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विकास पत्रकारिता

2). विकास के राजनैतिक सिद्धान्त

इसके तीन सिद्धान्त हैं:-

  • संरचनात्मक प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण
  • सामाजिक प्रक्रिया का दृष्टिकोण
  • सामाजिक परिवर्तन का सिद्धान्त

● संरचनात्मक प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण:- 1950 और 90 के दशकों में व्यवस्था परक अध्ययन को महत्व दिया जाता था। व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए इसके विभिन्न संरचनाओं एवं प्रकारों के आगम एवं निर्गम के आधार पर अध्ययन किया गया। इस संदर्भ में डेविड ईस्टर्न , लुशियन डब्ल्यूपाई, आमंत पोवेट, कॉल मैन आदि के अध्ययन प्रमुख माने जाते हैं।राजनैतिक विकास की अवधारणा को मुख्य रूप से अध्ययन करने वालो में से लुशियन पाई का नाम लिया जाता है, उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा इस संबंध में आने वाले , लिखे जाने वाले साहित्य , को प्रभावित किया। वे किसी भी प्रणाली को विकसित तभी मानते हैं जब अधिक मात्रा में तीन तत्व पाए जाएं। वे तीन तत्व हैं- समानता , क्षमता, और विभेदीकरण।

समानता से उनका तात्पर्य है एक विकासशील व्यवस्था में जन साधारण द्वारा राज्य के कार्यो में अधिक भाग लेना तथा स्वाभाविक रूप से समानता के सिद्धान्त के प्रति अधिक संवेदनशील होना।

क्षमता के माध्यम से सार्वजनिक कार्य को संचालन करने , वैचारिक मतभेदों को नियंत्रित रखने और सार्वजनिक मांगों के साथ निपटने की अधिक शक्ति से होता है।

जहाँ तक राजनैतिक व्यवस्था के गठन का संबंध है तो वहाँ एक विकासशील राजनैतिक व्यवस्था से अपेक्षा की जाती है कि उसकी सहभागी संस्थाओं में संरचनात्मक विभेदीकरण( काम का बटवारा/ classification) और कार्यात्मक विशेषता एवं समाकलन की मात्रा में वृद्धि हो। पाई का विचार था कि किसी भी विकासशील व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए उसमें समानता, क्षमता , विभेदीकरण की विशेषताओं को ढूढना चाहिए।

आमंड ने लगभग पाई के अनुसार ही प्रजातांत्रिक उप-व्यवस्था , स्वायत्ता एवं विभेदीकरण का नाम दिया है।आमंड और पाई के पहले दो तत्व , समान ही हैं इस प्रकार पाई व आमंड के सिद्धान्तों में काफ़ी हद तक एक रूपता है।इसी के अनुरूप रस्टीव के आर्थिक विकास की अवस्थाओं के अनुरूप आगेस्की के अनुसार राजनैतिक विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विकासशील समाजो को चार चरणों से गुजरना पड़ता है:-

  • राजनैतिक एकीकरण:- अधिक से अधिक शक्ति राज्यों के हाथों में होना।
  • उद्योगीकरण:- बिना औद्योगिक करण के विकास नहीं किया जा सकता।
  • लोककल्याण:- राजनैतिक और आर्थिक सामर्थ्य जो है वह लोगों को मिले तभी विकास किया जा सकता है।
  • भौतिक साधनों की प्रचुरता:- ऊँचे से ऊँचे स्तर का निर्माण करना

एक चीज दूसरे से प्रभावित होती भी है और दूसरों को प्रभावित करती भी है।

2). सामाजिक प्रक्रिया का दृष्टिकोण:- सन 1960 के दशक के अंतिम वर्षों मे आया। 1960 के दशक के बाद के वर्षों में राजनीतिक विकास के अध्ययन का केंद्र आर्थिक सामाजिक संरचना के अध्ययन से हटकर राजनीतिक पात्रों और संस्थाओं को इच्छा एवं क्षमता की दिशा में बढ़ने लगे। इस श्रेणी में काम करने वाले प्रमुख विद्वान हैं s.n आई जेन्स, टेडत हेल्पर्न , एस.पी हुडिंगतन, डायमंड हाल्ट, टर्नर आदि ने विकास के लिए निम्न पहलुओं को माना है।

  • राजनीतिक विकास एक लक्ष्य प्राप्ति तक सीमित न होकर एक निरंतर प्रक्रिया है अथवा इसे एक स्थायी आंदोलन हेतु क्षमताओं का सतत प्रयास माना है।
  • इसके समर्थकों ने इसे इच्छा और क्षमता के दृष्टिकोण , समस्या, समाधान , सामर्थ्य, संस्थापन नए लक्ष्यों को स्वीकारने की क्षमता आदि , भिन्न-भिन्न संदर्भो में परिभाषित किया है।
  • राजनीतिक विकास केवल विभिन्न चरणों अथवा एक समरूप स्थिति में नहीं माना जा सकता अपितु यह प्रक्रिया हमेशा उतार चढ़ाव के रूप में होता है।
  • राजनीतिक विकास निरंतर सफलता की प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसमें परिवर्तन एवं दिशा बदलाव भी आते हैं कभी- कभी विकास के बजाय राजनीतिक रुकावट/ह्रास भी होती है यह प्रक्रिया विकास चक्र में फस जाती है।
  • राजनैतिक व्यवहार एवं प्रक्रिया पर अधिक बल दिया जाता है न कि सामाजिक प्रणाली व व्यावस्थापरक में व्यवहारवादी एवं अनुभव सिद्द पद्धति को अपनाया ,न कि व्यावस्थापरक पद्धति की।
  • इस दृष्टिकोण में संबंधित प्रक्रियाओं पर यानी कार्यकारणी की व्यवस्था पर अधिक बल दिया जाता है।
  • यह दृष्टिकोण विभिन्न कारकों अर्थात एक प्रकार के कारकों व दूसरे प्रकार के कारकों के माध्यम सम्बन्धो से जुड़ा है। इसलिए यह परिवर्तन के अध्ययन के लिए व्यावस्थापरक सिद्धान्त से बेहतर है।

3) सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत:- इस सिद्धान्त को 1960 के अंतिम दशक में राजनीतिक परिवर्तन के रूप में देखा गया। इस सिद्धान्त के तीन क्षेत्र हैं:-१) घटकीय परिवर्तन-sp २) संकटपरिवर्तन- जियावन ३) जटिल परिवर्तन- रोनाल्ड डी ब्रूनर

समग्रता में पांच तत्व माने जाते हैं:- १) संस्कृत २) संरचना ३) समूह ४) नेतृत्व ५) नीतियां

● घटकीय परिवर्तन:- इसके संदर्भ में राजनीतिक व्यवस्था के घटकों को एक दूसरे से भिन्न करके देखने और यह पता लगाने पर है कि एक घटक के परिवर्तनों और दूसरे घटक के परिवर्तन के बीच क्या संबंध है। अतः राजनीतिक परिवर्तन की समग्रता को समझने के लिए यह जरूरी है कि पांच घटकों- संस्कृत , संरचना, समूह ,नेतृत्व और नीतियों में से प्रत्येक में होने वाले परिवर्तनों एवं घटकों में होने वाले परिवर्तनों के बीच संबंधों का गहराई के साथ अध्ययन किया जाए।यानी घटकीय परिवर्तन में समझने के लिए इन घटकों के उद्देश्य , हितों एवं मूल्यों को व्यापक रूप से समझना होगा।

● संकट परिवर्तन:- इस दृष्टिकोण के अंतर्गत स्थित प्रणाली(जो अभी है) पर पड़ने वाले आंतरिक एवं बाह्य प्रभावों का अध्ययन करना पड़ेगा। इसके कारण , राजनीतिक माँगो के स्वरूप और राजनीतिक स्त्रोतों के विवरण , दोनों में ही अंतर आता है। ये परिवर्तन तब स्वतंत्र परिवर्तन का स्वरूप लेते हैं जब इनका उपयोग राजनीतिक नेतृत्व, राजनीतिक गठबंधनों में निर्माण और नए राजनीतिक लाभों को उपलब्धि के लिए करता है। रस्टीव ने संकट परिवर्तन उपागम के लिए एक नया स्वरूप प्रस्तुत किया ,इनके अनुसार परिवर्तन का आरंभ होता है जब वर्तमान परिस्थिति के प्रति असंतोष की भावना जन्म लेती है और उसके परिणामस्वरूप नई राजनीतिक गतिविधियों का जन्म होता है।

जटिल परिवर्तन:- इसके अनुसार राजनीतिक परिवर्तन अपने आप में एक जटिल प्रक्रिया है और उनके अध्ययन के लिए 22 परिवर्तियों और 20 प्रायलयो(प्रयास) का उल्लेख है। जिनकी सहायता से ग्रामीण एवं नागरिक क्षेत्रों का तथा लोकतांत्रिक उपव्यवस्था , आर्थिक उपव्यवस्था तथा राजनीतिक उपव्यवस्था का अध्ययन किया जा सकता है।

इनके अलावा पाश्चात्य राजनीतिक शास्त्रियों ने राजनीतिक विकास के आधुनिकीकरण के संदर्भ में भी प्रस्तुत किया है। इसलिए नव स्वतंत्र एशिया , अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका के देशों को राजनीतिक विकास की ओर तभी अग्रसर माना जाता था जब वे पश्चिमी देशो की संस्थाओं एवं पद्धतियों का अनुसरण करने लगे।

3). आर्थिक सिद्धांत :- आर्थिक सिद्धान्त में आर्थिक विकास की समस्या जो कि प्राचीनकाल से ही अर्थव्यवस्था के लिए आकर्षक का केंद्र रही है जिसके चलते क्लासिक युग से लेकर आज तक अर्थ शास्त्रियों ने विभिन्न सिद्धांतों की स्थापना की है।

आर्थिक सिद्धान्त के तीन सिद्धान्त हैं:- 1) पूंजीवादी सिद्धान्त 2) मार्क्सवादी सिद्धान्त 3) विकासशील देशों का सिद्धांत

पूंजीवादी सिद्धान्त मूलतः पूंजी के विकास एवं संग्रह की मान्यताओं पर आधारित है जहाँ ये विकास ज्यादा होगा उसे विकसित प्रणाली माना जायेगा और जहाँ ये विकास कम होगा उसे अविकसित प्रणाली माना जायेगा। पूंजीवादी सिद्धान्तों की सुस्पष्ट रूप से समझने के लिए इन्हें तीन वर्ग में बाता गया है।

1) पूंजीवादी सिद्धान्त:-इसके तीन भाग हैं:-

१) क्लासिक युग का सिद्धान्त:- इस सिद्धांत को एडम स्मिथ (1723 से 1790) , डी. बी.रिगार्डो(1772-1790 तक), जे.बी. मालथुस(1776 से 1834 तक) एवं जेम्स मिलर(1806-73) से जुड़ा हुआ माना जाता है।एडम स्मिथ ने सबसे पहले यह सिद्धान्त (WEALTH OF NATION-1776) में दिया।

