Soil Types: भारत और दुनिया में कई तरह की मिट्टियाँ पाई जाती हैं, जिनकी विशेषताएँ अलग-अलग हैं और उनमें अलग फसलें अच्छी होती हैं। यहां हम सरल हिंदी में भारत की प्रमुख मिट्टीयों के प्रकार, उनके गुण, कहाँ पाई जाती हैं और उनमें उगने वाली सर्वोत्तम फ़सलें बताएंगे।
साथ ही, विश्व के विभिन्न क्षेत्रों (जैसे अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, एशिया) की आम मिट्टियों का भी एक संक्षिप्त परिचय देंगे और बताएंगे कि वहाँ कौन सी फ़सलें अच्छी होती हैं। (Soil Types)
Soil Types: भारत में प्रमुख मिट्टी के प्रकार
भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार की मिट्टी (Soil Types) पाई जाती हैं (ऊपर मानचित्र में रंगों द्वारा दर्शाया गया है)। भारत में मुख्य तौर पर सात प्रकार की मिट्टी मिलती हैं: जलोढ़ मिट्टी, काली मिट्टी, लाल मिट्टी, लेटराइट मिट्टी, मरुस्थलीय मिट्टी, पहाड़ी/वन मिट्टी, तथा लवणीय (खारी) मिट्टी। आइए इनके बारे में विस्तार से समझें:
Soil Types: जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)
- कहाँ पाई जाती है: जलोढ़ या दोमट मिट्टी (Soil Types) भारत में सबसे अधिक क्षेत्र में फैली उपजाऊ मिट्टी है। यह मुख्यतः उत्तरी भारत के सिंचित मैदानों (इंडो-गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी) में पाई जाती है और देश के कुल भूभाग के लगभग 40% हिस्से को कवर करती है। इसके अलावा प्रायद्वीपीय भारत में नदियों के डेल्टा (जैसे गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा, गोदावरी-कृष्णा डेल्टा) और तटीय मैदानों में भी यह मिलती है।
- मुख्य विशेषताएँ: यह मिट्टी नदियों द्वारा लाई गई अवसादी मिट्टी है, जिसका रंग हल्के भूरे से राख जैसे भूरे तक होता है। बनावट रेतीली दोमट से लेकर चिकनी (clay) तक भिन्न होती है। जलोढ़ मिट्टी आमतौर पर बहुत उपजाऊ होती है क्योंकि इसमें पर्याप्त पोषक तत्व होते हैं, हालांकि नाइट्रोजन की कमी हो सकती है। गंगा के मैदानों में जलोढ़ मिट्टी को दो भागों में बांटा जाता है: नव जलोढ़ “कछार (खादर)” जो हर वर्ष बाढ़ से नया अवसाद पाकर अधिक उर्वर होता है, और पुराना जलोढ़ “बांगर” जो ज़रा ऊंचे स्थानों पर पाया जाता है। कुल मिलाकर, जलोढ़ मिट्टी भारत की सबसे उपजाऊ मिट्टी मानी जाती है और किसान इसे व्यापक रूप से जोतते हैं।
- उपयुक्त फ़सलें: इस मिट्टी में विविध फसलें अच्छे से उगती हैं क्योंकि यह गहरी और उपजाऊ है। उत्तर भारत में जलोढ़ मिट्टी वाले मैदान धान (चावल) और गेहूं जैसे अनाज उत्पादन के लिए जाने जाते हैं। इसके अलावा गन्ना, मक्का, जूट, तिलहन (सरसों आदि) और दालें भी इस मिट्टी में खूब उगाई जाती हैं। सब्ज़ियों और फलों की खेती के लिए भी यह मिट्टी अनुकूल है। कुल मिलाकर, जलोढ़ मिट्टी में लगभग सभी प्रमुख फसलें उगाई जा सकती हैं, जिनमें विशेषकर धान, गेहूं, गन्ना, मक्का, कपास, तंबाकू तथा विभिन्न दालें शामिल हैं।
Soil Types: काली मिट्टी (Black Soil)
- कहाँ पाई जाती है: काली मिट्टी को रेगुर (Regur) या कपास वाली मिट्टी भी कहते हैं। यह मुख्यतः दक्कन के पठार क्षेत्र में मिलती है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के हिस्सों में यह पाई जाती है। भारत का लगभग 15% भूभाग काली मिट्टी से आच्छादित है। विशेषकर गोदावरी और कृष्णा नदियों के ऊपरी इलाकों तथा दक्कन के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में काली मिट्टी की गहरी परतें मिलती हैं। (Soil Types)
- मुख्य विशेषताएँ: काली मिट्टी का रंग गहरा काला से लेकर भूरा-भूरा हो सकता है। यह बेसाल्टिक ज्वालामुखीय चट्टानों के अपक्षय से बनी मिट्टी है, जिसकी बनावट भारी चिकनी (clayey) होती है। यह पानी मिलने पर काफी फूलकर चिपचिपी हो जाती है और सूखने पर सिकुड़कर चौड़ी दरारें बनाती है – इसी गुण के कारण इसे “स्वयं-बिलोड़ित (self-ploughing)” मिट्टी भी कहते हैं। काली मिट्टी में लौह, चूना, कैल्शियम, पोटैशियम, एल्युमिनियम और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में होते हैं, परंतु जैविक पदार्थ, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की कमी पाई जाती है। यह मिट्टी नमी रोक कर रखने की क्षमता में बहुत अच्छी होती है, जिससे सूखे मौसम में भी कुछ नमी बनी रहती है।
- उपयुक्त फ़सलें: काली मिट्टी कपास की खेती के लिए सबसे अधिक मशहूर है – इसे “कपास की मिट्टी” भी कहा जाता है। कपास के अलावा इस मिट्टी में गन्ना, तंबाकू, गेहूं, ज्वार, बाजरा जैसी मोटे अनाज की फसलें, दालें, तिलहन (जैसे सूरजमुखी, मूंगफली, अलसी), और फल-सब्ज़ियाँ भी अच्छी होती हैं। महाराष्ट्र और गुजरात में काली मिट्टी पर कपास के साथ-साथ संतरे जैसे खट्टे फल एवं सब्ज़ियों की भी खेती होती है। कुल मिलाकर, काली मिट्टी की जल धारण क्षमता और उर्वरता इसे कपास, गन्ना तथा कई अनाजों के लिए उपयुक्त बनाती है।
Soil Types: लाल मिट्टी (Red Soil)
- कहाँ पाई जाती है: लाल मिट्टी प्राचीन क्रिस्टलीय एवं रूपांतरित (metamorphic) चट्टानों के अपक्षय से बनी है। यह मुख्यतः दक्कन के दक्षिणी एवं पूर्वी पठारी भागों में पाई जाती है। ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से, तेलंगाना-आंध्रप्रदेश के पूर्वी क्षेत्र, तमिलनाडु और कर्नाटक के पठारी हिस्सों में लाल मिट्टी का विस्तार है। पश्चिमी घाट की पहाड़ियों की तलहटी (पाइडमोंट ज़ोन) तथा मध्य गंगा के दक्षिणी हिस्सों में भी लाल-पीली मिट्टी मिलती है। भारत के लगभग 18% क्षेत्र में लाल और पीली मिट्टी पाई जाती है। (Soil Types)
