SINDHU JAL 1

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को लोकसभा में ऐतिहासिक फैसले की घोषणा करते हुए बताया कि भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित (In Abeyance) कर दिया है। यह कदम उन्होंने देश के नागरिकों और किसानों के हित में उठाया है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि यह निर्णय देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा की गई “बड़ी ऐतिहासिक भूल” को सुधारने के लिए लिया गया है। उन्होंने कांग्रेस पर भी आरोप लगाया कि उसने बार-बार भारत के हितों को गिरवी रखा।

सिंधु जल संधि: एक पुरानी पीड़ा

नेहरू द्वारा हस्ताक्षरित संधि

मोदी ने लोकसभा में Operation Sindoor पर हुई 19 घंटे की बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि 1960 में जवाहरलाल नेहरू ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए थे। यह संधि विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी, जिसके तहत भारत को केवल 20% पानी के उपयोग का अधिकार दिया गया, जबकि 80% पानी पाकिस्तान को सौंप दिया गया।

कांग्रेस पर गंभीर आरोप

प्रधानमंत्री ने कहा, “कांग्रेस की पुरानी आदत रही है कि वह भारत के हितों को गिरवी रखती रही है। सिंधु जल संधि इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।” उन्होंने इसे भारत की गरिमा के साथ विश्वासघात बताया।

“खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते” – मोदी का दो टूक संदेश

मोदी ने संसद में स्पष्ट शब्दों में कहा:

“भारत ने साफ कर दिया है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।”

इस बयान से उन्होंने संकेत दिया कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक भारत को उसे जीवनदायिनी नदियों के जल का लाभ देना उचित नहीं है।

जल संधि के दुष्परिणाम: मोदी का विश्लेषण

सिंचाई और बिजली परियोजनाओं पर असर

प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि यदि यह संधि नहीं होती, तो भारत पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों – सिंधु, झेलम, चिनाब – पर अनेक परियोजनाएं बना सकता था, जिससे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के किसानों को लाभ मिलता।

“हम अधिक बिजली बना सकते थे, पीने के पानी की समस्या का समाधान कर सकते थे,” मोदी ने कहा।

अंतरराज्यीय जल विवादों की जड़

मोदी ने यह भी दावा किया कि सिंधु जल संधि के कारण भारत में राज्य-राज्य के बीच जल विवाद उत्पन्न हुए, जो आज तक जारी हैं।

पाकिस्तान को सहायता: नेहरू की आलोचना

प्रधानमंत्री ने यह आरोप लगाया कि नेहरू ने न सिर्फ पाकिस्तान को सिंधु जल में अधिकार दिए, बल्कि उसे करोड़ों रुपये भी दिए ताकि वह नहरें और बांध बना सके। साथ ही, भारत ने अपने ही क्षेत्र में बने बांधों की सिल्ट सफाई (De-silting) का अधिकार भी खो दिया।

विश्व बैंक की भूमिका पर सवाल

मोदी ने कहा कि नेहरू और कांग्रेस ने भारत की पहचान देने वाली नदियों के जल बंटवारे का अधिकार विश्व बैंक को सौंप दिया। उन्होंने पूछा:

“नेहरू ने यह कैसी कूटनीति की जिसमें भारत को केवल 20% पानी मिला और पाकिस्तान को 80%?”

नेहरू ने भी मानी थी गलती – मोदी का दावा

मोदी ने अपने भाषण में दावा किया कि जवाहरलाल नेहरू ने भी बाद में यह माना था कि उन्हें उम्मीद थी कि सिंधु जल संधि से पाकिस्तान के साथ अन्य समस्याएं सुलझेंगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ

कांग्रेस का विरोध और राजनीतिक प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री के इस भाषण के दौरान कांग्रेस के सांसदों ने विरोध जताया। हालांकि, मोदी अपने भाषण में डटे रहे और कहा कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने कभी इस संधि की समीक्षा नहीं की, न ही उन्होंने नेहरू की गलती सुधारने का प्रयास किया।

किसानों के हक की रक्षा: मोदी सरकार की प्राथमिकता

मोदी ने कहा कि उनकी सरकार ने यह कदम देश के अन्नदाता किसानों के हित में उठाया है। उन्होंने कहा कि भारत को उसके जल संसाधनों का पूरा लाभ मिलना चाहिए और इसके लिए सरकार कोई भी आवश्यक निर्णय लेने से पीछे नहीं हटेगी।

अंतरराष्ट्रीय दबाव से परे: भारत की नई जल नीति

यह फैसला एक संदेश भी है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय दबाव या पुराने समझौतों के अधीन नहीं रहेगा। वर्तमान सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह भारत के हितों को सर्वोपरि मानेगी, चाहे वह जल नीति हो, रक्षा नीति या कूटनीति।

निष्कर्ष: इतिहास से सबक, भविष्य की दिशा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कदम केवल एक जल संधि को स्थगित करने भर का मामला नहीं है, यह एक नीतिगत और वैचारिक बदलाव का प्रतीक है। वर्षों पुरानी एक विवादास्पद संधि को फिर से चुनौती देकर उन्होंने दिखाया कि अब भारत नई सोच और आत्मविश्वास के साथ अपने हितों की रक्षा करेगा।

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