युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फ्रांस ने वियतनाम और आसपास के क्षेत्रों पर उपनिवेश स्थापित कर उन्हें “फ्रेंच इंडोचाइना” का हिस्सा बना लिया। वियतनाम (जिसमें टोंकिन, अन्नम और कोचीन-चीन के क्षेत्र शामिल थे) के साथ-साथ कंबोडिया को भी फ्रांसीसी नियंत्रण में लाया गया, और बाद में 1893 में लाओस भी जोड़ा गया। फ्रांसीसी शासन के दौरान स्थानीय लोगों का आर्थिक शोषण और राजनीतिक दमन किया गया, जिसके विरुद्ध वियतनामी राष्ट्रवाद पनपने लगा।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1940-45 में जापानी सेना ने फ्रेंच इंडोचाइना पर कब्ज़ा कर लिया, जिससे उस अवधि में फ्रांस का नियंत्रण समाप्त हो गया। इसी दौर में हो ची मिन्ह नामक क्रांतिकारी नेता (जो लेनिन की बोल्शेविक क्रांति से प्रेरित थे) ने मई 1941 में “वियत मिन्ह” (वियतनाम स्वतंत्रता लीग) नामक संगठन की स्थापना की। इस संगठन का लक्ष्य फ्रांसीसी उपनिवेशवाद और जापानी कब्जे दोनों से वियतनाम की आज़ादी हासिल करना था।
जापान की हार के बाद 2 सितंबर 1945 को हो ची मिन्ह ने हनोई में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ वियतनाम की स्वतंत्रता की घोषणा की। हालांकि, युद्ध पश्चात फ्रांस ने वियतनाम पर दोबारा नियंत्रण कायम करने का प्रयास किया और हो ची मिन्ह के नेतृत्व वाले वियत मिन्ह के साथ उनका सशस्त्र संघर्ष शुरू हो गया। परिणामस्वरूप प्रथम इंडोचीन युद्ध (1946-1954) छिड़ा, जिसमें वियत मिन्ह ने छापामार युद्ध की रणनीति अपनाकर फ्रांसीसी सेना को कड़ी चुनौती दी। आखिरकार इस संघर्ष का निर्णायक मोड़ मई 1954 में डिएन बिएन फू के युद्ध के रूप में आया, जब जनरल वो गुयेन जियाप के नेतृत्व में वियत मिन्ह बलों ने चार महीने की घेराबंदी के बाद वहां स्थित फ्रांसीसी दुर्ग को ध्वस्त कर दिया। फ्रांस की इस करारी हार के साथ वियतनाम में लगभग एक सदी पुराने औपनिवेशिक शासन का अंत हो गया।
वियतनाम का विभाजन (1954 जिनेवा संधि के बाद)
डिएन बिएन फू में फ्रांसीसी पराजय के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ा और जुलाई 1954 में जिनेवा सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में जिनेवा संधि पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके तहत वियतनाम को अस्थायी रूप से 17वें समानांतर (17th parallel) रेखा पर दो भागों में विभाजित कर दिया गया। उत्तर वियतनाम में हो ची मिन्ह के नेतृत्व में साम्यवादी सरकार को मान्यता मिली, जबकि दक्षिण वियतनाम में सम्राट बाओ दाई के नेतृत्व में एक अलग राज्य स्थापित हुआ। समझौते के अनुसार 1956 में पूरे वियतनाम में एकीकृत राष्ट्रीय चुनाव कराने की योजना थी, ताकि देश को शांतिपूर्ण तरीक़े से पुनः जोड़ा जा सके।

हालांकि, शीत युद्ध के माहौल में संयुक्त राज्य अमेरिका और दक्षिण वियतनाम की सरकार को आशंका थी कि यदि चुनाव हुए तो हो ची मिन्ह की कम्युनिस्ट पार्टी जीत जाएगी। इसी भय से दक्षिण वियतनाम ने राष्ट्रीय चुनाव कराने से इनकार कर दिया और विभाजन लगभग स्थायी बन गया। इस प्रकार एक अस्थायी विभाजन धीरे-धीरे पूर्व-पश्चिम शीत युद्ध प्रतिद्वंद्विता का अंग बन गया। उत्तर वियतनाम “डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ Vietnam” (राजधानी हनोई) के रूप में साम्यवादी शासन के अधीन रहा, जबकि दक्षिण वियतनाम में अमेरिकी समर्थन प्राप्त “रिपब्लिक ऑफ़ Vietnam” (राजधानी साइगॉन) की स्थापना की गई। 1955 में दक्षिण वियतनाम में अमेरिका समर्थित राजनेता न्गो दिंह ज़ीएम (Ngo Dinh Diem) ने सम्राट बाओ दाई को पदच्युत कर स्वयं को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। दियम का शासन भ्रष्टाचार और अल्पसंख्यकों (विशेषकर बौद्ध बहुसंख्यक) के दमन के लिए कुख्यात था, जिसने जन असंतोष को जन्म दिया।
दक्षिण वियतनाम में अमेरिकी हस्तक्षेप और सैन्य वृद्धि के कारण
