फूलो-झानो मुर्मू संथाल हूल की वीरांगनाएँ

फूलो-झानो मुर्मू: एक रात। दो बहनें। हाथ में सिर्फ़ कुल्हाड़ी। और संथाल लोक-स्मृतियों और बाद के कुछ लेखों में कहा जाता है कि उस रात अंग्रेज़ी हुकूमत के इक्कीस सैनिक फिर कभी सुबह नहीं देख पाए। लेकिन इससे भी बड़ी बात ये है कि जिस बग़ावत का ये किस्सा है, उसमें करीब पंद्रह हज़ार लोग मारे गए। कुछ स्रोतों में ये संख्या दस से बीस हज़ार के बीच बताई गई है। फिर भी बहुतों ने इसका नाम तक नहीं सुना।

नमस्कार दोस्तों! अपनारण के Tuntun Explainer में आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है… आज हम बात करेंगे 1855 के संथाल हूल और फूलो-झानो मुर्मू की।… बता दें कि “हूल” संथाली भाषा का शब्द है। आम तौर पर इसका मतलब बग़ावत या विद्रोह समझाया जाता है।… लेकिन साफ कर दें की ये सिर्फ़ अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं थी। ये साहूकारों, ज़मींदारों, पुलिस, अदालत और उस पूरी व्यवस्था के ख़िलाफ़ थी, जिसने संथालों को उनकी ही ज़मीन पर कर्ज़ और बेगारी में फँसा दिया था।…

पर सवाल उठता है कि आखिर ये बग़ावत हुई ही क्यों?…ऐसे में इस explainer में सबसे पहले यही समझना ज्यादा ज़रूरी है।… और dive-in से पहले एक बात यहां साफ़ कर दें कि…वीडियो में हम हर आँकड़ा तौलकर बोलेंगे। साथ ही जहाँ इतिहासकारों और स्रोतों में मतभेद नजर आता है, वहाँ साफ़ बताएँगे।…

भाग 1: संथाल यहाँ आए कैसे?(फूलो-झानो मुर्मू)

अब करते हैं कहानी की शुरुआत।…

साल था 1832 का। ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजमहल की पहाड़ियों के नीचे की ज़मीन को अलग करके… नाम दिया “दामिन-ए-कोह”, यानी पहाड़ का दामन।… कंपनी को खेती से लगान चाहिए था, तो जंगल साफ़ करके ज़मीन तैयार करनी थी। वहीं पहाड़ी इलाके में पहले से रहने वाले पहाड़ी समुदायों के साथ कंपनी का रिश्ता अलग था, और अंग्रेज़ अफ़सरों को लगा कि संथालों से जंगल साफ़ करवाकर खेती का विस्तार कराया जा सकता है।…

तब कंपनी ने संथालों को इस इलाके में बसने के लिए बुलाया। और साथ ही ज़मीन और कुछ सुविधाओं का वादा भी किया।… संथाल आए, और मेहनत भी ऐसी की कि जंगल खेत बन गए। कहते हैं कि 1838 में इस इलाके में संथालों की गिनती करीब तीन हज़ार थी। जो 1851 तक बढ़कर करीब बयासी हज़ार के करीब हो गई।

इसी अवधि में गाँवों की संख्या भी बहुत तेज़ी से बढ़ी। कुछ विवरणों में 1838 के करीब चालीस गाँवों से बढ़कर 1851 तक… चौदह सौ से ज़्यादा गाँव होने की बात सामने आती है।(फूलो-झानो मुर्मू)

इसका नतीजा? कंपनी को इस इलाके से मिलने वाला राजस्व भी कई गुना बढ़ गया। वहीं कुछ स्रोत इसे करीब 22 गुना तक बढ़ा हुआ बताते हैं, हालांकि ये आँकड़ा किस तरह के राजस्व की गणना पर आधारित है, इस पर सावधानी ज़रूरी है।… पर जिस मेहनत ने कंपनी की तिजोरी भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी… उसी मेहनत ने आगे चलकर संथालों के लिए मुसीबत खड़ा कर दिया।… क्योंकि जैसे-जैसे खेती बढ़ी, वैसे-वैसे इस इलाके में साहूकार, व्यापारी, ज़मींदार, पुलिस और कंपनी के कर्मचारी भी बढ़ते गए।…

