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भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां अधिकांश आबादी खेती पर निर्भर करती है। हाल के वर्षों में अनाज, फल-सब्जियों और अन्य खाद्य उत्पादों की पैदावार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, लेकिन इसके साथ ही फसल की बर्बादी भी एक बड़ी चिंता बन गई है। इस समस्या का समाधान “Food Processing” के माध्यम से संभव है। यह न सिर्फ अनाज की बर्बादी को रोकने में सहायक है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और देश की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में भी मददगार हो सकता है।

भारत में खाद्य अपव्यय की स्थिति

दुनियाभर में लगभग 30% खाद्य पदार्थ ऐसे हैं जो उपभोग से पहले ही बर्बाद हो जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, खेत से लेकर बाजार तक 13.2% खाना बर्बाद हो जाता है, वहीं दुकानों और घरों में करीब 17% भोजन फेंक दिया जाता है। विकसित देशों में यह बर्बादी उपभोग स्तर पर अधिक होती है जबकि विकासशील देशों में उत्पादन से वितरण के बीच अधिक नुकसान होता है।

भारत में इस विषय पर कोई बड़ा सरकारी सर्वेक्षण नहीं हुआ है, लेकिन कुछ संस्थानों द्वारा समय-समय पर आंशिक सर्वे किए गए हैं। 2012 और 2015 में ICAR-CIPHET ने और 2022 में NABCONS ने फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान पर रिसर्च की थी। इन अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि भंडारण, लॉजिस्टिक्स और प्रोसेसिंग की कमी के कारण भारी मात्रा में खाद्यान्न बर्बाद होता है।

पैदावार बढ़ी, लेकिन नुकसान भी बढ़ा

भारत में 1966-67 में जहां कुल अनाज उत्पादन 7.4 करोड़ टन था, वहीं 2022-23 में यह बढ़कर 33 करोड़ टन से अधिक हो गया है। हम विश्व के प्रमुख चावल निर्यातकों में से एक हैं। इसके साथ ही फल और सब्जियों की पैदावार में भी कई गुना बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इस विकास के साथ-साथ पोस्ट-हार्वेस्ट लॉसेज़ (कटाई के बाद नुकसान) भी लगातार बढ़े हैं। मशीनरी की कमी, खराब वेयरहाउसिंग और वितरण तंत्र की कमजोरियां इसके प्रमुख कारण हैं।

आर्थिक दृष्टि से भारी नुकसान

NABCONS के 2022 के सर्वे के अनुसार, 2020 से 2022 के बीच फसलों के नुकसान से भारत को प्रतिवर्ष 1.53 लाख करोड़ रुपये (लगभग 18.5 अरब डॉलर) का नुकसान हुआ। यह नुकसान केवल मात्रा (Quantity) में ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता (Quality) में भी हुआ है। फसलें खराब भंडारण, बारिश, नमी, कीट आदि के कारण अपनी गुणवत्ता खो देती हैं, जिससे उनका बाजार मूल्य घट जाता है।

क्वालिटी लॉस भी बड़ा मुद्दा

ICRIER की एक स्टडी में पंजाब, मध्य प्रदेश और बिहार में गेहूं, धान, मक्का और सोयाबीन की क्वालिटी और क्वांटिटी दोनों में होने वाले नुकसान का विश्लेषण किया गया। इस स्टडी के अनुसार:

🔹सोयाबीन में 15.34% तक नुकसान देखा गया

🔹गेहूं में 7.87%, जिसमें 2.27% गुणवत्ता हानि

🔹धान में 6.37%

🔹मक्का में 5.95% नुकसान

गेहूं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह नमी सोख लेता है, जिससे भंडारण के दौरान उसकी गुणवत्ता तेजी से गिरती है।

नुकसान के कारण: छोटे खेत और मशीनों की कमी

ICRIER ने धान की फसल पर आधारित एक अध्ययन में पाया कि खेत जितना बड़ा होगा, नुकसान उतना कम होगा। भारत में 86% किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम भूमि है, इसलिए छोटे किसानों को ज्यादा नुकसान झेलना पड़ता है। अध्ययन से यह भी स्पष्ट हुआ कि:

🔹कंबाइन हार्वेस्टर का उपयोग करने से नुकसान में कमी आती है।

🔹शिक्षा स्तर बढ़ने से किसान बेहतर निर्णय ले सकते हैं।

🔹मंडी से दूरी बढ़ने पर नुकसान भी बढ़ता है।

बिहार जैसे राज्यों में जहां छोटे खेतों की संख्या ज्यादा है, प्रति हेक्टेयर नुकसान भी ज्यादा है।

क्या Food Processing है समाधान?

फूड प्रोसेसिंग अर्थात खाद्य प्रसंस्करण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कच्चे खाद्य पदार्थों को संसाधित करके उन्हें अधिक समय तक सुरक्षित रखने योग्य, आकर्षक और बाज़ार में बिक्री योग्य बनाया जाता है। यह प्रणाली अनाज की बर्बादी को रोकने में अहम भूमिका निभा सकती है क्योंकि:

🔹फसल को तुरंत प्रोसेस कर दिया जाए तो उसे लंबे समय तक स्टोर करने की जरूरत नहीं होती है।

🔹प्रोसेस किए गए प्रोडक्ट्स जैसे आटा, ब्रेड, बिस्किट, स्नैक्स आदि की शेल्फ लाइफ काफी बढ़ जाती है।

🔹फूड प्रोसेसिंग से एक्सपोर्ट क्वालिटी उत्पाद बनाए जा सकते हैं, जिससे निर्यात बढ़ता है।

🔹उदाहरण के तौर पर, धान को केवल चावल तक सीमित न रखते हुए पोहा, मुरमुरा, राइस फ्लेक्स आदि बनाया जाए तो उसके विविध उपयोग बढ़ जाते हैं।

किसानों को कैसे होगा फायदा?

