धान भारत की प्रमुख फसलों में से एक है, लेकिन इसकी खेती के दौरान कई तरह की बीमारियां और समस्याएं आती हैं। उन्हीं में से एक है पीलिया रोग, जिसमें धान की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और पौधे का विकास रुक जाता है। अगर समय रहते इसका इलाज न किया जाए तो पैदावार पर गंभीर असर पड़ सकता है।
पीलिया रोग क्या है?
- धान में पीलिया रोग मुख्य रूप से पोषण की कमी, कीट या रोगजनक फंगस/वायरस के कारण होता है।
- इसमें पौधे की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, जड़ें कमजोर हो जाती हैं और पौधे की वृद्धि रुक जाती है।
धान में पीलिया रोग के मुख्य कारण
- नाइट्रोजन की कमी – नाइट्रोजन पौधे के लिए सबसे जरूरी तत्व है, इसकी कमी से पत्तियों में हरापन खत्म हो जाता है।
- जिंक (जस्ता) की कमी – जिंक की कमी से नई पत्तियां छोटी और पीली हो जाती हैं।
- पानी का जमाव या निकासी की समस्या – खेत में लंबे समय तक पानी भरने से जड़ों में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।
- कीट या फफूंद का हमला – लीफ ब्लाइट, लीफ फोल्डर जैसे कीट या रोग पत्तियों का रंग बदल देते हैं।
- मिट्टी का पीएच असंतुलन – बहुत अधिक अम्लीय या क्षारीय मिट्टी में पोषक तत्व उपलब्ध नहीं हो पाते।
पीलिया रोग के लक्षण
- पत्तियों का ऊपर से पीला और नीचे से हल्का हरा रंग होना।
- पौधों का धीमा विकास और पतली तने।
- नई पत्तियों का सिकुड़ना और झुलसना।
- जड़ों का काला और सड़ना।
धान में पीलिया रोग के उपचार के उपाय
1. पोषण की कमी दूर करें
- नाइट्रोजन की कमी: प्रति एकड़ 35-40 किलो यूरिया का छिड़काव करें।
- जिंक की कमी: 5 किलो जिंक सल्फेट को 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़कें।
2. खेत की जल निकासी सुधारें
- खेत में अतिरिक्त पानी जमा न होने दें, समय-समय पर निकासी करें।
3. कीट व रोग नियंत्रण
- लीफ ब्लाइट या लीफ फोल्डर के लिए कार्बेंडाजिम + मैन्कोजेब (2.5 ग्राम/लीटर पानी) का छिड़काव करें।
- कीटों के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL (1 मि.ली./3 लीटर पानी) का प्रयोग करें।
4. मिट्टी की जांच
- फसल लगाने से पहले मिट्टी की जांच कराएं और उसके अनुसार उर्वरक डालें।
धान में पीलिया रोग से बचाव के उपाय
- प्रमाणित और रोग-मुक्त बीज का प्रयोग करें।
- फसल चक्र अपनाएं, लगातार एक ही खेत में धान न लगाएं।
- संतुलित उर्वरक प्रबंधन करें।
- समय पर कीट और रोग का निरीक्षण करते रहें।
निष्कर्ष
धान में पीलिया रोग से फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं। समय पर पहचान, सही उपचार और रोकथाम अपनाने से किसान इस समस्या से बच सकते हैं और अच्छी पैदावार ले सकते हैं।
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