kisan yatra

Kisan Yatra: फसलों को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है, जिनमें मौसम, उपयोग, भौगोलिक परिस्थितियाँ व स्थानीय परंपराएँ शामिल हैं। भारत में खेती मुख्यतः मानसूनी बारिश के चक्र पर निर्भर करती है और यहाँ रबी, खरीफ व ज़ायद नाम से तीन प्रमुख फसली मौसम होते हैं। दूसरी ओर, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जलवायु भिन्न होने के कारण फसली मौसमों के अपने तरीके व परिभाषाएँ हैं।

इस लेख में हम पहले भारत के रबी, खरीफ व ज़ायद फसली मौसमों की विस्तृत जानकारी देंगे, फिर अमेरिका, चीन, यूरोप, अफ्रीका आदि क्षेत्रों में फसलों के मौसम व उनकी जलवायु आवश्यकताओं की तुलना करेंगे। अंत में, दुनियाभर में फसलों के वर्गीकरण के विविध तरीकों (मौसम आधारित, उपयोग आधारित, भौगोलिक व स्थानीय प्रणाली) को उदाहरण सहित समझाया गया है। (Kisan Yatra)

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भारत में प्रमुख फसली मौसम: रबी, खरीफ और ज़ायद(Kisan Yatra)

भारत में खेती वर्षभर को तीन मुख्य ऋतुओं में बांटती है: खरीफ (बरसात/वर्षा ऋतु), रबी (शीत ऋतु) और ज़ायद (ग्रीष्म ऋतु)। ये विभाजन मानसूनी बारिश के समय पर आधारित हैं। नीचे इन तीनों फसली मौसमों का विस्तार से विवरण दिया गया है:

खरीफ फसलें (वर्षा ऋतु की फसल)

खरीफ वे फसलें हैं जिन्हें मानसून शुरू होते ही बोया जाता है और बरसात के अंत तक काटा जाता है। आम तौर पर खरीफ की बुवाई(Kisan Yatra) मई के अंत से जुलाई तक होती है और कटाई सितंबर-अक्टूबर में की जाती है। इन फसलों की बढ़वार के लिए गरम और आद्र्र (नम) जलवायु की आवश्यकता होती है, अर्थात् इन्हें बढ़ने के लिए खूब बारिश और गर्म तापमान चाहिए। खरीफ की सिंचाई मुख्यतः मानसूनी वर्षा से ही होती है, इसलिए समय पर अच्छी बारिश इनकी पैदावार के लिए बेहद ज़रूरी है। (Kisan Yatra)

यदि बारिश कम हो तो सिंचाई की आवश्यकता पड़ सकती है। मुख्य खरीफ फसलें हैं: धान (चावल), मक्का (कॉर्न), बाजरा, ज्वार, अरहर (तूर दाल), सोयाबीन, कपास, गन्ना, मूंगफली आदि। उदाहरण के लिए धान एक प्रमुख खरीफ फ़सल है जिसे भारत के अधिकांश भागों में जून-जुलाई में रोपा जाता है और सितंबर-अक्टूबर में काटा जाता है। खरीफ फसलें देश के उन क्षेत्रों में अधिक होती हैं जहाँ दक्षिण-पश्चिम मानसून से भरपूर वर्षा मिलती है (जैसे पूर्वी व उत्तर-पूर्वी भारत)।(Kisan Yatra)

Kisan Yatra: रबी फसलें (शीत ऋतु की फसल)

रबी फसलें सर्दियों की फसलें कहलाती हैं। इनकी बुवाई मानसून खत्म होने के बाद ठंड के मौसम में होती है – सामान्यतः अक्टूबर-नवंबर में बोआई की जाती है – और फसल को वसंत या प्रारंभिक गर्मियों में मार्च-अप्रैल/मई तक काट लिया जाता है। (Kisan Yatra)

“रबी” शब्द अरबी भाषा से आया है जिसका अर्थ वसंत होता है, पर भारतीय सन्दर्भ में यह सर्दियों में उगाई जाने वाली फसलों को दर्शाता है। रबी फसलों को बढ़ने के लिए ठंडे मौसम की जरूरत होती है और इनकी बढ़वार कम तापमान में अच्छी होती है। (Kisan Yatra)

चूंकि रबी मौसम में बारिश बहुत कम होती है, इन फसलों की सिंचाई आमतौर पर नहरों, कुओं या ट्यूबवेल द्वारा की जाती है। रबी फसलें अपेक्षाकृत कम पानी में भी हो सकती हैं और पाला (तुषार) इनकी बढ़वार के लिए लाभदायक होता है। मुख्य रबी फसलें हैं: गेहूँ, जौ, चना (काबुली व देसी), मसूर, मटर, सरसों, रायडा (रैपसीड/सरसों), अलसी, जीरा, धनिया आदि। (Kisan Yatra)

उदाहरण के लिए गेहूँ एक प्रमुख रबी फ़सल है, जिसे उत्तर भारत में नवंबर के आसपास बोया जाता है और अप्रैल-मई में काटा जाता है। रबी की पैदावार के लिए ठंड के साथ साथ फूल आने के समय गर्मी का समापन (पकने के समय हल्की गर्मी) अनुकूल होती है।(Kisan Yatra)

ज़ायद फसलें (ग्रीष्म/अंतरिम फसल)

ज़ायद वह फसली मौसम है जो रबी और खरीफ के बीच की अवधि को भरता है, इसलिए ज़ायद फसलों को अंतरिम या फिलर फसल भी कहते हैं। ज़ायद की बुवाई आमतौर पर मार्च से अप्रैल के दौरान की जाती है और फसल को जून तक (मानसून शुरू होने से पहले) काट लिया जाता है। यह मौसम छोटा होता है तथा इन कुछ महीनों में ही फसल तैयार करनी होती है। (Kisan Yatra)

ज़ायद फसलों को बढ़ने के लिए गरम और शुष्क (सूखा) मौसम चाहिए, साथ ही इन्हें फूल व फलने के लिए दिन में लंबी अवधि की धूप की जरूरत होती है। गर्मी में बारिश लगभग नहीं होती, इसलिए इन फसलों की सिंचाई पूरी तरह कृत्रिम साधनों पर निर्भर करती है (जैसे नहरी पानी या भूमिगत जल)। (Kisan Yatra)

ज़ायद मौसम में तेज गर्मी रहती है, इसलिए ऐसी फसलें बोई जाती हैं जो कम समय में तैयार हो जाएँ और गर्मी सहन कर सकें। मुख्य ज़ायद फसलें हैं: तरबूज़, ख़रबूज़ा, ककड़ी, लौकी, तोरई जैसी गर्मी की सब्ज़ियाँ व फल, तिल (तिलहन), मूँग, चारा फसलें (जैसे मक्का या ज्वार हरा चारा) इत्यादि। (Kisan Yatra)

