मक्का खेती का महत्व
मक्का (कॉर्न) भारत में एक प्रमुख फसल है, जिसका उपयोग भोजन, चारा और औद्योगिक कच्चे माल के रूप में होता है। मई का महीना खरीफ सीजन की मक्का खेती के लिए आदर्श समय है। इस दौरान सही तकनीक और समय पर कार्य करने से किसान बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं।
खेत की तैयारी
मक्का की अच्छी पैदावार के लिए खेत की गहरी जुताई बेहद जरूरी है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और उसके बाद 2-3 बार देशी हल या रोटावेटर से जुताई करें। जुताई के बाद खेत को समतल और भुरभुरा बनाएं ताकि बीज आसानी से अंकुरित हो सकें।
बीज का चयन और उपचार
बेहतर उत्पादन के लिए उन्नत किस्मों के बीज जैसे कि “एचएम-4”, “प्रभात”, “सुजीत-1” आदि का चयन करें। बुआई से पहले बीजों को फफूंदनाशक दवाओं से उपचारित करना चाहिए ताकि बीज जनित बीमारियों से सुरक्षा मिल सके।
बुवाई का सही समय और विधि
मक्का की बुवाई मई के पहले पखवाड़े में कर देनी चाहिए। बीजों को कतारों में 60-75 सेंटीमीटर की दूरी पर और पौधे से पौधे के बीच 20-25 सेंटीमीटर की दूरी रखकर बोना चाहिए। प्रति हेक्टेयर लगभग 18-20 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है।
उर्वरक प्रबंधन
मक्का की फसल को पर्याप्त पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। बुवाई से पहले खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद डालें। इसके अलावा, 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। नाइट्रोजन को तीन भागों में बांटकर देना फायदेमंद होता है।
सिंचाई प्रबंधन
मक्का की खेती में पहली सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद करनी चाहिए। इसके बाद फूल निकलने और दाना भरने के समय विशेष ध्यान देकर सिंचाई करनी चाहिए। अत्यधिक पानी या जलभराव से बचना चाहिए, वरना फसल खराब हो सकती है।
खरपतवार नियंत्रण
खरपतवार मक्का की बढ़वार को बाधित करते हैं। बुवाई के 20-25 दिन बाद एक बार गुड़ाई जरूर करें और यदि आवश्यक हो तो हर्बीसाइड का भी उपयोग करें।
रोग और कीट प्रबंधन
मक्का में तना छेदक, फॉल आर्मीवर्म, पत्ती धब्बा रोग आदि आम समस्याएं होती हैं। इनके नियंत्रण के लिए समय-समय पर जैविक या रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करें।
फसल कटाई और भंडारण
जब मक्का के पौधे पूरी तरह सूख जाएं और दाने कठोर हो जाएं, तब फसल काटनी चाहिए। कटाई के बाद दानों को अच्छी तरह सुखाकर भंडारण करें ताकि नमी के कारण खराबी न हो।
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