गाजियाबाद निवासी हरीश राणा, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति मिली थी, का दिल्ली के AIIMS में निधन हो गया। अस्पताल प्रशासन के अनुसार उन्होंने शाम 4 बजकर 10 मिनट पर अंतिम सांस ली। इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए उन्हें कुछ समय पहले एम्स में भर्ती कराया गया था, जहां वे डॉक्टरों की निगरानी में थे।
सूत्रों के मुताबिक, उनकी स्थिति को देखते हुए कुछ दिन पहले उनका पोषण धीरे-धीरे बंद किया गया था। इसी प्रक्रिया के तहत उनका निधन हुआ। अस्पताल ने यह भी जानकारी दी कि उनके दो कॉर्निया और हार्ट वाल्व दान किए गए, जिसे अंग एवं ऊतक दान के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक कदम माना जा रहा है।
13 साल से कोमा में थे हरीश राणा
हरीश राणा करीब 13 वर्षों से कोमा में थे। एक दुर्घटना में छत से गिरने के बाद उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी, जिसके चलते वे अचेत अवस्था में चले गए। परिवार ने देश के कई बड़े अस्पतालों में उनका इलाज कराया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हो सका।
इलाज का खर्च हर महीने लगभग 60 से 70 हजार रुपये तक पहुंच गया था, जिससे परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ता गया। जब डॉक्टरों ने उनके ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त बता दी, तब उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में इच्छामृत्यु की अनुमति के लिए याचिका दायर की।
सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद शुरू हुई प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद कानूनी और मेडिकल दिशा-निर्देशों के तहत इच्छामृत्यु की प्रक्रिया शुरू की गई। इसी कारण उन्हें एम्स दिल्ली के पैलियेटिव केयर विभाग में भर्ती किया गया था, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही थी।
क्या होती है इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)?
इच्छामृत्यु का अर्थ ऐसी स्थिति से है, जब मरीज के इलाज को सीमित या बंद किया जाता है, क्योंकि उसके ठीक होने की संभावना बेहद कम होती है और वह लंबे समय से असहनीय पीड़ा या अचेत अवस्था में होता है।
भारत में यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सख्त कानूनी और चिकित्सकीय दिशानिर्देशों के तहत ही संभव है। इसमें मरीज को दर्द से राहत देने के लिए दवाएं दी जाती हैं और जीवनरक्षक पोषण या उपचार धीरे-धीरे बंद किया जाता है, ताकि उसे कष्ट न हो।
हरीश राणा का मामला इच्छामृत्यु और पैलियेटिव केयर से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। उनका अंगदान समाज के लिए एक प्रेरक संदेश भी देता है कि कठिन परिस्थितियों में भी मानवता की सेवा संभव है।
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