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उदाहरण के लिए तरबूज़/खरबूज़ा जैसी फसलें मार्च में बोई जाकर मई-जून तक मंडी में आ जाती हैं। ज़ायद फसलें किसानों को अतिरिक्त आमदनी देती हैं क्योंकि मुख्य दो मौसमों के बीच की अवधि का उपयोग करती हैं। (Kisan Yatra)

इन तीनों फसली मौसमों का सार नीचे तालिका में प्रस्तुत(Kisan Yatra) है:

फसली मौसमबोआई का समयकटाई का समयमुख्य फसलेंजलवायु व सिंचाई
खरीफ (वर्षा)जून – जुलाई (मानसून आरंभ पर)​सितंबर – अक्तूबर (मानसून समाप्त पर)धान (चावल), मक्का, बाजरा, ज्वार, सोयाबीन, कपास, गन्ना, अरहर दाल आदि गर्म व नम जलवायु (अधिक वर्षा)​; मुख्यत: वर्षा जल पर निर्भर
रबी (शीत)अक्टूबर – नवंबर (मानसून बाद, ठंड की शुरुआत)मार्च – अप्रैल/मई (वसंत/गर्मी शुरुआत)गेहूँ, जौ, चना, मसूर, मटर, सरसों, आलू, सरसों, लिनसीड आदि​ ठंडा व सूखा मौसम; कम पानी की आवश्यकता, सिंचाई द्वारा पूर्ति
ज़ायद (ग्रीष्म)मार्च – अप्रैल (रबी कटाई के तुरंत बाद)​जून (खरीफ से पूर्व मानसून आने तक)तरबूज़, खरबूज़ा, ककड़ी, लौकी जैसी सब्ज़ियाँ; मूँग, चारा फसलें आदिगरम व शुष्क मौसम; लंबी धूप; पूरी तरह सिंचाई पर निर्भर

(उपरोक्त समयावधि व फसलें मुख्यतः उत्तरी/मैदानी भारत के संदर्भ में हैं; भारत के विभिन्न राज्यों में भौगोलिक परिस्थितियों अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है।) (Kisan Yatra)

अन्य देशों में फसली मौसम एवं उनकी जलवायु

भौगोलिक स्थिति और जलवायु के आधार पर भारत से बाहर अन्य देशों में फसलों के मौसम अलग तरीके से परिभाषित हैं। कहीं तापमान मुख्य कारक है तो कहीं वर्षा का पैटर्न(Kisan Yatra)। नीचे अमेरिका, चीन, यूरोप और अफ्रीका में फसली मौसमों का वर्णन तथा भारतीय प्रणाली से तुलना की गई है:

संयुक्त राज्य अमेरिका में फसली मौसम (Kisan Yatra)

अमेरिका एक विशाल देश है पर अधिकांश कृषि क्षेत्र समशीतोष्ण (टेम्परेट) जलवायु में हैं। यहाँ फसली चक्र मुख्यतः चार ऋतुओं (वसंत, ग्रीष्म, पतझड़, शीत) पर आधारित है(Kisan Yatra)। आमतौर पर दो प्रमुख खेती के मौसम माने जा सकते हैं:

  • वसंत/ग्रीष्म ऋतु की फसलें: ठंड ख़त्म होने के बाद वसंत में बुवाई होती है और फसल गर्मियों में बढ़कर शरद ऋतु (पतझड़) तक पकती है। उदाहरण के लिए, अमेरिका के मिडवेस्ट क्षेत्रों में मक्का (कॉर्न) व सोयाबीन जैसी फसलें अप्रैल-मई में बोई जाती हैं और अगस्त से अक्टूबर के बीच harvested (कटाई) की जाती हैं। इन फसलों को बढ़ने के लिए गर्म तापमान की ज़रूरत होती है और क्षेत्र विशेष के अनुसार वर्षा या सिंचाई से पानी मिलता है। अमेरिका के मध्य-पश्चिम (कॉर्न बेल्ट) में गर्मियों में पर्याप्त वर्षा होती है, इसलिए मक्का/सोयाबीन जैसी फसलें वर्षा-आधारित तरीके से उगती हैं। वहीं पश्चिमी व दक्षिणी सूखे इलाकों (जैसे कैलीफ़ोर्निया, टेक्सास) में सिंचाई की मदद से भी ग्रीष्मकालीन फसलें उगाई जाती हैं।
  • शीत/सर्दी ऋतु की फसलें: कुछ ठंड-सहिष्णु फसलें (विशेषकर अनाज) अमेरिका में पतझड़ (शरद) में बोई जाती हैं, सर्दियों में खेत में रहती हैं (धीमी बढ़वार या सुप्तावस्था में), फिर वसंत में तेजी से बढ़कर शुरुआती गर्मी तक पक जाती हैं। इसे “विंटर क्रॉप” (शीतकालीन फसल) प्रणाली कहते हैं। इसका प्रमुख उदहारण विंटर व्हीट (शीतकालीन गेहूँ) है – इसे सितंबर-अक्टूबर में बोया जाता है, सर्दी भर खेत में रहती है, और जून के आसपास काटा जाता है। इसी तरह राई (राई), जौ और कैनोला (रेपसीड) की कुछ क़िस्में भी सर्दियों में बोई जाती हैं। इन फसलों को ठंडी तापमान की आवश्यकता होती है लेकिन बहुत कठोर जमा देने वाली सर्दी नहीं होनी चाहिए, इसलिए वे अमेरिका के उन भागों में उगती हैं जहां सर्दियां मध्यम (हल्की बर्फ/ठंड) होती हैं (जैसे कैन्सस, ओकलाहोमा आदि प्लेन्स में विंटर व्हीट सफल है)। शीतकालीन फसलों की सिंचाई प्रायः सर्दियों की वर्षा/बर्फ या भूमिगत नमी से होती है, व वसंत में वर्षा मिलने से फसल पूरी होती है। (Kisan Yatra)

अमेरिका में भारतीय जैसे नियत नाम (खरीफ/रबी) नहीं हैं, बल्कि फसल को उगाने/बोने के मौसम के आधार पर सीधे “स्प्रिंग क्रॉप” या “समर क्रॉप” और “विंटर क्रॉप” जैसे शब्द उपयोग होते हैं। कुल मिलाकर, संयुक्त राज्य अमेरिका के अधिकांश क्षेत्रों में साल में एक मुख्य फ़सल चक्र चलता है (वसंत में बुवाई, पतझड़ में कटाई), और सर्दियों में ज़मीन खाली रहती है या उस दौरान कवर क्रॉप/घास बोई जाती है। (Kisan Yatra)

