भारत जैसे कृषि प्रधान देश में खेती न केवल लाखों लोगों की आजीविका का साधन है, बल्कि देश की आर्थिक संरचना की रीढ़ भी है। बावजूद इसके, हाल के वर्षों में एक चिंताजनक रुझान देखने को मिला है—किसान खेती छोड़ रहे हैं। सरकारी रिपोर्टों में इस ट्रेंड को शहरीकरण और अन्य क्षेत्रों में बढ़ते अवसरों से जोड़ा गया है, लेकिन जमीन पर हालात कुछ और कहानी बयां करते हैं।
खेती का गिरता मुनाफा और बढ़ती लागत
देश की लगभग आधी आबादी खेती पर निर्भर है, लेकिन किसानों की आमदनी लगातार घट रही है। फसल की लागत—बीज, खाद, कीटनाशक, डीज़ल और ट्रैक्टर—हर साल बढ़ती जा रही है, जबकि बाजार में फसल के उचित दाम नहीं मिलते। Middlemen (बिचौलिए) किसानों का लाभ हड़प लेते हैं। नतीजा यह होता है कि कई किसान कर्ज में डूब जाते हैं और कई आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं।
सरकारी बजट और जमीनी हकीकत
हालांकि भारत सरकार ने 2025-26 के बजट में कृषि को “विकास का पहला इंजन” बताया है और कृषि मंत्रालय के लिए 1.37 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, लेकिन यह पिछले वर्ष के मुकाबले 2.75% कम है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सिर्फ घोषणाओं से हालात सुधरेंगे? खासतौर पर तब जब कृषि से जुड़ी समस्याओं की गहराई को रिपोर्टों में पर्याप्त जगह नहीं दी जाती।
सरकारी रिपोर्ट में किसानों की संख्या घटने का जिक्र
जनगणना आंकड़ों के अनुसार, 2001 से 2011 के बीच करीब 85 लाख किसानों ने खेती छोड़ दी। लेकिन सरकार इसे सामान्य प्रक्रिया बताती है—जैसे कि लोग विकास के साथ सर्विस और इंडस्ट्री सेक्टर की ओर बढ़ते हैं। असलियत यह है कि खेती छोड़ने की मजबूरी कहीं ज़्यादा गंभीर है और यह सीधे-सीधे Low Income, Unstable Yield, और Climate Change जैसी समस्याओं से जुड़ी है।
नौकरियों का संकट और खेती पर निर्भरता
सरकार की 2024-25 की Employment Report कहती है कि सर्विस और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियां घटी हैं, जबकि खेती में काम करने वाले लोगों का प्रतिशत 44.1% से बढ़कर 46.1% हो गया है। यानी, सरकार जो लक्ष्य लेकर चल रही थी—हर साल लाखों लोगों को खेती से बाहर लाकर अन्य क्षेत्रों में रोजगार देने का—वह पूरा नहीं हो पाया है।
अमेरिका में भी घटे किसान, पर वजह अलग
अमेरिका में भी किसानों की संख्या में कमी आई है, लेकिन वहां यह ट्रेंड Increased Productivity, Better Mechanization, और Diversified Jobs की वजह से आया है। भारत में न तो किसान की आय बढ़ रही है और न ही पर्याप्त विकल्प मौजूद हैं। ऐसे में खेती छोड़ना मजबूरी बन गया है, न कि कोई सुनियोजित ट्रांजिशन।
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