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लैवेंडर विवाह..?….शादी या विवाह किसी भी व्यक्ति के लिए उसके जिंदगी का एक महत्वपूर्ण पल होता है फिर चाहे वह शादी अरेंज हो या लव मैरिज हो। वास्तव में कहा जाए तो शादी समाज के समक्ष होने वाला वह आयोजन हैं जहाँ दो लोग एक-दूसरे के जीवनसाथी बनने का वचन लेते हैं।

ऐसा नहीं है कि शादी समाज के समक्ष ही हो यह शादी कोर्ट में या मंदिर में भी पूर्ण किया जा सकता है। पर भारत देश में शादी की बात करें तो ज्यादातर वही शादी मान्य हैं जो समाज के लोगों के सामने हुई है, लेकिन इसी बीच एक मुद्दा आता है लैवेंडर मैरिज का। जिसके बारे में आइए जानते हैं….

सौ साल पुराना है लैवेंडर विवाह का इतिहास

लैवेंडर मैरिज का नाम आज से नहीं वरन 1920 के आसपास से ही सुर्खियों में बना रहा है ऐसे में यह कोई नया नाम नहीं है। कई वेबसाइट्स के ब्लॉग्स को देखें तो पता चलता है कि दूसरे विश्वयुद्ध से पहले ऐसी शादियां काफ़ी आम हुआ करती थी। उस समय जो सेलेब्रिटीज़ होते थे, वो अपनी मान-मर्यादा और समाज के भय से ऐसी शादियां करते थे। ताकि उनका कैरियर भी बना रहे, समाज भी उन्हें माने और वे अपना जीवन भी जी सकें।

क्या है लैवेंडर विवाह

एक लैवेंडर मैरिज तब कहा जाता है जब एक लड़का गे हो या लड़की लेस्बियन हो या फिर दोनों ही होमोसेक्सुअल हो और एक दूसरे से समाज के कारण या परिवार के दबाव के कारण शादी कर लेते हैं तो इसे लैवेंडर शादी कहा जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जब एक लड़का या लड़की एक लेस्बियन लड़की या गे लड़के से शादी करते हैं तो वह लैवेंडर शादी कहा जाता है।

यह शादी वास्तव में आम शादी की तरह होता है, सामान्यतः इस शादी के संदर्भ में यह नहीं कहा जा सकता कि यह एक लैवेंडर शादी है। क्योंकि दोनों ही शादी करने वाले शादी करने के बाद एक साथ पति-पत्नी की तरह रहते हैं और उन्हें ही पता होता है कि यह एक लैवेंडर शादी है।

लैवेंडर विवाह क्यों करना पड़ता है

भारत जैसे देश में जहाँ अन्तर जातीय शादी या अन्तर धार्मिक शादी को कलंक के रूप में देखा जाता हो वहाँ एक ही लिंग के दो लोगों का शादी करना कलंक से कम नहीं है। ऐसे में लैवेंडर विवाह ही एक मात्र रास्ता बचता है जिससे समाज मे इज्जत भी बनी रहे और कोई उनके स्वाभिमान पर कालिख न पोते और वे एक सामान्य लोगों की तरह रह सकें।

हालांकि, 6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा कि समलैंगिकता अपराध नहीं है। चीफ जस्टिस के अगुवाई में करीब 55 मिनट सुनाए फैसले में धारा 377 को पूरी तरह से रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को मनमानी और अतार्किक बताते हुए कहा कि एलजीबीटी समुदाय को भी आम नागरिकों की तरह जिंदगी जीने का पूरा अधिकार है। वह भी प्यार कर सकते हैं, वह भी अपने पसंद के साथी के साथ अपना काम कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए यह भी कहा कि यौन प्राथमिकता पूरी तरह से बायोलॉजिकल और प्राकृतिक है, जिन पर किसी का बस नही है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद भी लोगों द्वारा इस फैसले को पूरी तरह से नही अपनाया गया है। क्योंकि भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश मे जहाँ सबसे पुरानी विश्व की संस्कृति धरोहर है और जहाँ पर समाज को प्राथमिकता दी जाती है; ऐसे में अभी भी लोग अपने को कलंक से बचाने के लिए लैवेंडर विवाह करने की तरफ जाते हैं। ताकि वे अपना जीवन सही से बिता सकें।

क्या लैवेंडर विवाह के बाद समस्याओं का सामना जोड़ों को करना पड़ सकता है

ऐसा कहा जा सकता है कि शादी के बाद कपल्स को समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि शादी होने के बाद परिवार के लोगों का( खास कर भारत में) दबाव उन जोड़ों पर होता है कि वे जल्दी से उन्हें एक संतान दें और अपने वंश को आगे बढ़ाए। ऐसे में यह समस्या उत्पन्न हो सकती है।

लेकिन ऐसे मामलों में ज्यादातर यह देखा गया है कि करीब के लोगों को, रिश्तेदारों को परिवार वालो को इन बातों का पता होता है, जिससे उन जोड़ो को ज्यादा दिक्कत नही होती है पर ऐसे मामले भारत मे अभी शायद ही हो कि भारत मे कोई लैवेंडर विवाह हुई हो। और जहाँ तक लेस्बियन और गे शादी की बात हो तो वह भी भारत मे कानूनी मान्यता प्राप्त होने के बाद भी अभी, देखने को या सुनने को नहीं मिला है।

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