वियतनाम के विभाजन के बाद दक्षिण वियतनाम को कम्युनिस्ट उत्तर से बचाने के लिए अमेरिका ने आर्थिक और सैन्य सहायता बढ़ानी शुरू की। अमेरिकी नीति-निर्माताओं के बीच डोमिनो सिद्धांत प्रबल था, जिसके अनुसार यदि एक देश कम्युनिस्ट प्रभाव में गिरा तो उसके पड़ोसी देश भी क्रमशः कम्युनिस्ट हो जाएंगे। शीत युद्ध की प्रतिद्वंद्विता के संदर्भ में संयुक्त राज्य अमेरिका नहीं चाहता था कि वियतनाम भी चीन और सोवियत संघ की तरह साम्यवादी खेमे में चला जाए। इसी उद्देश्य से राष्ट्रपति आइज़ेनहावर और फिर जॉन एफ़. केनेडी ने दक्षिण वियतनाम के नेता दियम को मजबूत समर्थन दिया। 1955 से 1961 के बीच अमेरिका ने अपने सैन्य सलाहकारों और सीआईए के ज़रिए दक्षिण वियतनामी सेना को प्रशिक्षण, शस्त्र एवं वित्त देकर सशक्त बनाया।
दियम ने अपने शासन के आरंभिक वर्षों में हज़ारों कम्युनिस्ट समर्थकों और अन्य विरोधियों को गिरफ्तार किया या मरवा डाला। वह इन सभी को तिरस्कारपूर्वक “वियत कोंग” (वियतनामी कम्युनिस्ट) कहता था। दियम की दमनकारी नीतियों के चलते 1957 तक दक्षिण वियतनाम में विरोध स्वरूप विद्रोह शुरू हो गया – सरकारी अधिकारियों पर हमले बढ़ने लगे और 1959 तक दक्षिण वियतनामी सेना के साथ गुरिल्ला लड़ाइयाँ छिड़ने लगीं। दिसंबर 1960 में दियम के तमाम विरोधी गुटों (कम्युनिस्ट एवं ग़ैर-कम्युनिस्ट दोनों) ने मिलकर “नेशनल लिबरेशन फ़्रंट (NLF)” का गठन किया, जिसे वियत कोंग गुरिल्ला आंदोलन का राजनीतिक मोर्चा माना गया। उत्तर वियतनाम ने गुप्त रूप से इन विद्रोहियों को समर्थन देना शुरू कर दिया ताकि दक्षिण में दियम सरकार को अस्थिर किया जा सके।
राष्ट्रपति जॉन एफ़. केनेडी ने डोमिनो सिद्धांत के तहत दक्षिण वियतनाम में अमेरिकी भागीदारी बढ़ाने का निर्णय लिया। 1961 में केनेडी द्वारा भेजी गई एक विशेष टीम ने लौटकर रिपोर्ट दी कि वियत कोंग के ख़तरे से निपटने के लिए दियम शासन को व्यापक अमेरिकी सैन्य, आर्थिक एवं तकनीकी मदद दी जाए। इसके परिणामस्वरूप 1962 तक दक्षिण वियतनाम में अमेरिकी सैन्य “सलाहकारों” की संख्या बढ़कर लगभग 9,000 तक पहुँच गई, जबकि 1950 के दशक के अंत में यह संख्या 800 से भी कम थी।

इसके बावजूद दियम सरकार की तानाशाही नीतियाँ और अल्पसंख्यक बौद्धों पर अत्याचार (जिसका चरम 1963 में कुछ बौद्ध भिक्षुओं द्वारा आत्मदाह के रूप में दिखा) के कारण जनता में आक्रोश बढ़ता गया। अंततः नवंबर 1963 में दक्षिण वियतनाम की सेना के कुछ जनरलों ने अमेरिकी प्रश्रय से दियम का तख्तापलट कर उसे हत्या कर दी। दियम के पतन के बाद साइगॉन में राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ गई तथा अल्पकालिक सरकारें बनती-टूटती रहीं। इस बीच उत्तर वियतनाम ने दक्षिण में विद्रोहियों को और तेज़ी से सहायता पहुँचाई, जिससे संघर्ष उग्र होता गया।
अगस्त 1964 में टोंकिन की खाड़ी घटना ने अमेरिकी हस्तक्षेप को पूर्ण युद्ध में बदलने का मार्ग प्रशस्त किया। अमेरिकी रिपोर्ट के अनुसार उत्तरी वियतनाम की नौकाओं ने टोंकिन की खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोतों (जैसे यूएसएस मैडॉक्स) पर हमला किया, जिसके प्रत्युत्तर में राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने उत्तरी वियतनाम के ख़िलाफ़ हवाई बमबारी का आदेश दिया। तत्पश्चात अमेरिकी कांग्रेस ने टोंकिन खाड़ी प्रस्ताव पारित किया, जिसने जॉनसन को वियतनाम में युद्ध बढ़ाने के लिए व्यापक अधिकार प्रदान कर दिए।
इसके बाद अमेरिका सीधे युद्ध में कूद पड़ा। मार्च 1965 में अमेरिकी मरीन दस्तों ने दानांग तट पर उतरकर लड़ाई में हिस्सा लेना शुरू किया। साथ ही, 1965 से उत्तरी वियतनाम पर तीव्र बमबारी अभियान “ऑपरेशन रोलिंग थंडर” के नाम से चलाया गया। राष्ट्रपति जॉनसन ने जुलाई 1965 में तुरंत 1,00,000 और सैनिक वियतनाम भेजने की स्वीकृति दी तथा 1966 में अतिरिक्त 1,00,000 सैनिक तैनात किए। इस प्रकार कुछ ही वर्षों में अमेरिकी भूमिका एक सीमित सलाहकार से बढ़कर पूर्ण सैन्य हस्तक्षेप में बदल गई।
प्रमुख युद्ध घटनाएं