कुछ गर्म जलवायु वाले हिस्सों (जैसे फ़्लोरिडा, दक्षिणी टेक्सास) में साल में दो चक्र (जैसे सब्ज़ियों की फसल) संभव हैं, पर ये अपवाद हैं। जलवायु आवश्यकता की बात करें तो अमेरिकी फ़सलों के लिए तापमान (फ्रॉस्ट-फ्री पीरियड) और मिट्टी में नमी सबसे बड़ी सीमाएँ होती हैं; जहाँ नमी कम है वहाँ सिंचाई द्वारा इसे पूरा किया जाता है। (Kisan Yatra)

चीन में फसलें और फसली मौसम

चीन भौगोलिक रूप से बहुत विविध है और यहाँ उत्तर से दक्षिण की ओर जाते हुए फसली मौसमों में बदलाव देखने को मिलता है। सामान्यतः चीन में दो प्रमुख प्रणाली दिखती हैं: उत्तर में समशीतोष्ण-मौसम वाली द्विफसली प्रणाली, और दक्षिण में उष्णकटिबंधीय-मौसम वाली बहुफसली (दो या तीन फसल सालाना) प्रणाली। (Kisan Yatra)

  • उत्तरी और मध्य चीन (समशीतोष्ण क्षेत्र): उत्तर चीन के मैदानी भाग (जैसे नॉर्थ चाइना प्लेन) में एक वर्ष में दो फ़सलें उगाना आम है – सर्दियों में गेहूँ और गर्मियों में मकई (मक्का)। इस विंटर व्हीट – समर कॉर्न द्विफसली चक्र में अक्टूबर में गेहूँ की बोआई होती है, जो सर्दियों में बढ़ती रहती है और जून में काटी जाती है; इसके तुरंत बाद उसी खेत में जून-जुलाई में मक्का बोया जाता है जो गर्मियों में बढ़कर सितंबर-अक्टूबर तक तैयार हो जाता है। इस प्रकार साल में दो अनाज फ़सलें ली जाती हैं। इस प्रणाली के लिए सिंचाई व समयबद्धता बहुत आवश्यक है, क्योंकि गेहूँ की कटाई और मकई की बुवाई के बीच बहुत कम समय होता है। उत्तरी चीन के और ऊँचे अक्षांश या पठारी इलाकों (जैसे उत्तर-पूर्वी प्रांत) में सर्दियाँ कठोर होती हैं, वहाँ केवल एक ही फसल (वसंत-गर्मी में) ली जाती है – जैसे वसंत में सोयाबीन या मक्का बोकर शरद में काट ली गई। कुल मिलाकर उत्तर/मध्य चीन का पैटर्न अमेरिका/यूरोप जैसा समशीतोष्ण है: एक मुख्य गर्मी की फसल, साथ में यदि संभव हो तो एक सर्दी की अनाज फ़सल। जलवायु की दृष्टि से इन क्षेत्रों में गर्मियों में बारिश (पूर्वी एशिया मानसून) होती है जो गर्मी की फ़सल के लिए उपयुक्त है, जबकि सर्दियों में काफी सूखा होता है इसलिए winter wheat के लिए सिंचाई या बर्फ का पानी सहारा होता है। (Kisan Yatra)
  • दक्षिणी चीन (उपोष्णकटिबंधीय/उष्णकटिबंधीय क्षेत्र): देश के दक्षिणी हिस्सों में साल भर जलवायु अपेक्षाकृत गर्म रहती है, इसलिए यहाँ दो से तीन फ़सल चक्र प्रति वर्ष तक संभव हैं। विशेषकर चावल की खेती में दक्षिण चीन में डबल-क्रॉप और कहीं-कहीं ट्रिपल-क्रॉप प्रणाली historically प्रचलित रही है। उदाहरण के लिए, दक्षिण चीन के कुछ भागों में किसान एक ही वर्ष में तीन बार धान उगाते थे – पहले जल्दी पकने वाला धान (early rice) वसंत में, फिर मध्य-सीज़न धान, और फिर देरी से पकने वाला धान (लेट राइस) शरद तक। हालांकि अब तीन फ़सल कम हो गई है, पर दो फ़सली चावल (खरीफ व रबी जैसा चक्र) अभी भी दक्षिणी प्रांतों में होता है। दक्षिण चीन का मौसम: गर्मी में बहुत अधिक वर्षा (जून-सितंबर में भारी मॉनसून) और हल्की सर्दियाँ। यहाँ रबी जैसी सर्दी की फसल उतनी नहीं (क्योंकि ठंड कम पड़ती है), बल्कि साल के ठंडे महीनों में भी एक फसल (जैसे सब्जी या गेहूं/तेलहन) ली जा सकती है। जलवायु आवश्यकताएँ: दक्षिण में चावल जैसी फसलों के लिए उष्ण व आद्र्र मौसम मिलता है, लेकिन तीसरी फसल लेने के लिए सिंचाई व उन्नत किस्मों की जरूरत होती है। उत्तर की तुलना में दक्षिण में दिन छोटे नहीं होते (भूमध्य रेखा के नज़दीक दिन-रात लगभग बराबर), जिससे वर्ष भर फसलों को पर्याप्त धूप मिल सकती है। चीन में कुल मिलाकर उत्तर में फसल विभाजन यूरोप/अमेरिका के समान शीतकालीन बनाम ग्रीष्मकालीन फसल रूप में है, जबकि दक्षिण में भारत के समान खरीफ/ज़ायद जैसी कई फसलें वर्ष में संभव हैं। सरकारी स्तर पर चीन में फसली मौसमों के लिए भारत जैसी विशेष शब्दावली नहीं है; आमतौर पर फसलों को शीतकालीन गेहूँ (Yellow River), गर्मी धान आदि नाम से ही जाना जाता है, पर खेती की योजना में इस मौसमी विविधता को ध्यान में रखा जाता है। (Kisan Yatra)

यूरोप में फसलें और मौसम(Kisan Yatra)

यूरोप के अधिकांश भाग भी समशीतोष्ण कटिबंध में आते हैं, इसलिए वहाँ का पैटर्न अमेरिका के समान ही है। यूरोप में कृषि के सन्दर्भ में फसलों को दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा जाता है: शीतकालीन बोआई वाली फसलें (विंटर क्रॉप) और वसंत/ग्रीष्म बोआई वाली फसलें (स्प्रिंग/समर क्रॉप)। यूरोप के बड़े कृषि उत्पाद जैसे गेहूँ, जौ, राई, रेपसीड (तेल की फसल) आदि प्रायः सर्दियों में बोए जाते हैं और अगली गर्मी/शरद में काटे जाते हैं – इन्हें विंटर क्रॉप्स कहा जाता है।

