धान की खेती को परंपरागत रूप से अधिक पानी की फसल माना जाता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, जलस्तर गिरावट और पानी की कमी के कारण अब किसानों को कम पानी में भी अधिक पैदावार लेने की आवश्यकता है। उन्नत सिंचाई तकनीक अपनाकर न केवल पानी की बचत की जा सकती है, बल्कि उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार लाया जा सकता है।
धान में पानी की खपत और चुनौतियां
पारंपरिक विधि में धान की फसल को लगातार पानी में डूबाकर रखा जाता है, जिससे अत्यधिक जल उपयोग होता है। लेकिन यह तरीका भूजल स्तर को तेजी से गिराता है और लागत भी बढ़ाता है। इसके अलावा, अधिक पानी के कारण जड़ सड़न और कीट-रोग का खतरा बढ़ जाता है।
कम पानी में धान की खेती के आधुनिक तरीके
1. AWD (Alternate Wetting and Drying) तकनीक
- इस पद्धति में खेत को लगातार पानी में डूबा कर नहीं रखा जाता, बल्कि कुछ दिनों के अंतराल पर पानी दिया जाता है।
- खेत में पानी का स्तर लगभग 15 सेमी तक भरने के बाद इसे सूखने दिया जाता है और फिर सिंचाई की जाती है।
- इससे 25-30% तक पानी की बचत होती है और पैदावार भी बनी रहती है।
2. SRI (System of Rice Intensification) विधि
- इस तकनीक में पौधों को अधिक दूरी पर लगाया जाता है, जिससे जड़ों को पर्याप्त हवा और पोषक तत्व मिलते हैं।
- कम पानी, कम बीज और कम खाद के बावजूद पैदावार अधिक मिलती है।
- SRI से 40-50% तक पानी की बचत संभव है।
3. ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई
- धान में ड्रिप सिस्टम का प्रयोग करके पौधों को सीधे जड़ों तक पानी दिया जाता है।
- इससे पानी की बर्बादी कम होती है और उर्वरक भी पानी के साथ दिया जा सकता है।
पानी बचाने के अतिरिक्त सुझाव
- समतल खेत तैयार करें – पानी का बहाव और जमाव कम करने के लिए लेजर लैंड लेवलिंग मशीन का प्रयोग करें।
- मल्चिंग का उपयोग करें – मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए धान के खेत में भूसा या पुआल बिछाएं।
- खरपतवार नियंत्रण – समय-समय पर खरपतवार हटाएं, क्योंकि ये नमी और पोषक तत्व चूसते हैं।
- समय पर बुवाई और रोपाई – मौसमी बारिश के अनुसार खेती की योजना बनाएं ताकि अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत कम हो।
कम पानी में धान की खेती के फायदे
- पानी की 30-50% तक बचत
- लागत में कमी (कम पंपिंग, कम बिजली, कम खाद)
- फसल की गुणवत्ता में सुधार
- कीट और रोग के खतरे में कमी
- पर्यावरण संरक्षण और भूजल स्तर में सुधार
निष्कर्ष
धान की खेती में पानी की बचत आज समय की जरूरत है। AWD, SRI, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीक अपनाकर किसान कम पानी में भी अधिक पैदावार ले सकते हैं। इससे न केवल उनकी आमदनी बढ़ेगी बल्कि जल संसाधनों का भी संरक्षण होगा।
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