- मुख्य विशेषताएँ: इस मिट्टी का रंग लाल होता है जिसका कारण इसमें लोहे (लौह ऑक्साइड) की अधिकता है। जब मिट्टी में नमी होती है तो इसका रंग थोड़ा पीला दिखाई देता है, इसलिए इसे लाल और पीली मिट्टी दोनों कहा जाता है। लाल मिट्टी आम तौर पर बलुई-दोमट से लेकर दोमट बनावट की हो सकती है। बारीक दानेदार लाल मिट्टी अपेक्षाकृत उपजाऊ होती है, जबकि मोटे दाने वाली लाल मिट्टी में उर्वरता कम होती है। इसमें ह्यूमस, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्वों की कमी देखी जाती है, लेकिन उचित खाद एवं उर्वरक देकर इसकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।
- उपयुक्त फ़सलें: लाल मिट्टी प्राकृतिक रूप से बहुत उपजाऊ नहीं होती, परंतु सही सिंचाई और उर्वरक के इस्तेमाल से इसमें अनेक फ़सलें उगाई जाती हैं। चावल (धान) और गेहूं जैसी मुख्य अनाज फ़सलें कई क्षेत्रों में लाल मिट्टी पर उगाई जाती हैं। दक्षिणी पठार में रागी (मंडुआ), बाजरा, ज्वार जैसे मोटे अनाज और मक्का भी इस मिट्टी में उगते हैं, हालांकि इनके लिए अतिरिक्त पोषक तत्व देने पड़ते हैं। मूंगफली जैसी तिलहनी फसल, आलू, गन्ना, दलहन (अरहर आदि) को भी लाल मिट्टी में उगाया जाता है। कुछ बागवानी फ़सलें जैसे आम तथा संतरा (खट्टे फल) भी लाल मिट्टी वाले क्षेत्रों में उगते हैं, बशर्ते सिंचाई की उचित व्यवस्था हो। कुल मिलाकर, लाल मिट्टी में मध्यम उर्वरता वाली फ़सलें (जैसे दालें, तिलहन, शाकसब्ज़ियाँ) बेहतर परिणाम देती हैं, और इसकी उर्वरक क्षमता में सुधार करके प्रमुख अनाज भी सफलतापूर्वक उगाए जाते हैं। (Soil Types)
Soil Types: लेटराइट मिट्टी (Laterite Soil)
- कहाँ पाई जाती है: लैटराइट मिट्टी भारत में उन इलाकों में पाई जाती है जहाँ वर्षा ऋतु में भारी बारिश और फिर शुष्क मौसम का चक्र होता है। यह प्रमुख रूप से पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट के पहाड़ी क्षेत्रों में, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के कुछ भागों में, असम और मेघालय के पहाड़ी क्षेत्रों में, तथा तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल एवं मध्य प्रदेश के पठारी उच्चभूमि में मिलती है। केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के तटीय पहाड़ी क्षेत्रों में लाल लैटराइट मिट्टी भी पाई जाती है। कुल मिलाकर, भारत के लगभग 3.7% क्षेत्रफल पर लेटराइट मिट्टी है। (Soil Types)
- मुख्य विशेषताएँ: ‘लेटराइट’ शब्द लैटिन के “later” से आया है जिसका अर्थ ईंट होता है। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यह मिट्टी बारिश में गीली होकर नरम रहती है लेकिन हवा में खुली छूटने पर सख्त होकर ईंट जैसी कठोर हो जाती है। भारी वर्षा के कारण इस मिट्टी में चूना (लाइम) और सिलिका जैसे घुलनशील पदार्थ बह जाते हैं, जबकि लोहे और एल्युमिनियम जैसे अवशेष तत्व जमा होकर मिट्टी को लाल या ईंट जैसी रंगत देते हैं। इस मिट्टी में जैव पदार्थ, नाइट्रोजन, फॉस्फेट (स्फूर) और कैल्शियम की कमी होती है, लेकिन लोहा (Iron oxide) और पोटैशियम पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। लेटराइट मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता कम होती है, किंतु यह खाद और उर्वरक डालने पर फसल उत्पादन के लिए ठीक प्रतिक्रिया देती है।
- उपयुक्त फ़सलें: अपनी कम उर्वरता के बावजूद, कुछ विशेष फ़सलें लेटराइट मिट्टी में अच्छी तरह उगती हैं, खासकर यदि सिंचाई-उर्वरक की सहायता ली जाए। दक्षिण भारत में लाल लेटराइट मिट्टी पर काजू (कеш्यू) के पेड़ों के बागान काफी सफल रहे हैं। इसके अलावा चाय, कॉफ़ी, रबर जैसी पेरैनिक फसलें (दीर्घायु पौधे) पहाड़ी लेटराइट मिट्टी वाले क्षेत्रों (जैसे पश्चिमी घाट) में उगाई जाती हैं, क्योंकि वहां उच्चभूमि पर पर्याप्त वर्षा और नम वातावरण मिलता है। कर्नाटक, केरल के पहाड़ों पर चाय-कॉफी के बागान इसके उदाहरण हैं। लेटराइट मिट्टी वाले क्षेत्रों में धान, रागी, और गन्ना जैसी फ़सलें भी उगाई जाती हैं, लेकिन उनके लिए उर्वरकों की आवश्यकता होती है। कुल मिलाकर, लेटराइट मिट्टी वृक्ष फ़सलों (जैसे काजू, नारियल) और चाय-कॉफी जैसे बागानी फ़सलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है, तथा उचित प्रबंधन से कुछ अनाज भी यहाँ पैदा किए जा सकते हैं। (Soil Types)
Soil Types: मरुस्थलीय मिट्टी (Desert/Arid Soil)
- कहाँ पाई जाती है: मरुस्थलीय या शुष्क मिट्टी मुख्यतः भारत के शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्रों में पाई जाती है। ये मिट्टियाँ पश्चिमी राजस्थान (थार मरुभूमि) में विस्तृत हैं, और साथ ही अरावली पर्वतश्रेणी के पश्चिम में, उत्तरी गुजरात, कच्छ तथा हरियाणा-पंजाब के दक्षिण-पश्चिमी सूखे इलाकों में भी मिलती हैं। देश के करीब 4.4% क्षेत्र में मरुस्थलीय मिट्टी है।
