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5 जून 2025 को मनाया जा रहा विश्व पर्यावरण दिवस, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा संचालित होता है, इस बार का मुख्य विषय है ‘#BeatPlasticPollution’। इसका उद्देश्य दुनियाभर में प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करना है।

प्लास्टिक प्रदूषण की एक पहली बड़ी घटना 1960 के दशक में सामने आई थी, जब अलास्का के द्वीप पर अल्बाट्रॉस पक्षियों के पेट में प्लास्टिक कण और बोतल के ढक्कन पाए गए थे।

माइक्रोप्लास्टिक क्या है?

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक वे प्लास्टिक कण होते हैं जो 1 नैनोमीटर से 5 मिलीमीटर के बीच होते हैं। ये कण पृथ्वी के हर कोने में — समुद्र की गहराई से लेकर मानव शरीर तक — पाए जाते हैं।

माइक्रोप्लास्टिक के स्रोतों में प्रमुख हैं:

  • माइक्रोबीड्स, जो सौंदर्य और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स में मिलाए जाते हैं।
  • बड़े प्लास्टिक उत्पादों का धीरे-धीरे विघटन, जो समय के साथ छोटे-छोटे कणों में बदल जाते हैं।
  • ये कण हवा, समुद्र और मिट्टी में घूमते हुए खाद्य श्रृंखला के माध्यम से इंसानों और जानवरों तक पहुंचते हैं।

माइक्रोप्लास्टिक के नुकसान

अध्ययन बताते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक:

  • जल स्रोतों में शैवाल की वृद्धि को प्रभावित करते हैं।
  • समुद्री खाद्य श्रृंखला को नुकसान पहुंचाते हैं।
  • मानव शरीर में जमा होकर अंगों को प्रभावित कर सकते हैं।
  • कुछ माइक्रोप्लास्टिक कणों को कैंसरकारी (carcinogenic) भी माना गया है।

माइक्रोप्लास्टिक की खोज कब हुई?

  • 1960 के दशक में अल्बाट्रॉस पक्षियों के पेट में प्लास्टिक कणों की खोज हुई।
  • ‘माइक्रोप्लास्टिक’ शब्द की आधिकारिक पहचान 2004 में UK के समुद्र तटों पर प्लास्टिक के दानों की खोज के बाद हुई।

भारत और प्लास्टिक प्रदूषण

  • शोध बताते हैं कि भारत हर साल वैश्विक प्लास्टिक प्रदूषण में लगभग 20% का योगदान देता है।
  • 2017 में भारत ने कॉस्मेटिक्स में पॉलीएथिलीन को असुरक्षित घोषित किया, परंतु माइक्रोबीड्स पर स्पष्ट प्रतिबंध अब तक लागू नहीं हुआ।
  • 2021 में भारत ने सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर बैन लगाया, जिसके तहत राज्यों ने अपने-अपने नियम बनाए।
  • हालांकि भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पहलें की हैं, माइक्रोप्लास्टिक से निपटने के लिए ठोस और एकीकृत नीति की अब भी आवश्यकता है।

निष्कर्ष: मिलकर रोकें प्लास्टिक प्रदूषण

विश्व पर्यावरण दिवस 2025 एक सुनहरा अवसर है जागरूकता और कार्रवाई का। प्लास्टिक प्रदूषण को हराने के लिए सरकार, उद्योग, समाज और नागरिकों को एक साथ आकर काम करना होगा।

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