उदाहरण के लिए यूरोप में सामान्य गेहूँरेपसीड अक्टूबर-नवंबर में बोये जाते हैं, सर्दियों में थोड़ी बढ़वार करके ठंड सहते हैं, और जून-जुलाई में उनकी कटाई होती है। दूसरी ओर, मक्का, सूरजमुखी, सोयाबीन, चुकंदर (बीट) जैसी फसलें यूरोप में ठंड गुजरने के बाद वसंत में बोई जाती हैं और उसी साल गर्मियों के अंत या शरद ऋतु तक तैयार होकर काट ली जाती हैं – इन्हें स्प्रिंग/समर क्रॉप्स कहा जाता है। जौ (बार्ले) एक ऐसा अनाज है जो वहाँ दोनो तरीके से उगाया जाता है – कुछ किस्में सर्दी में बोई जाती हैं तो कुछ वसंत में। (Kisan Yatra)

यूरोप में फसली मौसम की लंबाई दक्षिण से उत्तर की ओर बदलती है। दक्षिणी यूरोप (जैसे स्पेन, इटली) में सर्दियाँ हल्की व बरसात वाली होती हैं तथा गर्मियाँ काफी सूखी और गर्म। इन भूमध्यसागरीय जलवायु वाले क्षेत्रों में किसान अकसर शीत ऋतु की वर्षा का उपयोग करने हेतु शरदकाल में बुवाई करते हैं (जैसे गेहूँ, जौ को शरद में बोना ताकि सर्दी की बारिश से उपज लें) और गर्मियों के सूखे महीनों को या तो खाली रखते हैं या उन फसलों के लिए प्रयोग करते हैं जो सूखे में भी चल सकती हैं (जैसे जैतून, अंगूर जैसे बाग़ान)।

उत्तरी यूरोप में सर्दियाँ लंबी व कड़ी (बरफ पड़ने वाली) होती हैं – वहाँ मुख्यतः एक ही फसल चक्र (वसंत-शरद) चल पाता है क्योंकि ज़मीन सर्दी में जमी रहती है। पश्चिमी यूरोप (जैसे फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन) में गल्फ स्ट्रीम के प्रभाव से सर्दियाँ थोड़ी नरम रहती हैं, जिससे विंटर क्रॉप उगाना संभव व लाभदायक होता है। (Kisan Yatra)

कुल मिलाकर यूरोप में सालाना दो फ़सलों की बजाय एक ही मुख्य फ़सल ली जाती है, सिवाय कुछ दक्षिणी इलाकों के जहाँ सिंचाई की मदद से दो फसलें (जैसे गर्मी में मक्का दूसरी फ़सल के रूप में) संभव हैं। जलवायु व सिंचाई: यूरोप की कृषि बड़ी हद तक बारिश पर निर्भर है – उत्तरी/मध्य यूरोप में गर्मियों में पर्याप्त वर्षा होती है, भूमध्य क्षेत्र में सर्दियों की बारिश पर खेती होती है व गर्मियों में सिंचाई की जरूरत पड़ती है।

तापमान एक सीमक कारक है: पाले (frost) की तारीखें फसल चक्र निर्धारित करती हैं। सामान्यतया यूरोप में भारत जैसी मानसून अवधारणा नहीं है, इसलिए फसल-वर्गीकरण मौसम (cropping season) को गर्मी या सर्दी कहकर ही समझते हैं। (Kisan Yatra)

अफ्रीका में फसलें और मौसम

अफ्रीका महाद्वीप में कृषि जलवायु के आधार पर बहुत भिन्न है, पर एक बड़ा भाग उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में आता है। अफ्रीका में अनेक क्षेत्रों में खेती का समय मुख्यतः वर्षा ऋतु द्वारा निर्धारित होता है, क्योंकि अधिकांश खेती वर्षा पर निर्भर (रेनफेड) होती है। सामान्य तौर पर:

  • महाद्वीप के उष्णकटिबंधीय बेल्ट (करीब 15° उत्तरी से 15° दक्षिणी अक्षांश) में साल में दो मुख्य मौसम होते हैं – बरसात का मौसम और सूखा (निर्वर्ष) मौसम। जिन क्षेत्रों में साल में एक ही लंबा बरसाती मौसम होता है, वहाँ किसान उसी दौरान बुवाई करते हैं और बारिश खत्म होने पर कटाई करके अगले सूखे मौसम में खेत खाली रखते हैं। उदाहरण के लिए, मध्य एवं पूर्वी अफ्रीका के देशों जैसे तंज़ानिया, ज़ाम्बिया आदि में नवंबर से अप्रैल तक वर्षा ऋतु रहती है और किसान इसी एक मौसम में मक्का, ज्वार, बाजरा जैसी फ़सल उगाते हैं; मई से अक्टूबर तक शुष्क मौसम में खेती संभव नहीं, तो यह समय खेतPreparation या विश्राम का होता है। ऐसी परिस्थिति में प्रति वर्ष एक ही फसल ली जाती है, इसलिए किसानों को उसी से सालभर का अनाज जुटाना होता है। (Kisan Yatra)
  • कुछ उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वर्षा दो भागों में बंटी होती है (द्विमौसमी वर्षा)। उदाहरण के लिए, पूर्वी अफ्रीका के हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र (सोमालिया, केन्या, इथियोपिया के हिस्से) में एक साल में दो बरसात के दौर आते हैं: स्थानीय भाषा में इन्हें गु (Gu) और डेयर (Deyr) कहते हैं। गु वर्षा मार्च–मई में होती है और डेयर वर्षा अक्टूबर–दिसंबर में। इन दो बरसाती मौसमों के चलते कई जगह किसान साल में दो बार फसल ले पाते हैं – पहली बरसात के दौरान बोआई करके मध्य साल में कटाई, फिर दूसरी छोटी बरसात में बोआई कर साल अंत में दूसरी कटाई। हालाँकि बारिश की मात्रा हर बार भरोसेमंद नहीं होती, पर सामान्य स्थिति में यह द्विफसली चक्र संभव है। ऐसे क्षेत्रों में फसलें स्थानीय नामों व मानसून/वर्षा के आधार पर जानी जाती हैं (जैसे “लंबी बारिश की फसल” बनाम “छोटी बारिश की फसल”).
  • अफ्रीका के साहेल व पश्चिमी अफ्रीका क्षेत्र (जैसे सेनेगल से सूडान तक) में एक ही मानसूनी बारिश का समय होता है जो लगभग जून/जुलाई से सितंबर/अक्टूबर तक सीमित है। किसान जून-जुलाई में खेत बोते हैं (जब बारिश शुरू होती है) और सितंबर-अक्टूबर में कटाई करते हैं। प्रमुख फसलें मोटे अनाज (बाजरा, ज्वार) व मक्का, और कुछ जगह चावल (जहाँ पानी भरपूर) होती हैं। सूखे मौसम (अक्टूबर से अगले मई) में पारंपरिकतः खेत खाली रहते थे, लेकिन अब नदी घाटियों में या कुओं के सहारे कुछ सब्ज़ियाँ उगाना शुरू हुआ है जिसे “सूखा मौसम खेती” कहते हैं। (Kisan Yatra)
  • अफ्रीका के उपोष्ण/शीतोष्ण क्षेत्र (जैसे दक्षिण अफ्रीका का उत्तरी भाग, या भूमध्यसागरीय उत्तर अफ्रीका) में मौसम पैटर्न फिर अलग है। उत्तरी अफ्रीका के भूमध्य तटीय देशों (मोरक्को, ट्यूनीशिया आदि) में यूरोप जैसा ही पैटर्न है – सर्दियों की बारिश पर गेहूँ, जौ उगते हैं, गर्मियाँ सूखी रहती हैं। दक्षिण अफ्रीका के दक्षिणी हिस्से में भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ सर्दियों में बारिश होती है (वहाँ अंगूर, गेहूँ आदि सर्दी में उगते हैं), जबकि देश के अधिकतर अन्य हिस्सों में गर्मी (नवंबर-मार्च) में बारिश होती है और उसी दौरान मक्का आदि उगाई जाती है। कुल मिलाकर, अफ्रीका में हिंदुस्तान की तरह व्यापक रूप से खरीफ (बरसाती) मौसम की फसलें ही प्रमुख हैं, और कई जगह एक ही फसल-चक्र पर निर्भरता है। पानी की उपलब्धता बड़ी चुनौती होती है – सिंचाई सुविधाएँ सीमित हैं, पर जहाँ उपलब्ध हैं वहाँ सूखे मौसम में दूसरी फसल उगाने की कोशिशें बढ़ रही हैं। (Kisan Yatra)