और ऐसे में संथालों की ज़मीन पर उनका ही नियंत्रण धीरे-धीरे कम होता चला गया।…

भाग 2: दिकू, साहूकार और कर्ज़ का जाल

अब समझाते हैं कि मुसीबत कैसी थी।… संथाल बाहर से आने वाले गैर-आदिवासियों को “दिकू” कहते थे। लेकिन हर बाहरी व्यक्ति दिकू नहीं था। इस संदर्भ में दिकू शब्द खास तौर पर उन बाहरी लोगों के लिए इस्तेमाल होता था, जिन्हें संथाल शोषण और दखल से जोड़कर देखते थे।… इनमें साहूकार, व्यापारी, ज़मींदार और कुछ सरकारी कर्मचारी शामिल थे।(फूलो-झानो मुर्मू)

वहीं… खेती के बीच के महीनों में संथाल को अनाज या पैसे की ज़रूरत पड़ती, तो वो साहूकार के पास जाता। आपको यहां बता दें की… इतिहास से जुड़े कई विवरणों में ब्याज की दर पचास से पाँच सौ प्रतिशत तक बताए जाने का दावा मिलता है।… अब सोचिए, अगर कोई व्यक्ति सौ रुपये उधार ले और उस पर इतना भारी ब्याज लग जाए, तो कर्ज़ चुकाना क्या संभव होगा… नहीं न।

इतना ही नहीं, तराज़ू में भी बेईमानी थी।… जहां… संथाल से फ़सल ख़रीदते वक़्त भारी बाट रखा जाता, तो वहीं… उसे सामान बेचते वक़्त हल्का बाट रखा जाता।… यानी जब संथाल अपनी फ़सल बेचता, तो उसे कम तौला जाता। और जब वही संथाल साहूकार से सामान खरीदता, तो उससे ज़्यादा वसूला जाता।… ऐसे में कर्ज़ चुकता ही नहीं होता था।…फिर ऐसे में यहां दो तरह की बंधुआ मज़दूरी शुरू होती थी।…

  • पहली, कमियोती।… इसमें कर्ज़ चुकने तक साहूकार के यहाँ काम करना पड़ता था।…
  • दूसरी, हरवाही। इसमें साहूकार के खेत जोतो और उसकी निजी सेवा भी करो।…

ऐसे में कई परिवार लंबे समय तक इस कर्ज़ और श्रम के चक्र में फँसे रहते थे। कई बार ये स्थिति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँच जाती थी।… ऊपर से रेल लाइन बन रही थी और मज़दूरों से बेगार करवाए जाने की शिकायतें भी थीं, यानी बिना उचित मज़दूरी के काम।…फिर शिकायत लेकर संथाल पुलिस और अदालत पहुंचे। पर वहाँ भी सुनवाई नहीं हुई।…कई बार तो उन्हे ऐसा लगा कि पुलिस, अदालत और साहूकारों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं।…

और सबसे बड़ी समस्या तब आती है… जब अपनी ही ज़मीन पर मेहनत करने वाला किसान कर्ज़दार बनाकर, आरोपी और मज़दूर बना दिया जाए, फिर उसके जीने का हर दरवाजा बंद कर दिया जाए, उसके पास कुछ न रहे…तब इंसान क्या करे? यही सवाल संथालों के सामने किसी बड़े दानव के आकर में आकर खड़ा हो गया। फिर भड़की वह चिंगारी जिसे अंग्रेज भाप तक नहीं पाए…