- मुख्य विशेषताएँ: मरुस्थलीय मिट्टी का रंग हल्का भूरा से लेकर लाल-भूरा होता है। इसकी बनावट आमतौर पर रेतीली होती है, जिसमें बजरी (gravel) भी मिली हो सकती है। इस मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ और नमी का स्तर बहुत कम रहता है, इसलिए इसकी जल-धारण क्षमता भी कम होती है। मरुस्थलीय मिट्टियाँ अक्सर क्षारीय या लवणीय प्रकृति की होती हैं; कई स्थानों पर इनमें घुले लवणों की मात्र इतनी अधिक है कि सतह पर नमक की परत (सफ़ेद पपड़ी) दिखाई देती है। राजस्थान के कुछ भागों में तो भूमिगत पानी के वाष्पीकरण से आम नमक (सोडियम क्लोराइड) तक जमा किया जाता है। इस मिट्टी में फॉस्फेट सामान्य स्तर पर हो सकता है, पर नाइट्रोजन जैसे तत्वों की कमी रहती है। मरुस्थलीय मिट्टी में नीचे की परतों में कैल्शियम कार्बोनेट की “कंकर” स्तर बन जाती है, जिससे पानी का रिसाव सीमित हो जाता है। अगर सिंचाई द्वारा पानी उपलब्ध कराया जाए, तो यही कंकर परत पानी को नीचे गहराई में जाने से रोकती है और सतह पर नमी कुछ समय तक बनाए रखती है, जो पौधों के लिए फ़ायदेमंद हो सकती है। (Soil Types)
- उपयुक्त फ़सलें: बिना सिंचाई के, मरुस्थलीय मिट्टी में बहुत कम फसलें उग पाती हैं। कम वर्षा वाले इन इलाकों में स्थानीय रूप से बाजरा, ज्वार जैसे सूखा-सहिष्णु अनाज, ग्वार तथा कुछ दालें (जैसे मूंग, चना) उगाई जाती रही हैं। इन फसलों को कम पानी की ज़रूरत होती है और ये रेतली मिट्टी में भी बढ़ सकती हैं। जहाँ कहीं नहरी सिंचाई (जैसे राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर) उपलब्ध हुई है, वहाँ इस रेतीली मिट्टी में खेती का रकबा बढ़ा है। सिंचाई के बाद इस मिट्टी में गेहूं और सरसों जैसी फ़सलें भी उगाई जाने लगी हैं, पर मुख्यतः कम पानी वाली फ़सलें ही अधिक सफल हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिमी राजस्थान में नहरी पानी आने के बाद बाजरा, दालें, ग्वार और चारे की फ़सलें बड़े पैमाने पर उगने लगी हैं। कुल मिलाकर, मरुस्थलीय मिट्टी में खजूर जैसे वृक्ष (नख़लिस्तान में), बाजरा-ज्वार जैसे मोटे अनाज, और कुछ दालें ही आसानी से पलती हैं; पानी की उपलब्धता बढ़ने पर ही अन्य फ़सलें यहाँ संभव होती हैं। (Soil Types)
Soil Types: पहाड़ी या वन मिट्टी (Mountain/Forest Soil)
- कहाँ पाई जाती है: पहाड़ी मिट्टी (Soil Types) उन पर्वतीय और जंगल वाले क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ वर्षा पर्याप्त होती है। भारत में हिमालयी क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश आदि) की ऊँची घाटियों और पहाड़ों में, उत्तर-पूर्वी राज्यों के पर्वतीय जंगलों में, तथा कुछ भाग पश्चिमी एवं पूर्वी घाट के पहाड़ी वनों में यह मिट्टी मिलती है। यह मिट्टी पर्वतीय ढलानों तथा वनों की मिट्टी के रूप में जानी जाती है। पर्वतीय मिट्टी देश के कुल क्षेत्रफल का क़रीब 8% हिस्सा घेरती है (वन एवं पर्वतीय मिट्टी मिलाकर) – यद्यपि सटीक प्रतिशत अलग-अलग स्रोतों में भिन्न हो सकता है।
- मुख्य विशेषताएँ: पहाड़ी मिट्टी की बनावट और गुण पहाड़ी पर्यावरण पर निर्भर करते हैं। ऊँची ढलानों पर यह मिट्टी प्रायः मोटे दानों वाली, पतली परत वाली और कम विकसित होती है, क्योंकि तेज़ ढलान पर मिट्टी का कटाव होता रहता है। घाटियों व निचले पहाड़ी ढलानों पर यह मिट्टी अधिक दोमट और सिल्टी (gadavari) हो सकती है तथा वहाँ पर मृदा की गहराई और उर्वरता अपेक्षाकृत अधिक होती है। पर्वतीय वन क्षेत्रों में गिरती पत्तियों आदि से ह्यूमस की मात्रा ऊपरी परत में काफी रहती है, जिससे मिट्टी की ऊपरी सतह जैविक पदार्थ से समृद्ध होती है। हालाँकि, बहुत ऊँचाई (बर्फीले क्षेत्रों) में मिट्टी का अपरदन तेज़ और विखनिजीकरण कम होने से वह अम्लीय प्रवृत्ति की और कम ह्यूमस वाली हो जाती है। कुल मिलाकर, पर्वतीय मिट्टी कहीं बहुत उपजाऊ (घाटियों में) हो सकती है तो कहीं बंजर या पतली (ऊपरी ढलानों व बर्फीले क्षेत्रों में)। इसे अक्सर वन मिट्टी भी कहा जाता है क्योंकि घने वनों में ही यह ज्यादातर पाई जाती है।
- उपयुक्त फ़सलें: पहाड़ी मिट्टी वाले क्षेत्रों में ज़्यादातर ढलानों पर सीढ़ीनुमा खेती (terrace farming) की जाती है। इन क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से मक्का, गेहूं, जौ जैसी फसलें कुछ हद तक उगाई जाती हैं जहां ढलान कम है। लेकिन पहाड़ी मिट्टी वास्तव में कुछ विशिष्ट फसलों के लिए बहुत उपयुक्त मानी जाती है। चाय और कॉफ़ी जैसे बागानी पौधे उत्तर-पूर्व भारत (असम, दार्जिलिंग आदि) और दक्षिण भारत (नीलगिरी, कोडैikanal) की पहाड़ियों में सफलतापूर्वक उगते हैं, क्योंकि पहाड़ी मिट्टी और जलवायु उनके अनुकूल है। मसाले (जैसे इलायची, काली मिर्च) एवं फल (जैसे सेब, नाशपाती, खूबानी) भी पहाड़ी मिट्टी में उगाए जाते हैं – सेब के लिए हिमाचल, कश्मीर की मृदा-जलवायु उपयुक्त है। विशेषकर पूर्वोत्तर तथा दक्षिणी पहाड़ियों में चाय-कॉफी के बागान और पश्चिमी हिमालय में सेब के बाग इसी मिट्टी पर पनपते हैं। पर्वतीय मिट्टी में प्रचुर ह्यूमस होने से कुछ अनाज भी उगते हैं; उत्तराखंड आदि में गेहूं, मक्का, जौ ऊंचाई के अनुसार कहीं-कहीं उगाए जाते हैं। लेकिन समग्र रूप से देखें तो पहाड़ी/वन मिट्टी चाय, कॉफ़ी, मसाले, फलों (सेब आदि) के बागानों और कुछ हद तक मक्का, आलू, जौ जैसी फ़सलों के लिए जानी जाती है।
Soil Types: लवणीय/क्षारीय मिट्टी (Saline/Alkaline Soil)
- कहाँ पाई जाती है: लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी (Soil Types) भारत में उन जगहों पर पाई जाती है जहाँ मिट्टी में नमक (लवण) की मात्रा अत्यधिक हो जाती है। ऐसे क्षेत्र शुष्क जलवायु वाले हो सकते हैं या जल-जमाव (waterlogging) वाले इलाके। उदाहरण के लिए, पश्चिमी गुजरात (कच्छ का रण) में समुद्री लवण मिट्टी में जमा हो जाते हैं। पूर्वी तटीय क्षेत्रों के कुछ डेल्टा (जैसे सुंदरबन, जहाँ ज्वार के कारण खारे पानी का प्रभाव है) में मिट्टी खारी हो जाती है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र के कुछ सिंचाई वाले क्षेत्रों में भी जहॉं जलनिकासी खराब है, वहाँ मिट्टी की ऊपरी परत में लवणीयता आ जाती है। इन मिट्टियों को स्थानीय नामों से भी जाना जाता है – राजस्थान-हरियाणा में “छोपन”, उत्तर भारत में “उसार या रेह” जैसी मिट्टी कहते हैं।
