामने निष्पक्ष भाव से रखना

●देश की समानता और बंधुत्व का रक्षक 


जन माध्यमों से अपेक्षाएं- जनमाध्यमों से अपेक्षाएं हैं कि वे –

●हाशिये के लोगों की खबरें मुख्यधारा की मीडिया में लाएं। 

●सच को जनता तक पहुंचाए

●जनप्रतिनिधियों से सवाल करे

●खबरों में प्रासंगिकता रखे

●हर महत्वपूर्ण बात की जानकारी दे,पार्टी पॉलिटिक्स से दूर रहे।

●समाज को भड़काने के बजाय उन्हें संगठित करने के लिए काम करें

●समाज को परिवर्तित करने वाले जन आंदोलनों में भागीदार बने

आधुनिक जनसंचार माध्यम: अध्ययन की आवश्यकता-


●जनसंचार की सामाजिक उपयोगिता जानने के लिए


●समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने के लिए

●नई तकनीक के बारे में जानने के लिए

●उस नई तकनीक का लक्षित वर्ग पर प्रभाव समझने के लिए

●विषय वस्तु को तैयार करने का तरीका और उसके बदलते स्वरूप पर बात करने के लिए

●पाठक/दर्शक का खबर को देखने का नजरिया, जानने के लिए

●जनसंचार माध्यमों में प्रत्येक स्तर पर हो रहे बदलाव का पता लगाने के लिए

●पत्रकारिता की नैतिकता व उसके मूलभूत सिद्धांतों को जानने के लिए

●जनसंचार में वैश्वीकरण के कारण आए प्रभाव को जानने के लिए 

●विश्व में, विकसित देशों से विकासशील देशों की ओर सूचना के प्रभाव के महत्व को अधिक स्पष्ट करने के लिए

जनमाध्यमों की प्रस्तुति की समीक्षा- जनमाध्यमों की प्रस्तुति की समीक्षा यानी कि जनमाध्यम में जो भी सामग्री आ रही है उसे हम किन आधारों पर वर्गीकृत कर सकते हैं ताकि उसे समझा जा सके।

कंटेंट के आधार पर- खबर को लिखने का नजरिया, संतुलन, पक्ष-विपक्ष

भाषा के आधार पर- व्याकरण, शुद्ध/परिष्कृत, मुहावरेदार, सरल/कठिन, सहज 

तकनीक के आधार पर– कागज, पेज, कलर कॉन्बिनेशन

विज्ञापन के आधार पर-सरकारी, गैर सरकारी, 60: 40 का संतुलन 

लक्षित वर्ग के आधार पर,क्वालिटी के आधार पर- पेज, लेआउट, स्पेस| इसके साथ ही नैतिकता के स्तर पर, शीर्षक के स्तर पर, तथ्यों- बहस का स्वरूप, मुद्दे, विशेषज्ञता, अतिथि संख्या प्रस्तुतकर्ता के बोलने का तरीका, शब्दों का चयन आदि, प्रत्येक आधार पर समीक्षा की जा सकती है।

संचार के प्रमुख मॉडल– 

( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)

मॉडल को तीन श्रेणियों में बांटा गया है, इसके आधार पर कई मॉडल्स की व्याख्या की गई है।

तीन श्रेणियाँ-

लीनियर श्रेणी मॉडल, सर्कुलर मॉडल, ट्रांजैक्शनल मॉडल।

लीनियर श्रेणी मॉडल- वह मॉडल जिसमें एक दिशा में संचार होता है, वक्ता संदेश का संप्रेषण करता है जिसे प्रापक द्वारा प्राप्त किया जाता है। संप्रेषक व संदेश की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होती है, प्रापक का योगदान कम होता है। प्रतिपुष्टि नहीं होती है।

 सर्कुलर श्रेणी मॉडल- संचार की प्रक्रिया एक वृत्त के रूप में होती है। इसमें परस्पर खबरों का आदान-प्रदान होता है और प्रतिपुष्टि भी होती है।