भाग 3: चिंगारी और चार भाई

साल था 1854-55 का… जब संथालों के अंदर विद्रोह की चिंगारी तेजी से आसपास फैल गई… कुछ विवरणों में बीर सिंह मांझी नाम के… एक संथाल नेता के… साहूकारों और शोषणकारी व्यवस्था के विरोध का ज़िक्र मिलता है। उनके ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई की बात भी सामने आती है।… इस तरह की घटनाओं ने पहले से जमा गुस्से को और भड़का दिया।(फूलो-झानो मुर्मू)

इसी माहौल में…भोगना-डीह गाँव के चार भाई आगे आए: सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव मुर्मू।… इनकी दो बहनों के नाम फूलो और झानो बताए जाते हैं।… वहीं… सिद्धू ने कहा कि उन्हें ठाकुर बोंगा, यानी संथाल धार्मिक परंपरा की एक सर्वोच्च दैवी सत्ता, का संदेश मिला है कि बाहरी लोगों के राज और शोषण को ख़त्म करने का समय आ गया है।…ऐसे में इस संदेश को गांव-गांव पहुंचाने के लिए कहा जाता है कि साल के पेड़ की टहनियों और दूसरे पारंपरिक संकेतों का इस्तेमाल हुआ।

वहीं इस संदेश के बाद 30 जून 1855 को भोगनाडीह में करीब दस हज़ार संथाल जमा हुए।… चारों भाइयों ने नेतृत्व संभाला। कुछ विवरणों में उन्हें “सूबा” या नेता के रूप में चुने जाने की बात मिलती है।…कहा जाता है कि संथालों ने तय किया कि वे कलकत्ता जाकर गवर्नर-जनरल तक अपनी बात पहुँचाएँगे। लेकिन आंदोलन सिर्फ़ शिकायत लेकर जाने तक सीमित नहीं रहा। कुछ ही समय में ये खुले विद्रोह में बदल गया।

भाग 4: जब बग़ावत हथियार बन गई

फिर एक जुलाई के आसपास कुछ संथालों ने बाज़ार में पाँच साहूकारों को मार डाला।… इसके बाद 7 जुलाई को दारोगा महेश लाल दत्त भी मारा गया।… साफ़ कर दें कि हूल कोई शांतिपूर्ण याचिका-आंदोलन नहीं था। इसमें हिंसा हुई, हत्याएँ हुईं और संपत्ति पर हमले हुए। इतिहास को ईमानदारी से समझने के लिए इन बातों को छिपाना नहीं चाहिए।… लेकिन ये भी समझना ज़रूरी है कि ये हिंसा अचानक पैदा नहीं हुई थी। इसके पीछे लंबे समय से चल रहा कर्ज़, ज़मीन का कब्ज़ा, बेगार और प्रशासनिक शोषण था।… ऐसे में विद्रोह के कुछ ही दिनों में संथालों ने… बाज़ारों, ज़मींदारों की कोठियों, साहूकारों के ठिकानों और रेल से जुड़े बंगलों को निशाना बनाना शुरू कर दिया।

फिर आया नारायणपुर।…

बता दें की… बाद के कई विवरणों में कहा गया है कि संथालों ने कंपनी की एक टुकड़ी को हरा दिया था। वहीं कुछ कथाओं के अनुसार, उस दिन भीगे बारूद की वजह से अंग्रेज़ी बंदूक़ें ठीक से नहीं चल पाईं थी।…जबकि इससे संथालों में ये विश्वास फैल गया कि सिद्धू-कान्हू को कोई दैवी शक्ति बचा रही है।…

अब यहाँ भी सावधानी ज़रूरी है।… भीगे बारूद और दैवी संरक्षण का विवरण सभी स्रोतों में एक जैसा नहीं मिलता।… इसलिए इसे पक्के सैन्य रिकॉर्ड की तरह नहीं, बल्कि उस समय की प्रचलित कथा और बाद के विवरण के रूप में समझना चाहिए।…