तुलनात्मक सारांश (Kisan Yatra)

संपूर्ण विश्व में फसली मौसमों को अगर तुलना करें, तो मुख्य अंतर स्थानीय जलवायु के आधार पर आता है:

  • मानसून/वर्षा-आधारित सिस्टम: भारत, दक्षिण एशिया, अफ्रीका के बड़े हिस्से, लैटिन अमेरिका के उष्णकटिबंधीय भाग – इन क्षेत्रों में खेती का कैलेंडर बारिश द्वारा निर्धारित होता है(Kisan Yatra)। भारत का खरीफ/रबी/ज़ायद विभाजन मानसूनी वर्षा की टाइमिंग से जुड़ा है; अन्य मानसूनी क्षेत्रों में भी स्थानीय शब्दों में ऐसा ही विभाजन मिलता है (जैसे दक्षिण पूर्व एशिया में एक मेन सीज़न (बरसात) और एक ड्राई सीज़न क्रॉप)। वर्षा-आधारित प्रणालियों में खरीफ या बरसात की फसल सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि उसी में प्राकृतिक पानी मिलता है। अतिरिक्त सिंचाई की सुविधा होने पर कुछ जगह सूखे मौसम में दूसरी फसल ली जाती है (जैसे भारत में रबी, या अफ्रीका में नदी तट पर сухी मौसम की सब्जियाँ)।
  • समशीतोष्ण/टेम्परेट सिस्टम: उत्तरी अमेरिका, यूरोप, उत्तरी चीन जैसे मध्यम अक्षांश वाले क्षेत्रों में फसलें मुख्यतः तापमान व पाले (frost) के चक्र पर निर्भर हैं। यहाँ आम तौर पर वसंत से पतझड़ तक का मौसम उपज के लिए होता है, क्योंकि सर्दियों में ज़मीन ठंडी/जमी रहती है। एक वर्ष में एक ही मुख्य फसल उगती है (जैसे गेहूँ या मक्का), हालांकि हल्की सर्दियों वाले क्षेत्रों में शीतकालीन अनाज उगाए जाते हैं जिन्हें वसंत में काटा जाता है। कुल मिलाकर, इन क्षेत्रों में एक स्प्रिंग-समर ग्रोइंग सीज़न होता है। पर्याप्त वर्षा हो तो वर्षा-आधारित खेती होती है, नहीं तो सिंचाई पर निर्भरता रहती है।
  • उपोष्णकटिबंधीय/भूमध्यसागरीय सिस्टम: ऐसे क्षेत्र (दक्षिणी यूरोप, उत्तरी अफ्रीका, कैलिफ़ोर्निया आदि) जहां सर्दियाँ बारिश लाती हैं और गर्मियाँ शुष्क होती हैं, वहाँ फसल चक्र फिर भिन्न होता है। सर्दियों को उत्पादन सीज़न की तरह प्रयोग किया जाता है (जैसे गेंहूँ, चना जैसी फसल शरद में बोकर वसंत में काटना) और गर्मियों के सूखे दौर में या तो कोई फसल नहीं या फिर ऐसी फसलें जिनमें कम पानी चाहिए (जैसे ज़ैतून, अंगूर जो बहुवर्षीय पौधे हैं)। इन क्षेत्रों में सिंचाई के सहारे सब्ज़ियाँ व चावल जैसी फसलें गर्मियों में भी उगाई जाती हैं, पर पारंपरिक रूप से सूखे मौसम को ब्रेक की तरह लिया जाता था। (Kisan Yatra)
  • बहुफसली उष्णकटिबंधीय प्रणाली: भूमध्यरेखीय क्षेत्रों (दक्षिण भारत, दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण चीन, मध्य-अमेरिका के उष्ण भाग) में जहाँ साल भर गर्मी रहती है, यदि पानी की उपलब्धता हो (प्राकृतिक या सिंचित), तो एक साल में दो-तीन फसलें लेना संभव है। उदाहरण के लिए, दक्षिण चीन में तीन बार चावल उगाना संभव था, इंडोनेशिया में धान-धान-दलहन का त्रिफसली चक्र मिलता है, दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में खरीफ के बाद रबी में धान और फिर ज़ायद में सब्जी जैसी योजनाएँ हैं। बहुफसली प्रणाली में फसलें जल्दी-जल्दी उगानी पड़ती हैं और उन्नत किस्में व सिंचाई पर जोर रहता है। जबकि एक ही खेती चक्र वाले समशीतोष्ण इलाकों में खेत को साल में लंबे ब्रेक भी मिलते हैं जिससे मिट्टी पुनर्जनन कर पाती है, बहुफसली उष्णकटिबंधीय खेती में मिट्टी पर ज्यादा ज़ोर पड़ता है और उसे पोषण व प्रबंधन की खास जरूरत होती है। (Kisan Yatra)