क्लासिक युग के सिद्धान्त की मुख्य विशेषताएं:-

  • अहस्तपक्षेप की नीति
  • विकास का मूल मंत्र,पूंजी का संचय
  • लाभ कमाना भावी पूंजी निवेश का मुख्य इनाम होता है।
  • उत्पादकों के मध्य प्रतिस्पर्धा प्रणाली की चुस्ती।
  • उपभोक्ता की प्रभसत्ता सर्वोपरी।
  • नौकरी के पूर्ण अवसर उपलब्ध होंगे।
  • पूंजी संग्रह के आधार पर स्थायी राज्यो की स्थापना होगी।

इन विशेषताओं के आधार पर कहा जा सकता है कि क्लासिक सिद्धान्त के आधार पर विकास मुख्यता बाजार व्यवस्था पर टिका हुआ है। राजनीतिक स्तर पर आर्थिक विकास का अर्थ होगा व्यक्तिगत अधिकार ,स्वतंत्रता, कानूनी एवं राजनीतिक समानता तथा उदार प्रजातंत्र।

इसकी आलोचना/कमियां

  • केवल बाजार पर आधारित
  • पूंजी पर अधिकार होना(छोटी कंपनियों की नष्ट कर देना)
  • तकनीक के विकास को महत्व तब तक देना जब तक लाभ ज्यादा से ज्यादा हो।

२) नव-क्लासिक सिद्धान्त:- यह सिद्धान्त सन 1871 में सामने आया।आर्थिक विकास के संदर्भ में इस सिद्धान्त का विकास सन 1871 में हुआ । जिसे जीवोन के theory of political economy(1871), मेंजर के principal of economics (1871),एवं वालरस के elements of pure economic (1874) आदि ग्रंथो से इस परिवर्तन का पता चलता है,इनके बाद वाईजर और भोम बावरक एवं मार्शल ने इन विचारों को आगे बढ़ाया । प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जे.एम केम्स ने नव क्लासिक सिद्धान्त को गति प्रदान की।क्लासिक सिद्धान्त जहाँ आर्थिक विकास ,राष्ट्रीय संपत्ति में बढ़ोतरी तथा पूंजी के संचय की समस्याओं से जुड़ा हुआ था तो वहीं नव क्लासिक सिद्धान्त मुलतः संसाधनों के वितरण , अत्यधिक लाभ तथा बाजार संतुलन को महत्व देता है।केन्ज ने क्लासिक सिद्धान्त में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किए-

  • बेरोजगारी का सिद्धांत
  • पूंजीवाद को बचाने के लिए सामाजिक संतुलन पर बल
  • असमानता को दूर करने के लिए राज्य एवं सामाजिक हस्तक्षेप को मंजूरी

नव क्लासिक सिद्धान्त में निम्न कारणों से राज्य की भूमिका का समावेश किया गया है,इसके तीन संदर्भ हैं:-

  1. राज्य की बाजार व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए तीन संदर्भों में राज्य का हस्तक्षेप को आमंत्रित किया १) प्रत्येक व्यक्ति एवं परिवार को उनके परिवार द्वारा किये गए कार्य के बाजार मूल्य को देखे बिना उन्हें न्यूनतम मजदूरी/आमदनी उपलब्ध कराना २) सुरक्षा संबंधी आपात स्थितियों पर ध्यान देकर असुरक्षा की भावना को कम करना ३) प्रत्येक नागरिक को बिना पक्षपात के सामाजिक सेवाएं उपलब्ध कराना।
  2. स्वायत्त संस्थाओं के माध्यम से राज्य की भूमिका का विस्तार करना।
  3. कल्याणकारी योजनाओं के द्वारा व्यक्ति की गरीबी, भुखमरी, बेकारी, बुढ़ापा, आदि में मदद करते हुए संसाधन उपलब्ध कराना।

इसकी आलोचना क्यों?

अगर राज्य को छोड़ दिया जाए तो यह सिद्धांत हूबहू क्लासिक सिद्धान्त की तरह है यानी नव क्लासिक , क्लासिक सिद्धान्त पर लगाई गई एक लेप की तरह है।

३) भूमंडलीकरण का सिद्धांत(१९९० के दशक में):- १९९० के दशक में भूमंडलीकरण का सिद्धांत ,प्रतिपादित हुआ। जब नव क्लासिक एवं मार्क्सवादी की कल्याणकारी गतिविधियों को धक्का लगा। पूर्व सोवियत संघ ने समाजवादी व्यवस्था टूटने लगी,इसके परिणामस्वरूप भूमंडलीकरण, उदारीकरण एवं मुक्त व्यापार व्यवस्था को बल मिला पूंजीवादी व्यवस्था एवं उनके ढांचों के विकास की सभी समस्याओं का एक मात्र हल समझा जाने लगा।भूमंडलीकरण में निम्न पहलुओं पर बल दिया गया:-

  • आर्थिक विकास के लिए मुक्त बाजार एवम व्यक्ति परक पहल को औचित्य पूर्ण माना गया।
  • उत्पादन का मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक लाभ कमाना माना गया।
  • विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को विकसित देशों की अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए ढांचागत सुधारो पर बल दिया गया।
  • विश्व अर्थव्यवस्था में दक्षिण के देशों की भागीदारी और कम होना।
  • राज्य की भूमिकाओं को और सीमित करना।
  • सीमांत उत्पादकों को मिलने वाली रियायत को समाप्त करना । विकास के विभिन्न स्तरों के बावजूद सभी राज्यों को एक खुली प्रतिस्पर्धा के लिए बाजार की स्थित पर छोड़ दिया गया है। अब का समाज लोगों की मदद के लिए , राज्य एक प्रमुख प्राधिकरण (ऑथोरिटी) नही रहा, हाँ, इतना जरूर हुआ है कि संसाधनों एवं अत्यधिक विकास से नई समस्याएं आने लगी हैं जिसे एक नए अवधारणीय विकास के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमे माना गया है कि
  1. वर्तमान पीढ़ी वाला विकास भावी पीढ़ी की कीमत पर नहीं होगा।
  2. पर्यावरण से मित्रतापूर्ण रिश्ते पर विकास आधारित होना चाहिए, क्योकि पर्यावरण और विकास का गहरा संबंध है।
  3. विकास की एक प्राकृतिक सीमा है।
  4. धारणीय व्यवस्था के लिए राज्य स्तर के तथ्यों पर महत्व देना ताकि हाशिये पर स्थित समूहों का भी महत्व हो।