हालांकि अंग्रेज़ भी चुप नहीं बैठे।… कमिश्नर बिड-वेल को विद्रोह से निपटने की विशेष ज़िम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद मेजर जनरल लॉयड ने भी सैन्य कार्रवाई की कमान संभाली।… वहीं 24 जुलाई को महेशपुर के बारे में कुछ स्रोत बताते हैं कि करीब पाँच हज़ार संथाल मौजूद थे।… जबकि उनके सामने कंपनी के पचास सैनिक के साथ मुर्शिदाबाद के नवाब के करीब… दो सौ सैनिक और तीस हाथी बताए जाते हैं।… कहा जाता है कि लड़ाई करीब दस मिनट चली और लगभग सौ संथाल मारे गए।… इन संख्याओं और लड़ाई के पूरे विवरण को लेकर भी स्रोतों में एकरूपता नहीं है, इसलिए इन्हें “कुछ विवरणों के अनुसार” ही समझना सही रहेगा।…

ऐसे में देखा जाए तो संथालों के पास तीर-कमान, कुल्हाड़ी और स्थानीय हथियार थे। हालांकि… सामने प्रशिक्षित सैनिक, बंदूकें, सैन्य संगठन और लंबे अभियान के लिए बेहतर रसद थी।… लेकिन संथालों की ताक़त भी कम नहीं थी।… उन्हें जंगल, पहाड़ और रास्तों की जानकारी थी। ऐसे में… वे स्थानीय समर्थन और तेज़ी से जुटने की क्षमता के सहारे… अंग्रेज़ी प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गए थे।…

भाग 5: फूलो और झानो

अब आपको बताते हैं इस वीडियो की असली नायिकाओं फूलो और झानो मुर्मू के बारे में। ये सिद्धू-कान्हू की बहनें बताई जाती हैं।… संथाल लोक-स्मृतियों और बाद के कुछ लेखों के मुताबिक, दोनों अँधेरे की आड़ में दुश्मन के ठिकाने तक पहुँचीं थी। उनके हाथ में कुल्हाड़ी थी।… और कहा जाता है कि उन्होंने वहाँ मौजूद इक्कीस सैनिकों को मार डाला था।(फूलो-झानो मुर्मू)

अब ईमानदारी से एक बात।…

हमें इस घटना का पक्का ब्योरा, यानी निश्चित तारीख़, जगह या पूरी कहानी, अंग्रेज़ों के उस दौर के दस्तावेज़ों में नहीं मिला।… जो स्रोत मिले, वे मुख्यतः बाद के लेखों, लोक-स्मृतियों और समुदाय में चली आ रही कथाओं पर टिके हैं। इसलिए हम इस संख्या को पक्के ऐतिहासिक तथ्य की तरह नहीं बोल सकते।(फूलो-झानो मुर्मू)

हम इसे इस तरह कहेंगे:… संथाल परंपरा में फूलो और झानो की वीरता की ये कहानी पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है, और उस परंपरा के अनुसार दोनों ने 21 सैनिकों को मार गिराया।… इसका मतलब ये नहीं कि कहानी झूठ है।… कई बार जिन समुदायों के पास अपने इतिहास को लिखने के लिए संस्थान, अधिकारी या अख़बार नहीं होते, उनका इतिहास गीतों, लोक-कथाओं और पीढ़ियों की याद में ज़िंदा रहता है।… लेकिन इतिहास में किसी संख्या या घटना को पक्का साबित करने के लिए समकालीन दस्तावेज़ और स्वतंत्र स्रोत भी ज़रूरी होते हैं।

इसलिए हम इसे एक शक्तिशाली लोक-स्मृति और समुदाय की वीरगाथा के रूप में रख रहे हैं, न कि पूरी तरह प्रमाणित सैन्य रिपोर्ट के रूप में।… वहीं फूलो-झानो ने इसके बाद क्या किया, इस पर भी अलग-अलग बातें मिलती हैं।… कुछ कथाओं में कहा जाता है कि वे आख़िर तक लड़ती रहीं और अंग्रेज़ी दमन के सामने झुकीं नहीं।… लेकिन… इन विवरणों की तारीख़ और जगह हर स्रोत में एक जैसी नहीं है, पर उनकी स्मृति आज भी संथाल समाज में प्रतिरोध और साहस का प्रतीक है।…