फूड प्रोसेसिंग से किसानों को कई स्तरों पर फायदा मिल सकता है:

1. बेहतर कीमत – अगर किसान सीधे प्रोसेसिंग यूनिट्स को अपनी फसल बेचें, तो उन्हें मंडी की तुलना में बेहतर रेट मिल सकता है।

2. बर्बादी में कमी – खेत से सीधे प्रोसेसिंग के लिए सप्लाई होने पर फसल जल्दी इस्तेमाल में आ जाती है और खराब होने की संभावना घटती है।

3. मांग में वृद्धि – प्रोसेस्ड उत्पादों की मांग शहरों, विदेशों और ऑनलाइन मार्केट्स में बहुत अधिक है।

4. उद्योग से जुड़ाव – किसान अगर प्रोसेसिंग यूनिट्स के साथ जुड़े रहें तो यह उनके लिए एक स्थायी आय का साधन बन सकता है।

भारत में फूड प्रोसेसिंग सेक्टर की वर्तमान स्थिति

भारत सरकार के खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय (Ministry of Food Processing Industries – MoFPI) द्वारा करवाए गए एक सर्वे के अनुसार:

🔹फल: सिर्फ 4.5% फल प्रोसेस किए जाते हैं

🔹सब्जियां: महज 2.7%

🔹दूध: 21.1% प्रोसेसिंग के साथ थोड़ा बेहतर स्थिति में

🔹मांस: 34.2% प्रोसेस होता है

🔹मछली: 15.4% तक प्रोसेसिंग हो पाती है

इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि भारत में फूड प्रोसेसिंग की संभावनाएं बहुत बड़ी हैं, लेकिन वर्तमान स्तर बेहद सीमित है।

फूड प्रोसेसिंग का आर्थिक महत्व

फूड प्रोसेसिंग न केवल खाद्य सुरक्षा और बर्बादी को नियंत्रित करता है, बल्कि यह एक विशाल उद्योग भी है। भारत का फूड मार्केट लगभग 380 अरब डॉलर का है, जिसमें 32% हिस्सा प्रोसेस्ड फूड का है। यह सेक्टर हर साल 8% की दर से बढ़ रहा है।

इसके अतिरिक्त:

🔹रोजगार सृजन – यह सेक्टर गांवों में रोजगार के नए अवसर खोल सकता है

🔹एक्सपोर्ट बढ़त – विश्व बाज़ार में भारतीय खाद्य उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है

🔹फसल की स्थिर मांग – कच्चे माल की प्रोसेसिंग से फसलों की लगातार जरूरत बनी रहती है। 

सरकार की पहलें और योजनाएं

सरकार ने फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं:

🔹PM Formalisation of Micro Food Processing Enterprises (PM-FME)

🔹Mega Food Parks Scheme

🔹Operation Greens (टोमेटो, ऑनियन और पोटैटो के लिए)

🔹Pradhan Mantri Kisan SAMPADA Yojana

इन योजनाओं का उद्देश्य किसानों, प्रोसेसर्स और स्टार्टअप्स को सपोर्ट करना है ताकि बर्बादी रोकी जा सके और मूल्य संवर्धन (Value Addition) किया जा सके।

चुनौतियां और आगे की राह

हालांकि फूड प्रोसेसिंग के फायदों की कोई कमी नहीं, लेकिन इसके विकास में कई बाधाएं भी हैं:

🔹ग्रामीण इलाकों में बिजली, पानी और सड़कों की कमी

🔹निवेश की कमी और छोटे किसानों की पूंजी सीमित

🔹जागरूकता और ट्रेनिंग की कमी

🔹टेक्नोलॉजी तक पहुंच का अभाव

🔹इन समस्याओं का समाधान करने के लिए सरकार, निजी क्षेत्र और किसान संगठनों को मिलकर कार्य करना होगा।

क्या फूड प्रोसेसिंग ही है बर्बादी रोकने का रास्ता?

इस प्रश्न का उत्तर है – हां। फूड प्रोसेसिंग न केवल फसल के नुकसान को कम करती है, बल्कि यह कृषि को उद्योग से जोड़ती है, जिससे किसानों की आमदनी में वृद्धि होती है। यह खाद्य सुरक्षा को सशक्त बनाती है, बेरोजगारी कम करती है और अर्थव्यवस्था को गति देती है। ऐसे में भारत जैसे कृषि आधारित देश के लिए फूड प्रोसेसिंग एक सुनहरा अवसर है। आवश्यकता है तो बस उचित निवेश, नीतिगत समर्थन, टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन और किसानों की भागीदारी की। यदि सही दिशा में कदम उठाए जाएं, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल खाद्यान्न उत्पादन में अग्रणी रहेगा, बल्कि फूड प्रोसेसिंग हब बनकर वैश्विक बाजार में अपनी सशक्त पहचान भी बनाएगा।

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