- मुख्य विशेषताएँ: खारी मिट्टी में सोडियम, पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे लवणों का प्रतिशत बहुत अधिक होता है। इसकी ऊपरी सतह पर सफ़ेद रंग की नमक जैसी तह दिख सकती है। मिट्टी का pH प्रायः क्षारीय (alkaline) होता है, जिससे यह भौतिक संरचना में अनुकूल नहीं रहती और जीवित पौधों की बढ़वार के लिए प्रतिकूल बन जाती है। बनावट की दृष्टि से खारी मिट्टी बलुई से दोमट हो सकती है, लेकिन ज़्यादा लवणीयता होने पर मिट्टी भुरभुरी हो जाती है या फिर सख्त पपड़ी बन जाती है। अक्सर ऐसी मिट्टी सूखे मौसम में बंजर दिखती है और बरसात में उस पर कीचड़ सा जम जाता है। कैल्शियम और नाइट्रोजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व इनमें कम उपलब्ध होते हैं। कुल मिलाकर, ऊँची लवणीयता के कारण यह मिट्टी प्राकृतिक रूप से अनउपजाऊ (infertile) श्रेणी में आती है। (Soil Types)
- उपयुक्त फ़सलें: खारी मिट्टी में सामान्य फसलें उगाना कठिन होता है क्योंकि ज़्यादातर पौधे अधिक नमक सहन नहीं कर पाते। फिर भी कुछ नमक-सहिष्णु फ़सलें (salt-resistant crops) ऐसी मिट्टी में उगाई जा सकती हैं या इन मिट्टियों को सुधारकर खेती लायक बनाया जा सकता है। वैज्ञानिक तरीकों से जलनिकासी सुधारकर, जिप्सम जैसी पदार्थों को मिट्टी में मिलाकर इसकी लवणीयता कम की जाती है। सुधार के बाद इस मिट्टी में चावल, गेहूं जैसी सामान्य फसलें भी उग सकती हैं। बिना सुधार के भी, बरसीम (हरी खाद के लिए चारा), धैंचा जैसे चारा या हरी खाद वाले पौधे इन मिट्टियों में कुछ हद तक उगाए जाते हैं क्योंकि वे नमक सह लेते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ दलहन (जैसे कुछ किस्म के चने) को भी लवणीय भूमि में उगाने के प्रयास होते हैं। कुल मिलाकर हालांकि, खारी मिट्टी कृषि के लिए आदर्श नहीं है – पहले इसे उपचारित कर “मीठा” करना पड़ता है, तब जाकर सामान्य फसलें सम्भव होती हैं। किसानों द्वारा ऐसी मिट्टी को उपयोगी बनाने के लिए ज़मीन धोनो (leaching), कार्बनिक खाद, जिप्सम आदि का प्रयोग किया जाता है, जिसके बाद जौ, कपास, सरसों जैसी कुछ सहनशील फ़सलें प्रारंभ में ली जाती हैं। (Soil Types)
Soil Types: विश्व के विभिन्न क्षेत्रों की प्रमुख मिट्टियाँ और फ़सलें

भारत के अलावा दुनिया के विभिन्न देशों और महाद्वीपों में भी भौगोलिक तथा जलवायु अंतर के कारण विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ (Soil Types) बनती हैं।
यहाँ हम संक्षेप में उत्तर अमेरिका (विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका), यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और एशिया के कुछ आम मिट्टी (Soil Types) प्रकारों का परिचय देंगे, उनके प्रमुख गुण बताएंगे और यह भी कि वहाँ कौन-सी फ़सलें अच्छी पनपती हैं।
Soil Types: संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) की मिट्टियाँ
- मध्य-पश्चिमी मैदान (प्रेरी क्षेत्र): अमेरिका के मध्य-पश्चिम में स्थित “कॉर्न बेल्ट” तथा ग्रेट प्लेन्स क्षेत्र गहरी, काली-दोमट उपजाऊ मिट्टी के लिए प्रसिद्ध हैं। यह मिट्टी बहुत उपजाऊ (ह्यूमस-समृद्ध) है और इसमें पानी रोकने की क्षमता भी ज़बरदस्त है, जिसके कारण यहां अनाज की खेती में अत्यधिक उत्पादन मिलता है। इस क्षेत्र की मिट्टी पर व्यापक रूप से मकई (कॉर्न), गेहूं, सोयाबीन जैसी अनाज/तेलहन फ़सलें उगाई जाती हैं और यह इलाक़ा अमेरिका का अन्न भंडार कहलाता है। अमेरिकी कॉर्न बेल्ट की गहरी काली मिट्टी की उर्वरता की तुलना यूक्रेन की काली मिट्टी (Chernozem) से की जाती है – दोनों ही अत्यंत उपजाऊ हैं और भारी पैमाने पर अनाज उत्पादन में सहायक हैं। (Soil Types)
- दक्षिण-पूर्व एवं पूर्वी क्षेत्र: अमेरिका के दक्षिणपूर्वी हिस्सों (जैसे जॉर्जिया, अलाबामा आदि) में लाल-पीली मिट्टी (यूएसDA वर्गीकरण अनुसार Ultisols) पाई जाती है, जो लंबे समय से मौसमजन्य अपक्षय के कारण कम पोषक हुई है। यह मिट्टी अम्लीय होती है और इसमें प्राकृतिक उर्वरता कम होती है, फिर भी यहाँ कपास, तंबाकू, मूंगफली जैसी फ़सलें उगाई जाती हैं (इन फ़सलों ने ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र में महत्व पाया)। उत्तरपूर्वी अमेरिका में जंगलों वाली भूरी मिट्टी और स्पोडिक मिट्टी (Spodosols) मिलती है, जो अम्लीय व कम उपजाऊ हैं; वहाँ मक्का, चारा घास तथा आलू जैसी फ़सलें सीमित तौर पर उगाई जाती हैं, साथ ही वनों से मिलने वाले फल (ऐपल आदि) भी। कुल मिलाकर, अमेरिका के पूर्वी भाग की कई मिट्टियाँ मध्यम उपजाऊ हैं और उनमें चुने-फॉस्फेट आदि देकर ही बड़े पैमाने पर खेती होती है।