1965 से 1968 के बीच वियतनाम युद्ध अपने चरम पर था। दक्षिण वियतनाम में अमेरिकी सैनिकों की संख्या 1967 के अंत तक बढ़कर लगभग 5,00,000 पहुंच गई थी। जनरल विलियम वेस्टमोरलैंड ने अमेरिकी रणनीति को क्षय-युद्ध (war of attrition) में बदल दिया, जिसका उद्देश्य भूभाग जीतने के बजाय अधिक-से-अधिक शत्रु सैनिकों को मारना था। बड़ी संख्या में दक्षिण वियतनामी ग्रामीण क्षेत्रों को “मुक्त-गोलीबारी क्षेत्र” (free-fire zone) घोषित किया गया – मानो इन इलाकों में बचे सभी लोग दुश्मन हों – और वहां भारी बमबारी व गोलाबारी की गई। इन कार्रवाइयों से व्यापक जनहानि हुई और लाखों ग्रामीण घर छोड़कर शरणार्थी शिविरों में रहने पर मजबूर हुए। युद्ध के दौरान अमेरिका ने जंगल उजाड़ने के लिए एजेंट ऑरेंज जैसे रसायनों का भी इस्तेमाल किया, जिसके दीर्घकालिक दुष्प्रभाव आज तक वियतनामी जनता झेल रही है।
हालांकि अमेरिकी सेना बड़ी संख्या में कम्युनिस्ट लड़ाकों को मार रही थी, उत्तरी वियतनाम और वियत कोंग ने हार नहीं मानी। उन्हें सोवियत संघ व चीन से निरंतर मदद मिल रही थी, और हो ची मिन्ह ट्रेल नामक आपूर्ति मार्ग के जरिए वे लाओस व कंबोडिया होते हुए दक्षिण वियतनाम में सैनिक व युद्धसामग्री पहुँचाते रहे। इस आपूर्ति को बाधित करने के लिए अमेरिका ने पड़ोसी लाओस और कंबोडिया में भी गुप्त अभियान शुरू किए। 1964-73 के बीच अमेरिका ने लाओस पर दो миллион टन से अधिक बम गिराए, जिससे लाओस इतिहास में प्रति व्यक्ति सबसे अधिक बमबारी झेलने वाला देश बन गया। इसी तरह 1969-70 में कंबोडिया में भी कम्युनिस्ट अड्डों पर भारी बमबारी और थल अभियान चलाए गए, जिनके बारे में बाद में जानकारी बाहर आने पर काफी विवाद हुआ।

टेट आक्रमण (1968): 30 जनवरी 1968 को वियतनामी नववर्ष (टेट) के अवसर पर, उत्तर वियतनाम के जनरल वो गुयेन जियाप के नेतृत्व में लगभग 70,000 कम्युनिस्ट सैनिकों ने दक्षिण वियतनाम में एक साथ दर्जनों शहरों और सैन्य ठिकानों पर अचानक आक्रमण शुरू किया। इस टेट ऑफ़ेंसिव ने अमेरिका और दक्षिण वियतनामी बलों को चौंका दिया, लेकिन वे जल्द ही संभलकर पलटवार करने में सफल रहे। कम्युनिस्ट लड़ाके किसी भी बड़े शहर पर एक-दो दिन से ज्यादा कब्ज़ा बरकरार नहीं रख पाए और भारी क्षति उठाकर उन्हें पीछे हटना पड़ा। हालांकि सैन्य दृष्टि से यह आक्रमण विफल हुआ, किन्तु इसने अमेरिकी जनता को झकझोर दिया। युद्ध से संबंधित पश्चिममोरलैंड सहित अमेरिकी नेताओं के आश्वासनों के विपरीत, दुश्मन की यह क्षमता देखकर अमेरिका में आक्रोश और अविश्वास की लहर दौड़ गई। टेट आक्रमण के बाद जनरल वेस्टमोरलैंड ने 2,00,000 और अमेरिकी सैनिकों की माँग की, जिससे जॉनसन प्रशासन की कठिनाई बढ़ गई। मार्च 1968 में राष्ट्रपति जॉनसन ने उत्तरी वियतनाम पर अधिकांश बमबारी रोकने और अपना शेष कार्यकाल शांति प्रयासों को समर्पित करने की घोषणा की – साथ ही यह भी कहा कि वे पुनः चुनाव नहीं लड़ेंगे। टेट आक्रमण को वियतनाम युद्ध में निर्णायक मोड़ माना जाता है, जिसने अमेरिकी जनमत को तेजी से युद्ध-विरोध की ओर मोड़ दिया।
माई लाई हत्याकांड (1968): 16 मार्च 1968 को अमेरिकी सेना की चार्ली कंपनी के सैनिकों ने दक्षिण वियतनाम के एक छोटे गाँव माई लाई में सैकड़ों निहत्थे ग्रामीणों – जिनमें महिलाएं, बच्चे और वृद्ध शामिल थे – को निर्ममतापूर्वक गोलीबारी करके मार डाला। इस माई लाई नरसंहार को प्रारंभिक दौर में सेना ने छुपा लिया था, किन्तु लगभग एक वर्ष बाद 1969 के अंत में जब अमेरिकी प्रेस में यह घटना उजागर हुई तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की कड़ी आलोचना हुई। जांच से पता चला कि 400 से अधिक निर्दोष ग्रामीणों की हत्या की गई थी। इस भयावह घटना ने युद्ध की नैतिकता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिया और अमेरिका में युद्ध-विरोधी आंदोलन को और भड़का दिया।