ट्रांजैक्शनल श्रेणी मॉडल- जब संचार की पूरी प्रक्रिया के दौरान किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न हो जाए तो उसे इस मॉडल के अंतर्गत रखते हैं।

लीनियर श्रेणी मॉडल- 

  1. अरस्तु का मॉडल- 

यह संचार का पहला मॉडल है। यह तर्क और विश्वसनीयता की बात करता है। इसमें संचारक और प्रापक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। फीडबैक नहीं होता है। अवसर पर ज्यादा बल दिया जाता है। अरस्तु का मॉडल, श्रोता पर प्रभाव उत्पन्न करना बताता है। इसके अनुसार संदेश तीन प्रकार से सबसे ज्यादा काम करता है। पहला, पैथोज (दुख) संवेदना यानी वक्ता अपने संदेश में दुख (संवेदना) लाए। दूसरा,  इथोज यानी विश्वसनीयता, संचारक ,प्रापक के लिए विश्वसनीय हो। तीसरा, लोगोज यानी संदेश में तार्किकता हो।

  1. हेराल्ड- लासवेल मॉडल- 

यह मॉडल, माध्यम की महत्वपूर्ण भूमिका पर बात करता है। माध्यम में रुकावट आ सकती है। इसमें फीडबैक नहीं होता है। यह 5W1h पर आधारित है।

  1. गणितीय मॉडल-

इसे मदर ऑफ कम्युनिकेशन मॉडल या टेलीफोनिक मॉडल भी कहा जाता है। इसका सबसे ज्यादा प्रयोग द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुआ था। यह तकनीकी ज्ञान पर आधारित है। इसमें तरंगों के माध्यम से संचार किया जाता है। इस मॉडल में भाषाई त्रुटि या तकनीकी समस्या आ सकती है। यह मॉडल, मनुष्य को मशीन मानता है, इसमें मानवता का भाव नहीं है। फीडबैक प्राप्त नहीं होता है।

  1. बर्लो मॉडल- 

इसे SMCR मॉडल भी कहा जाता है। 

प्रेषक- वाचन कला में निपुण, ज्ञान का भंडार, प्रभावशाली लेखन, सांस्कृतिक भिन्नता का ज्ञान, सामाजिक व्यवस्था की समझ।

संदेश- मजबूत विषय-वस्तु, संदर्भित, तार्किक, कोडिंग सही तरीके से हो, व्यवस्थित हो।

माध्यम- प्रासंगिक हो, लक्षित समूह तक पहुंच हो।

प्रापक- अच्छा श्रोता हो, मैसेज को डिकोड कर सके, सांस्कृतिक और सामाजिक ज्ञान हो, भाषाई ज्ञान भी जरूरी।

सर्कुलर श्रेणी मॉडल-

  1. ऑसगुड-श्राम मॉडल-

 यह अंतर वैयक्तिक संचार मॉडल है। इसमें एक ही व्यक्ति प्रेषक और व्यापक दोनों की भूमिका में होता है।

  1. थ्योडोर- ABX मॉडल-

इसे न्यूकॉम्ब मॉडल ऑफ कम्युनिकेशन भी कहते हैं। यह एक त्रिकोणीय मॉडल है। यह सामाजिक भूमिका पर बल देता है। इसका मूल उद्देश्य यही है कि जब तक ABX तीनों एक दूसरे को नहीं समझेंगे, संचार पूरा नहीं होगा।

  1. मैक्ली मॉडल-

यह आज के सोशल मीडिया पर लागू होने वाला मॉडल है। इसमें संचारक, संदेश, प्रापक के बीच किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं होती है।

ट्रांजैक्शनल श्रेणी मॉडल-

  1. फ्रेंक डांस मॉडल

इसे हेलीकल ने दिया था, इसलिए इसे ‘हेलीकल मॉडल ऑफ कम्युनिकेशन’ भी कहा जाता है। इसके अनुसार संचार की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती है। यह मॉडल अतीत को वर्तमान से जोड़ता है। यह तीन तत्वों पर बल देता है- समय, संबंध और संचार। यह सिद्धांत हेलिक्स पर आधारित है जिसमें संचार की प्रक्रिया धीमे-धीमे समय के साथ और बड़ी होती जाती है।

