बचपन की ‘ईदगाह’ और चिमटे की अहमियत
जब हम बचपन में ‘ईदगाह’ पढ़ते थे, तो यह समझना मुश्किल होता था कि हामिद ने मेले में खिलौनों और मिठाइयों के बजाय चिमटे को क्यों चुना। उस समय यह केवल एक भोले बच्चे की कहानी लगती थी, लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े हुए, मुंशी प्रेमचंद की रचनाएँ सिर्फ कहानियाँ नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशील व्याख्या लगने लगीं।
प्रेमचंद: हाशिए के भारत की आवाज़
प्रेमचंद ने उस भारत को आवाज़ दी, जिसे अक्सर साहित्य में जगह नहीं मिलती थी। उनकी कहानियाँ उन किसानों की बात करती हैं जिनकी थाली खाली थी, उन स्त्रियों की जिन्हें सामाजिक नियमों ने जकड़ रखा था, और उस जातिवादी व्यवस्था की, जिसने इंसानियत को बांटकर रख दिया था।
वे उन विषयों को उठाते थे जिन्हें आमतौर पर दबा दिया जाता था, और यही उन्हें अपने समय से आगे का लेखक बनाता है।
कलम को बनाया बदलाव का हथियार
प्रेमचंद का मानना था कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने का एक सशक्त साधन होना चाहिए। वे मानते थे कि कलम अन्याय के विरुद्ध सबसे प्रभावी हथियार बन सकती है।
उनकी हर कहानी में कोई न कोई संदेश छिपा होता है—एक ऐसा संदेश जो पाठक को सोचने और आत्मचिंतन के लिए मजबूर कर देता है।
कहानियाँ जो आज भी प्रासंगिक हैं
प्रेमचंद की कहानियाँ सिर्फ उनके दौर की नहीं थीं; वे आज भी उतनी ही सटीक लगती हैं जितनी तब।
‘सद्गति’ में छुआछूत पर गहरी चोट है, ‘पंच परमेश्वर’ में इंसानियत की श्रेष्ठता का संदेश है, और ‘कफन’ में गरीबी की क्रूर वास्तविकता का दर्शन होता है।
इन रचनाओं के माध्यम से वे हमें यह बताते हैं कि सच्चा बदलाव तब ही आएगा जब हम समाज की सच्चाई से आंखें नहीं चुराएंगे।
आज का सवाल: क्या हमने वह भारत बनाया?
प्रेमचंद की कहानियाँ आज भी हमें एक सवाल के साथ छोड़ जाती हैं—
क्या हमने वह भारत बनाया है, जिसका सपना उन्होंने देखा था?
एक ऐसा भारत जो समानता, न्याय और करुणा पर आधारित हो।
निष्कर्ष
मुंशी प्रेमचंद केवल एक लेखक नहीं थे, वे भारत की आत्मा के प्रवक्ता थे। उनके साहित्य ने आम जनजीवन की पीड़ा को शब्द दिए और समाज को आईना दिखाया। आज जब हम उन्हें पढ़ते हैं, तो केवल कहानियाँ नहीं पढ़ते, बल्कि अपने समाज की परतें खोलते हैं।
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