अन्य प्रमुख घटनाएं: 1968 के बाद अमेरिकी नीति में परिवर्तन की शुरुआत हुई। राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने सत्ता संभालते ही “वियतनमीकरण” (Vietnamization) की नीति अपनाई। इस योजना के तहत अमेरिकी सैनिकों को क्रमिक रूप से वापस बुलाना, दक्षिण वियतनामी सेना को प्रशिक्षण व हथियार देकर लड़ाई की ज़िम्मेदारी सौंपना, तथा अमेरिकी हवाई और तोपखाने हमलों को बढ़ाना शामिल था। निक्सन ने घरेलू मोर्चे पर बढ़ते विरोध को शांत करने के लिए स्वयं को “मौन बहुमत” का पक्षधर बताते हुए आश्वासन दिया कि वह सम्मानजनक शांति लेकर आएंगे। इसी दौरान युद्ध का विस्तार गुप्त रूप से पड़ोसी देशों में भी हुआ। अप्रैल 1970 में अमेरिकी एवं दक्षिण वियतनामी सेनाओं ने कंबोडिया पर आक्रमण किया ताकि वहाँ छिपे वियत कोंग और उत्तरी वियतनामी ठिकानों का खात्मा किया जा सके। इस कदम से अमेरिका में भारी विरोध भड़क उठा। 4 मई 1970 को ओहायो के केंट स्टेट यूनिवर्सिटी परिसर में वियतनाम-विरोधी प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर नेशनल गार्ड के जवानों ने गोलियां चला दीं, जिससे 4 छात्र मारे गए और 9 घायल हुए। यह घटना युद्ध के प्रति अमेरिकी जनभावनाओं में एक और मोड़ साबित हुई और देश भर के कॉलेज परिसरों में हड़तालें फैल गईं।
1972 में उत्तर वियतनाम ने विशाल ईस्टर आक्रमण शुरू किया, जिसमें टैंकों और भारी हथियारों के साथ दक्षिण वियतनाम के बड़े हिस्सों पर धावा बोला गया। जवाब में निक्सन ने ऑपरेशन लाइनबैकर के तहत उत्तरी वियतनाम पर भीषण हवाई हमले करवाए। दिसंबर 1972 में हनोई और हैफोंग पर क्रिसमस के समय गहन बमबारी (तथाकथित “क्रिसमस बॉम्बिंग“) की गई, जिसने उत्तरी वियतनाम को शांति वार्ता पर लौटने के लिए मजबूर किया। इन हमलों के बाद शांति समझौते की दिशा में प्रगति हुई और जनवरी 1973 में पेरिस में एक प्रारंभिक समझौता संपन्न हो सका।
अमेरिका की घरेलू प्रतिक्रिया और विरोध आंदोलन
वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकी समाज गहराई से विभाजित हो गया – एक ओर सरकार और युद्ध-समर्थक “बाज़” (hawks) थे, तो दूसरी ओर युद्ध-विरोधी “कबूतर” (doves) कहलाने वाले लोग। प्रारंभ में शीत युद्ध की भयावहता और कम्युनिज़्म के प्रसार को रोकने की इच्छा से युद्ध को पर्याप्त जनसमर्थन मिला, लेकिन जैसे-जैसे हताहतों की संख्या बढ़ी और जीत अनिश्चित दिखने लगी, जनता का मोहभंग होना शुरू हो गया। विशेषकर 1968 के टेट आक्रमण के बाद यह स्पष्ट हो गया कि सरकार द्वारा पेश की जा रही जीत की तस्वीर वास्तविकता से मेल नहीं खा रही थी, जिससे एक विश्वसनीयता संकट पैदा हुआ। परिणामस्वरूप 1960 के दशक के उत्तरार्ध में अमेरिका में एक शक्तिशाली युद्ध-विरोधी आंदोलन उभरा।
युद्ध-विरोधी भावना सबसे पहले विश्वविद्यालय परिसरों में पनपी, जहां छात्रों और शिक्षाविदों ने teach-ins और प्रदर्शन आयोजित किए। 1965 के बाद से विरोध प्रदर्शनों का दायरा देशव्यापी स्तर पर बढ़ता गया। अक्टूबर 1967 में लगभग 35,000 प्रदर्शनकारियों ने वॉशिंगटन डी.सी. में पेंटागन के सामने मार्च किया। विरोधियों का तर्क था कि इस युद्ध में असैनिक वियतनामी नागरिक मुख्य शिकार बन रहे हैं और अमेरिका साइगॉन में एक भ्रष्ट तानाशाही का समर्थन कर रहा है। वियतनाम युद्ध आधुनिक इतिहास का पहला ऐसा संघर्ष था जिसे व्यापक रूप से टेलीविजन पर प्रसारित किया जा रहा था – घरों में युद्ध के विभत्स दृश्य (जलते हुए ग्रामीण, गोलियों से छलनी बच्चे आदि) प्रतिदिन देखे जा सकते थे। इन तस्वीरों ने अमेरिकी जनता को गहरे तक विचलित किया और नैतिक आक्रोश को हवा दी।
युद्ध-विरोधी आंदोलन में छात्रों के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार, लेखक और स्वयं युद्ध में सेवा कर चुके पूर्व सैनिक भी शामिल हुए। मोहम्मद अली जैसे प्रसिद्ध मुक्केबाज़ ने लड़ने से इंकार करके विरोध प्रकट किया, तो हज़ारों युवाओं ने जबरन भर्ती (ड्राफ्ट) के आदेश जला दिए। 1969 तक आते-आते युद्ध-विरोधी रैलियाँ और मोर्चे काफी आम हो गए। 15 नवंबर 1969 को वॉशिंगटन डी.सी. में अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा शांति प्रदर्शन हुआ, जिसमें लगभग 2,50,000 लोगों ने भाग लिया और वियतनाम से अमेरिकी सेना की पूर्ण वापसी की मांग की।