  1. जॉर्ज गर्वनर मॉडल-

 इसे जनरल मॉडल भी कहा जाता है क्योंकि इसे अमेरिका के जनरल जॉर्ज गर्वनर ने दिया था। इसे व्यापक संदर्भ में समझने के लिए निम्न बिंदुओं पर ध्यान देना होगा-

कोई,

किसी घटना पर बात करता है,

प्रतिक्रिया,

स्थिति,

माध्यम,

सामग्री,

किस रूप में,

परिप्रेक्ष्य, भेजने लायक संदेश,

 किस निष्कर्ष के साथ,

 E व M के बीच फैक्टर- चयन, संदर्भ, उपलब्धता।

  1. प्रोपेगैंडा मॉडल-

 इसे नॉम चॉम्स्की व एडवर्ड हेरमेन ने दिया है, इसे उन्होंने अपनी किताब ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’ में दिया था। इसके अनुसार संचार में पाँच फ़िल्टर काम करते हैं, जो खबरों को प्रभावित करते हैं। यह पांच फिल्टर हैं-

 ओनरशिप ,फंडिंग, सोर्स, क्रेडिबिलिटी, एंटी -टेररिज्म। प्राइवेट मीडिया ‘बिजनेस’ है। कॉरपोरेट मीडिया प्रोपेगैंडा कैसे चलाती है व इसका आमजन पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह प्रोपेगैंडा मॉडल बताता है।

जनमाध्यमों की सैद्धान्तिकी: अभिप्राय एवं आवश्यकता, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में जनमाध्यम सैद्धांतिकी की भूमिका, जनमत निर्माण में भूमिका, मनोशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय और मार्क्सवादी सैद्धान्तिकी, लोकतांत्रिक भागीदारी का सिद्धांत

( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)

जनमाध्यमों की सैद्धान्तिकी: अभिप्राय एवं आवश्यकता-


किसी भी संस्था के कुछ आदर्श होते हैं, जिन पर वह संस्था काम करती है। यह आदर्श, नियम-उसूल समाज में उसकी उपयोगिता तय करते हैं जिन्हें सैद्धान्तिकी कहा जाता है


मीडिया संस्था की शुरुआत के समय कुछ आदर्श तथा नियम तय किए गए, जिनको आधार मानकर, मूल मानकर संस्था को अपना काम करना होता है इसे ही जनमाध्यमों की सैद्धांतिकी कहा गया।जनमाध्यमों की सैद्धान्तिकी यानी Basic set of rules and regulations.


जनमाध्यमों के संदर्भ में भी कुछ सिद्धांत तय किए गए हैं जो इनका आधार है तथा जनमाध्यमों से यह अपेक्षा की गई है कि अपना मूल बनाए रखेंगे।


●जनमाध्यम विकास की बात करेंगे।   

●लोगों की आम जन की बात करेंगें।   

●सूचना में मौलिकता होगी।   

●समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की कोशिश होगी।                   

●खबरों के विभिन्न विषयों में संतुलन बनाए रखेंगे।   

●निष्पक्ष रहेंगे। ये सिद्धांत ही जनमाध्यमों का मूल हैं, अगर इनका क्षरण हुआ तो जनमाध्यम अपना अस्तित्व और आधार खो देंगे।
इस सैद्धान्तिकी की आवश्यकता इसलिए है ताकि उसे अपने होने की वजह पता हो

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में जनमाध्यम सैद्धांतिकी की भूमिका-


