The Journey to Stature: कार के अंदर बैठते ही आदमी बाक़ी दुनिया से कट जाता है, और उसे पता भी नहीं चलता। आज हम एक ऐसे मुद्दे पर निकलने वाले हैं, जहां कार को सिर्फ़ गाड़ी के रूप में नहीं, बल्कि समाज को बाँटने वाली चीज़ के रूप में देखा गया है। कैसे… इस वीडियो में जानिए…
The Journey to Stature
लोग मानते हैं कि मोबाइल ने भारतीय जीवन को बहुत बदला है।…लेकिन इससे भी पहले कार के आने ने… समाज को गहराई से बदल दिया था।…कार आते ही समाज जैसे दो हिस्सों में बँट गया-कार वाले और बिना कार वाले।… कार में बैठकर आदमी उस दुनिया से अलग हो जाता है, जहाँ लोग सड़क पर चलते हैं, अपना सामान ख़ुद ढोते हैं और दूर जाने के लिए बस या ट्रेन का सहारा लेते हैं।
कार मनोवैज्ञानिक रूप से एक सुरक्षित पनाहगाह जैसी लगने लगती है।… जैसे बाहर की दुनिया से बचने का कोई कवच हो।… जहां पहले लोग मुश्किल समय में रिश्तेदारों और समुदाय का सहारा ढूँढते थे। अब कई बार कार,… ज़मीन या बैंक में रखे पैसे को ही सुरक्षा का आधार समझा जाता है।
अब समझिए कि कार आर्थिक बोझ कैसे बन सकती है।… कार होने से आदमी कई बार जरूरत से ज्यादा यात्रा करने लगता है।… कार पास हो तो बिना वजह भी कहीं जाने का मन हो जाता है। और एक बार कार की आदत लग जाए, तो बस या ट्रेन में सफ़र परेशानी लगने लगता है।… ऐसे में कार फिर केवल आने-जाने का साधन नहीं रहती।… उसके साथ fuel, maintenance, insurance, parking, repairs और loan की EMI भी जुड़ जाती है।
यानी जो चीज़ बाहर से सुविधा और शान दिखाई देती है, वह घर के बजट पर लगातार बोझ भी डाल सकती है।… इसीलिए आज इस वीडियो में कार की तुलना एक ऐसे नशे से की गई है, जिसे अपनाने के बाद छोड़ना मुश्किल लग सकता है।… मिसाल के तौर पर, तनख़्वाह देर से मिलने पर आदमी उधार लेता है। और जब बकाया पैसा मिलता है, तो पता चलता है कि उसका बड़ा हिस्सा कार के fuel, maintenance और घूमने-फिरने में खर्च हो चुका है।
और यहीं रुतबे का भ्रम जन्म लेता है… और कार को लेकर सबसे तीखा सवाल भी यहीं से उठता है।… क्या कार सचमुच हमारी योग्यता और सम्मान बढ़ाती है? या वह हमें श्रेष्ठ होने का सिर्फ़ एक बाहरी एहसास देती है?… कई बार परिवार महँगी कार को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ने लगते हैं।…
किसी व्यक्ति की क्षमता या गुणों से ज्यादा उसकी कार देखकर उसके सम्मान का अंदाज़ा लगाया जाता है।… यह सोच उस समय मजाकिया लगती है, जब महँगी कार किसी ऐसे व्यक्ति की कमियों को छिपाने का साधन बन जाती है जिसने अपनी उपलब्धियों से कोई खास पहचान नहीं बनाई।
साथ में यह भी दिखाई देता है कि कार रखने वाले लोग कई बार अपने सामाजिक दायरे को उसी तरह के लोगों तक सीमित कर लेते हैं।… जबकि बिना कार वाले लोग उनकी नज़र में कमतर समझे जाने महसूस होते हैं। और कभी-कभी तो कार की कीमत इंसान से ज्यादा महत्वपूर्ण बना दी जाती है। किसी गरीब या कमज़ोर व्यक्ति से सिर्फ़ इसलिए बदसलूकी करना कि उसकी वजह से कार पर खरोंच आ गई-यह उसी मानसिकता का उदाहरण है।
हालांकि कार का सबसे बड़ा नुक़सान केवल आर्थिक नहीं है। कार से सफ़र करने पर हम समाज के बाकी लोगों के साथ सफ़र करने का मौक़ा खो देते हैं।
बस या ट्रेन में हमें अलग-अलग तरह के लोगों से मिलने का अवसर मिलता है।… हम उनकी परेशानियाँ, उनका संघर्ष, उनकी भाषा और उनकी सोच देख पाते हैं। कार के भीतर बैठे रहने पर यह अनुभव हमसे दूर हो जाता है।…
हम सड़क और शहर को देखते तो हैं, लेकिन उसमें रहने वाले लोगों से हमारा जुड़ाव कम हो जाता है।…यही दूरी लोकतंत्र की मूल भावना को भी कमजोर कर सकती है।… लोकतंत्र केवल वोट देने का नाम नहीं है। यह दूसरे लोगों की जिंदगी, मुश्किलों और जरूरतों को समझने की क्षमता का नाम भी है।…
इसीलिए अगर कोई व्यक्ति कार खरीद सकता है, फिर भी उसे नहीं रखता, तो इसे जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता के रूप में देखा जा सकता है।… साइकिल को भी इसी वजह से महत्व दिया गया है। साइकिल हमारी शारीरिक ऊर्जा को यात्रा और आत्मनिर्भरता में बदल देती है। वह हमें सड़क, मौसम, दूरी और आसपास के लोगों के ज्यादा करीब रखती है।
अब सवाल है कि रास्ता क्या है?… अगर, आने-जाने को सबके लिए आसान बनाना है, तो सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा।… बसें समय पर चलें।… वे सुरक्षित, साफ़ और पर्याप्त संख्या में हों।…
रेल और metro तक पहुँच आसान हो।… फुटपाथ, cycle tracks और पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित रास्ते बनाए जाएँ।… लेकिन सार्वजनिक परिवहन की मौजूदा हालत भी किसी से छिपी नहीं है।
जब बसें कम हों, भीड़ ज्यादा हो, समय तय न हो और सुरक्षा का भरोसा न मिले, तब लोग मजबूरी में निजी वाहन चुनते हैं।… इसलिए सिर्फ़ लोगों से कार छोड़ने की अपील करना काफी नहीं है। उन्हें भरोसेमंद और सम्मानजनक public transport का विकल्प भी देना होगा।… कार रखना गलत नहीं है।
बीमार व्यक्ति, बुज़ुर्ग, छोटे बच्चों वाले परिवार, दूर-दराज़ रहने वाले लोग या अपने काम के लिए vehicle पर निर्भर लोग कार की जरूरत महसूस कर सकते हैं। पर यहां सवाल कार होने या न होने का नहीं है।… सवाल यह है कि क्या कार हमारी सुविधा, या हमारी पूरी पहचान और सामाजिक हैसियत का प्रतीक बन गई है?
तो याद रखिए, यह वीडियो किसी को बुरा कहने के लिए नहीं है।… यह हमसे सिर्फ़ एक सवाल पूछता है।…की, क्या हम गाड़ी के सहारे अपनी हैसियत नाप रहे हैं? और क्या उसकी कीमत अपने समाज से जुड़ाव कम होने के रूप में चुका रहे हैं?…
कार जरूरत हो सकती है। सुविधा हो सकती है। लेकिन उसे इंसान की योग्यता, सम्मान या श्रेष्ठता का पैमाना बना देना अलग बात है।… आपको क्या लगता है, कार जरूरत है या रुतबे की निशानी? कमेंट में बताइए।
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