Veer Savarkar: भारत के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं जिनके योगदान और भूमिका को लेकर आम जनमानस और राजनीतिक दलों में स्पष्ट मतभेद हैं। विनायक दामोदर सावरकर या ‘वीर सावरकर’ भी ऐसी ही एक हस्ती हैं। उनकी पुण्यतिथि पर यह जरूरी हो जाता है कि हम उनके जीवन, योगदान, और उनसे जुड़े विवादों की गहन समीक्षा करें।
प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी गतिविधियां(Veer Savarkar)
विनायक दामोदर सावरकर(Veer Savarkar) का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले में हुआ था। युवावस्था से ही वे स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध आवाज उठाई और युवाओं को क्रांति के लिए प्रेरित किया। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की शुरुआत भारत के साथ-साथ लंदन में भी हुई, जहां वे कानून की पढ़ाई करने गए थे।
जैक्सन हत्या कांड और गिरफ्तारी(Veer Savarkar)
1909 में नासिक के जिलाधिकारी जैक्सन की हत्या हुई, जिसकी जिम्मेदारी क्रांतिकारी युवा अनंत लक्ष्मण कन्हारे ने ली। जांच में पता चला कि हत्या के लिए इस्तेमाल की गई पिस्तौल सावरकर ने भेजी थी। इसके बाद लंदन में उन्हें गिरफ्तार किया गया और भारत प्रत्यर्पित किया गया।
जहाज से ऐतिहासिक छलांग
सावरकर(Veer Savarkar) को 1910 में भारत लाते समय, समुद्र में उन्होंने एक दुस्साहसिक छलांग लगाकर बच निकलने की कोशिश की। फ्रांस के तट पर पहुंचकर उन्होंने राजनीतिक शरण मांगी, लेकिन भाषाई बाधा के कारण उन्हें पुनः अंग्रेजी हुकूमत को सौंप दिया गया।
काला पानी की सजा
बंबई पहुंचने के बाद उन पर(Veer Savarkar) मुकदमा चला और उन्हें दो अलग-अलग मामलों में 50 साल की सजा सुनाई गई। उन्हें कुख्यात सेल्यूलर जेल (काला पानी) में भेजा गया।
सेल्यूलर जेल की यातनाएं
अंडमान की जेल में सावरकर को असहनीय यातनाएं दी गईं। जेल में कैदी का जीवन जानवरों से बदतर था। कठोर श्रम, अमानवीय व्यवहार, गंदा खाना और मानसिक उत्पीड़न ने कई कैदियों को तोड़ दिया, लेकिन सावरकर ने एक दशक तक यह सब साहसपूर्वक सहा।
क्षमा याचिकाओं का विवाद
सावरकर ने जेल से रिहाई के लिए ब्रिटिश सरकार को क्षमा याचिकाएं लिखीं, जो आज तक विवाद का विषय बनी हुई हैं। उनके आलोचक इन याचिकाओं को उनकी कमजोरी और समर्पण का संकेत मानते हैं, जबकि समर्थकों का मानना है कि ये याचिकाएं रणनीतिक कदम थीं, ताकि वे बाहर आकर स्वतंत्रता संघर्ष में पुनः सक्रिय हो सकें।
राजनीतिक गतिविधियां और हिन्दुत्व की विचारधारा
1921 में जेल से रिहा होने के बाद सावरकर ने अपनी राजनीतिक विचारधारा को आकार दिया। उन्होंने “हिंदुत्व” की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसका मुख्य आधार हिन्दू राष्ट्रवाद था। सावरकर ने हिन्दू महासभा का नेतृत्व किया और कांग्रेस तथा गांधी की धर्मनिरपेक्ष सोच के खिलाफ खुलकर खड़े हुए।
गांधी हत्या मामला और विवाद
30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद सावरकर को हत्या की साजिश रचने और उकसाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हालांकि, अदालत ने उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया, परन्तु गांधीवादी और सेक्युलर ताकतों की दृष्टि में वे हमेशा दोषी बने रहे।
सावरकर के समर्थन और विरोध में विभाजन
गांधी हत्या कांड के बाद से ही भारत के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में सावरकर को लेकर दो धड़े स्पष्ट रूप से बन गए। एक धड़ा उन्हें महान क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी मानता है, तो दूसरा धड़ा उन्हें गांधी की हत्या का परोक्ष दोषी और ब्रिटिश शासन से क्षमा याचना करने वाला व्यक्ति मानता है।
संघ परिवार और सावरकर का रिश्ता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सावरकर के संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। हालांकि हिंदुत्व की वैचारिकी ने उन्हें अंततः करीब ला दिया। भाजपा और संघ परिवार सावरकर को हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रतीक मानकर उनका सम्मान करते हैं, जिससे राजनीतिक विवाद अक्सर सामने आता है।
राजनीतिक विवाद और संसद
सावरकर भले ही कभी संसद सदस्य नहीं रहे, लेकिन उनकी विचारधारा और व्यक्तित्व संसद में अक्सर चर्चा का विषय बनते रहे हैं। उनकी पुण्यतिथि और जयंती पर संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह उनके समर्थन और विरोध में तीखी बहस देखने को मिलती है।
सम्मान का विवाद
अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में सावरकर की याद में सेल्यूलर जेल में पट्टिका लगाई गई, जिसे यूपीए सरकार ने हटवा दिया। मोदी सरकार ने पुनः इसे स्थापित कर विवाद को नया जीवन दिया।
निष्कर्ष
विनायक दामोदर सावरकर का व्यक्तित्व और जीवन देश के लिए प्रेरणा और विवाद दोनों के स्त्रोत बने हुए हैं। उनके समर्थक उन्हें एक महान राष्ट्रवादी योद्धा के रूप में देखते हैं, जबकि विरोधी उन्हें विवादित और विभाजनकारी व्यक्तित्व के रूप में चित्रित करते हैं।
यह स्थिति बताती है कि भारतीय इतिहास में वीर सावरकर की जगह एक जटिल, बहुपक्षीय और विवादित व्यक्तित्व की है, जिसका पूर्ण विश्लेषण समय और परिस्थितियों के संदर्भ में ही संभव है।
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