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खेती की दुनिया में एक नई क्रांति आने वाली है, जहां मिट्टी के बिना भी उन्नत फसलें उगाई जा सकेंगी। आईआईटी कानपुर के स्टार्टअप ‘एक्वा सिंथेसिस’ ने हाइड्रोपोनिक तकनीक के जरिए एक अनोखा सिस्टम विकसित किया है, जिससे केसर, स्ट्रॉबेरी और ब्लैकबेरी जैसी फसलें बिना मिट्टी के, केवल पोषक तत्वों से भरपूर पानी और अत्याधुनिक तकनीक की मदद से उगाई जा सकती हैं। इस तकनीक में डीप टेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और मशीन लर्निंग (ML) का उपयोग किया गया है, जिससे फसलों की निगरानी और नियंत्रण बेहद आसान हो गया है।

कैसे काम करती है यह तकनीक?

परंपरागत खेती में मिट्टी से पोषक तत्व पौधों तक पहुंचते हैं, लेकिन हाइड्रोपोनिक सिस्टम में पौधों की जड़ों तक आवश्यक पोषक तत्व सीधे पानी के माध्यम से पहुंचाए जाते हैं। इसमें कोकोपीट और अन्य विशेष लेयर का उपयोग किया जाता है, जिससे पौधों को उचित नमी और पोषण मिलता है। इस पूरी प्रणाली को स्मार्ट सेंसर और IoT की मदद से नियंत्रित किया जाता है, जो तापमान, नमी और प्रकाश का स्तर बनाए रखते हैं।

आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर ने दी जानकारी

आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर दीपू फिलिप के अनुसार, इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इससे पानी की 90% तक बचत होती है, साथ ही मिट्टी की भी आवश्यकता नहीं रहती। स्मार्ट सेंसर रियल-टाइम डेटा का विश्लेषण कर फसलों के विकास की निगरानी करते हैं, जिससे खेती अधिक प्रभावी और उत्पादक बन जाती है।

कम लागत में अधिक मुनाफा

इस तकनीक को विकसित करने वाले देव प्रताप ने बताया कि परंपरागत खेती में 1 स्क्वायर फीट भूमि पर लगभग 2500 रुपये तक की लागत आती थी, लेकिन इस हाइड्रोपोनिक प्रणाली के उपयोग से यह लागत घटकर मात्र 700-800 रुपये तक रह गई है। इससे किसानों को अधिक लाभ मिलेगा और खेती को आधुनिक और टिकाऊ बनाया जा सकेगा।

छोटे स्थानों पर भी संभव है खेती

इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे घर की छत, कमरे या किसी छोटी सी जगह में भी अपनाया जा सकता है। यानी अब शहरी क्षेत्रों में भी लोग केसर, स्ट्रॉबेरी और ब्लैकबेरी जैसी महंगी फसलें आसानी से उगा सकते हैं।

भविष्य की खेती: स्मार्ट और टिकाऊ

यह हाइड्रोपोनिक तकनीक न सिर्फ किसानों के लिए वरदान साबित होगी, बल्कि इससे शहरी खेती (Urban Farming) को भी बढ़ावा मिलेगा। यह तकनीक कम पानी, कम लागत और उच्च उत्पादन के साथ पर्यावरण के अनुकूल भी है। सरकार और किसानों के सहयोग से यह प्रणाली भविष्य में भारत की कृषि व्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है।

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