ऊपर दिए गए विश्लेषण से स्पष्ट है कि हर क्षेत्र ने अपनी जलवायु के अनुसार फसली मौसमों को बांटा है। अगले अनुभाग में हम फसलों के वर्गीकरण के अन्य तरीकों (जैसे उपयोग और प्रकृति के आधार पर) पर दृष्टि डालेंगे।

विश्वभर में फसलों का वर्गीकरण: विभिन्न आधार

फसलें सिर्फ मौसम के आधार पर ही नहीं, बल्कि अन्य कई मानकों पर वर्गीकृत की जाती हैं। ये वर्गीकरण किसानों, वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के लिए उपयोगी होते हैं ताकि फसलों की विशेषताओं को समझकर उचित प्रबंधन किया जा सके। मुख्य वर्गीकरण तरीके इस प्रकार हैं:

1. मौसम / ऋतु के आधार पर वर्गीकरण (Kisan Yatra)

यह तरीका हम ऊपर विस्तार से देख चुके हैं, जहाँ फसलों को बोआई/कटाई के मौसम के अनुसार समूहबद्ध किया जाता है:

  • मौसमी (वार्षिक चक्र) आधारित: जैसे भारत में खरीफ, रबी, ज़ायद; इसी तरह अन्य मानसूनी देशों में वर्षा/सूखा मौसम की फसलें; समशीतोष्ण देशों में शीतकालीन व ग्रीष्मकालीन फसलें। उदाहरणतः भारत में धान खरीफ ऋतु की फ़सल है क्योंकि यह बरसात में बोई जाती है, जबकि गेहूँ रबी फ़सल है क्योंकि सर्दियों में उगता है। यूरोप में गेहूँ को “विंटर व्हीट” और “स्प्रिंग व्हीट” दो प्रकार से वर्गीकृत करते हैं कि उसे शरद में बोया या वसंत में। (Kisan Yatra)
  • फसल अवधि के आधार पर: कुछ जगह फसलों को दीर्घ अवधि फसल vs स्वल्प अवधि (कम अवधि) फसल भी कहते हैं। मसलन, गन्ना 10-12 माह लेती है तैयार होने में, तो यह वार्षिक चक्र में भी लंबी अवधि की फसल है; वहीं मूँग जैसी दाल 60 दिनों में तैयार हो जाती है, तो यह अल्पावधि फसल है। यह वर्गीकरण भी मौसमीय ही है, क्योंकि कुछ मौसम छोटे होते हैं (ज़ायद) तो उनमें कम अवधि की फसलें ही उगती हैं।

2. उपयोग / उत्पादन के आधार पर वर्गीकरण

फसल को उसकी उपयोगिता या आर्थिक उद्देश्य के आधार पर वर्गीकृत करना बहुत आम है। इससे यह समझने में आसानी होती है कि फसल का उत्पादन मानव या उद्योग के किस काम आता है (Kisan Yatra)। इस आधार पर प्रमुख फसल वर्ग इस प्रकार हैं:

  • खाद्य फसलें: वे फसलें जिनका मुख्य उपयोग मानव के भोजन हेतु होता है। इसमें अनाज (गेहूँ, चावल, मक्का, जौ, बाजरा आदि), दालें/दलहन (चना, अरहर, मूंग, मसूर आदि), सब्ज़ियाँ, फल इत्यादि आते हैं। ये हमारे आहार का मुख्य स्रोत हैं। अनाजों को अक्सर मुख्य खाद्य फसल कहा जाता है क्योंकि विश्वभर में कैलोरी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इन्हीं से आता है। उदाहरणतः चावल, गेहूँ और मक्का विश्व की तीन सबसे ज्यादा उत्पादित व उपभोग वाली खाद्य फसलें हैं ।
  • दाल एवं प्रोटीन फसलें: यद्यपि दालें खाद्य श्रेणी में ही आती हैं, लेकिन इन्हें विशेष रूप से प्रोटीन प्रदान करने वाली फसलें माना जाता है। कुछ स्थानों पर सोयाबीन जैसी फसलें भी प्रोटीन स्रोत होने से अलग उल्लेखित हैं। (Kisan Yatra)
  • तेलहन फसलें: ये फसलें मुख्यतः तेल निकालने के लिए उगाई जाती हैं, जिनका उपयोग भोजन पकाने, उद्योग और बायोफ्यूल तक में होता है। उदाहरण: सरसों, सूरजमुखी, सोयाबीन, मूंगफली, तिल, नारियल, पाम ऑयल आदि। (Kisan Yatra)
  • रेशा (फाइबर) फसलें: उन फसलों को कहते हैं जिनसे रेशा प्राप्त कर कपड़ा या अन्य औद्योगिक सामान बनाया जाता है। मुख्य रेशा फसलें हैं कपास (Cotton), जूट, सन (फ्लैक्स), पटसन आदि। कपास विश्व की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक रेशा फसल है जिससे वस्त्र उद्योग चलता है। जूट व सन से बोरे, रस्सी व टेक्सटाइल बनते हैं। (Kisan Yatra)
  • नकदी फसलें: नकदी फसल का अर्थ ऐसी फसल जिससे किसानों को नकद आय होती है क्योंकि इसका बाजार मूल्य उच्च होता है और अक्सर यह सीधे खाने की बजाय उद्योग में कच्चे माल के रूप में जाती है। कपास, गन्ना, तंबाकू, चाय, कॉफी, रबर आदि को प्रायः नकदी फसल कहा जाता है। (कई बार नकदी फसलें और औद्योगिक फसलें समान होती हैं।) उदाहरण के लिए, चाय/कॉफी पेय फसलें हैं लेकिन इनसे किसान मुख्यत: व्यापार हेतु कमाते हैं, खुद उपभोग नहीं करते।
  • चारा फसलें (Forage/Fodder Crops): वे फसलें जो पशुओं के चारा (आहार) के लिए उगाई जाती हैं। जैसे बरसीम, नेपीयर घास, चारा मक्का, चारा ज्वार, लूसर्न, क्लोवर, सिलेज के लिए मक्का आदि। इनका मनुष्य सीधा सेवन नहीं करता पर डेयरी, पशुपालन के लिए ये महत्वपूर्ण हैं। (Kisan Yatra)
  • औद्योगिक फसलें: इस श्रेणी में वे फसलें आती हैं जिनका प्रयोग कच्चे माल के रूप में उद्योगों में होता है। उदाहरण के तौर पर कपास व जूट (टेक्सटाइल उद्योग), गन्ना (शक्कर व इथेनॉल उद्योग), रबर (उद्योगों में प्रयुक्त लेटेक्स), तंबाकू (सिगरेट उद्योग), सोयाबीन/मक्का (बायोफ्यूल व प्रोसेस्ड फूड इंडस्ट्री) आदि। कई औद्योगिक फसलें नकदी फसल भी हैं।
  • शोध/औषधीय व मसाला फसलें: कुछ पौधे औषधि निर्माण या मसाले के रूप में उपयोग होते हैं, जैसे मेंथोल पुदीना, तुलसी, सर्पगंधा (रेसर्पीन दवा हेतु) या मसाले जैसे हल्दी, मिर्च, इलायची, लौंग इत्यादि। ये अपेक्षाकृत छोटे रकबे में उगाई जाती हैं लेकिन महत्वपूर्ण वर्ग हैं। (Kisan Yatra)
  • सौंदर्य/शोभा हेतु फसलें (ऑर्नामेंटल): ये फूलों या सजावटी पौधों की फसलें हैं जो कट-फ्लावर उद्योग, बागवानी सज्जा इत्यादि के लिए उगाई जाती हैं (जैसे गुलाब, गेंदा, ग्लैडियोलस, ट्यूलिप)। वैश्विक संदर्भ में इन्हें भी एक अलग प्रकार माना जाता है, हालांकि पारंपरिक कृषि में इनका स्थान कम ही रहता है। (Kisan Yatra)

