pain or content 1

सड़क पर कोई हादसा हुआ है, कोई तड़प रहा है।… और भीड़ में कुछ लोग मदद करने के बजाय फ़ोन निकालकर video बनाने लगते हैं।…
क्या हम किसी के आँसू देखने की ताक़त खो चुके हैं?… आज का हमारा विषय इसी पर आधारित होगा…

हमें अपने आँसुओं का तो पता रहता है, लेकिन दूसरों की भीगी पलकें कई बार अनदेखी रह जाती हैं।… जिस बात से हमारा नुकसान हुआ, उसे हम बहुत गंभीरता से लेते हैं। … लेकिन किसी और का दुख कई बार हमारे पास से गुज़र जाने वाली चीज़ बन जाता है।…

किसी की परेशानी कुछ सेकंड के लिए दिखाई देती है।… फिर screen पर अगली post आती है, और हम आगे बढ़ जाते हैं।… किसी की आँखों से बहते आँसू भी कई बार इंसानी पीड़ा नहीं, सिर्फ़ एक image, एक clip या एक viral content बनकर रह जाते हैं।… सवाल यही है कि क्या हम दुख को समझने से… पहले उसे record करने लगे हैं?

इस सवाल को समझने के लिए दो बड़े विचारकों की बातें मदद कर सकती हैं।… जर्मन दार्शनिक इमैनुएल कांट के नैतिक दर्शन में… हर इंसान को अपने-आप में एक उद्देश्य माना गया है।… यानी किसी व्यक्ति को सिर्फ़ अपने फायदे, मनोरंजन या किसी दूसरे मकसद का साधन नहीं समझना चाहिए।… जब हम किसी के आँसुओं को सिर्फ़ देखने, share करने या content बनाने की चीज़ बना देते हैं, तो हम उसकी इंसानियत और उसकी पीड़ा को पीछे धकेल देते हैं।

वहीं शोपेन-हावर के नैतिक दर्शन में करुणा को बहुत महत्वपूर्ण स्थान मिलता है।… उनके लिए नैतिकता सिर्फ़ नियम याद कर लेने का नाम नहीं है। नैतिकता तब शुरू होती है जब हमें दूसरे व्यक्ति का दुख दिखाई देता है और हम उसके प्रति संवेदनशील होकर व्यवहार करते हैं। यानी किसी को रोते देखकर हमें यह महसूस होना चाहिए कि सामने वाला भी हमारी तरह दर्द, डर और उम्मीद रखने वाला इंसान है।…

हालांकि आज का समाज एक अजीब उलझन में जी रहा है।… हम पहले से कहीं ज्यादा जुड़े हुए हैं, लेकिन कई बार एक-दूसरे के दुख से उतने ही कटे हुए हैं। किसी सड़क हादसे के आसपास भीड़ जमा हो जाती है। लेकिन भीड़ में मौजूद हर व्यक्ति मदद नहीं करता।…वहीं सामाजिक मनोविज्ञान में इसे बाई-स्टैंडर इफ़ेक्ट कहा जाता है। जहां कई लोगों के मौजूद होने पर हर व्यक्ति यह सोच सकता है कि कोई दूसरा मदद कर देगा।

ऐसे में कभी लोग यह भी समझ नहीं पाते कि स्थिति कितनी गंभीर है, या उन्हें डर रहता है कि कहीं बीच में पड़कर वे खुद मुसीबत में न फँस जाएँ।…
इसलिए बाई-स्टैंडर इफ़ेक्ट का मतलब केवल यह नहीं है कि लोग संवेदनहीन हैं।… लेकिन यह जरूर दिखाता है कि भीड़ में व्यक्तिगत जिम्मेदारी कमजोर पड़ सकती है। और जब मदद करने की जगह camera उठ जाता है, तो किसी का दर्द तमाशा और content बन जाता है।

साफ़ कर दें कि बात सिर्फ़ सड़क के हादसों या निजी दुख तक सीमित नहीं है।… युद्ध के मैदानों में भी सबसे भारी कीमत आम नागरिक, महिलाएँ और बच्चे चुकाते हैं।

UNICEF के अनुसार, दुनिया के conflict-affected इलाकों में लाखों बच्चे गहरे मानसिक सदमे से गुज़र रहे हैं।

और कई बार आँसू व्यवस्था की नाइंसाफ़ी का नतीजा होते हैं। जब किसान की फ़सल बर्बाद होने पर वह रोता है, या कोई कमज़ोर तबका अपने बुनियादी हक़ के लिए तरसता है, तब उन आँसुओं को “दूसरों की समस्या” कहकर छोड़ देना ग़लत है।… क्योंकि ऐसा होने पर अनजाने में ही सही पर उस दमनकारी व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है।

अब समझते हैं इंसानी दिमाग़ के बारे में…। बता दें की दिमाग़ में “मिरर न्यूरॉन” नाम की कोशिकाएँ होती हैं, जो हमें दूसरे के दर्द को ऐसे महसूस कराने में मदद करती हैं जैसे वह हमारा अपना हो।… यानी इंसान को एक-दूसरे की मदद और हमदर्दी के लिए ही बनाया गया है।…

तो याद रखिए, किसी के बहते आँसू देखकर मुँह मोड़ लेना इंसानियत की हार है। हमारी कोशिश आँसू पोंछने वाला हाथ बनने की होनी चाहिए, उन्हें तमाशे की तरह देखने वाली आँख बनने की नहीं।… और सही अर्थ में, इसी में मनुष्यता की सार्थकता है।…

ऐसे में अब अगली बार जब कोई मुसीबत में दिखे, तो आप पहले फ़ोन निकालेंगे या मदद के लिए हाथ?… कमेंट में बताइए। वहीं वीडियो से कुछ सीख मिली हो तो चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब जरूर करिए।… मिलते हैं अगले वीडियो में।

APNARAN MEDIUM

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By Admin

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