- पश्चिमी तथा दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र: संयुक्त राज्य के पश्चिमी हिस्सों में (कैलिफ़ोर्निया के हिस्से, एरिज़ोना, नेवादा आदि) रेतीली या पथरीली अरिडिसोल श्रेणी की शुष्क मिट्टियाँ पाई जाती हैं, जो भारत की मरुस्थलीय मिट्टी जैसी ही हैं। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से बहुत कम वर्षा होती है, इसलिए बिना सिंचाई खेती संभव नहीं के बराबर है। जहाँ सिंचाई उपलब्ध कराई गई (जैसे कैलीफ़ोर्निया की सिंचित घाटियाँ), वहाँ की दोमट-रेतीली मिट्टियाँ बेहद उपजाऊ बन गई हैं और फल-सब्ज़ियों, कपास तथा चावल तक की भरपूर खेती होती है। लेकिन बिना पानी के, दक्षिण-पश्चिम अमेरिका के रेगिस्तान क्षेत्रों में केवल क्षुप वनस्पति या कुछ सूखा-सहिष्णु झाड़ियां उगती हैं। सिंचाई से नमी आने पर भी एक चुनौती मिट्टी में लवण-संचय (salinization) की रहती है, क्योंकि बार-बार पानी देने से लवण ऊपर आ जाते हैं और समय के साथ फ़सल उत्पादन कम कर सकते हैं। फिर भी, आधुनिक तकनीक से इन शुष्क मिट्टियों को उपजाऊ बनाकर कैलिफ़ोर्निया जैसे राज्यों में विशाल कृषि उद्योग खड़ा हुआ है (जहाँ अलसी, बादाम, अंगूर, सब्ज़ियों तक की खेती हो रही है)। कुल मिलाकर, अमेरिका की मिट्टियाँ बहुत विविध हैं: मध्यम-पौर्वी हिस्से की उपजाऊ काली-दोमट मिट्टी अनाज उत्पादन के लिए आदर्श है, वहीं पश्चिम के रेगिस्तानी हिस्सों में सिंचाई से ही खेती संभव हो पाती है। (Soil Types)
Soil Types: यूरोप की मिट्टियाँ
- पूर्वी यूरोप – चेरनोज़म (काली मिट्टी): यूरोप के पूर्वी भाग (यूक्रेन, रूस के दक्षिण-पश्चिमी इलाके, मोल्दोवा आदि) में दुनिया की सबसे उपजाऊ मिट्टियों में से एक चेरनोज़म पाई जाती है, जिसे ब्लैक अर्थ (काली धरती) भी कहते हैं। यह मिट्टी बहुत गहरी काली रंग की, भारी ह्यूमसयुक्त मिट्टी है जो घास के मैदानों में विकसित हुई है। यूक्रेन के लगभग 65% कृषि भूमि इसी अद्वितीय काली मिट्टी से ढकी है और इसने इस क्षेत्र को यूरोप का “ब्रेडबास्केट” (अनाज का कटोरा) बना दिया है। चेरनोज़म मिट्टी में जलधारण क्षमता और कार्बनिक पदार्थ अत्यधिक होते हैं, जिससे इसमें गेहूं, जौ, मक्का, सूरजमुखी आदि फ़सलों की भरपूर पैदावार होती है। वास्तव में, चेरनोज़म को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कृषियोग्य मिट्टी कहा गया है जिसने यूरोप और उत्तरी अमेरिका, दोनों महाद्वीपों में भारी अनाज उत्पादन को ऐतिहासिक रूप से संभव बनाया। यूरोप के इस काली मिट्टी वाले क्षेत्र में गेहूं, मक्का, सूरजमुखी, जौ, चुकंदर जैसी फ़सलें प्रमुखता से उगाई जाती हैं – ये मिट्टी उन्नत उत्पादन के लिए जानी जाती है और एक ही जगह दशकों तक फ़सल ली जा सकती है।
- भूमध्यसागरीय क्षेत्र – लाल/भूरी मिट्टी (Terra Rossa): दक्षिणी यूरोप (इटली, स्पेन, ग्रीस आदि) के भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में चूना-पत्थर चट्टानों पर विकसित लाल मिट्टी पाई जाती है, जिसे टेरा रॉसा कहते हैं। यह मिट्टी लाल रंग की, भारी मिट्टी है जिसमें जल-निकासी अच्छी होती है (चूना पत्थर के कारण) और ये कैल्शियम युक्त होती है। उर्वरता की दृष्टि से Terra Rossa मध्यम उपजाऊ है – ज़्यादा कार्बनिक पदार्थ तो नहीं होता, पर कुछ विशेष बागानी फ़सलों के लिए यह अत्यंत अनुकूल मानी जाती है। उदाहरण के लिए, ज़ैतून (ऑलिव) के पेड़, अंगूर की बेलें और खट्टे फल (संतरा, नींबू) भूमध्य क्षेत्र की इसी लाल मिट्टी में बहुत अच्छी तरह बढ़ते-फलते हैं। इटली और स्पेन की पर्वतीय घाटियों में अंगूर के प्रसिद्ध बागान (वाइन यार्ड्स) Terra Rossa मिट्टी पर ही हैं, क्योंकि यह मिट्टी अंगूर की जड़ों के लिए उचित पोषण व जल-निकासी प्रदान करती है। इसी प्रकार, ग्रीस, टर्की, इटली में प्राचीन काल से ज़ैतून के व्यापक बगीचे इसी मिट्टी में लगे हैं – लाल मिट्टी में लोहे की मौजूदगी और अच्छी सूखी जलवायु के मेल से ज़ैतून के फल उत्कृष्ट गुणवत्ता के होते हैं। कुल मिलाकर, भूमध्यसागरीय यूरोप की मिट्टीयां बहुत गहरी और उर्वर नहीं हैं, पर जैतून, अंगूर, बादाम, खट्टे फल जैसी बाग़वानी फ़सलों के लिए ये एक आदर्श प्राकृतिक परिवेश देती हैं। (Soil Types)
- उत्तरी-पश्चिमी यूरोप – समशीतोष्ण भूरी मिट्टी: पश्चिमी और उत्तरी यूरोप (फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन आदि) में मुख्यतः समशीतोष्ण जलवायु वाली भूरी वन-मिट्टी (ब्राउन अर्थ) मिलती है। यह मिट्टी मध्यम उर्वरता वाली है, pH लगभग तटस्थ के करीब, और अच्छी बनावट (loamy) वाली होती है। सदियों के कृषि प्रयोग से इस क्षेत्र की मिट्टियों में पर्याप्त सुधार हुआ है। यहां गेहूं, जौ, आलू, चुकंदर, चरागाह घास आदि की खेती बड़े पैमाने पर होती है। विशेषकर ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी के समतल मैदानों की भूरी मिट्टी को हरी खाद और खाद डालकर काफी उपजाऊ बनाया गया है, जहाँ यूरोप के बड़े हिस्से के लिए अनाज एवं शाक-सब्ज़ी उत्पादन होता है। हालांकि ये मिट्टियाँ चेरनोज़म जितनी प्राकृतिक उपजाऊ नहीं थीं, लेकिन मानव प्रबंधन से इनकी उत्पादकता बढ़ी है। यूरोप के सुदूर उत्तरी हिस्सों (स्कैंडेनेविया, रूस के उत्तरी भाग) में ठंडी जलवायु के कारण मिट्टी पतली और अम्लीय (पोडज़ोल) हो जाती है; वहाँ अधिकतर जंगल हैं या सीमित तौर पर जौ, ओट्स जैसी कम अवधि की फ़सलें उगाई जाती हैं। कुल मिलाकर, यूरोप में सबसे उपजाऊ मिट्टी पूर्वी यूरोप की काली मिट्टी है, जबकि शेष यूरोप में समशीतोष्ण दोमट मिट्टी को मानव ने कृषि योग्य बनाया हुआ है, जहां विभिन्न अनाज, सब्ज़ियाँ और चारा उगाया जाता है। (Soil Types)
Soil Types: अफ्रीका की मिट्टियाँ
