
कश्मीर का वह 1990 का दशक शायद ही कोई कश्मीरी पंडित के दिलों से, उनके यादों से निकल पाए। जब उन्हें उनके ही देश में उनके ही घर से निकाला गया, उनके बहू-बेटियों का सरेआम बलात्कार किया गया और फिर उन्हें और उनके परिवार को गोलियों से भून दिया गया। ऐसा नहीं था कि सरकार को पता नहीं था कि कश्मीर जल रहा है और भारत से उसका कश्मीर छीन रहा है पर उन्हें तो केवल दोस्ती निभानी थी, कश्मीर जल रहा है तो जले, उनकी दोस्ती बनी रहे। खैर 32 साल को होने को आए हैं इस जेनोसाइड के हुए, पर अब भी कश्मीरी पंडित अपने घरों को वापस लौट नहीं पाए हैं।
खैर 11 मार्च 2022 को कश्मीरी पंडितों से जुड़ी फ़िल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ थिएटर में रिलीज हो चुकी है। जो कि 2 घंटे और 50 मिनट की है, जिसमें फ़िल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने कश्मीरी पंडितों के दर्द को पूरी तरह से समेटने का प्रयास किया है और वे इसमें लगभग सफल भी हुए हैं। वहीं कलाकारों के रूप में देखें तो दर्शन कुमार, अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती, पल्लवी जोशी, चिन्मय मांडलेकर, प्रकाश बेलावड़ी, मृणाल कुलकर्णी और पुनीत इस्सर जी ने भी अपने अभिनय में कोई कसर नहीं छोड़ा है।
इन 32 वर्षों के दौरान ऐसा नहीं है कि, कश्मीरी पंडितों के जेनोसाइड पर फ़िल्म नहीं बनी। बहुत सी बनी! पर शायद ही कोई फ़िल्म हो जिसने पैसे के स्थान पर कश्मीरी पंडितों के दर्द को समझा हो और उसे बिना मिर्च-मसाला के परोसा हो|
पर इस फिल्म को देख कर आप समझ सकते हैं कि कैसे कश्यप ऋषि के नाम पर कश्मीर का नाम पड़ा, शुक्राचार्य यहाँ पैदल क्यों आए और कैसे आतंकवाद ने कश्मीर में अपना पैर किस चीज को ताक पर रखकर, कश्मीरी पंडितो और कश्मीर पर कैसे हावी हुआ और जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर को आतंकवादियों का गढ़ कैसे बना दिया। ऐसे कई प्रश्नों के जवाब देते हुए दिखती है यह फिल्म|
फ़िल्म की कहानी
द कश्मीर फाइल्स फ़िल्म रेडियो के क्रिकेट कमेंट्री से शुरू होती है और वहीं कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे होते हैं, जहाँ सचिन तेंदुलकर का नाम लेने पर कुछ लोग भड़क जाते हैं और उन बच्चो को मारते हुए इंडियन डॉग से संबोंधित करते है। ये बच्चे वहाँ से भाग कर एक सुरक्षित जगह छुप जाते हैं। जहाँ से उनके दादा पुष्कर नाथ पंडित(अनुपम खेर) उन बच्चों को घर लेकर आते हैं और घर पर उनके बेटे को आतंकवादियों के गोलियों से भुना हुआ और अपनी बहु और उसके छोटे बच्चों को रोते-बिलखते हुए पाते हैं।
वहीं दूसरे सीन में,दिल्ली में पड़ने वाला छात्र अपने दादा के अस्थियों को विसर्जित करने के लिए कश्मीर आता है और यहीं उसकी मुलाकात उसके दादा के दोस्तों से होती है और यहीं से, कश्मीरी पंडितों के खौफ की दासता की कहानी शुरू होती है और परत दर परत गुत्थियां छूटती जाती है।
जिसके साथ वे बताती हैं कि कैसे कश्मीरी पंडितों को घर से भगाया गया, कैसे दोस्ती के कारण लोगों को दलदल में मरने के लिए छोड़ दिया गया, कैसे एनयू भारत का लीडिंग कॉलेज में कृष्णा पंडित( दर्शन कुमार) एक चेहरा बन जाते हैं, कैसे उस समय सरकारी मशीनरी ढह जाती है और सरकार उसपर कैसा रिएक्शन देती है, मीडिया कैसे इस मुद्दे का संज्ञान लेती है, ऐसे कई मुद्दों को लेकर इस फ़िल्म को बुना गया है।
आपको बता दें कि असल मे यह फ़िल्म एक टाइम ट्रेवल की तरह बनाई गई है जहाँ एक भाग दूसरे भाग से जुड़ा हुआ है और कोई भी भाग छोड़ देने पर आप मूवी को समझने में असमर्थ रहेंगे। ज ऐसे में सलाह है कि फ़िल्म पूरी देखें पर फ़िल्म में कसावट इतना है, तारतम्यता इतना है कि शायद ही आप अपने बैठक को छोड़ पाए।
फ़िल्म के विजुअल की बात करें तो फ़िल्म का सिनेमेटोग्राफ बहुत है। फ़िल्म कश्मीरी पंडितों के दर्द को बयां करने में ज्यादातर सफल रही है। आपको शायद फ़िल्म के ड्यूरेशन के कारण कुछ बोरियत हो पर फ़िल्म जिस प्रकार से एक कड़ी से दूसरे कड़ी में जुड़ी है कि आप अंतिम समय तक अब क्या होगा के सोच में घुले रहेंगे और यही इस फ़िल्म की खासियत है।
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