Patna

Patna: आप जिस Patna की सड़कों पर चलते हैं, उसके नीचे और आसपास ढाई हज़ार साल पुराने पाटलिपुत्र के अवशेष छिपे हैं। और इसी शहर की कहानी में एक ऐसा बादशाह भी है, जिसके नाम के सिक्के तब जारी हुए, जब वह मर चुका था। आज इस पूरी कहानी को हम बिल्कुल आसान भाषा में समझेंगे।

भाग 1: एक छोटा गाँव, जो बड़ा शहर बना

सबसे पहले चलते हैं करीब ढाई हज़ार साल पहले। गंगा किनारे एक छोटा-सा गाँव था, पाटलिग्राम। उस वक़्त मगध के राजा थे अजातशत्रु, और उनकी वैशाली के लिच्छवियों से ठनी रहती थी। इसलिए उन्होंने इस गाँव में एक किला या सैन्य चौकी बनवाई, ताकि दुश्मन पर नज़र रखी जा सके। बाद में उनके उत्तराधिकारी उदायिन ने मगध की राजधानी राजगृह से इस इलाके में स्थानांतरित की और पाटलिग्राम आगे चलकर पाटलिपुत्र के रूप में विकसित हुआ।

बौद्ध ग्रंथों में यह भी बताया गया है कि भगवान बुद्ध अपने आख़िरी सफ़र में इस जगह से गुज़रे थे। परंपरा के अनुसार उन्होंने कहा था कि यह जगह एक दिन बहुत बड़ा शहर बनेगी, लेकिन इसे तीन चीज़ों का ख़तरा रहेगा-आग, पानी और आपसी फूट। बता दें कि आगे चलकर इस शहर के पतन की वजहों में आग, बाढ़ और राजनीतिक संघर्षों को भी गिना गया। फिर गाँव का नाम बना पाटलिपुत्र। इसे कुसुमपुर और पुष्पपुर भी कहा गया।

भाग 2: मौर्यों का महानगर

अब आपको बताते हैं मौर्य काल की बात। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज़ चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आए थे। उन्होंने इस शहर का हाल लिखा था।
साफ़ कर दें कि उनकी मूल किताब आज सुरक्षित नहीं है। हम उनके विवरण को बाद के यूनानी लेखकों के उद्धरणों से जानते हैं। उनके अनुसार शहर करीब 80 stadia लंबा और 15 stadia चौड़ा था-यानी लगभग 14 से 15 किलोमीटर लंबा और ढाई से तीन किलोमीटर चौड़ा। इसके चारों तरफ़ लकड़ी की बहुत बड़ी दीवार थी, जिसमें 570 बुर्ज और 64 दरवाज़े बताए गए हैं।

दीवार के बाहर करीब 600 फुट चौड़ी और 45 फुट गहरी खाई थी। और सबसे दिलचस्प बात यह कि शहर चलाने के लिए 30 लोगों की एक परिषद बताई गई है, जो पाँच-पाँच लोगों की छह समितियों में बँटी थी। एक समिति कारीगरों को देखती थी। एक परदेसियों का ख़याल रखती थी।एक जन्म और मृत्यु का हिसाब रखती थी। एक बाज़ार और नाप-तौल देखती थी। एक यह तय करती थी कि नई और पुरानी चीज़ें अलग-अलग बिकें। और एक बिक्री पर 10 प्रतिशत टैक्स वसूलती थी। ध्यान रहे, यह विवरण मेगस्थनीज़ से जुड़ा है, कौटिल्य के अर्थशास्त्र से नहीं। ढाई हज़ार साल पहले शहर के प्रशासन का इतना व्यवस्थित विवरण सचमुच हैरान करता है।

भाग 3: ज़मीन से निकला सबूत

हालांकि कई इतिहासकारों को लगता था कि मेगस्थनीज़ ने बढ़ा-चढ़ाकर लिखा है। फिर ज़मीन ने जवाब दिया। 1895 में एल. ए. वाडेल की खुदाई से प्राचीन शहर और बुलंदी बाग क्षेत्र के अवशेषों का पता चला। 1912 से 1915 के बीच अमेरिकी पुरातत्वविद डी. बी. स्पूनर ने कुम्हरार में बड़ी खुदाई की। इस खुदाई का खर्च टाटा परिवार की ओर से उठाए जाने का उल्लेख मिलता है। कुम्हरार में उन्हें चुनार के बलुआ पत्थर का एक स्तंभ मिला, जिस पर शीशे जैसी चमक थी। इसे मौर्य पॉलिश कहा जाता है। इसके साथ ही 72 गड्ढे मिले, जहाँ ऐसे ही स्तंभ खड़े रहे होंगे। बाद की खुदाई में आठ और गड्ढे मिले, यानी कुल 80 जगहों के निशान।

