जीरा एक प्रमुख मसाले वाली फसल है, जिसकी खेती से किसानों को अच्छा मुनाफा मिल सकता है, बशर्ते वे इसकी बुवाई, जलवायु, सिंचाई और फसल सुरक्षा से जुड़ी जरूरी बातों का ध्यान रखें। आइए जानते हैं जीरे की खेती के लिए किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।
बुवाई का उपयुक्त समय और विधि
जीरे की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त समय 25 से 30 नवंबर के बीच होता है। बुवाई छिड़काव विधि से न करके, लोहे या लकड़ी के हुक से 25–30 सेमी. के अंतराल पर कतारें बनाकर करनी चाहिए। इसके बाद ऊपर से दंताली चलाकर बीज को ढक देना चाहिए, लेकिन ध्यान रखें कि मिट्टी की परत 1 सेमी. से अधिक मोटी न हो। इससे न सिर्फ बीज अच्छी तरह अंकुरित होते हैं, बल्कि सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण में भी सुविधा मिलती है।
जलवायु और तापमान की भूमिका
जीरे की खेती के लिए शुष्क एवं ठंडी जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
बुवाई के समय तापमान: 24 से 28 डिग्री सेल्सियस
फसल वृद्धि के समय तापमान: 20 से 25 डिग्री सेल्सियस
बीज पकने के समय अपेक्षाकृत गर्म और शुष्क मौसम उत्तम होता है।
उपयुक्त मिट्टी और पीएच मान
वैसे तो जीरे की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में संभव है, लेकिन रेतीली, बलुई या दोमट मिट्टी, जिसमें कार्बनिक पदार्थों की अधिकता हो और उचित जल निकास हो, उसे सबसे उपयुक्त माना जाता है।
मिट्टी का पीएच मान: 5.5 से 7.5
अधिक पालाग्रस्त क्षेत्रों और अत्यधिक नमी वाले इलाकों में जीरे की खेती नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे छाछ्या और झुलसा रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
सिंचाई विधि और सावधानियां
फव्वारा विधि (Sprinkler Irrigation) को जीरे की सिंचाई के लिए सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि इससे फसल को संतुलित मात्रा में पानी मिलता है।
पकती फसल में सिंचाई नहीं करनी चाहिए।
दाना बनने की अवस्था में अंतिम सिंचाई गहराई से करनी चाहिए, ताकि दाने अच्छी तरह विकसित हो सकें।
फसल चक्र और रोग नियंत्रण
हर साल एक ही खेत में जीरा न बोएं। यदि पिछले साल भी उसी खेत में जीरे की खेती की गई थी, तो उसमें फिर से जीरा बोने से रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है।
फसल चक्र अपनाएं और जमीन को समय दें ताकि रोगजनक तत्व खत्म हो सकें।
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