- उत्तरी अफ्रीका – रेगिस्तानी मिट्टी: अफ्रीका के एक बड़े हिस्से पर सहारा का मरुस्थल फैला है। इस उत्तरी अफ्रीका की मिट्टी लगभग पूर्णतः रेतीली, शुष्क और बहुत कम जैविक तत्व वाली है। अफ्रीका की कुल भूमि का लगभग 60% भाग ऐसे ही गर्म, शुष्क या अविकसित मिट्टी वाले क्षेत्रों से घिरा है। सहारा और उससे लगे सेहल (Sahel) इलाके में प्राकृतिक रूप से कृषि बेहद सीमित है – सिर्फ़ नख़लिस्तानों (Oases) में कृत्रिम सिंचाई से खजूर के पेड़, और वर्षा पर निर्भर कुछ मिलेट (बाजरा) तथा ज्वार जैसी फ़सलें। सेहल क्षेत्र (माली, नाइजर, सूडान आदि) में बहुत ही कम वर्षा होती है, वहाँ की मिट्टी बालुई व पथरीली है; स्थानीय लोग पारंपरिक तौर पर बाजरा, साबूननट (groundnut) और कुछ सहनशील दलहन जैसे गोंद, अरहर इत्यादि उगाते हैं। बिना सिंचाई के अफ्रीका के रेगिस्तानी/अर्ध-रेगिस्तानी मिट्टी में बाग़वानी असंभव है। कुल मिलाकर, सहारा की रेतीली मिट्टी कृषि के लिए अनुपयुक्त है जब तक कि कुओं या नहरों से पानी उपलब्ध न कराया जाए। (Soil Types)
- उष्णकटिबंधीय अफ्रीका – लेटराइट/लाल मिट्टी: अफ्रीका के मध्य और पश्चिमी भाग (विषुवतीय एवं उष्णकटिबंधीय ज़ोन) में गरम-आर्द्र जलवायु है, जहाँ की मिट्टी भारत की लेटराइट या लाल मिट्टी से मिलती-जुलती है। अफ्रीका की लगभग 20% भूमि पर ऐसी उष्णकटिबंधीय मिट्टियाँ पाई जाती हैं, जो भारी वर्षा से लीच होकर लोहे-अल्यूमिना युक्त लाल मिट्टी के रूप में रहती हैं। यह मिट्टी प्राकृतिक रूप से ज़्यादा उपजाऊ नहीं (बहुत कम जैव पदार्थ व नाइट्रोजन) होती, इसलिए परंपरागत रूप से अफ्रीकी किसान झूम खेती (slash-and-burn) करते आए हैं – अर्थात कुछ वर्षों तक खेती करके जमीन को परती छोड़ देते थे ताकि मिट्टी अपने आप पुनर्जीवित हो सके। इस क्षेत्र में मुख्य फ़सलें मकसा (Cassava), याम, शकरकंद जैसी कंदमुखी और मक्का, बाजरा, मूंगफली जैसे अनाज/तिलहन हैं, पर इनमें प्रायः बाहरी उर्वरक की आवश्यकता पड़ती है। पश्चिम अफ्रीका (घाना, नाइजीरिया) में लाल मिट्टी पर ताड़ (Oil Palm) और रबर के बागान भी लगे हैं। मध्य अफ्रीका के घने वर्षावन क्षेत्रों (कांगो बेसिन आदि) में मिट्टी बहुत पतली व अम्लीय है – वहाँ प्राकृतिक वनस्पति तो प्रचुर है, पर मिट्टी कृषि हेतु कमजोर मानी जाती है। अमेज़न के समान, अफ्रीका के वर्षावनों की मिट्टी भी अधिकांश पोषक तत्व सतही पत्तियों-जीवांश में होते हैं, मिट्टी खुद अपेक्षाकृत न्यून पोषक होती है। कुल मिलाकर, उप-सहारा अफ्रीका की लाल-भूरी मिट्टियाँ मेहनत और सुधार के बाद ही लगातार खेती झेल पाती हैं; कम घनी आबादी वाले क्षेत्रों में अभी भी झूम खेती से प्राकृतिक मिट्टी क्षमता का उपयोग किया जाता है। (Soil Types)
- विशेष क्षेत्र – ज्वालामुखीय मिट्टी (पूर्वी अफ्रीका): अफ्रीका में कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहाँ मिट्टी अत्यंत उपजाऊ है। पूर्वी अफ्रीका की महान घाटी (Great Rift Valley) और आस-पास के पहाड़ी क्षेत्रों – जैसे केन्या, इथियोपिया, युगांडा के उच्चभूमि – में प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधि से बनी गहरी काली मिट्टी मिलती है। यह मिट्टी नाइट्रोजन, फ़ॉस्फोरस, पोटैशियम जैसे खनिजों से भरपूर है और स्थानीय रूप से इसे Andisols कहा जाता है। केन्या व इथियोपिया के पहाड़ी क्षेत्रों की इस समृद्ध मिट्टी ने यहाँ कुछ विशिष्ट नकदी फ़सलों को जन्म दिया है। विशेषकर कॉफ़ी की विश्वप्रसिद्ध किस्में (जैसे केन्याई और इथियोपियाई कॉफ़ी) इस ज्वालामुखीय मिट्टी में उगती हैं, जिसमें फ़ॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, जस्ता, आयरन आदि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। इन तत्वों से कॉफ़ी के पौधों को उत्कृष्ट पोषण मिलता है, जिसके परिणामस्वरूप केन्या-इथियोपिया की कॉफ़ी फलियों में विशिष्ट स्वाद और अम्लता पाई जाती है (यहां की ज्वालामुखीय मिट्टी और ऊँचाई मिलकर इसे अद्वितीय बनाती हैं)। इसके अलावा, रवांडा, तंज़ानिया के पर्वतों में भी इसी तरह की मिट्टी पर चाय और कॉफ़ी के बागान हैं। अफ्रीका के पूर्वी उच्चभूमि में चाय, कॉफ़ी, फलियाँ, मक्का आदि भरपूर उगते हैं – कुल मिलाकर यह क्षेत्र अफ्रीका के अन्य हिस्सों की तुलना में कृषि की दृष्टि से काफी उत्पादक है। इसी प्रकार, नील नदी के किनारे की काली-दोमट जलोढ़ मिट्टी भी अत्यन्त उपजाऊ है; मिस्र का नील नदी डेल्टा तो दुनिया के सबसे उपजाऊ कृषि क्षेत्रों में गिना जाता है, जहाँ प्राचीन काल से निरंतर गेहूं, कपास, चावल, गन्ना, सब्ज़ियाँ आदि उगाई जाती रही हैं। संक्षेप में कहें तो, अफ्रीका की मिट्टी दो छोर पर है – एक तरफ़ विशाल रेगिस्तान और कमजोर लाल मिट्टी, तो दूसरी ओर चुनिंदा क्षेत्रों में नील नदी के कछारी मैदान और ज्वालामुखीय मैदान जैसे बेहद उपजाऊ स्थल।
Soil Types: दक्षिण अमेरिका की मिट्टियाँ
- अमेज़न वर्षावन क्षेत्र: दक्षिण अमेरिका के अमेज़न बेसिन में दुनिया के सबसे सघन वर्षावन हैं, लेकिन paradoxically (विरोधाभासी रूप से) वहाँ की मिट्टी (Soil Types) ज़्यादा उपजाऊ नहीं है। अमेज़न क्षेत्र की मिट्टी अत्यधिक वर्षा के कारण लेचिंग से गुजर चुकी लाल-पीली लैटेराइट मिट्टी है, जिसकी ऊपरी परत पतली और पोषक तत्वों में गरीब होती है। “वर्षावनों की मिट्टी दुनिया की सबसे गरीब मिट्टियों में होती है” – अमेज़न बेसिन में कुछ स्थानों पर हल्की सफ़ेद रेतीली मिट्टी भी मिलती है जो करोड़ों सालों के अपरदन का नतीजा है। इसके बावजूद, घने जंगलों की जैव विविधता कायम है क्योंकि पेड़ों की गिरी पत्तियाँ, सड़े-जगलों का जैविक पदार्थ तुरंत पुनर्चक्रित (recycle) हो जाता है और पौधों को मिल जाता है। जब अमेज़न के जंगल काटकर खेत बनाए जाते हैं, तो शुरू में 1-2 साल फ़सल अच्छी हो सकती है, लेकिन फिर मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता क्षीण हो