इसी वजह से इसे 80 स्तंभों वाला हॉल कहा जाता है। साफ़ कर दें कि 80 पूरे स्तंभ नहीं मिले हैं। एक स्तंभ और कई टुकड़े मिले हैं, जबकि बाकी स्तंभों की जगह के निशान मिले हैं। यह हॉल किस काम आता था, इस पर इतिहासकार पूरी तरह एकमत नहीं हैं। कुछ सरकारी और पर्यटन स्रोत इसे assembly hall या अशोक के महल से जोड़ते हैं, लेकिन इसे तीसरी बौद्ध संगीति का निश्चित स्थल मानना पूरी तरह प्रमाणित नहीं है।
बुलंदी बाग में लकड़ी की मोटी दीवार के हिस्से मिले।

इन अवशेषों को मेगस्थनीज़ की बताई लकड़ी की दीवार से जोड़ा जाता है। दलदली और कम-ऑक्सीजन वाली मिट्टी में दबे होने के कारण लकड़ी के कुछ हिस्से इतने लंबे समय तक बच सके। वहीं मुस्कुराते बच्चे और नाचती आकृतियों वाली मिट्टी की मूर्तियाँ भी मिलीं।

भाग 4: दीदारगंज की यक्षी

अब आपको एक ऐसी मूर्ति के बारे में बताते हैं, जिसे लोकप्रिय रूप से भारत की मोनालिसा कहा जाता है। अक्टूबर 1917 में दीदारगंज में गंगा किनारे यह मूर्ति मिली। बिहार संग्रहालय के मुताबिक़, इसकी खोज का श्रेय ग़ुलाम रसूल को दिया जाता है। एक मशहूर कहानी यह भी है कि धोबी जिस पत्थर पर कपड़े धोते थे, उसके आसपास खुदाई हुई तो नीचे पूरी मूर्ति निकल आई। लेकिन इसकी खोज से जुड़ी अलग-अलग कहानियाँ मिलती हैं। मूर्ति 5 फीट 2 इंच ऊँची है और चुनार के पत्थर से बनी है। सतह शीशे जैसी चमकती है। दाएँ हाथ में चौरी है, यानी मक्खी उड़ाने वाला पंखा, और बायाँ हाथ टूट चुका है। होंठों पर हल्की मुस्कान है।

इसे मौर्य काल की माना जाता है, हालांकि इसकी सही उम्र पर विद्वान आज भी बहस करते हैं। यह मूर्ति असल में यक्षी है या किसी दूसरी पहचान से जुड़ी है, इस पर भी मतभेद हैं। अब यह पटना के बिहार संग्रहालय की सबसे बड़ी पहचान में से एक है।

भाग 5: गुप्त काल, फिर उजड़ना

मौर्यों के बाद पाटलिपुत्र का दौर चलता रहा। गुप्त काल में यह फिर एक महत्वपूर्ण राजधानी बना। पाँचवीं सदी में चीनी यात्री फ़ा-हियान यहाँ आए और उन्होंने अशोक के महल की भव्यता का उल्लेख किया। उनके वर्णन में यह महल इतना शानदार दिखाई देता है कि लगता है, इसे इंसानों ने नहीं, देवताओं ने बनाया होगा। फ़ा-हियान के यात्रा-वृत्तांत में पाटलिपुत्र के dispensaries और hospitals का भी उल्लेख मिलता है।

कुम्हरार में गुप्त काल से जुड़ी कुछ संरचनाएँ भी मिली हैं, जिन्हें कुछ विद्वान आरोग्य विहार या monastery-cum-hospital से जोड़ते हैं। गणित के इतिहास में भी इस शहर का नाम है। आर्यभट ने 499 ईस्वी में, लगभग 23 साल की उम्र में, आर्यभटीय लिखी। वे कुसुमपुर में रहे, जिसे पाटलिपुत्र से जोड़ा जाता है। लेकिन यह पहचान ऐतिहासिक व्याख्या पर आधारित है, इसलिए इसे पूर्ण निश्चितता के साथ नहीं बोलना चाहिए। फिर बुरे दिन आए। 637 ईस्वी में चीनी यात्री ह्वेनसांग यहाँ आए तो उन्हें शहर के कई हिस्से उजड़े और खंडहर अवस्था में दिखाई दिए।
ठीक-ठीक वजह कोई नहीं जानता।

आग, बाढ़ और आपसी लड़ाइयों-तीनों को शहर के पतन की संभावित वजह माना जाता है। और यह बात बुद्ध से जुड़ी उस पुरानी भविष्यवाणी जैसी लगती है, जिसमें आग, पानी और आपसी फूट का खतरा बताया गया था।