भाग 6: ये सिर्फ़ संथालों की लड़ाई नहीं थी(फूलो-झानो मुर्मू)

बता दें कि इस हूल में सिर्फ़ संथाल नहीं थे।… लोहार और गोआला जैसे समुदायों ने भी हथियार बनाने, सामान जुटाने और ख़बरें पहुँचाने में मदद की थी।… कुछ विवरणों में पहाड़िया, कामार और बागदी समुदायों के लोगों के शामिल होने की भी बात आती है।… इसलिए इसे केवल एक समुदाय का अलग-थलग विद्रोह समझना सही नहीं होगा।… ये उस पूरे इलाके में फैलते असंतोष का रूप था, जहाँ औपनिवेशिक राज, साहूकारों और ज़मींदारों की व्यवस्था से अलग-अलग समुदाय प्रभावित हो रहे थे।…

वहीं…कितने लोग इस हूल से जुड़े थे, इसका निश्चित आँकड़ा उपलब्ध नहीं है।… कुछ स्रोत पचास हज़ार कहते हैं, कुछ साठ हज़ार या उससे अधिक का अनुमान देते हैं। इसलिए सुरक्षित रूप से कहा जा सकता है कि इसमें दसियों हज़ार लोग शामिल हुए थे।… जंगल और पहाड़ की जानकारी इनकी सबसे बड़ी ताक़त थी। इसी के सहारे वे अचानक हमला करते, रास्ते बदलते और अंग्रेज़ी सेना के लिए इलाके को मुश्किल बना देते। लेकिन लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के लिए हथियार, भोजन, संगठन और लगातार सैन्य सहायता की ज़रूरत होती है।… यहीं पर कंपनी की संगठित सेना को बढ़त मिली।(फूलो-झानो मुर्मू)

भाग 7: कुचलने की कहानी

ऐसे में कुछ ही महीनों में अंग्रेज़ों ने विद्रोह के कई प्रमुख इलाक़ों पर फिर से नियंत्रण स्थापित करना शुरू कर दिया।… कई अफ़सर पूरे संथाल समुदाय को कठोर दंड देने या उन्हें पूरी तरह दबाने की बात तक करने लगे थे।… हालांकि सरकार ने पूरे समुदाय को समाप्त करने की नीति को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया।…

कुछ घोषणाओं में हथियारबंद विद्रोहियों के ख़िलाफ़ कठोर कार्रवाई की अनुमति बेशक दी गई… पर औरतों और बच्चों के साथ अलग व्यवहार की बात का ब्यौरा मिलता है।… लेकिन आदेश और ज़मीन पर होने वाली कार्रवाई हमेशा एक जैसी नहीं होती।… नवंबर 1855 में मार्शल लॉ लगाया गया। इसका अर्थ था कि सामान्य अदालतों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जगह सैन्य शासन को व्यापक अधिकार मिल गए। और हथियार उठाए हुए संथालों के ख़िलाफ़ तत्काल और कठोर कार्रवाई की जा सकती थी।

जबकि मॉर्शल लॉ के दौरान कहा जाता है कि सिद्धू को पहले पकड़ा गया… वहीं कुछ स्रोतों में गाँव वालों या मुखबिर की मदद से उनकी गिरफ्तारी की बात भी सामने आती है। लेकिन… कान्हू की गिरफ्तारी और उसके बाद की घटनाओं पर स्रोतों में अधिक मतभेद हैं।… एक तरफ कुछ विवरण उन्हें बाद में पकड़े जाने और मृत्युदंड दिए जाने की बात कहते हैं, जबकि सटीक तारीख़ों पर अलग-अलग दावे मिलते हैं। इसलिए हम यहाँ कोई निश्चित तारीख़ नहीं बोलेंगे। ऐसे में हां… इतना कहा जा सकता है कि सिद्धू, कान्हू और विद्रोह के दूसरे प्रमुख नेताओं के पकड़े जाने और मारे जाने के बाद आंदोलन का संगठित नेतृत्व बुरी तरह टूट गया।…(फूलो-झानो मुर्मू)

