“पहर” शब्द का अर्थ होता है – समय को मापने की एक पारंपरिक हिन्दू विधि, जो दिन और रात के 24 घंटों को आठ समान भागों में विभाजित करती है। प्रत्येक पहर लगभग 3 घंटे का होता है। इसमें चार पहर दिन के और चार पहर रात के होते हैं। यह प्रणाली न केवल समय गणना की दृष्टि से बल्कि धार्मिक, योगिक और दैनिक जीवन की व्यवस्था के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
दिन के चार पहर और उनका महत्व
प्रथम पहर (सुबह 6 बजे से 9 बजे तक) – प्रातःकाल
- यह समय उठने, स्नान, ध्यान, जप और पूजा के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।
- प्रातःकाल में की गई साधना को अत्यंत फलदायक कहा गया है।
- इसे मानसिक और शारीरिक शुद्धि का समय माना गया है।
द्वितीय पहर (9 बजे से 12 बजे तक) – कार्यारंभ
- यह पहर शिक्षा, कार्य और ऊर्जा के उपयोग के लिए श्रेष्ठ है।
- विद्यार्थी, गृहस्थ और कर्मयोगी अपने दिन के प्रमुख कार्यों की शुरुआत इसी समय करते हैं।
तृतीय पहर (12 बजे से 3 बजे तक) – मध्यान्ह
- यह समय शारीरिक थकान और मानसिक विश्रांति का संकेत देता है।
- धार्मिक दृष्टिकोण से यह मध्यान्ह संध्या और आहार का समय होता है।
चतुर्थ पहर (3 बजे से 6 बजे तक) – सायंकाल
- सायं का यह समय दीप प्रज्वलन, संध्या वंदन और आत्मचिंतन के लिए उपयुक्त है।
- यह परिवार के साथ बैठने, भजन-पूजन करने और मन को शांत करने का समय होता है।
रात के चार पहर और उनका महत्व
प्रथम रात्रि पहर (6 बजे शाम से 9 बजे रात तक) – विश्राम आरंभ
- रात्रि का यह पहला भाग दिन की समाप्ति और विश्राम की शुरुआत का समय है।
- यह समय पारिवारिक संवाद, कथा श्रवण और शांति की भावना जगाने के लिए उत्तम है।
द्वितीय रात्रि पहर (9 बजे रात से 12 बजे तक) – गहन विश्राम
- यह समय गहरी नींद के लिए है।
- तामसिक विचारों से दूर रहकर मन को विश्राम देना आवश्यक है।
- मन और शरीर दोनों की मरम्मत इसी काल में होती है।
तृतीय रात्रि पहर (12 बजे रात से 3 बजे सुबह तक) – जागृति पूर्व चरण
- इस समय को ब्रह्ममुहूर्त से पहले का काल कहा जाता है।
- योगी और साधक इस समय का उपयोग जप, ध्यान और आत्मिक साधना में करते हैं।
चतुर्थ रात्रि पहर (3 बजे सुबह से 6 बजे तक) – ब्रह्ममुहूर्त
- यह सबसे पवित्र और ऊर्जा से भरा समय होता है।
- इसे ध्यान, मंत्रजप, वेद अध्ययन, योग अभ्यास और आत्मबोध के लिए सर्वोत्तम काल माना गया है।
- आयुर्वेद, योगशास्त्र और वेद इस समय को अत्यंत शुभ और प्रभावशाली बताते हैं।
निष्कर्ष
सनातन धर्म में “पहर” केवल समय बताने का साधन नहीं, बल्कि एक जीवन प्रणाली और आध्यात्मिक अनुशासन का हिस्सा हैं। प्रत्येक पहर की प्रकृति और उसका उद्देश्य अलग है, और यदि व्यक्ति इनका पालन करे तो वह अपने दैनिक जीवन को अधिक अनुशासित, संतुलित और आध्यात्मिक बना सकता है।
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