भाग 6: शेरशाह और पटना

शहर सदियों तक कमजोर और बिखरी हुई अवस्था में रहा। फिर 16वीं सदी में एक शख़्स आया-फ़रीद, जिसे हम शेरशाह सूरी के नाम से जानते हैं। बिहार में उसकी ताक़त बढ़ी। शादी के रास्ते उसे चुनार का मज़बूत किला मिला। 1534 में सूरजगढ़ की लड़ाई में उसने बंगाल के सुल्तान महमूद शाह की भेजी हुई संयुक्त फ़ौज को हराया। उस फ़ौज के सेनापति इब्राहिम खान मारे गए। इस जीत ने शेरशाह को बिहार का सबसे ताक़तवर शासक बना दिया।

करीब 1541 में शेरशाह ने गंगा किनारे इस जगह की अहमियत समझी। यहाँ किला बनवाया और शहर को फिर बसाया। आधुनिक पटना के पुनरुत्थान की नींव इसी दौर से जोड़ी जाती है। शेरशाह की बनवाई मस्जिद भी यहाँ मौजूद है।

भाग 7: अज़ीमाबाद और 16 दिन के सिक्के

मुग़ल दौर में यह शहर फिर चमका। बादशाह औरंगज़ेब के पोते, शहज़ादा अज़ीम-उश-शान, 1703 में पटना आए और यहीं से बिहार का प्रशासन चलाने लगे। उन्हीं के नाम पर शहर को अज़ीमाबाद भी कहा गया। इसी व्यापक दौर में अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी ने पटना में अपनी फ़ैक्ट्री भी स्थापित की थी। यह शहर सिख इतिहास में भी ख़ास है। यहीं गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ। उनका जन्म 22 दिसंबर 1666 को पटना में हुआ था। उनकी याद में बना तख़्त श्री पटना साहिब आज सिखों के पाँच तख़्तों में से एक है।

अब आती है वो कहानी, जिसका वादा हमने शुरू में किया था। 1712 में अज़ीम-उश-शान और उनके भाइयों में गद्दी की जंग छिड़ी। मार्च 1712 के बीच में रावी नदी के पास हुई लड़ाई में अज़ीम-उश-शान मारे गए। कहा जाता है कि उनका हाथी रावी नदी के दलदल में फँस गया। उस वक़्त उनके बेटे फर्रुखसियर पटना के पास थे और उन तक यह ख़बर तुरंत नहीं पहुँची थी। इसलिए उन्होंने 21 मार्च को अपने पिता को बादशाह घोषित कर दिया और उनके नाम के सिक्के जारी करवा दिए। असली ख़बर आने पर यह सब रुक गया। इसलिए ये सिक्के बहुत कम वक़्त के लिए, करीब 16 दिन, चले और आज बेहद दुर्लभ माने जाते हैं।

भाग 8: अंग्रेज़ों का दौर और गोलघर

1770 में बंगाल और बिहार में भयानक अकाल पड़ा। इसके बाद अंग्रेज़ों ने पटना में अनाज रखने के लिए एक विशाल गोदाम बनवाया। नाम था-गोलघर। यह 1786 में बनकर तैयार हुआ। इसकी ऊँचाई 29 मीटर है और ऊपर चढ़ने के लिए 145 सीढ़ियाँ हैं। कहा जाता है कि इसके दरवाज़े अंदर की तरफ़ खुलते थे, इसलिए इसे भरना और अनाज निकालना मुश्किल हो जाता था। गोलघर आज पटना की सबसे पहचान वाली इमारतों में से एक है।

कहानी का सार यही है कि पटना कोई एक दौर का शहर नहीं है। यह अजातशत्रु की सैन्य चौकी से शुरू हुआ। मौर्यों का महानगर बना। गुप्तों के दौर में महत्वपूर्ण केंद्र रहा। शेरशाह के हाथों फिर बसा। और मुग़लों के दौर में अज़ीमाबाद के नाम से पहचाना गया। जिस मिट्टी और गाद ने इसे ढका, उसी ने इसकी लकड़ी की दीवारों और मूर्तियों के कुछ हिस्सों को बचाकर रखा। तो अगली बार आप पटना की किसी सड़क से गुज़रें, तो ज़रा रुककर सोचिएगा। आपके पैरों के नीचे ढाई हज़ार साल का इतिहास छिपा है। यह सिर्फ़ एक आधुनिक शहर नहीं। यह कई राजधानियों, साम्राज्यों, यात्रियों, विद्वानों और आम लोगों की परतों से बना हुआ शहर है।

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