भारत में तिलहन फसलों का उत्पादन
भारत में तिलहन फसलों का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है, लेकिन कई किसान इसे ज्यादा मुनाफे की फसल नहीं मानते क्योंकि सामान्यत: इसकी पैदावार कम होती है। हालांकि, यदि तिल की खेती उन्नत बीजों और सही तकनीकों के साथ की जाए, तो यह काफी फायदेमंद साबित हो सकती है।
खासकर गर्मियों का मौसम तिल की खेती के लिए बेहद उपयुक्त होता है, क्योंकि इस समय इसमें कीट व रोगों का प्रकोप कम होता है और अंकुरण भी बेहतर होता है।
गर्मियों में तिल की खेती क्यों है फायदेमंद?
गर्मियों के मौसम में तिल की खेती से अच्छी पैदावार मिलती है। यह मौसम तिल के बीजों के लिए अनुकूल तापमान (25–40 डिग्री सेल्सियस) प्रदान करता है, जिससे अंकुरण सही ढंग से होता है। इसके अलावा, गर्मियों में फसलों को रोगों से भी कम नुकसान होता है।
जलवायु और मिट्टी की ज़रूरत
तिल की अच्छी फसल के लिए गर्म और शुष्क जलवायु सर्वोत्तम मानी जाती है। तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से कम होने पर अंकुरण में बाधा आती है।
मिट्टी की बात करें तो काली मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। मिट्टी का pH मान लगभग 8 होना चाहिए और जल निकासी अच्छी होनी चाहिए। अधिक बालूयुक्त या क्षारीय मिट्टी तिल के लिए उपयुक्त नहीं होती।
तिल की उन्नत किस्में
गर्मियों में अधिक उत्पादन देने वाली कुछ प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं:
- टी.के.जी. 21 – 80–85 दिनों में तैयार होती है, उपज 6–8 टन प्रति हेक्टेयर।
- टी.के.जी. 22, जे.टी. 7, 81, 27 – ये किस्में 75–85 दिनों में पक जाती हैं और फूल 30–35 दिन में आ जाते हैं। इनकी उपज 8–10 टन प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है।
खेत की तैयारी और बुवाई का सही तरीका
खेत की गहरी जुताई करें और पाटा चलाकर समतल करें। जैविक खाद (गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट) का प्रयोग मिट्टी को उपजाऊ बनाता है।
बुवाई फरवरी महीने में करें और इस दौरान खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
बुवाई के तरीके:
- छिड़काव विधि – प्रति हेक्टेयर 5–6 किलो बीज।
- लाइन बुवाई – प्रति हेक्टेयर 4–5 किलो बीज।
👉 पौधे से पौधे की दूरी 10–15 सेमी और कतारों की दूरी 30–45 सेमी रखें।
👉 जड़ और तना गलन से बचाव के लिए बीजोपचार ज़रूरी है।
खाद और सिंचाई का प्रबंधन
- गोबर की खाद: 1.5 टन प्रति हेक्टेयर
- एजोटोबेक्टर और पीएसबी: 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
- नाइट्रोजन: आधी मात्रा बुवाई के समय और बाकी 25–30 दिन बाद दें।
- सिंचाई: गर्मियों में हर 8–10 दिन में सिंचाई करें।
फसल की कटाई कब करें?
जब तनों और फलियों का रंग पीला हो जाए, तो कटाई का समय आ जाता है। देर करने पर फलियां फटने लगती हैं और बीज झड़ने लगते हैं। इसलिए समय पर कटाई करें और दानों को सुरक्षित करें।
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