1970 में कंबोडिया पर अमेरिकी हमले की खबर ने विरोध को और भड़का दिया। केंट स्टेट की घटना (मई 1970) के अलावा उसी महीने मिसिसिपी के जैक्सन स्टेट यूनिवर्सिटी में भी पुलिस ने युद्ध-विरोधी प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई, जिसमें दो अफ्रीकी-अमेरिकी छात्र मारे गए। जनता के बढ़ते दबाव और अशांति को देखते हुए सरकार को कुछ नीतिगत बदलाव करने पड़े। 1971 में पेंटागन पेपर्स (रक्षा विभाग के गुप्त दस्तावेज) समाचार-पत्रों में लीक हुए, जिनसे स्पष्ट हुआ कि सरकार ने वियतनाम में परिस्थिति की वास्तविकता जनता से छुपाई थी। इन खुलासों ने सरकारी प्रतिष्ठान के प्रति अविश्वास को चरम पर पहुँचा दिया। व्यापक जनविरोध और राजनीतिक दबाव ने अंततः अमेरिकी नेतृत्व को युद्ध समाप्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाने पर मजबूर किया।
युद्ध का अंत और 1975 में साइगॉन का पतन
लगभग दो दशकों तक चले इस रक्तरंजित संघर्ष के अंत की नींव 1973 के पेरिस शांति समझौते (Paris Peace Accords) से पड़ी। जनवरी 1973 में अमेरिका, उत्तर वियतनाम, दक्षिण वियतनाम और वियत कोंग के प्रतिनिधियों ने पेरिस में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत अमेरिका सभी लड़ाकू सैनिकों को वियतनाम से वापस बुलाने पर सहमत हुआ। बदले में उत्तर वियतनाम ने युद्धबंदी बनाए गए अमेरिकी सैनिकों को रिहा करने पर सहमति दी। इस संधि से अमेरिका और उत्तर वियतनाम के बीच प्रत्यक्ष शत्रुता औपचारिक रूप से समाप्त हो गई, किंतु उत्तर और दक्षिण वियतनाम के बीच संघर्ष थमा नहीं और युद्धविराम कुछ ही समय में टूट गया। मार्च 1973 तक अधिकांश अमेरिकी सेना वियतनाम से लौट चुकी थी, पर दक्षिण वियतनामी सेना (ARVN) और कम्युनिस्ट बलों के बीच छिटपुट लड़ाई चलती रही।

अमेरिकी सेना की वापसी के बाद दक्षिण वियतनाम की सरकार को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। अमेरिका ने कुछ समय तक आर्थिक और हथियार संबंधी सहायता ज़रूर जारी रखी, किंतु अब दक्षिण वियतनाम को बिना प्रत्यक्ष अमेरिकी सैन्य सहयोग के लड़ना था। 1974 तक आते-आते अमेरिकी कांग्रेस ने भी दक्षिण वियतनाम को दी जाने वाली सहायता में कटौती कर दी, जिससे साइगॉन शासन और कमजोर हो गया। इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर मार्च 1975 में उत्तर वियतनाम ने दक्षिण पर एक अंतिम बड़ा आक्रमण शुरू किया, जिसे हो ची मिन्ह अभियान कहा जाता है। उत्तरी सेना ने तेज़ी से मध्य वियतनाम के प्रांतों पर कब्ज़ा जमाना शुरू कर दिया और दक्षिण वियतनामी सेना ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी। मात्र कुछ ही हफ़्तों में कम्युनिस्ट सेनाएँ साइगॉन के द्वार पर पहुँच गईं।
अप्रैल 1975 के अंतिम दिनों में उत्तर वियतनामी बलों ने साइगॉन (दक्षिण वियतनाम की राजधानी) को चारों ओर से घेर लिया। अमेरिकी दूतावास से अमेरिकी नागरिकों तथा हजारों दक्षिण वियतनामी सहयोगियों को हेलीकॉप्टर द्वारा आपातकालीन निकाल सुरक्षित किया गया – इस अराजक निकासी के हृदयविदारक दृश्य दुनिया ने टेलीविजन पर देखे। अंततः 30 अप्रैल 1975 को साइगॉन नगर पतन हुआ और कम्युनिस्ट सैनिकों ने वहाँ नियंत्रण स्थापित कर लिया। दक्षिण वियतनाम की शेष सरकार ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया। इस प्रकार वियतनाम युद्ध का समापन उत्तर वियतनाम की पूर्ण विजय के साथ हुआ। 1976 में उत्तर और दक्षिण को आधिकारिक रूप से एकीकृत कर वियतनाम का समाजवादी गणराज्य बनाया गया, तथा साइगॉन का नाम बदलकर हो ची मिन्ह सिटी रखा गया (हो ची मिन्ह का 1969 में ही देहांत हो चुका था)।
युद्ध के प्रभाव: वियतनाम, अमेरिका, लाओस और कंबोडिया पर प्रभाव
वियतनाम युद्ध के परिणामस्वरूप संबंधित देशों पर गहरा मानवीय, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ा। यह आधुनिक इतिहास के सबसे विनाशकारी संघर्षों में से एक था, जिसमें अनुमानतः 30 लाख लोगों की जान गई (जिसमें अधिकांश वियतनामी नागरिक थे)। नीचे दी गई तालिका वियतनाम युद्ध में प्रमुख पक्षों के अनुमानित हताहतों का सार प्रस्तुत करती है:
| देश | अनुमानित मृतक (सैन्य + नागरिक) |
|---|---|
| वियतनाम | 30,00,000+ से अधिक |
| संयुक्त राज्य अमेरिका | ~58,000 सैनिक |
| कंबोडिया | 2,75,000–3,10,000 |
| लाओस | 20,000–60,000 |