वहीं… 10 नवंबर 1855 को लगाए गए मार्शल लॉ को 3 जनवरी 1856 को हटा दिया गया।… फ़रवरी तक सैन्य कार्रवाई के अंतिम चरण भी समाप्त हो गए। लेकिन इस दमन की कीमत बहुत बड़ी थी। मौतों का अनुमान देखें तो कुछ जगह दस हज़ार से पंद्रह हज़ार, तो कुछ जगह पंद्रह हज़ार से बीस हज़ार तक की संख्या दी जाती है। इसलिए हूल में करीब पंद्रह हज़ार लोगों ने अपना जान गवांई कहा सही रहेगा, हालांकि वास्तविक संख्या इससे कम या ज़्यादा हो सकती है।…

वहीं एक सवाल जरूर मन में आता है की जब उनकी हार हो गई तो हार के बाद उन्हें क्या मिला?… उनपर तो और भी कई कड़े कानून लगा दिए गए होंगे… तो साफ कर दें की ऐसा नहीं था… हार हुई, लेकिन बात बेकार नहीं गई।…(फूलो-झानो मुर्मू)

विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों को ये समझ आया कि संथाल परगना को सामान्य प्रशासनिक ढाँचे में चलाना आसान नहीं है।… ऐसे में 1855 में… संथाल परगना के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई और 1856 से ये अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में काम करने लगा। इसका मुख्यालय दुमका बना।… बाद में 1876 का संथाल परगना टेनेंसी कानून आया। इसका उद्देश्य संथाल परगना में भूमि-अधिकारों को नियंत्रित करना और आदिवासी ज़मीन के बाहरी लोगों के हाथ जाने पर रोक लगाना था।

लेकिन यहाँ एक ज़रूरी सुधार है। 1876 के कानून को आज लागू होने वाली पूरी और अंतिम भूमि-सुरक्षा व्यवस्था की तरह नहीं समझना चाहिए। आज़ादी के बाद 1949 में संथाल परगना टेनेंसी का एक महत्वपूर्ण कानून आया, जिसमें रैयती भूमि के हस्तांतरण पर कड़े प्रावधान किए गए। इसके तहत रैयत अपनी ज़मीन बेच या गिरवी तभी रख सकता है, जब रिकॉर्ड में उसे ऐसा अधिकार मिला हो और कानून की बाकी शर्तें भी पूरी हों। यानी ये कहना सही नहीं होगा कि 1876 के बाद ज़मीन कभी भी बाहरी व्यक्ति को नहीं दी जा सकती थी।

सही बात ये है कि संथाल परगना में भूमि-हस्तांतरण को रोकने और नियंत्रित करने के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था धीरे-धीरे विकसित हुई, जिसका महत्वपूर्ण आधार 1949 का कानून है। एक दिलचस्प बात ये भी है कि इस विद्रोह की खबर भारत से बाहर तक पहुँची।…चार्ल्स डिकेंस से जुड़ी पत्रिका में संथाल विद्रोह पर लिखे जाने का उल्लेख मिलता है… और कार्ल मार्क्स ने अपने नोट्स में भी संथालों के उभार का संक्षिप्त ज़िक्र किया था।

उन्होंने एक लंबा विश्लेषण तो नहीं लिखा था। पर उनके नोट्स में संथालों के संघर्ष और कई महीनों तक चले गुरिल्ला प्रतिरोध के बाद उसके दबाए जाने का संक्षिप्त उल्लेख मिलता है।

भाग 9: आज उनकी याद(फूलो-झानो मुर्मू)

ऐसे में आज उनकी याद में हर साल 30 जून को भोगना-डीह और दूसरे इलाक़ों में हूल दिवस मनाया जाता है। इस दिन सिद्धू, कान्हू, चाँद, भैरव, फूलो और झानो सहित उन सभी लोगों को याद किया जाता है, जिन्होंने इस विद्रोह में हिस्सा लिया।