मार्क्सवादी सिद्धान्त:- वर्ग हितों के संदर्भ में अर्थव्यवस्था को परिभाषित किया।

मार्क्स ने विकास की प्रक्रिया को इतिहास में सामाजिक आर्थिक उतपादन ढाँचे के अनुरूप माना है। मार्क्स ने विकास के पाँच चरणों का उल्लेख किया है:- 1) दास अर्थव्यवस्था 2) सामंतवादी अर्थव्यवस्था 3) पूंजीवादी/औद्योगिक अर्थव्यवस्था 4) समाजवादी अर्थव्यवस्था 5) साम्यवादी अर्थव्यवस्था

मार्क्स के अनुसार जिस प्रकार पूंजी के आगमन के साथ नए युग का प्रारंभ हुआ उसी प्रकार से मजदूरी के आने से विकास के एक नए युग यानी समाजवाद का प्रारंभ हुआ, अंतिम स्तर तक पहुचने के लिए एक बद्धता वाली संस्थान (साम्यवादी दल) की जरूरत है जिसके द्वारा भेदभाव रहित व समानता पर आधारित वर्ग रहित व राज्य रहित समाज की स्थापना की जा सके। इस प्रकार मार्क्सवादी विकास के एक समाजवादी ढांचे को उचित मानता है तथा इसके अन्तर्गत योजना एवं सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के महत्व पर बल दिया जाता है। पूर्ण समानता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राज्य के हस्तक्षेप को अनिवार्य माना गया है।

इसकी आलोचना क्यों:-

1) आलसी होना/ हो जाना 2) ऋण ग्रस्त होना 3) अत्यधिक नियंत्रण अर्थात तानाशाह प्रवृत्ति को जन्म देना।

विकासशील देशों के सिद्धांत:- ये सिद्धान्त मुख्यतः पूंजीवादी और मार्क्सवादी सिद्धान्तों से अलग है लेकिन दोनों से प्रभावित है।

विकासशील देशों के तीन सिद्धांत हैं:- १) निर्भरता(dependency) का सिद्धान्त २) गाँधीवादी सिद्धान्त ३) मानव संसाधन विकास का सिद्धान्त

१) निर्भरता का सिद्धान्त:- 1950 के दशक से, तीसरे दुनिया के देशों को समझने के लिए निर्भरता का सिद्धान्त प्रकाश में आया। निर्भरता के अंतर्गत एक ऐसी प्रक्रिया को माना जाता है जिसके माध्यम से हासिये पर स्थित देशों को अंतरराष्ट्रीय पूंजीवादी व्यवस्था में मिलाया जा सके।इस सिद्धान्त के समर्थक थे एजी फ्रैंक , पॉल बरान, सेल्सो फुरटानडो ,मोंडल कोरदोसो, राउल परेबीसीज़। निर्भरता के बारे में इनका अभाव रहा है परंतु इसकी तीन धाराएं देखने को मिलती हैं:-

  • संरचनात्मक कार्यात्मकता:- इससे जुड़ी सुधारवादी धारा जो मुख्यतः संयुक्त राज्य के लैटिन अमेरिकी देशों के आयोग , राउल परेबिसिज की अध्यक्षता में उभरी। यह धारा केंद्र परिधि को ‘ एक ही सिक्के के दो पहलू’ मानती है तथा विकास को केंद्र की परिधि के राज्यो पर विजय के रूप में परिभाषित करती है।
  • क्रांतिकारी धारा:- जो विकासशील राज्यों में गैर विकास के ही विकास मानती है ए.जी.फ्रैंक इसके सिद्धनतकार हैं। उन्होंने आर्थिक विकास को मेट्रोपोलच एवं उपग्रह की दृष्टि से देखा है जिसमें एक ओर विकसित राज्य तथा दूसरी तरफ विकासशील राज्यों के रूप में देखा गया है।
  • निर्भरता धारा:- निर्भरता धारा निर्भरता विकास के नाम से जानी जाती है जिसका नेतृत्व मोंडल कोरडोसो ने किया। इनका मानना है कि विकास की निर्भरता , पूंजीवाद का ‘एकाधिकार विकास’ जो तीसरी दुनिया के देशों को पूंजीवाद के प्रति निर्भर बना देती है। इसके निम्नलिखित बिंदु हैं:- 1) औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के सिद्धान्त पर ज्यादा बल दिया गया। पूंजी वादी देशों के द्वारा औपनिवेशिक बाजारों के माध्यम से पूंजी संचय एवं औद्योगिकरण को बढ़ावा देकर केवल कुछ हद तक उत्तरदायी माना जा सकता है। 2) घरेलू व निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के बीच विभेद पैदा कर दिया गया है।

