डिग्री हाथ में है, नंबर भी अच्छे हैं… फिर भी इंटरव्यू में सामने वाला पूछ लेता है, “काम करके देखा है कभी?”…और आप चुप हो जाते हैं।… ऐसा क्यों होता है?…आज इसी की बात करते हैं।…
बता दें कि आज के ज़माने में कंपनियाँ सिर्फ़ यह नहीं देखतीं कि आपने कितना पढ़ा है। वे यह भी देखना चाहती हैं कि आप अपने ज्ञान को असली काम में इस्तेमाल कर सकते हैं या नहीं और दफ़्तर के माहौल में काम करना जानते हैं या नहीं। साफ़ कर दें कि क्लास में पढ़ाई ज़रूरी है, लेकिन अकेली पढ़ाई कई नौकरियों के लिए काफ़ी नहीं हो सकती।…
डिग्री और अच्छे नंबर कई नौकरियों में आपकी शुरुआती eligibility या shortlist में मदद कर सकते हैं, लेकिन इंटरव्यू में employer यह भी देखता है कि आप problem को समझकर उसका हल निकाल सकते हैं या नहीं।…साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए की नौकरी में सिर्फ़ किताब में दिए सवाल और उसके जवाब ही काम नहीं आते।
बल्कि नई परिस्थितियाँ, अलग-अलग समस्याएँ और बदलती priorities के साथ खुद को ढालना भी जरूरी होता है। तो वहीं… कई jobs में तो उपलब्ध जानकारी के आधार पर फैसला लेना पड़ता है, जबकि हर बार पूरी जानकारी मौजूद नहीं होती।… इसीलिए employers analytical thinking, problem-solving, communication, teamwork और बदलती परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढालने की क्षमता को भी महत्व देते हैं।
बता दें की World Economic Forum की 2025 report में analytical thinking को employers की सबसे महत्वपूर्ण core skill बताया गया है, जबकि NACE की recent research में communication, teamwork, professionalism और critical thinking को नए graduates के लिए अहम career-readiness skills माना गया है।…
अब आपको बताते हैं कि यह “व्यावहारिक शिक्षा” आख़िर है क्या।… सीधी बात, इसमें आप जो पढ़ते हैं उसे असली काम में आज़माकर देखते हैं।…
जैसे:
- इंटर्नशिप: किसी कंपनी या संस्था में कुछ समय काम करके सीखना।
- असली प्रोजेक्ट: कागज़ पर नहीं, सच में किसी काम या समस्या पर हाथ लगाना।
- कंपनी का दौरा: देखना कि factory या office में काम असल में कैसे चलता है।
- Simulation या role-play: ऐसा अभ्यास-माहौल जहाँ काम वैसे ही किया जाता है जैसे असली नौकरी में, लेकिन गलती हो जाए तो वास्तविक नुकसान नहीं होता।
- Case study: किसी असली company या संस्था की कहानी पढ़ना कि उसने क्या फैसला लिया और उसका क्या नतीजा निकला।
- Volunteer या freelance work: किसी छोटे काम की जिम्मेदारी लेकर client, team या community के साथ काम करना।
हालांकि बहुत से लोग सोचते हैं कि यह सब बस दिखावा है, लेकिन इसके फ़ायदे साफ़ हैं।… जब आप असली हालात में काम करते हैं, तो आपको analytical thinking, problem-solving और decision-making जैसी skills को practice करने का मौका मिलता है।… इसके साथ communication और teamwork भी बेहतर हो सकते हैं।… क्योंकि असली project में आपको सिर्फ़ अपना काम नहीं करना होता। यहां आपको दूसरों को समझाना, feedback लेना, deadline निभाना और कभी-कभी अपनी गलती सुधारना भी पड़ता है।
और सबसे बड़ी बात, आपको workplace की वास्तविक expectations, teamwork, deadlines और professional responsibilities को करीब से समझने का मौका मिलता है।… यही वो चीज़ें हैं जिन्हें नौकरी देने वाले अक्सर महत्व देते हैं। लेकिन साफ़ कर दें- practical experience degree और academic knowledge का replacement नहीं है। सबसे मजबूत उम्मीदवार वही होता है जो विषय को समझता भी है और उसे काम में इस्तेमाल करना भी जानता है।
तो अगर आप विद्यार्थी हैं, तो पढ़ाई के साथ-साथ कोई अच्छी internship ढूँढिए।… लेकिन केवल certificate के लिए internship मत कीजिए।… यह देखिए कि वहाँ आपको कोई वास्तविक काम, mentor, feedback और सीखने का मौका मिलेगा या नहीं।… साथ ही किसी असली project में हाथ लगाइए।… अपने college से पूछिए कि companies के दौरे, industry workshops या उनके साथ मिलकर काम करने का कोई मौका है या नहीं।
अगर internship न मिले, तो अपने विषय से जुड़ा छोटा project खुद बनाइए।… उसे portfolio में रखिए और interview में बताइए कि आपने क्या समस्या हल की, कौन-से tools इस्तेमाल किए और नतीजा क्या रहा। और अगर आप माता-पिता हैं, तो बच्चे से सिर्फ़ यह मत पूछिए कि “कितने नंबर आए?”… यह भी पूछिए कि “कुछ करके सीखा क्या?”… उसे सिर्फ़ marks के लिए नहीं, सीखने, सवाल पूछने और जिम्मेदारी लेने के लिए भी प्रोत्साहित कीजिए।
अंत में एक सलाह याद रखिए,… degree और अच्छे नंबर आपको interview तक पहुँचाने में मदद कर सकते हैं।… लेकिन interview में आपकी समझ, आपकी communication skill और अपने किए हुए काम के उदाहरण… आपको बाकी candidates के बीच अलग दिखाने मुख्य भूमिका निभा सकते हैं।
इसलिए किताबी ज्ञान को कम मत समझिए। उसे practical experience के साथ जोड़िए। क्योंकि नौकरी के लिए सबसे मजबूत तैयारी यही है-जो पढ़ा है, उसे काम में करके दिखा पाना। आपको क्या लगता है, पढ़ाई ज़्यादा ज़रूरी है या अनुभव?…कमेंट में ज़रूर बताइए।
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