भारत में गेहूं की कटाई के बाद बचे अवशेष, यानी पराली को खेतों में जलाना एक आम परंपरा बन चुकी है। हालांकि यह तरीका किसानों के लिए सरल और त्वरित समाधान प्रतीत होता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव भूमि, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं।
पराली जलाने के कारण खेत को होने वाले नुकसान
मिट्टी की उर्वरता में गिरावट
जब किसान पराली जलाते हैं, तो उच्च तापमान के कारण मिट्टी की ऊपरी परत में मौजूद उपयोगी सूक्ष्मजीव मर जाते हैं। ये सूक्ष्मजीव जैविक पदार्थों के विघटन और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके नष्ट होने से मिट्टी की उर्वरता धीरे-धीरे घटने लगती है।
पोषक तत्वों का नुकसान
पराली जलने से मिट्टी में मौजूद मुख्य पोषक तत्व जैसे- नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम और सल्फर भी नष्ट हो जाते हैं। इससे अगली फसल के लिए खेत में प्राकृतिक पोषक तत्वों की भारी कमी हो जाती है, जिसके कारण किसान को रासायनिक खादों पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है।
मिट्टी की संरचना में खराबी
लगातार पराली जलाने से खेत की मिट्टी सख्त और बंजर होने लगती है। इसका सीधा प्रभाव जल धारण क्षमता पर पड़ता है और मिट्टी की हवा अवरोधक शक्ति कम हो जाती है, जिससे पौधों की जड़ें सही तरह से विकसित नहीं हो पातीं।
पर्यावरणीय और स्वास्थ्य समस्याएँ
पराली जलाने से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य विषैली गैसें वातावरण में फैलती हैं। इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है, जो न केवल इंसानों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि जलवायु परिवर्तन में भी योगदान देता है।
समाधान: पराली के प्रबंधन के वैकल्पिक तरीके
पराली का मशीनों से प्रबंधन
आजकल बाजार में कई ऐसी आधुनिक मशीनें उपलब्ध हैं जैसे- सुपर सीडर, हैपी सीडर और रोटावेटर, जो पराली को बिना जलाए खेत में ही मिलाकर अगली फसल की बुआई में मदद करती हैं।
जैविक खाद बनाना
पराली का उपयोग खाद बनाने के लिए भी किया जा सकता है। कम्पोस्टिंग विधि से पराली को सड़ाकर उत्तम जैविक खाद तैयार की जा सकती है, जिससे खेत की उर्वरता बढ़ती है।
पराली से ऊर्जा उत्पादन
कुछ तकनीकों के जरिए पराली से बायो-एनर्जी या बायो-गैस बनाई जा सकती है, जिससे किसान को अतिरिक्त आमदनी का साधन भी प्राप्त होता है।
निष्कर्ष
गेहूं की पराली जलाना तत्कालीन समाधान भले ही लगे, लेकिन इसके गंभीर दुष्परिणाम भविष्य की कृषि और मानव जीवन को गहरा नुकसान पहुँचा सकते हैं। किसानों को चाहिए कि वे पराली के प्रबंधन के वैकल्पिक उपाय अपनाएँ और अपनी मिट्टी तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखें।
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