२) गाँधीवादी सिद्धान्त:- यह सिद्धान्त पश्चिमी सिद्धान्तों से बिल्कुल भिन्न है। गाँधीवादी सिद्धान्त में विकास के सिद्धान्त को समग्रता से माना गया है। गाँधी जी ने विकास में मूल्यों(नैतिकता) का भी समावेश किया है इस सिद्धान्त का मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति को उसकी न्यूनतम आवश्यकता के अनुरूप अगर साधन की प्राप्ति न हो तो उसे विकास नहीं माना जा सकता।इस सिद्धान्त का मानना था कि आर्थिक विकास एक जटिल प्रक्रिया है जिसमे नैतिक , सामाजिक एवं भौतिक पहलू सम्मिलित हैं। नैतिक मूल्य:- विकास के नैतिक मूल्यों ने मुख्य रूप से सत्य, अहिंसा, संयम , अपरिग्रह, चोरी न करना, निडर, स्वदेशी मेहनत से रोटी कमाना, धार्मिक सहिष्णुता, शाकाहारी, प्राकृतिक चिकित्सक एवं सादा जीवन शामिल है। सामाजिक स्तर:- सामाजिक स्तर के अन्तर्गत नारी समानता, छुआ छूट की समाप्ति, नशा निषेध , शिक्षा, साम्प्रदायिक सद्भाव , ग्रामीण एवं समन्वय शामिल है। भौतिक स्वरूप:- इसके अधीन विकास का अर्थ ग्रामीण एवं कुटिल उद्योगों के माध्यम से पूंजी का विकास करना , उत्पादन के साधनों का विकेंद्रीकरण तथा न्यास(trust) परिषद के माध्यम से गरीब एवं अमीरों के बीच पूंजी का विभाजन शामिल है।

३) मानव संसाधन विकास का सिद्धान्त:- जब तक किसी राष्ट्र के मानव संसाधन का विकास नहीं होता तबतक उस राष्ट्र के विकास को नहीं माना जा सकता है इसलिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अंतर्गत मानव संसाधन अनुक्रमणिका को राज्यो के लिए एक मानक माना जाने लगा है। इस संदर्भ में मानव संसाधन के आकलन के लिए तीन प्रमुख कारण माना गया है:-

विकास के मानक

  • जन्म के समय जीवन की संभावनाएं
  • शिक्षा की प्राप्ति
  • प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादकता

संयुक्त राष्ट्र ने अमर्त्य सेन लेखों एवं रचनाओं के आधार पर मानव संसाधन मानक तैयार किया गया क्योंकि अमर्त्य सेन का मानना है कि गरीबी, उत्पादन में कमी के कारण नहीं होती बल्कि, व्यक्तियों द्वारा क्षमताओं में कमी के आधार पर होती है इस प्रकार विकसित समाजो में इस प्रकार के अभाव की कमी मिलती है। अमर्त्य सेन के अनुसार विकास के लिए इन क्षमताओं का विकास तीन कारकों पर निर्भर करता है:- 1) आमदनी 2) शिक्षा 3) स्वास्थ्य

इन तत्वों के आधार पर विकसित मानव संसाधन विकास के द्वारा ही, राज्यों का विकास, संभव हो सकेगा।

विकास के प्रारूप या मॉडल

इसके चार प्रतिमान है(graphic representation)

  1. पूर्वी प्रतिमान(मॉडल)
  2. पश्चिमी प्रतिमान(मॉडल)
  3. गाँधीवादी सिद्धान्त/प्रतिमान
  4. शुमेखर सिद्धान्त/प्रतिमान

पूर्वी प्रतिमान:- यह प्रतिमान पूर्वी यूरोप और सोवियत संघ के द्वारा अपनाया गया, जिसमे संघ ने नेतृत्व की भूमिका निभाई। एशिया के कुछ देश – चीन, वियतनाम, उत्तरी कोरिया, उत्तरी अमेरिका के द्वीप और क्यूबा ने भी सोवियत संघ का अनुसरण किया। अफ्रीकी महाद्वीप के देशों में छित पुट ज्यादा देखने को नहीं मिलता। मुलतः यह मॉडल एक वर्ग व्यवस्था संसाधन सहित और संसाधन रहित पर आधारित है, अतः इनसे विकास की बहस में एक वैचारिक पद्धति जोड़ी। कार्ल मार्क्स के विचार इस मॉडल के मुख्य केंद्र बिंदु रहे। इस मॉडल के माध्यम से वर्गों में व्यक्तिपरक एवं सामूहिक संतुलन पैदा करके विकास को स्थापित करने का प्रयास किया गया है।इस मॉडल के आधार पर भौतिक संसाधनों का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के माध्यम से मानव इतिहास की व्यख्या करने की कोशिश की गई है।

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यह माना गया कि जिस प्रकार से भौतिक संसाधनों के विकास ने एक नई सामाजिक उत्पादन व्यवस्था को जन्म दिया है,उसी प्रकार मजदूर व्यवस्था ने विकास के उच्च आयाम यानी समाजवाद को जन्म दिया।यह मॉडल निम्न विशेषताओं पर है:

● आर्थिक संदर्भ:- यह पहले समाजवाद एवं साम्यवाद की ओर अग्रसर होता है इसलिए यह विकास के विभिन्न आयामो को महत्व देता है। इस मॉडल में उत्पादन एवं वितरण के साधनों पर सार्वजनिक नियंत्रण के साथ साथ केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था पर बल दिया गया है। इस व्यवस्था में उपभोक्ता उत्पादन एवं वितरण पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से से सार्वजनिक वस्तुओं पर नियंत्रण रखा जाता है। पूँजीनिवेशों में भी इसका नियंत्रण होता है। भारी उद्योग को प्रोत्साहित किया जाता है।

● योजना पर अधिक बल दिया जाता है, समाज कल्याण का कार्य अधिक सुचारू रूप से केंद्रीकृत योजनाबद्ध तरीके से ही हो सकता है। कब,कितना और कैसे उत्पादित या बेचा जाएगा। यह बाजार की शक्तियों के हाथ मे न होकर , केंद्र सत्ता द्वारा, निर्धारित किया जाता है।