 यदि वर्तमान समय की बात की जाए तो पत्रकारिता में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलते हैं। यह परिवर्तन सकारात्मक भी हैं और नकारात्मक भी। जब तक सकारात्मक परिवर्तन है तब तो ठीक है लेकिन यदि परिवर्तन की दिशा नकारात्मक हो जाए तो उसे सुधारने की और अपनी मूल भावना को फिर से याद करने की जरूरत महसूस होती है। यह जनमाध्यमों की सैद्धान्तिकी ही वर्तमान दौर में मीडिया को टूटता खम्भा होने से बचा सकती है।

इस कारण इन सिद्धांतों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।आज के दौर में, मीडिया को अपने सिद्धांतों को दोहराने की जरूरत है क्योंकि पत्रकारिता अपने मूल से भटक गई है। उसकी राह पैशन से प्रोफेशन की ओर हो गई है। अब पत्रकारिता पैसा कमाने का जरिया हो गई है। अखबार और चैनल प्रोडक्ट हो गए हैं। संस्थान का लाभ सर्वोपरि हो गया है। उपभोक्तावाद की आड़ में विज्ञापनों की भरमार हो गई है।  पेड न्यूज़ ने अपने पाँव गंभीरता से पसारने शुरू कर दिए हैं।


इन सभी कारणों से इसकी जरूरत है ताकि मीडिया अपनी जिम्मेदारी समझे, नैतिकता बनाए रखे, कार्य प्रणाली में सुधार करे। मीडिया, खुद का ही असल उद्देश्य समझे और अपने सिद्धांतों को प्रभावी रूप से लागू कर पाए।


जनमत निर्माण में भूमिका-


किसी भी विषय पर समान राय/ विचार/ दृष्टिकोण ही जनमत कहलाता है। इन समान विचारों की सामूहिकता को जनसंचार माध्यम अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। किन विषयों पर जनता किस तरीके से अभिव्यक्ति दे रही है इससे जनमत का निर्माण होता है। जनमत से राजनीति और समाज दोनों ही व्यापक रूप से प्रभावित होते हैं।

जनमत निर्माण में चार अवस्थाएं होती हैं-

1) समस्या उत्पन्न होना 

2) समस्या पर विचार-विमर्श 

3) विकल्पी समाधान प्रस्तुत करना 

4) जनमत का प्रकट होना 


जनमत निर्माण के दौरान सबसे पहले हमारे सामने प्रश्न होता है, ये प्रश्न ही असल में हमारी समस्या है। इस प्रश्न पर बातचीत की जाती है, डिबेट की जाती है, परिचर्चा होती है, सामूहिक बैठकों का आयोजन किया जाता है। उस सवाल के जवाब तलाशे जाते हैं। इस प्रकार एक विकल्प या एक समाधान सबके सामने आता है, यह समाधान ही जनता एवं विशेषज्ञों की राय होती है, इसे जनमाध्यम द्वारा हर व्यक्ति तक पहुंचाया जाता है। यही है जनमत का प्रकट होना।


जनमत का निर्माण के साधन- जनमत निर्माण विभिन्न तरीकों से किया जाता है। जनमत निर्माण के साधन हैं- समाचार पत्र-पत्रिकाएं, ओपिनियन पोल, एग्जिट पोल, विभिन्न आंदोलन, सर्वे, टीवी, रेडियो, सिनेमा। विभिन्न घटनाएं भी जनमत को आवश्यक रूप से प्रभावित करती हैं, उनका केवल घटित होना ही नहीं बल्कि जिस ढ़ंग से उनकी व्याख्या की जाती है,वह भी महत्वपूर्ण है।

मनोशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय और मार्क्सवादी सैद्धान्तिकी

( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)


मनोशास्त्रीय सैद्धान्तिकी- यह मानव-केंद्रित है। इस सिद्धांत का मानना है, कि यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह किस खबर को देखना चाहता है, इसके लिए माध्यम का चयन भी वह स्वयं अपने विवेक से करता है। यह सैद्धान्तिकी कहती है कि संचार, संबंध स्थापित करने की प्रक्रिया न होकर मानव विकास की प्रक्रिया है। व्यक्ति पर कोई भी माध्यम या खबर थोपी नहीं जा सकती है, उसे संचारक द्वारा बाध्य नहीं किया जा सकता है।