जाती है। इसी कारण अमेज़न क्षेत्र में पारंपरिक किसान मिल्पा या स्थानांतरित कृषि करते हैं – जंगल साफ़ करके कुछ साल खेती, फिर छोड़कर आगे बढ़ना। आधुनिक रूप में ब्राज़ील के कुछ हिस्सों में चूना और उर्वरक डालकर अमेज़न की मिट्टी(Soil Types) में सोयाबीन आदि की खेती की जा रही है, परन्तु यह प्राकृतिक रूप से टिकाऊ नहीं है। अमेज़न की मिट्टी में विशेष उल्लेखनीय बात “टेरा प्रेता” नामक काली मिट्टी है – यह प्राचीन मूलनिवासियों द्वारा बनाई गई कृत्रिम उर्वर मिट्टी के छोटे-छोटे क्षेत्र हैं, जिन्हें कोयला, खाद मिलाकर समृद्ध किया गया था। लेकिन प्राकृतिक अमेज़न मिट्टी में कृषि के लिए पोषक तत्व बहुत कम होते हैं। कुल मिलाकर, दक्षिण अमेरिका के आर्द्र उष्णकटिबंधीय जंगलों की मिट्टी कम उपजाऊ, अम्लीय लाल मिट्टी है, जिसमें गिनी-चुनी ही फ़सलें बिना भारी खाद के उग सकती हैं।
- पाम्पास के मैदान (अर्जेंटीना/ब्राज़ील): दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी-पूर्वी हिस्से (अर्जेंटीना, उरुग्वे और ब्राज़ील के दक्षिणी क्षेत्र) में विशाल घास के मैदान हैं जिन्हें “पम्पास” कहते हैं। यहाँ की मिट्टी (Soil Types) बेहद उपजाऊ दोमट काली मिट्टी है, जो काफी कुछ यूक्रेन या अमेरिकी प्रेरी की चेरनोज़म मिट्टी जैसी है। अर्जेंटीना के पम्पास की मिट्टी (Soil Types) को गहराई, पोषकता और भंडारण क्षमता में अमेरिकी कॉर्न बेल्ट जितना ही उर्वर माना जाता है। इस क्षेत्र ने अर्जेंटीना को एक कृषि महाशक्ति बनाया – पिछली शताब्दियों में बिना अधिक उर्वरक उपयोग के ही पम्पास ने भारी मात्रा में अनाज और तेलहन उपज दिए। पम्पास मिट्टी पर मुख्यतः गेहूं, मक्का, सोयाबीन, सूरजमुखी जैसी फ़सलें और विशाल मवेशी ranches (चारागाह) चलते हैं। अर्जेंटीना दुनिया के शीर्ष सोयाबीन और गेहूं उत्पादकों में से है क्योंकि इसकी मिट्टी अत्यंत उपजाऊ और गहरी है। बहुधा तीन-फसल चक्र (गेहूं के बाद सोयाबीन इत्यादि) भी यहाँ सम्भव है। हल्की सिंचाई से भी बड़ी उपज मिल जाती है और दशकों तक लगातार खेती के बावजूद मिट्टी ने उत्पादन बनाए रखा है – यद्यपि हाल के वर्षों में सतत कृषि हेतु रोटेशन अपनाने की बात उठी है। कुल मिलाकर, दक्षिण अमेरिकी पम्पास पृथ्वी के सर्वाधिक उपजाऊ कृषि भूभागों में एक है, जहां अनाज और चारा फसलें अपार मात्रा में उगती हैं।
- एंडीज़ पर्वतीय क्षेत्र: दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी किनारे पर लंबी एंडीज़ पर्वतमाला है, जो कई जलवायु एवं मिट्टी (Soil Types) क्षेत्रों को अपने में समेटे है। एंडीज़ के निचले घाटियों में नदीयों के किनारे जलोढ़ मिट्टी है जहां चावल, मक्का, फल-सब्ज़ी उगाई जाती है (जैसे पेरू की घाटियाँ)। ऊंचे पहाड़ी इलाकों में सीढ़ीदार खेतों में आलू, क्विनोआ, मक्का की परंपरागत खेती होती आई है – इंका जैसी प्राचीन सभ्यताओं ने एंडीज़ की मिट्टी को terraces बनाकर उपजाऊ बनाया था। एंडीज़ की ज्वालामुखीय मिट्टी (जैसे इक्वाडोर, कोलंबिया के ज्वालामुखीय क्षेत्र) कॉफी की उत्कृष्ट किस्मों के लिए जानी जाती है। उदाहरण के लिए, कोलंबिया और ब्राज़ील के पहाड़ी क्षेत्रों में ज्वालामुखीय दोमट मिट्टी पर कॉफ़ी के बागान हैं (कोलंबियाई कॉफ़ी इसकी गुणवत्ता से प्रसिद्ध है)। हालांकि एंडीज़ के बहुत ऊँचे भागों में मिट्टी उथली और पथरीली है जहां सिर्फ़ चारागाह घास या कोका जैसी झाड़ियाँ उग सकती हैं, पर मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में मिट्टी काफ़ी उपजाऊ हो सकती है (वहाँ मिलने वाले ज्वालामुखीय राख मिश्रित अवसाद इसे उपजाऊ बनाते हैं)। कुल मिलाकर, दक्षिण अमेरिका में मिट्टी की उर्वरता क्षेत्रवार बहुत भिन्न है – अमेज़न वर्षावन की कमजोर मिट्टी से लेकर पम्पास की गहन उपजाऊ मिट्टी तक का विशाल अंतर यहाँ देखा जाता है। (Soil Types)
Soil Types: एशिया (भारत को छोड़कर अन्य भाग) की मिट्टियाँ
एशिया महाद्वीप काफी बड़ा और विविध है, इसलिए मिट्टी (Soil Types) के कई प्रकार यहाँ मिलते हैं। भारत की मिट्टीयों पर तो हम चर्चा कर ही चुके, अब संक्षेप में एशिया के अन्य भागों पर नज़र डालते हैं:
- पूर्वी एशिया (चीन के मैदानी क्षेत्र): चीन के उत्तरी मैदानी भाग (ह्वांगहो या पीली नदी का मैदान, यांग्त्ज़ी नदी की घाटी) और मंचूरिया (उत्तरी पूर्वी चीन) अति उपजाऊ जलोढ़ (Soil Types) और हवा द्वारा लाई गई मृदा (Loess मिट्टी) के लिए मशहूर हैं। लोस (Loess) एक महीन बलुई मिट्टी है जो प्राचीन काल में हवा से उड़कर जमा हुई। उत्तर चीन का लोस पठार अत्यंत उपजाऊ है लेकिन अपरदन के प्रति बहुत संवेदनशील है। इस मिट्टी (Soil Types) की खासियत है कि यह नरम, भुरभुरी होते हुए भी पानी व पोषक तत्वों को अच्छे से रोककर रखती है, जिसके कारण इसमें बिना बहुत उर्वरक के भी अच्छी पैदावार ली जा सकती है। यही कारण है कि चीन की सभ्यता की शुरुआत इसी लोस मिट्टी (Soil Types) वाले क्षेत्र में हुई – इस उपजाऊ मिट्टी ने हज़ारों साल से वहां अनाज उगाने में सहायता की। आज चीन के उत्तरी व मध्य मैदानी इलाकों की मिट्टी पर विशाल मात्रा में गेहूं, मक्का, चावल, सोयाबीन आदि उगाए जाते हैं, जिससे चीन दुनिया में कृषि उत्पादन में अग्रणी है। मंचूरिया के कुछ क्षेत्रों में काली चेरनोज़म जैसी मिट्टी (जिसे वहाँ “काली मिट्टी” ही कहते हैं) भी मिलती है, जो सोयाबीन और मकई के लिए जानी जाती है। कुल मिलाकर, पूर्वी चीन का विशाल मैदानी भाग मिट्टी की उर्वरता एवं सिंचाई के मेल से पृथ्वी के सबसे उत्पादनशील कृषि क्षेत्रों में शामिल है – चावल, गेहूं, मक्का, कपास, गन्ना, सब्ज़ियाँ आदि यहाँ बंपर पैदावार देते हैं। (Soil Types)
