भारत समेत पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। अब भारत सरकार ने भी इस दिशा में बड़ा अपडेट देते हुए चेताया है कि आने वाले वर्षों में बारिश की मात्रा में बढ़ोतरी होने की संभावना है, जिससे खेती योग्य भूमि की मिट्टी की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। यह जानकारी केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संसद में दी।
ICAR की रिपोर्ट से सामने आए चिंताजनक आंकड़े
मंत्री ने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने मौसम, मिट्टी और फसलों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए सिमुलेशन मॉडलिंग स्टडी की है। रिपोर्ट के अनुसार, खरीफ सीजन में 2050 तक बारिश में 4.9% से 10.1% और 2080 तक 5.5% से 18.9% तक वृद्धि हो सकती है। वहीं, रबी सीजन की बारिश 2050 तक 12% से 17% और 2080 तक 13% से 26% तक बढ़ सकती है।
मिट्टी कटाव और खारेपन का बढ़ता खतरा
बारिश की अधिकता से खेतों की मिट्टी का क्षरण (Soil Erosion) बढ़ेगा। 2050 तक खेती योग्य भूमि से हर साल प्रति हेक्टेयर 10 टन मिट्टी का नुकसान होने की आशंका है। इसके साथ ही, जलवायु परिवर्तन की वजह से खारे पानी वाली जमीन का दायरा भी बढ़ेगा। अभी जो क्षेत्र 6.7 मिलियन हेक्टेयर है, वह 2030 तक 11 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच सकता है।
फसल उत्पादन पर भारी असर
🔹जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सिर्फ मिट्टी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे फसलें भी प्रभावित होंगी।
🔹धान की पैदावार: 2025 तक बारिश आधारित धान उत्पादन में 20% की गिरावट आ सकती है और 2080 तक यह 104.7% तक घट सकता है। सिंचित धान की पैदावार में 2050 तक 3.5% और 2080 तक 5% की गिरावट संभव है।
🔹गेहूं उत्पादन: 2050 तक 19.3% और 2080 तक 40% की गिरावट का अनुमान है।
🔹मक्का (Kharif Maize): 2050 तक उत्पादन 10% से 19% और 2080 तक 20% से अधिक घट सकता है।
क्या है समाधान?
इन खतरों से निपटने के लिए समय रहते सस्टेनेबल कृषि प्रथाओं, मिट्टी संरक्षण, जल प्रबंधन, और जलवायु-अनुकूल फसलों को अपनाना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, किसानों को मौसम आधारित कृषि सलाह और तकनीकी सहायता प्रदान करना, जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभाव को कम करने में मददगार साबित हो सकता है।
निष्कर्ष
जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि कृषि अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा की भी गंभीर समस्या बन चुका है। सरकार और किसान दोनों को मिलकर अब climate-resilient agriculture की ओर कदम बढ़ाने होंगे, ताकि भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और टिकाऊ खेती सुनिश्चित की जा सके।
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