The issue of children’s online safety: ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कई social-media platforms पर account रखने पर रोक लगा दी।… पर तीन महीने बाद भी 81.5 फ़ीसदी under-16 बच्चे social media इस्तेमाल कर रहे थे।… तो क्या सिर्फ़ उम्र की पाबंदी से बच्चे सुरक्षित हो जाते हैं?…आज हम इसी मुद्दे पर बात करेंगे।
सच तो ये है की… बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सिर्फ़ उम्र की पाबंदी या बुरा content हटाने से नहीं होगी।… असली असर इस बात से भी पड़ता है कि app और games बनाए कैसे गए हैं।… मसलन इन्हें कई बार ऐसे design किया जाता है कि बच्चा उनसे जुड़ा रहे, बार-बार वापस आए और ज्यादा से ज्यादा समय platform पर बिताए।
वहीं…सवाल यह नहीं है कि बच्चे online कैसे आते हैं।… बल्कि सवाल यह है कि online आने के बाद उनके साथ होता क्या है।… उन्हें कौन-सा content दिखाया जाता है, किससे बात करने का मौका मिलता है और platform उन्हें कितनी देर तक रोके रखता है-ये सब बातें उसकी safety को प्रभावित किसी-न-किसी रूप में करती हैं।
The issue of children’s online safety
बता दें की 2024 में NCRB के मुताबिक़, बच्चों के खिलाफ़ 1,238 cyber crime cases दर्ज किए गए। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर घटना report नहीं होती। इसलिए दर्ज मामलों की संख्या online harm की पूरी तस्वीर नहीं बताती।
अब समझिए कि बच्चे का online अनुभव कई बार बच्चे के अपने फैसले से कम… और platform के design से ज्यादा तय होता है।… मान लीजिए कोई 13 साल का बच्चा है… उसके लिए नई दुनिया किसी सपने से कम नहीं… ऐसे में… ऐप का Autoplay बिना रुके उसे अगला video दिखाता रहता है।… Notifications बार-बार उसे वापस बुलाती हैं।… तो वहीं strangers से message या contact जैसी सुविधाएँ कई platforms पर पहले से available रहती हैं।
साफ कर दें की… सबसे अहम फैसले platform बनाने के शुरुआती stage में ही approved हो जाते हैं। जिसमें इंजीनियर, designers और product managers तय करते हैं कि notification कब आएगी, content कैसे recommend होगा, privacy setting default में कैसी होगी और user को platform छोड़ना कितना आसान या मुश्किल होगा।… इसलिए online risk किसी एक post से नहीं, पूरे platform की बनावट से भी तय होता है। ऐसे में अगर design का लक्ष्य सिर्फ़ ज्यादा time-on-screen और engagement है, तो बच्चे की safety पीछे छूट सकती है।
क़ानून भी इस समस्या को पहचानता है।… Digital Personal Data Protection Act में बच्चों के personal data की processing, tracking, behavioural monitoring और targeted advertising पर restrictions का प्रावधान है।
लेकिन इन प्रावधानों का लागू होना rules और government notification पर निर्भर करता है।… बच्चों से जुड़े कई operational provisions के लिए rules बनने और transition period पूरा होने की जरूरत है।… इसलिए यह मत समझिए कि कानून में प्रावधान लिखा है तो वह हर हिस्सा उसी दिन से पूरी तरह लागू हो गया।… इस framework के बच्चों से जुड़े प्रावधानों के पूरी तरह लागू होने की timing को लेकर… government notification जरूर देखना चाहिए।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़, बच्चों के personal data से जुड़े महत्वपूर्ण provisions 18 महीने की phased transition अवधि के अंतिम चरण से जुड़े हैं, जिसकी timing 13 मई 2027 के आसपास पड़ती है।
वहीं ऑस्ट्रेलिया में भी यही सवाल तब उठा… जब…16 साल से कम उम्र के बच्चों पर social-media restriction लागू होने के बाद regulator की review में सामने आया कि कई platforms ने बड़ी संख्या में users की age verify ही नहीं की।
Reports के मुताबिक़, social-media accounts रखने वाले बच्चों का अनुपात 52.4 प्रतिशत से घटकर 42.1 प्रतिशत हुआ, लेकिन platforms इस्तेमाल करने वाले बच्चों का अनुपात 85.9 प्रतिशत से घटकर करीब 81.5 प्रतिशत ही हुआ। यानी नियम लागू होने के बाद भी बहुत से बच्चे platforms तक पहुँच रहे थे। इससे पता चलता है कि सिर्फ़ law बना देना काफी नहीं है। Age verification, enforcement और platform accountability भी उतने ही जरूरी हैं।
जबकि भारत में जुलाई 2026 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्चों को gaming platform Roblox से दूर रखने की मांग वाली याचिका पर notice जारी किया था। लेकिन अदालत ने उस समय कोई रोक नहीं लगाई थी। इसलिए इस मामले को “Roblox पर ban” कहकर नहीं बोलना चाहिए। अदालत का notice और final order दो अलग चीज़ें होती हैं।
तो याद रखिए, बच्चे का phone छीन लेना या उम्र की दीवार खड़ी कर देना आज के समय में काफ़ी नहीं है।… जब तक apps और games बच्चों की safety को ध्यान में रखकर design नहीं होंगे, खतरा बना रहेगा।… Parents को भी बच्चे से सिर्फ़ यह नहीं पूछना चाहिए कि… वह phone कितनी देर चलाता है। यह भी पूछना चाहिए कि वह क्या देख रहा है, किससे बात कर रहा है, कौन-से permissions दे रहा है और सबसे जरूरी सवाल की… कोई उसे परेशान तो नहीं कर रहा।…
साथ ही बच्चे की privacy और safety के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।… हर चीज़ पर जासूसी करना समाधान नहीं है, लेकिन पूरी तरह अनजान रहना भी सुरक्षित नहीं है। Platforms की जिम्मेदारी है कि बच्चों को harmful content, unwanted contact, addictive design और targeted manipulation से बचाने के लिए मजबूत व्यवस्था बनाएं।
तो वहीं सरकार की जिम्मेदारी है कि नियम साफ़ हों और उनका पालन जमीनी स्तर पर हो न की सिर्फ कागजों पर। और परिवार की जिम्मेदारी है कि बच्चा डरकर बात छिपाने के बजाय खुलकर मदद मांग सके।
अब आपसे सवाल…आपके घर में आपके बच्चे कितनी देर phone चलाते हैं?… क्या आप उनके online experience पर उनसे बात करते हैं? Comment में बताइए।
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