- दक्षिण-पूर्वी एशिया: दक्षिण-पूर्वी एशिया (थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, फ़िलीपीन्स आदि) में उष्णकटिबंधीय जलवायु है, बहुत वर्षा होती है और मिट्टियाँ लाल-पीली लैटेराइट प्रकार (Soil Types) की होती हैं। समतल क्षेत्रों में नदी घाटियों और डेल्टाओं में अत्यंत उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी है – विशेषकर मेकाँग नदी का डेल्टा (वियतनाम) विश्व के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में से एक है, जिसे वियतनाम का “चावल का कटोरा” कहा जाता है। वहाँ की मिट्टी (Soil Types), लगातार बाढ़ से आए अवसाद के कारण, चावल की तीन फ़सलें तक साल में दे देती है। वियतनाम का मेकाँग डेल्टा और थाईलैंड का चाओफ्राया मैदानी इलाक़ा गहरी दोमट मिट्टी (Soil Types) पर आधारित हैं, जहाँ साल भर धान की खेती चलती है। दूसरी ओर, पर्वतीय या जंगल वाले हिस्सों में दक्षिण-पूर्व एशिया की मिट्टी भारी वर्षा से लीच हो चुकी और कम उर्वर है – वहाँ स्थानांतरित कृषि की जाती थी। अब आधुनिक रूप से उर्वरक डालकर इंडोनेशिया, मलेशिया में तेल-ताड़ (पाम ऑयल) के विशाल बागान उष्णकटिबंधीय लैटेराइट मिट्टी (Soil Types) पर लगे हैं, यद्यपि इससे मिट्टी की पोषण-स्थिति दीर्घकाल में बिगड़ती है। इंडोनेशिया के जावा द्वीप की ज्वालामुखीय मिट्टी बेहद उर्वर है और वहाँ चावल, कॉफ़ी, चाय की खेती उन्नत स्तर पर होती है – जावा और सुमात्रा के ज्वालामुखीय मैदान एशिया में कॉफ़ी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। फ़िलीपीन्स की मिट्टी (Soil Types) भी ज्वालामुखीय मूल की है और वहाँ नारियल, अनानास, धान खूब होते हैं। कुल मिलाकर, दक्षिण-पूर्वी एशिया में नदियों के किनारे की दोमट मिट्टियाँ और ज्वालामुखीय द्वीपों की मिट्टियाँ (Soil Types) अत्यधिक उपजाऊ हैं (इनसे विश्व का बड़ा चावल और प्राकृतिक रबड़ उत्पादन आता है), जबकि जंगलों की दूरस्थ मिट्टी कमजोर है जिसे उपयोग योग्य बनाने को निरंतर प्रबंधन चाहिए। (Soil Types)
- पश्चिमी/मध्य एशिया: पश्चिम एशिया (मध्य-पूर्व) और मध्य एशिया के बड़े हिस्से शुष्क या अर्ध-शुष्क जलवायु वाले हैं, जहां की मिट्टी (Soil Types) काफी हद तक रेतीली, पथरीली या लवणीय है। अरब प्रायद्वीप की अधिकतर मिट्टी रेगिस्तानी है – सऊदी अरब, इराक, सीरिया के बड़े रेतीले इलाकों में प्राकृतिक रूप से खेती संभव नहीं है।
- मेसोपोटामिया (इराक) के सिंचित मैदान – टिगरिस और यूफ़्रेटीज़ नदियों के किनारे – अपवाद थे, जहाँ प्राचीन सभ्यताओं ने नहरों द्वारा रेगिस्तान को हरा-भरा किया था। आज भी इराक की नदी घाटी की जलोढ़ मिट्टी (Soil Types) में खजूर, गेहूं, जौ उगाए जाते हैं, लेकिन पानी की कमी से उत्पादन सीमित है। मिस्र की नील नदी घाटी पश्चिमी एशिया का भाग नहीं बल्कि अफ्रीका में आती है, फिर भी मध्य-पूर्व के खाद्य उत्पादन में उसका महत्व है – नील डेल्टा विश्व में सबसे उपजाऊ मिट्टी क्षेत्रों में एक है, जहाँ कपास, चावल, सब्ज़ियाँ, गेहूं आदि खूब उगते हैं (मिस्र लंबे समय से उच्च गुणवत्तापूर्ण कपास के लिए प्रसिद्ध है क्योंकि नील की मिट्टी और धूप इसका अनुकूल संयोजन देते हैं)। मध्य एशिया (उज्बेकिस्तान, कज़ाखस्तान) की बात करें तो वहाँ भी अधिकतर क्षेत्र स्तेपी (steppe) घासभूमि (Soil Types) थे – कज़ाखस्तान के उत्तरी भाग में कुछ चेरनोज़म मिट्टी मिलती है जो सोवियत काल में गेंहू की खेती के लिए प्रयोग में लाई गई। लेकिन मध्य एशिया के दक्षिणी हिस्से में ज़मीन रेगिस्तानी (किरगिज़स्तान, तुर्कमेनिस्तान) है, जहाँ कपास उत्पादन केवल नहरों से सिंचाई करके हुआ (उदाहरण: उज्बेकिस्तान में रेगिस्तान की मिट्टी को अमू दरिया के पानी से सींचकर सोवियतों ने कपास खेत बनाए)। हालाँकि अधिक सिंचाई की वजह से इन मिट्टियों में लवणीयता बड़ी समस्या बन गई और कई ज़मीनें बंजर (Soil Types) हो गईं। कुल मिलाकर, पश्चिमी व मध्य एशिया की मिट्टी (Soil Types) अधिकांशतः शुष्क, रेतीली या लवणीय है – जहां प्राकृतिक रूप से सिर्फ़ खानाबदोश चरागाह सम्भव था। मानव ने सिंचाई द्वारा कुछ क्षेत्रों (नील घाटी, दजला-फ़रात, फिरगाना घाटी) में इन मिट्टियों (Soil Types) को उपजाऊ बनाया और वहाँ गेहूं, कपास, खजूर, जौ, चना जैसी फ़सलें उगाईं, पर जल की कमी से बड़े हिस्से अब भी कृषि से वंचित हैं।
Soil Types: शेष दुनिया में भी कई प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं – जैसे ऑस्ट्रेलिया की अधिकतर मिट्टी पुरानी, पोषक तत्व-विहीन रेडियन मिट्टी है (इसे वहां मृदा-गरीबी की समस्या है), जबकि उत्तरी कनाडा-साइबेरिया में ठंडी टुंड्रा मिट्टी है जो बर्फीली और गैर-उपजाऊ होती है।
पृथ्वी पर मिट्टी का वितरण (Soil Types) जलवायु, पारिस्थितिकी और भौगोलिक इतिहास पर निर्भर करता है। प्रत्येक प्रकार की मिट्टी में उसकी संरचना के अनुसार कुछ खास फसलें अच्छी उगती हैं – उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि कैसे अलग-अलग क्षेत्रों ने अपनी मिट्टी (Soil Types) के अनुकूल फ़सलों को अपनाया और विकसित किया।
दुनिया भर के किसान मिट्टी की प्रकृति(Soil Types) समझकर उसे सुधारने व टिकाऊ खेती करने के प्रयास करते आए हैं, ताकि भावी पीढ़ियों के लिए भी भूमि उपजाऊ बनी रहे।
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