● राजनीतिक विशेषताएं:- इस रूप से नियोजित एवं केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था को एकदलीय व्यवस्था का समर्थन प्राप्त होता है जो सभी हितों का समूहीकरण करने का कार्य करती है। यह दल मार्क्सवाद पर आधारित है।

सार्वजनिक वितरण+केंद्रीय अर्थव्यवस्था

गरीब का प्रतीक:- kukurmutta by NIRALA

गुलाब:- पूंजीपति का प्रतिक

पश्चिमी प्रतिमान:- विकास का पाश्चात्य प्रतिमान मुलतः पूंजीवाद पर आधारित है। अमेरिका,पश्चिमी यूरोप एवं लैटिन अमेरिका देशों ने इसे अपनाया। अमेरिका इन देशों का नेतृत्व करता है। इस प्रतिमान का विकास मूल्य रूप से तीन चरणों मे देखा जा सकता है।1) क्लासिक/बाजारवाद 2) नव-क्लासिक/कल्याणकारी अर्थव्यवस्था 3) भूमंडलीकरण

इस मॉडल के आधार पर उपभोक्ता , प्रभसत्ता, उत्कृष्ट उत्पादन, तकनीकी खोज और पूर्ण रोजगार को महत्व दिया जाता है। विकास के इस मॉडल में उदारवादी , पूंजीवादी और लोकतांत्रिक पद्धति के साथ साथ प्रतिस्पर्धा को विशेष स्थान दिया गया है। इसके अलावा इसमें यह मूलतः व्यक्तिपरक है जिसमे राज्य की भूमिका बहुत कम होती है । इसके दूसरे चरण में राज्य की सीमित भूमिका स्वीकार की गई है । परंतु तीसरे चरण में इसको फिर से नकार दिया गया है। पाश्चात्य मॉडल की निम्नलिखित विशेषताएं हैं:-

  • आर्थिक संदर्भ में यह मॉडल मुक्त बाजार व्यवस्था के अंतर्गत अहस्तपक्षेप के सिद्धांत को मान्यता देता है। बचत की नीतियां व्यक्ति पार्क होती हैं। प्रजातांत्रिक कर व्यवस्था सरकार द्वारा तय की जाती है, पूंजी निवेश भी व्यक्ति परक अनियंत्रित होता है। औद्योगिकरण एवं तकनीक पर बल भी व्यक्तिगत भागीदारी पर आधारित होता है। विकास लाभ कमाने के लिए होता है और सामाजिक कल्याण में उनकी भागीदारी की मात्रा असामान्य होती है।
  • राजनैतिक संदर्भ में:- यह उदार प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। कानूनी समानता , प्रजातांत्रिक समानता , जातीय एवं धार्मिक भेदभाव रहित समाज , स्वतंत्रता का अधिकार , सामाजिक समानता आदि इसके प्रमुख तत्व हैं। इस व्यवस्था में व्यक्ति के अधिकार एवं कर्तव्यों/ दायित्वों का सम्पूर्ण समावेश होता है ।
  • सामाजिक संदर्भ:- इसमें उच्चतम शहरीकरण के विकास के साथ मध्य व बढ़े शहरों की स्थापना होती है। औधोगिकीकरण से उच्च स्तर के विकास का प्रयास किया जाता है। कार्यक्षेत्र में विशेषज्ञ और उद्यमी से पूर्ण माध्यम वर्ग का विकास होता है। शिक्षा के मांग में वृद्धि , अनपढों की दरों में कमी आएगी, कम जन्मदर और कम मृत्युदर , जनसामान्य के स्थित में वृद्धि, सामाजिक स्थांतरण , आबादी के संगठनात्मक रूप में बदलाव , शहरीकरण के कारण समाज मे व्यक्तियों की भूमिका में ज्यादा विशिष्टीकरण।
  • सामरिक संदर्भ:-नए नए आधुनिक हथियार जमा करेगा राज्य, रक्षा खर्च में वृद्धि, रक्षा विशेषज्ञों में वृद्धि, सेना में आधुनिक विशेषज्ञता से काम करेगी। देश की रक्षा के अलावा उनकी और कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं होगी।

पाश्चात्य प्रतिमान दो मान्यताओं पर आधारित है:-

  1. राजनीतिक आर्थिक संदर्भ एक दूसरे पर निर्भर/अन्तः निर्भर
  2. व्यक्ति हित मे ही समाज का हित

गाँधीवादी प्रतिमान/मॉडल:- विकास के नैतिक पहलू को आधार बनाकर, प्रतिमान लाया। गांधी जी का प्रतिमान आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित है । आर्थिक मामलों में,उनके विकास में विचार के संदर्भ में गांधी जी के विचारों को तीन चरणों मे देख सकते हैं:-१)१९१९ २)१९१९-१९३४ ३)१९३४-१९४८

गाँधी जी का पहला चरण 1919 माना जाता है। जिसमे पाश्चात्य मॉडल की आलोचना के साथ साथ गैर भौतिकतावादी व्यवस्था की पैरवी की गई है। उनके ये विचार उनकी पुस्तक ‘ हिन्द स्वराज’ में 1909 में अति स्पष्ट रूप से उजागर हुई हैं।

दूसरा चरण(१९१९-१९३४):- इसमें पूंजीवादी संस्कृत के संदर्भ में स्वदेशी को वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनके विचारों का अंतिम चरण १९३४-१९४८ तक माना जा सकता है जिसमें वे यथार्थ वादी प्रतीत होते हैं इस दौर में उन्होंने ग्रामीण उत्थान एवं पुनर्गठन की दृष्टि से सर्वोदय का विचार प्रस्तुत किया।