जरूरी कारक- ●भावनात्मक जुड़ाव ●सामाजिक जुड़ाव ●व्यक्तिगत जुड़ाव ●मानसिक जुड़ाव ●आर्थिक जुड़ाव


समाजशास्त्रीय सैद्धान्तिकी– यह समाज केंद्रित है। इसका मानना है कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक संचार के साधनों की और संचार की पहुंच हो। समाजशास्त्रीय सिद्धांत यह कहता है कि कोई भी सूचना समाज के लिए प्रसारित की जाती है और उसका समाज पर प्रभाव जाना जाता है। समाजशास्त्रीय सिद्धांत का यह भी मानना है कि जैसा समाज होता है, मीडिया भी वैसा ही काम करता है।


मार्क्सवादी सैद्धांतिकी –इसका मानना है कि संचार, संबंध स्थापित करने के लिए होना चाहिए। उसमें भले कोई भी सूचना या मनोरंजन ना हो लेकिन उससे व्यक्तियों के संबंध मजबूत होने चाहिए।


मार्क्सवादी सिद्धांत के 3 पहलू माने जाते हैं- सूचनात्मक, अन्योन क्रिया और अंतर वैयक्तिक।
सूचनात्मक पहलू यानी संचार, सूचना के आदान-प्रदान की प्रक्रिया है। अन्योन क्रिया यानी कि एक दूसरे के साथ संचार के द्वारा संबंध बनाए जाने चाहिए। अंतर वैयक्तिक यानी केवल सूचना का आदान प्रदान ही संचार नहीं होता बल्कि उसके लिए विचारों का आदान-प्रदान भी जरूरी है। मार्क्सवादी सैद्धान्तिकी समाज केंद्रित होती है। इसका यह भी मानना है कि सूचना, मनोरंजन, शिक्षा व जानकारी का आदान-प्रदान नहीं है तो चलेगा, लेकिन लोगों के बीच संबंध जरूर बनने चाहिए।


लोकतांत्रिक भागीदारी का सिद्धांत-

( JANSANCHAR MADHYAM KE SIDDHANT)


यह सिद्धांत, नियामक सिध्दांत के अंतर्गत आता है। इसे Understanding Uniform Communication नामक किताब से लिया गया है। लोकतांत्रिक भागीदारी के सिद्धांत को जर्मन थिंकर मैकवेल ने दिया था। इसमें लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप जनता की सहभागिता सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है। इसका मानना है कि मीडिया को पूंजीवादी नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे उसकी विषय-वस्तु पर प्रभाव पड़ता है। साथ ही मीडिया को लोकतांत्रिक प्रणाली में अपनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए। उसे अपने नागरिकों के मुद्दों को उठाना चाहिए और उनके अधिकारों के बारे में बताना चाहिए। क्षेत्रवाद, जातिवाद, समाजवाद, साम्यवाद, समतावाद; ये सब पहले से ही मीडिया में विद्यमान है।

इसमें मानव अधिकारों को जोड़ने की जरूरत है और मीडिया को इन सभी मुद्दों की खबरें दिखानी चाहिए और समाज से विभिन्न प्रकार की कुरीतियों को हटाने का प्रयास करना चाहिए और ऐसी संस्कृति, जो समाज को उत्थान की ओर ले जाए, को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए। इस सिद्धांत का यह भी मानना है कि मानव अधिकारों की बात करना बहुत जरूरी है क्योंकि उससे फिर कई मुद्दे अपने आप ही सुलझ जाएंगे।

Keval education purpose ke liye samagri ka upyog kare.anya aur kisi kaam ke liye nahi. Online classes ke dauran sahayata ke liye. Thank you

READ MORE

By Admin

3 thought on “Jansanchar madhyam ke siddhant”

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Copy Protected by Chetan's WP-Copyprotect.