नोट: उपरोक्त आंकड़े युद्ध के प्रत्यक्ष परिणामस्वरूप मृतकों के हैं। कंबोडिया में 1975 के बाद खमेर रूज शासन द्वारा किया गया नरसंहार (जिसमें अतिरिक्त ~10 से 30 लाख लोग मारे गए) इन आंकड़ों में शामिल नहीं है।
- वियतनाम पर प्रभाव: युद्ध ने वियतनाम को जनहानि के साथ-साथ भौतिक और सामाजिक रूप से भी तबाह कर दिया। बमबारी और रासायनिक हथियारों (एजेंट ऑरेंज आदि) के कारण वियतनाम के जंगल, खेत और गाँव बर्बाद हो गए; बुनियादी ढांचा नष्टप्राय हो गया और अर्थव्यवस्था चरमरा गई। अनुमानतः 12 लाख से अधिक वियतनामी नागरिकों को शरणार्थी बनना पड़ा। 1976 में देश का पुनर्एकीकरण तो हो गया, पर दक्षिण वियतनाम के पूर्व सैनिकों व सरकारी अधिकारियों को पुनर्शिक्षा शिविरों में वर्षों तक कैद रखा गया, जहाँ उन्हें कठोर परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। युद्ध की समाप्ति के बाद भी वियतनाम अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग रहा; अमेरिका ने तीन बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो कर वियतनाम की सदस्यता रोक दी और किसी भी प्रकार की सहायता पहुँचने नहीं दी। 1975 के बाद भी क्षेत्र में हिंसा पूरी तरह नहीं थमी – कंबोडिया में पोल पॉट के अधीन हो रहे नरसंहार को रोकने के लिए वियतनाम ने 1978 में हस्तक्षेप किया, जिससे उसे 1979 में चीन के साथ एक संक्षिप्त युद्ध भी लड़ना पड़ा। अगले एक दशक तक वियतनाम और आसपास के क्षेत्र में अस्थिरता बनी रही। अंततः 1980 के दशक में परिस्थितियां सुधरने लगीं – वियतनाम ने 1986 में “डॉई मॉय” नामक आर्थिक सुधार लागू किए, जिससे धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था में सुधार आया। 1990 के दशक में शीत युद्ध की समाप्ति के बाद वियतनाम के अमेरिका सहित अधिकांश देशों से कूटनीतिक संबंध सामान्य हो गए और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध हट गए। आज वियतनाम युद्ध की विभीषिका पीछे छूट चुकी है, पर उसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव दशकों तक महसूस किए गए।
- संयुक्त राज्य अमेरिका पर प्रभाव: वियतनाम युद्ध अमेरिकी इतिहास में गहरे घाव छोड़ गया, जिसने राष्ट्र को आंतरिक रूप से विभाजित करने के साथ विदेश-नीति पर भी असर डाला। सैन्य दृष्टि से अमेरिका को 58,000 से अधिक सैनिकों की जान गंवानी पड़ी और लगभग 3,00,000 जवान घायल हुए। यह संघर्ष अमेरिकी सशस्त्र बलों के लिए पहली बड़ी असफलता थी, जिसने अमेरिकी अपराजेयता के मिथक को तोड़ा। आर्थिक दृष्टि से, 1965-73 के बीच युद्ध पर $120 अरब से अधिक खर्च हुआ, जिसके कारण देश में व्यापक मुद्रास्फीति और वित्तीय अस्थिरता फैल गई। सामाजिक रूप से, इस युद्ध ने अमेरिकी जनता का सरकार पर विश्वास हिलाकर रख दिया – लगातार गलत बयानों और पेंटागन पेपर्स जैसे खुलासों ने दिखाया कि सरकार ने युद्ध की वास्तविकता को लेकर जनता को गुमराह किया था।
युद्ध के बाद अमेरिका में “वियतनाम सिंड्रोम” घर कर गया – अर्थात् विदेशी युद्धों में उलझने के प्रति जनता और नेताओं में हिचक और भय उत्पन्न हो गया। इस अनुभव ने अमेरिकी नीतियों को बदलने पर मजबूर किया। 1973 में कांग्रेस ने युद्ध शक्तियाँ अधिनियम (War Powers Act) पारित किया, जिसने राष्ट्रपति द्वारा कहीं भी सैन्य कार्रवाई शुरू करने से पहले कांग्रेस की स्वीकृति को अनिवार्य बना दिया। इसी दौरान अनिवार्य सैन्य भर्ती (मसौदा) समाप्त कर सर्व-volunteer बल की व्यवस्था की गई और 18 वर्ष की आयु वालों को मताधिकार दिया गया। हजारों लौटे हुए सैनिक शारीरिक व मानसिक पीड़ा से जूझते रहे – एक सर्वेक्षण के अनुसार वियतनाम में सेवाकर चुके लगभग 5,00,000 सैनिक पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से ग्रस्त हुए, और कई को एजेंट ऑरेंज जैसे विषैले रसायनों के संपर्क से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ हुईं। वियतनाम से लौटे सैनिकों का समाज में स्वागत भी विभाजित रहा; युद्ध-विरोधियों ने कुछ को निर्दोषों का हत्यारा कहा, तो युद्ध-समर्थकों ने कुछ को पराजय के लिए दोषी ठहराया। 1982 में वॉशिंगटन डी.सी. में वियतनाम वेटरन्स मेमोरियल का अनावरण किया गया, जिसकी काली ग्रेनाइट दीवारों पर 58,000 से अधिक अमेरिकी मृतकों व लापता सैनिकों के नाम खुदे हैं। इस स्मारक ने धीरे-धीरे राष्ट्र को उन सैनिकों के त्याग को सम्मान देने में मदद की, जिन्हें लंबे समय तक उपेक्षा झेलनी पड़ी थी।