नोट: ऊपर के वर्गों में कई फसलें एक से अधिक श्रेणी में आ सकती हैं, जैसे सोयाबीन एक खाद्य (प्रोटीन) भी है, तेलहन भी और औद्योगिक (बायोडीज़ल) भी। इस तरह का वर्गीकरण लचीला होता है।

3. भौगोलिक या जलवायु अनुकूलता के आधार पर (Kisan Yatra)

फसलों को उनकी जलवायु अनुकूलन क्षमता के अनुसार भी बांटा जाता है, जिसका संबंध भौगोलिक क्षेत्रों से है। अलग-अलग फसलें भिन्न जलवायु क्षेत्रों में अच्छी तरह उग सकती हैं, इसलिए इन्हें उन क्षेत्रों के नाम से पुकारा जाता है:

  • उष्णकटिबंधीय फसलें: ये गर्म जलवायु वाली फसलें हैं जो पाले (frost) को सहन नहीं कर सकतीं और जिन्हें बढ़ने के लिए उच्च तापमान (आमतौर पर 20°C से ऊपर) व अक्सर अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है। उदाहरण: धान (चावल), गन्ना, केला, नारियल, कॉफी, कोको, कपास, मक्का, अधिकांश दालें व तेलहन (मूंगफली, सोयाबीन), आम, पपीता आदि फल। ये भूमध्य रेखा के आसपास के क्षेत्रों (दक्षिण एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका) में मुख्य रूप से उगाई जाती हैं। इन फसलों में दिन-रात की लंबाई लगभग स्थिर रहने से (12 घंटे के करीब) उनकी वृद्धि चक्र उस पर निर्भर नहीं होती, बल्कि पानी व तापमान पर अधिक निर्भर होती है। (Kisan Yatra)
  • समशीतोष्ण कटिबंधीय (टेम्परेट) फसलें: ये ठंडे/समशीतोष्ण जलवायु को सहने वाली फसलें हैं, जिन्हें बढ़ने के लिए मध्यम तापमान (आमतौर पर 0°C–20°C) व एक सर्दी के दौर की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी फसलें यूरोप, उत्तरी अमेरिका, उत्तरी एशिया जैसे क्षेत्रों में पनपती हैं। उदाहरण: गेहूँ, जौ, ओट्स, राई, आलू, सेब, पीच, स्ट्रॉबेरी, गोभी जैसी सब्जियाँ आदि। इन फसलों के लिए अक्सर ठंड में निष्क्रियावस्था (vernaliation जरूरत) लाभदायक होती है, जैसे सेब के पेड़ को फलने के लिए ठंडे घंटे चाहिए होते हैं। (Kisan Yatra)
  • सुभोजपत्री (सबट्रॉपिकल) फसलें: ये उन फसलों के लिए शब्द है जो उष्ण और समशीतोष्ण के बीच के जलवायु में उगती हैं। जैसे संतरा, गन्ना (जो उपोष्ण क्षेत्र में भी उग सकता है), कपास (कुछ ठंड झेल सकती है), चाय (पहाड़ी ठंडे व जलयुक्त इलाके) आदि।
  • शुष्क/मरुस्थलीय क्षेत्र की फसलें: अत्यंत कम वर्षा और ऊँचे तापमान/अनियमित मौसम वाले क्षेत्रों में केवल कुछ सहनशील फसलें पनप पाती हैं। उदाहरण: बाजरा, ज्वार, कक्तुस अंजीर, खजूर (डेट पाम) आदि जो बहुत कम पानी में बढ़ सकती हैं। इनको सूखा-सहिष्णु (drought resistant) फसलें भी कहा जाता है। (Kisan Yatra)
  • भूमध्यसागरीय फसलें: जैसा ऊपर चर्चा हुआ, भूमध्यसागरीय जलवायु (माइल्ड वे विंटर, हॉट ड्राई समर) में खास तौर पर जैतून, अंगूर, खट्टे फल (संतरा, नींबू), अंजीर, बादाम आदि फसलें उगती हैं। ये फसलें गरम व शुष्क ग्रीष्म सहन कर सकती हैं और हल्की सर्दियों में पनपती हैं।
  • पहाड़ी/समशीतोष्ण पर्वतीय फसलें: ऊँचाई वाले ठंडे क्षेत्रों में आलू, गोभी, गाजर, सेब, चाय (उच्च भूमि पर) जैसे crop उगते हैं, जिनमें ठंड सहने की क्षमता होती है लेकिन अत्यधिक गर्मी नहीं सहते। (Kisan Yatra)

4. अन्य स्थानीय वर्गीकरण प्रणालियाँ (Kisan Yatra)

कई जगह फसलें वर्गीकृत करने के अन्य मापदंड या पारंपरिक प्रणालियाँ भी हैं:

  • जीवनकाल के आधार पर: वृक्षों और फसलों में फर्क करने के लिए वार्षिक, द्विवार्षिक व बहुवर्षीय (बारहमासी) जैसे वर्ग इस्तेमाल होते हैं। वार्षिक फसलें वे हैं जिनका जीवनचक्र बीज से बीज तक एक मौसम/साल में पूरा हो जाता है (अधिकांश खाद्य फसलें जैसे धान, गेहूँ, दालें, सब्जियाँ आदि साल भर में खत्म हो जाती हैं)। द्विवार्षिक फसलें (Biennial) दो वर्षों में अपना जीवनचक्र पूरा करती हैं – पहले साल बढ़वार, दूसरे साल प्रजनन/बीज उत्पादन (जैसे चीनी चुकंदर, गोभी का बीज उत्पादन, गाजर बीज हेतु)। बहुवर्षीय फसलें कई साल तक जीवित रहती हैं और प्रति वर्ष उत्पादन देती हैं; इनमें फलदार पेड़ (आम, सेब), पौधे (केला), कटाई के बाद फिर बढ़ने वाली फसल (गन्ना एक से अधिक कटाई – रेटून क्रॉप) या चाय-कॉफी जैसे झाड़ियाँ शामिल हैं। इस आधार पर समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि वार्षिक फसल को हर साल नए सिरे से बोना पड़ता है जबकि बहुवर्षीय फसलों की एक बार रोपण के बाद कई साल तक देखभाल करनी होती है और फसल मिलती रहती है। (Kisan Yatra)
  • सिंचित बनाम असिंचित (पोषित) फसलें: कई जगह किसान फसलों को इस आधार पर भी बांटते हैं कि कौनसी फसल बारिश के भरोसे (रेनफ़ेड) उगती है और कौन सी फसल के लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, भारत में खरीफ की ज्यादातर फसलें वर्षा-पोषित हैं, जबकि रबी की फसलों को सिंचाई की दरकार होती है। कुछ फसलें जैसे धान, गन्ना पानी की मांग वाली मानी जाती हैं, जबकि बाजरा, चना जैसी फसलें कम पानी में भी हो जाती हैं। अतः जल-आवश्यकता के आधार पर भी फसलें पहचान की जाती हैं (जैसे जल-सारिण्य फसलें vs अल्प-जल फसलें)।
  • स्थानीय सांस्कृतिक/पारंपरिक वर्गीकरण: बहुत से क्षेत्रों में स्थानीय खेती के अनुभव से फसलों व मौसमों के लिए खास स्थानीय नाम व श्रेणियाँ बनी हुई हैं। उदाहरणस्वरूप, दक्षिण भारत में धान की खेती के लिए तीन मौसम बताए जाते हैं – संबा, कुरुवई और थालडी – जो राज्य तमिलनाडु में अलग-अलग अवधि के धान फसल चक्र हैं। इसी तरह पूर्वी अफ्रीका में गु और डेयर मौसम की फसलें, या नेपाल में बरदौली (मनसून) और हिउँदे (सर्दी) फसल के नाम प्रचलित हैं। ये स्थानीय वर्गीकरण वहाँ की भौगोलिक व सांस्कृतिक जरूरतों के अनुसार विकसित हुए हैं और अक्सर वही बात कहते हैं जो व्यापक तौर पर मौसम आधारित वर्गीकरण कहता है। (Kisan Yatra)
  • फसल चक्र/क्रम के आधार पर: खेत प्रबंधन की दृष्टि से फसलों को उनके आने वाले क्रम से भी पहचाना जाता है, जैसे मुख्य फसल और अंतरफ़सल या उत्तर फ़सल (सीक्वेंसियल क्रॉपिंग)। अगर किसान एक खेत में साल में एक से अधिक फसलें उगाते हैं, तो पहली को मुख्य और बाद की को अगली फसल के रूप में देखा जाता है। भारत में ज़ायद की फसल को इसीलिए बीच की या “अंतराल” फसल कहा गया। (Kisan Yatra)
  • अन्य वैज्ञानिक वर्गीकरण: वनस्पति विज्ञान के आधार पर भी फसलों को परिवार/जाति के अनुसार बाँटा जाता है, जैसे घास परिवार (Poaceae) के अनाज, लेग्यूम परिवार (Fabaceae) की दालें, सोलनसी कुल की सब्जियाँ (आलू, टमाटर), इत्यादि। पर व्यावहारिक लिहाज़ से किसान और खाद्य प्रणाली इन्हें ज़्यादा उपयोग आधारित या मौसम आधारित ही देखते हैं। (Kisan Yatra)

निष्कर्ष

इस प्रकार, फसल वर्गीकरण एक व्यापक विषय है जो क्षेत्र विशेष की कृषि प्रणाली पर निर्भर करता है। भारत में खरीफ, रबी, ज़ायद जैसा मौसम-आधारित वर्गीकरण है जो मानसूनी जलवायु का प्रतिफल है। वहीं दुनिया के अन्य हिस्सों में मौसम के पैटर्न अलग हैं – कहीं सर्दी-गर्मी का चक्र है तो कहीं एक ही फसल मौसम। (Kisan Yatra)

फसलों को उपयोग के आधार पर खाद्यान्न, नकदी, तिलहन, रेशा आदि श्रेणियों में बांटकर हम उनके आर्थिक महत्व को समझते हैं। भौगोलिक जलवायु के अनुसार उष्णकटिबंधीय बनाम समशीतोष्ण फसल का भेद हमें बताता है कि कौन सी फसल कहाँ सफल होगी। इन सभी तरीकों का उद्देश्य कृषि को व्यवस्थित ढंग से समझना और क्षेत्रानुकूल सर्वोत्तम फ़सल प्रबंधन करना है।

अंततः, एक किसान के लिए यह जानना जरूरी होता है कि “कौन सी फसल, किस मौसम/जलवायु में, किस उद्देश्य से बोई जाए”, ताकि वह कम जोखिम में बेहतर पैदावार ले सके। उपरोक्त विवरण इसी निर्णय प्रक्रिया में सहायक विभिन्न पक्षों को रेखांकित करता है। (Kisan Yatra)

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संदर्भ (References):

  1. Major cropping Seasons in India
  2. Cropping Seasons in India | Taro Pumps
  3. Agricultural production – crops – Statistics Explained
  4. Changing growing seasons around the world – Futurepump
  5. What Climate Change Means for Agriculture in Africa
  6. फसलों का उपयोग आधारित वर्गीकरण – EOS कृषि Blog

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By Admin

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