वहीं हर साल बड़ी संख्या में लोग भोगनाडीह पहुँचते हैं। दुमका में फूलो-झानो के नाम पर मेडिकल कॉलेज के साथ पास ही सिद्धू-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय है। साफ कर दें की इन संस्थानों के नाम केवल सम्मान के प्रतीक नहीं हैं। ये याद दिलाते हैं कि इतिहास सिर्फ़ राजाओं, युद्धों और राजधानी में बैठे शासकों का नहीं होता।… इतिहास उन लोगों का भी होता है, जिन्होंने अपनी ज़मीन, अपनी मेहनत और अपनी इज़्ज़त के लिए लड़ाई लड़ी।

और वर्तमान की बात करें तो… 2020 में झारखंड सरकार ने “फूलो झानो आशीर्वाद अभियान” शुरू किया(फूलो-झानो मुर्मू)।… ध्यान रहे, ये कोई सामान्य कल्याण योजना नहीं, बल्कि एक विशेष अभियान है। इसका उद्देश्य हड़िया और शराब के कारोबार से जुड़ी महिलाओं को वैकल्पिक और सम्मानजनक आजीविका से जोड़ना था।… साथ ही अभियान का नाम फूलो और झानो के नाम पर रखना उनके संघर्ष को आज की सामाजिक और आर्थिक नीतियों से जोड़ने की कोशिश है।… लेकिन इस अभियान का असर कितना रहा, इस पर अलग-अलग रिपोर्टें हैं। इसलिए कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी।

आख़िर में एक सवाल।… हज़ारों लोगों ने जान दी।… एक पूरा समुदाय शोषण और दमन के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ।…दो बहनों की कहानी पीढ़ियों से गाई जाती रही है।… फिर भी हमारी किताबों में इस हूल को इतनी कम जगह क्यों मिलती है?… क्यों आदिवासी विद्रोहों को अक्सर इतिहास की मुख्य कहानी से अलग करके पढ़ाया जाता है?…(फूलो-झानो मुर्मू)

क्यों सिद्धू-कान्हू, चाँद-भैरव और फूलो-झानो के नाम उतने लोगों तक नहीं पहुँचते, जितने दूसरे ऐतिहासिक नेताओं के नाम पहुँचते हैं?… फूलो और झानो के 21 सैनिकों वाली कहानी को हम आज पक्के दस्तावेज़ की तरह बेशक साबित नहीं कर सकते।… लेकिन उनकी वीरता की स्मृति को भी सिर्फ़ इसलिए नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि उसे लिखने वाला कोई अंग्रेज़ अधिकारी मौजूद नहीं था।

इतिहास में दस्तावेज़ ज़रूरी हैं।… लेकिन लोगों की सामूहिक स्मृति भी महत्वपूर्ण है।…हूल हमें याद दिलाता है कि शोषण चाहे किसी भी रूप में हो-कर्ज़, ज़मीन, बेगार, पुलिस या अदालत-एक समय के बाद लोग उसके ख़िलाफ़ खड़े होते हैं।…

वहीं 1855 का संथाल हूल 1857 से दो साल पहले हुआ था। ऐसे में इसे “भारत की पहली जन-क्रांति” कहना विवादित हो सकता है, लेकिन ये निश्चित रूप से 1857 से पहले के सबसे बड़े और सबसे संगठित आदिवासी विद्रोहों में से एक था। और इसकी सबसे बड़ी विरासत यही है कि हार के बाद भी इसकी आवाज़ ख़त्म नहीं हुई।…(फूलो-झानो मुर्मू)

वो गीतों में रही।

कहानियों में रही।

हूल दिवस में रही।

और फूलो-झानो(फूलो-झानो मुर्मू) के नाम में आज भी ज़िंदा है।… सोचिएगा ज़रूर।

और अगर वीडियो ने आपको कुछ नया बताया हो, तो इसे उन लोगों तक पहुँचाइए जो इस इतिहास को नहीं जानते।

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