तरबूज (Watermelon) एक गर्मी के मौसम की लोकप्रिय, मीठी और रसीली फल वाली फसल है। इसकी खेती भारत के अधिकांश भागों में फरवरी से जून के बीच की जाती है। यह न केवल ताजगी देने वाला फल है बल्कि किसान भाइयों के लिए अच्छी आमदनी का स्रोत भी है। सही तकनीक और जलवायु में इसकी खेती करके प्रति एकड़ 15 से 20 टन उपज प्राप्त की जा सकती है।
तरबूज की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी
- जलवायु: तरबूज की खेती के लिए गर्म और शुष्क मौसम सबसे उपयुक्त होता है। तापमान 25°C से 35°C के बीच हो तो उपज बेहतर होती है।
- भूमि: इसकी खेती के लिए रेतीली दोमट या हल्की दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। खेत में जल निकासी अच्छी होनी चाहिए। pH मान 6 से 7.5 के बीच सबसे उपयुक्त है।
प्रमुख किस्में (Varieties)
- सरपंच
- सुगंधा
- अर्जुन
- NS-295
- सांकरा F1 हाइब्रिड
इन किस्मों का चुनाव क्षेत्र की जलवायु और बाजार की माँग के अनुसार करें।
बुवाई का समय और विधि
बुवाई का समय:
- उत्तर भारत में: फरवरी से मार्च
- दक्षिण भारत में: दिसंबर से जनवरी
बुवाई विधि:
- बीजों को 60–90 सेमी की दूरी पर गड्डों में बोएं।
- प्रति हेक्टेयर 1.5–2.5 किलोग्राम बीज पर्याप्त होते हैं।
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन
- प्राकृतिक खाद: 15-20 टन गोबर की खाद खेत तैयार करते समय डालें।
- रासायनिक उर्वरक: प्रति हेक्टेयर N:P:K = 80:60:60 का प्रयोग करें।
- फूल और फल बनने की अवस्था में पोटाश की मात्रा बढ़ाने से फल का आकार और मिठास बढ़ती है।
सिंचाई प्रबंधन
बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करें।
गर्मियों में हर 7–10 दिन में सिंचाई करें।
फल बनने के समय अधिक पानी देने से फल फट सकते हैं, अतः नियंत्रित सिंचाई करें।
रोग एवं कीट नियंत्रण
- पाउडरी मिल्ड्यू, डाउनी मिल्ड्यू जैसे रोग आम हैं।
- कीट: रेड पंपकिन बीटल, एफिड्स
- जैविक समाधान: नीम आधारित कीटनाशक, ट्राइकोडर्मा
- रासायनिक समाधान: कृषि विशेषज्ञ की सलाह से दवा छिड़काव करें।
तोड़ाई और उपज
- बीज बोने के 70–90 दिनों बाद फल तैयार हो जाते हैं।
- फल की पकने की पहचान: डंठल के पास की बेल सूखने लगे, फल बजाने पर गूंज की आवाज़ आए।
- औसतन उत्पादन: 15–25 टन प्रति हेक्टेयर तक।
बाजार मूल्य और मुनाफा
- तरबूज की माँग गर्मियों में तेज़ रहती है।
- थोक बाजार और सीधे उपभोक्ताओं को बेचकर अच्छा लाभ कमाया जा सकता है।
- एक एकड़ से ₹40,000 से ₹70,000 तक का लाभ संभव है।
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