- लाओस पर प्रभाव: वियतनाम युद्ध के दौरान लाओस औपचारिक रूप से तटस्थ था, लेकिन उत्तरी वियतनामी सेना ने लाओस के पूर्वी भाग का इस्तेमाल दक्षिण वियतनाम में घुसपैठ के लिए किया। इसे काटने के लिए अमेरिका ने लाओस पर भारी बमबारी की, जिसे “सीक्रेट वॉर” कहा जाता है। 1964 से 1973 के बीच लाओस पर अनुमानतः 20 लाख टन बम गिराए गए, जिससे देश का बड़ा हिस्सा आज भी बिना फटे बमों और बारूदी सुरंगों से अटा पड़ा है। इस गुप्त युद्ध में 20,000 से 60,000 लाओ नागरिकों की मौत हुई। 1975 में वियतनाम युद्ध समाप्त होने पर लाओस में साम्यवादी पाथेट लाओ ने सत्ता पर कब्ज़ा कर राजशाही को समाप्त कर दिया – यह परिवर्तन भी वियतनाम युद्ध के दौरान शक्ति-संतुलन बदलने का ही नतीजा था। युद्ध और क्रांति के कारण हजारों लाओ नागरिक (विशेषकर ह्मोंग जनजाति के लोग) शरणार्थी बनकर पड़ोसी देशों या अमेरिका भागने पर मजबूर हुए। आज दशकों बाद भी लाओस के ग्रामीण इलाकों में बिखरे विस्फोटक अवशेष वहां के लोगों के लिए ख़तरा बने हुए हैं। इस प्रकार लाओस को वियतनाम युद्ध का दुष्परिणाम व्यापक विनाश और एक कम्युनिस्ट शासन के रूप में भुगतना पड़ा।
- कंबोडिया पर प्रभाव: वियतनाम युद्ध के दौरान कंबोडिया भी संघर्ष की चपेट में आ गया। एक ओर उत्तरी वियतनाम ने कंबोडिया की सरहद के पास अपने सैन्य ठिकाने बना लिए, तो दूसरी ओर अमेरिका और दक्षिण वियतनाम ने इन ठिकानों पर हमला कर कंबोडिया को युद्ध में घसीट लिया। 1970 में अमेरिकी समर्थित जनरल लोन नोल ने प्रिंस नोरोडोम सिहानुक को हटाकर कंबोडिया की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया, जिसके बाद कंबोडिया खुले तौर पर अमेरिका का सहयोगी बन गया। 1970-75 के कंबोडियाई गृहयुद्ध में एक तरफ लोन नोल की सरकार (अमेरिका द्वारा समर्थित) थी और दूसरी तरफ कम्युनिस्ट खमेर रूज विद्रोही, जिन्हें वियतनाम के कम्युनिस्टों का परोक्ष समर्थन मिला। इस गृहयुद्ध और अमेरिकी बमबारी के कारण अनुमानतः 2.75 से 3.1 लाख कंबोडियाई मारे गए। अंततः अप्रैल 1975 में खमेर रूज ने राजधानी फ़नोम पेन्ह पर कब्ज़ा कर लिया और कंबोडिया में कम्युनिस्ट शासन स्थापित हो गया।
खमेर रूज की जीत वियतनाम युद्ध की सबसे भयानक परिणतियों में से एक साबित हुई। पोल पॉट के नेतृत्व में खमेर रूज ने कंबोडिया में किलिंग फ़ील्ड्स के नाम से जनसंहार चलाया, जिसमें 1975-1979 के बीच करीब 17 लाख (कुछ अनुमानों के अनुसार 20 से 30 लाख तक) कंबोडियाई नागरिक मारे गए। यह नरसंहार आधुनिक इतिहास के सबसे रक्तरंजित अध्यायों में गिना जाता है। पड़ोसी वियतनाम ने इस अत्याचार को रोकने के लिए दिसंबर 1978 में कंबोडिया पर आक्रमण किया, कुछ ही हफ्तों में पोल पॉट शासन का पतन कर दिया और खमेर रूज नेताओं को जंगलों में भागने पर मजबूर कर दिया। हालांकि, इसके साथ ही वियतनामी सेना कंबोडिया में फँस गई और 1980 के दशक में उसे गुरिल्ला युद्ध का सामना करना पड़ा। 1990 के दशक की शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र की पहल पर कंबोडिया में शांति स्थापित हुई। कुल मिलाकर, वियतनाम युद्ध ने कंबोडिया को राजनीतिक अस्थिरता, गृहयुद्ध और नरसंहार जैसे विनाशकारी परिणाम भुगतने के लिए मजबूर किया।
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव और युद्ध के बाद की स्थिरता
वियतनाम युद्ध ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और शीत युद्ध की धारणा को गहराई से प्रभावित किया। यह संघर्ष शीत युद्ध के दौरान एक प्रमुख प्रॉक्सी युद्धक्षेत्र बन गया था, जहाँ एक ओर सोवियत संघ और चीन समर्थित उत्तरी वियतनामी थे, तो दूसरी ओर अमेरिका समर्थित दक्षिण वियतनामी। वियतनाम का आंतरिक विवाद धीरे-धीरे वैश्विक महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता से जुड़ गया था – जैसा कि एक इतिहासकार लिखते हैं, “सत्रहवें समानांतर पर हुआ अस्थायी विभाजन वियतनाम के गृहयुद्ध को पूर्व-पश्चिम की प्रतिस्पर्धा से पूर्ण रूप से जोड़ गया”। इस युद्ध ने दिखाया कि एक परमाणु महाशक्ति भी पारंपरिक गुरिल्ला युद्ध में पराजित हो सकती है, जिससे अमेरिकी सैन्य अभिमान को गहरी ठेस पहुँची।