गाँधी जी के आर्थिक विचार रस्किन बांड की पुस्तक ‘अन टू द लास्ट’ से प्रभावित है। इस पुस्तक से गांधी जी निम्न रूप से प्रभावित हुए:-

  • एक व्यक्ति का भला सभी व्यक्तियों के भले में निहित है।
  • सभी व्यक्तियों के कार्य , सामान्य महत्व का होता है।
  • परिश्रम से आजीविका कमाना महत्वपूर्ण होता है।

इसके अलावा और कई पश्चिमी विद्वान हैं जिनका प्रभाव गांधी पर पड़ा। जिसमें थोरियो, टालस्टाम , क्रॉप्ट सीन महत्वपूर्ण हैं। इनके अलावा वेद, उपनिषद, भारतीशास्त्र, गीता, कबीर , मीरा, रामायण आदि से भी प्रभावित हुए हैं।

विकास का संतुलित प्रभाव

गाँधी जी के संदर्भो को समझने के लिए उनके भावों को समझना बहुत जरूरी है। जो की निम्नलिखित हैं:-1) स्वदेशी पर जोर देना 2) आजीविका के लिए परिश्रम 3) अपरिग्रह 4) व्यास 5) शोषण रहित व्यवस्था 6) विकेंद्रीकरण 6) सादगी 8) समानता

  1. व्यक्ति और समाज से जुड़ी , दो प्रकार से लाभकारी ● गरीब व्यक्तियों द्वारा संसाधनों का सही प्रयोग ● वस्तुओं की पूर्ति आसानी से की जा सकती है।
  2. जितना ज्यादा केंद्रीकरण उतना ज्यादा शोषण की संभावना इसलिए आजीविका के लिए लघु उद्योग उपयोगी तथा विकेंद्रीकरण व्यवस्था पर जोर।
  3. गाँधी जी का मानना था कि न्यूनतम आवश्यकता के अनुसार वस्तुओं का प्रयोग हो अगर ऐसा नहीं होता तो वह नैतिकता की दृष्टि से गलत है। इसमें गाँधी जी ने अनावश्यक रूप से संग्रह करने को सिरे से नकार दिया है। तथा इसमें जितना व्यक्ति अमीर होगा वह उतना ही अधिक भ्रस्ट होगा, की बात को माना गया है।
  4. अहिंसात्मक रूप से सामाजिक परिवर्तन करने के लिए आर्थिक समानता लाना जरूरी है। शांतिपूर्ण समानता लाभ के उद्देश्य के लिए कार्य नहीं करता(trust)।
  5. मजदूरों के शोषण के विरुद्ध , गरीब जो भी कार्य करता है उसके लिए उसकी आमदनी कम नहीं करनी चाहिए और न ही किसी दृष्टि से उसका शोषण किया जाना चाहिए।
  6. छोटे छोटे उद्योग को विकसित किया जाना चाहिए। गाँवो तक पहुच के लिए लघु उद्योग की पहल करनी चाहिए।इसमें बेरोजगार लोगों को जीवन व्यापन के लिए रोजगार मिल सकेगा।
  7. सादगी:- समाज मे रहने के लिए व्यक्ति के पास न्यूनतम आजीविका होनी चाहिए जिसमें रोटी, कपड़ा , मकान , सादगी और आवाज मुख्य है।
  8. समानता:- समानता पर आधारित समाज, किसी भी व्यक्ति को इसलिए गरीब नहीं होना चाहिए कि कुछ लोग राजकुमार बनना चाहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि पहला व्यक्ति जो है , और उसकी आवश्यकता ज्यादा है तो उसे मूलभूत संसाधन का इस रूप में प्रयोग करना चाहिए कि गरीब वर्ग को भी उस संसाधन का पूर्ण लाभ मिल सके व वह उसका प्रयोग जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए कर सके।(सभी व्यक्तियों के लिए एक समान वितरण)।

शुमेखर का सिद्धान्त/मॉडल(ई.एफ.शुमेखर)

आर्थिक विकास के अहिंसात्मक मॉडल का प्रतिपादन किया है।

डर सन कापरा यूरोप के बुद्धिजीवी हैं जो कि गाँधी जी के विचारों से प्रभावित हुए थे।

क्रांतिकारी सिद्धान्त:- जन अभिमुखन अर्थव्यवस्था पर आधारित “जनता के विकास के लिए जनता को आगे रखने वाला व जनता के विकास को महत्वपूर्ण मानने वाला”

“small is beautiful” बुक का नाम है, जिसका अर्थ है जन का कल्याण हो।

शुमेखर मॉडल की विशेषताएं:-

  1. शुमेखर, लालच और स्वार्थ पर आधारित आधुनिक विकास की अवधारणा के विरुद्ध हैं, उनका मानना है कि विश्व मे संसाधनों का असीमित प्रयोग कभी भी संभव नहीं हो सकता है। इस वास्तविकता को ध्यान में रखकर ही विकास की परिकल्पना करनी चाहिए।
  2. वे प्राकृत से सहयोग रखने वाले तकनीक के समर्थक हैं और प्राकृत विरोधी तकनीक के विरुद्ध हैं। इसलिए उन्होंने माध्यमिक तकनीकी तथा मानव सहयोग तकनीक पर बल दिया है।
  3. विकास के प्रद्योगिकी के संदर्भ में वे प्रजातांत्रिक स्वावलंबी और जन-अभिमुखन प्रद्योगिकी के पक्षधर थे। उनका मानना रहा है कि माध्यमिक प्रद्योगिकी भी निरर्थक नही हुई है क्योंकि यह एक ओर परंपरागत प्रद्योगिकी से बेहतर है तो दूसरी ओर आधुनिक प्रद्योगिकी से सस्ती, आसान व मुक्त है । अत्यधिक मात्रा में उत्पादन करने वाली प्रद्योगिकी जो उच्चतर तकनीकों, अति पूंजी व्यवस्था पर आधारित ज्यादा ऊर्जा की खपत पर निर्भर मजदूरी की बचत आदि पर आधारित है। शायद वह यह मानकर चलती है कि समाज अमीर है। इस प्रकार यह उत्पादकता, बहुमल्य प्रद्योगिकी बहुत सारे जनमानस से उनकी बेशकीमती संसाधन , दिमाक एवं शिल्प चुरा लेती हैं।
  4. शुमेखर गांधी जी के समान इच्छाओं को सीमित रखने के पक्षधर रहे हैं।
  5. शुमेखर, सामाजिक न्याय पर आधारित व्यवस्था के पक्षधर रहे हैं क्योंकि वे मानव के शोषण के विरुद्ध होने के साथ-साथ हमेशा मानव समानता स्थापित करने के लिए प्रयासरत रहे हैं।

