भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित एक विशेष व्रत और पर्व है। यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, जो भक्तों के जीवन से संकटों को दूर करते हैं।
कहते हैं इसे ‘भालचंद्र’?
इस विशेष चतुर्थी को ‘भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन भगवान गणेश को माथे पर चंद्रमा धारण किए हुए रूप में पूजा जाता है। यह स्वरूप शांति, सौम्यता, शुभता और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। ‘भाल’ का अर्थ है माथा और ‘चंद्र’ का अर्थ चंद्रमा।
संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व
‘संकष्टी’ शब्द का अर्थ होता है – संकटों को हरने वाली। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत और पूजा करने से भगवान गणेश सभी बाधाओं को दूर करते हैं। यह दिन मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन में सुख-शांति लाने के लिए अत्यंत शुभ होता है।
पूजा विधि: कैसे करें व्रत और पूजन?
इस दिन भक्त उपवास रखते हैं और भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाते हैं।
पूजन सामग्री में शामिल होते हैं –
- दूर्वा
- मोदक या लड्डू
- लाल फूल,
- सिंदूर,
- धूप-दीप आदि।
शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है। चंद्रमा को जल चढ़ाते समय मंत्रों का उच्चारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
गणेश व्रत कथा सुनने का महत्व
इस दिन गणेश व्रत कथा सुनना या पढ़ना अनिवार्य माना जाता है। मान्यता है कि कथा सुनने से भगवान गणेश अत्यंत प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। कथा में गणेश जी की लीलाएं, बुद्धि और संकटमोचन स्वरूप का वर्णन होता है।
जीवन में मिलते हैं विशेष लाभ
जो श्रद्धा और नियमपूर्वक यह व्रत करता है, उसे जीवन में कई लाभ मिलते हैं –
- सुख और समृद्धि
- मानसिक शांति
- कार्य में सफलता
- रोगों से मुक्ति
- कठिन कार्यों में सरलता
विशेष रूप से यह व्रत उन लोगों के लिए लाभकारी है जिनके कार्य बार-बार बाधित होते हैं या असफल हो जाते हैं।
गणेश चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी में अंतर
जहाँ गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास में जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है, वहीं संकष्टी चतुर्थी हर महीने चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश के संकटमोचक रूप की पूजा के लिए होती है। भालचंद्र संकष्टी विशेष रूप से चंद्रमा के प्रतीक स्वरूप से जुड़ी होती है।
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