वियतनाम में अप्रत्याशित कठिनाई ने अमेरिका को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने पर मजबूर किया। युद्ध के अंतिम चरण में ही राष्ट्रपति निक्सन ने चीन के साथ रिश्ते सुधारने की पहल की, जिसकी परिणति 1972 में ऐतिहासिक बीजिंग यात्रा में हुई। माना जाता है कि अमेरिकी प्रशासन ने चीन से मेलजोल बढ़ाकर सोवियत संघ को संतुलित करने और उत्तर वियतनाम पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई। 1970 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच डेंटे (तनाव कम करने) की नीति भी उभरी, जिसके तहत दोनों ने हथियार नियंत्रण और सह-अस्तित्व के समझौते किए – वियतनाम युद्ध की थकान ने इन कूटनीतिक पहलों को प्रेरित किया। साथ ही, वियतनाम युद्ध के बाद अमेरिकी नीति-निर्माताओं में प्रत्यक्ष ज़मीनी सैन्य हस्तक्षेप को लेकर झिझक बन गई जिसे राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने बाद में “वियतनाम सिंड्रोम” कहकर संबोधित किया। 1970 और 1980 के दशकों में अमेरिका ने कहीं भी सैनिक भेजने से पहले बेहद सावधानी बरती; परिणामतः उसने कई स्थानों पर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने के बजाय परोक्ष रूप से समर्थन देने या हवाई शक्ति के प्रयोग पर ज़ोर दिया। उदाहरणतः, 1980 के दशक में अमेरिका ने सोवियत-समर्थित सरकार से लड़ रहे अफ़ग़ान मुजाहिदीनों की सहायता की, लेकिन स्वयं सैनिक नहीं भेजे। 1991 के खाड़ी युद्ध जैसे अभियानों में भी निर्णायक और सीमित लक्ष्य रखे गए ताकि वियतनाम जैसी दलदल स्थिति से बचा जा सके।
दूसरी ओर, वियतनाम युद्ध में अमेरिका की पराजय ने सोवियत संघ और उसके सहयोगियों को प्रारंभिक मनोवैज्ञानिक बढ़त दी। सोवियत नेतृत्व को लगा कि जन युद्ध (पीपुल्स वॉर) की रणनीति से पश्चिमी शक्तियों को हराया जा सकता है। शायद इसी आत्मविश्वास के साथ 1979 में सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान में हस्तक्षेप किया, पर वहां उसे अपने ही “वियतनाम” का सामना करना पड़ा। कुल मिलाकर, वियतनाम युद्ध ने शीत युद्ध के दोनों खेमों को सबक सिखाए – अमेरिका को अति-आत्मविश्वास त्यागकर संयम और कूटनीति का महत्व समझ आया, जबकि सोवियत संघ को यह एहसास हुआ कि हर संघर्ष वियतनाम नहीं होता और महाशक्ति होना भी गुरिल्ला संघर्ष में सफलता की गारंटी नहीं देता।

युद्धोत्तर काल में दक्षिण-पूर्व एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता धीरे-धीरे बहाल हुई। 1975 में कम्युनिस्ट विजय के बाद वियतनाम, लाओस और कंबोडिया तीनों देश नए साम्यवादी शासनों के अधीन थे, पर इनकी परस्पर दुश्मनी भी उभर आई (विशेषकर वियतनाम बनाम खमेर रूज कंबोडिया)। 1979 में चीन ने भी वियतनाम पर संक्षिप्त आक्रमण किया। किंतु 1980 के दशक के अंत तक इन संघर्षों का अंत हो गया – वियतनाम ने 1989 में कंबोडिया से अपनी सेना हटा ली और संयुक्त राष्ट्र के दखल से कंबोडिया में शांति स्थापना हुई। शीत युद्ध की समाप्ति के साथ क्षेत्र में बाहर से आने वाला वैचारिक हस्तक्षेप भी खत्म हो गया। 1995 में वियतनाम और अमेरिका ने पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल कर लिए, जो इस बात का संकेत था कि युद्ध के घाव भरने लगे हैं। आज युद्ध के दशकों बाद वियतनाम और उसके पड़ोसी स्थिरता और विकास की राह पर आगे बढ़ चुके हैं। फिर भी, वियतनाम युद्ध के सबक अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों और सैन्य रणनीतियों को प्रभावित करते हैं, तथा वह संघर्ष इतिहास में एक चेतावनी बनकर दर्ज है कि महाशक्तियों के लिए भी सैन्य हस्तक्षेप के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
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