आलोचना:-

  • यह प्रतिमान काल्पनिक है।(उत्पादन ज्यादा अगर हो तो प्रति यूनिट कॉस्ट कम पड़ेगा).
  • भूमंडलीकरण के दौर में , लोग इस अर्थव्यवस्था को क्यों अपनाएंगे(अपनी स्थित के साथ-साथ दूसरे की स्थित का भी ध्यान रखना चाहिए)।
  • पर्यावरण से संबंधित कोई नई बात नहीं है इसमें।
  • प्रद्योगिकी नियंत्रण हेतु विकसित होती है न की उनके सहयोग के लिए।

विकास संचार के बदलते प्रतिमान

भूमिका:- क्लासिक अर्थव्यवस्था से लेकर आज तक , विकास की प्रवृत्तियों में बदलाव आता रहा है इसलिए विकास के विभिन्न प्रतिमान बदलते रहते हैं।

इन परिवर्तनों का पता हमें विभिन्न प्रतिमानों के संकेतों से चलता है। ये प्रतिमान निम्न कार्यकलापों के माध्यम से समझे जा सकते हैं:-1) प्रतिमानों की कार्य सूची(मॉडल या एजेंडा) 2) व्यक्ति एवं राज्य के बीच संबंध 3) राज्य की भूमिका 4) लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों का प्रयोग

  1. पाश्चात्य प्रतिमान में व्यक्ति को महत्व दिया गया है। इसका केंद्र बिंदु मुनाफा कमाना है। पूर्वी प्रतिमान इसके विपरीत है। इसका केंद्र बिंदु समाज होता है। इसमें व्यक्ति की जगह समाज को महत्व दिया जाता है। शुमेखर और गाँधीवादी प्रतिमान में व्यक्ति एवं समाज मे टकराव न होकर दोनों ही सामंजस्य पूर्ण संबंध के रूप में कार्य करते हैं।
  2. पाश्चात्य प्रतिमान में व्यक्ति महत्वपूर्ण माना गया है इसलिए अहस्तपक्षेप का सिद्धान्त अपनाया गया, जिसमे राज्य, व्यक्तियों के कार्यो में हस्तक्षेप नहीं करते। इसी को लेकर के क्लासिक अर्थव्यवस्था में कल्याणकारी अर्थव्यवस्था के लिए राज्य के लिए सीमित हस्तक्षेप की भूमिका स्वीकार की गयी। पूर्वी प्रतिमान सामूहिकता को महत्व देता है इसलिए वह व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है। सारे निर्णय सरकार लेती है। गाँधी व शुमेखर प्रतिमान में व्यक्ति और समाज दोनों का महत्व है परंतु यहाँ पर व्यक्तिपरक समाज प्रतिबंध या कानून की बाध्यता न लगाकर , व्यक्ति की आत्मा में पूर्ण बदलाव की बात कही गयी है।
  3. सभी प्रतिमान राज्य की भूमिका के बारे में एकमत नहीं हैं, पाश्चात्य प्रतिमान में, आर्थिक मामले में सरकार का हस्तक्षेप स्वीकार नही किया है। वहीं राजनैतिक व सामरिक मामलों में वह इसे स्वीकार करता है ताकि व्यक्तियों के आर्थिक हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।जबकी पूर्वी प्रतिमान में साधन विहीन वर्ग के शोषण में हमेशा साधन सम्पन्न को जिम्मेदार माना जाता है और उसी के अनुसार साधन विहीन वर्ग के लोगों की सुरक्षा के लिए कार्य करता है।वहीं शुमेखर व गाँधीवादी प्रतिमान पंचायती राज्य के माध्यम से प्रजातांत्रिक स्थापना की बात रखते हैं।
  4. जहाँ तक लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों के प्रयोग का प्रश्न है तो जाहिर सी बात है कि सभी प्रतिमान का मत भी अलग-अलग ही होगा। पाश्चात्य प्रतिमान प्रजातंत्रिक तरीके की बात करता है। पूर्वी प्रतिमान क्रांतिकारी तरीके की बात करता है और शुमेखर व गाँधीवादी प्रतिमान अहिंसा आधारित आर्थिक व्यवस्था की बात करता है जो समाज के विभिन्न वर्गों के सामंजस्य पर आधारित होने की बात/पक्ष को मानता है।

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सहायता प्राप्त:- ग्राम स्वराज्य-महात्मा गांधी, हिन्द स्वराज्य- महात्मा गाँधी , विकास का समाजशास्त्र-श्याम चरण दुबे, क्लासरूम स्टडी, गूगल, लेक्चर, कॉलेज लाइब्रेरी।


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2 thought on “विकास पत्रकारिता (सिद्धांत,मॉडल, बदलते प्रतिमान)”

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