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भारत के युवा वैज्ञानिक शुभांशु शुक्ला ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) में 18 दिन बिताकर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यह यात्रा न सिर्फ तकनीकी दृष्टि से खास थी, बल्कि यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण रही। इस दौरान शुभांशु ने अनेक प्रयोग किए और जीवन के कई अनोखे अनुभवों से गुजरे।

व्यस्त दिनचर्या और वैज्ञानिक प्रयोग

ISS में शुभांशु की दिनचर्या बेहद व्यस्त और व्यवस्थित थी। सुबह होते ही वे वैज्ञानिक प्रयोगों में जुट जाते, डेटा रिकॉर्ड करते और अंतरराष्ट्रीय टीम के अन्य सदस्यों के साथ तालमेल से कार्य करते। वे अंतरिक्ष में नई तकनीकों के परीक्षण और जैविक प्रयोगों में भी शामिल रहे।

माइक्रोग्रैविटी में खाना बनाना और खाना

शून्य गुरुत्वाकर्षण (Zero Gravity) में खाना बनाना आसान नहीं होता। शुभांशु ने विशेष तकनीकों की मदद से वहां खाना बनाना और खाना सीखा। उन्होंने बताया कि माइक्रोग्रैविटी में भोजन हवा में तैरता है, इसलिए हर चीज़ को सावधानी से पकड़ना और खाना होता है।

सोने का अनोखा अनुभव

अंतरिक्ष में नींद लेना पृथ्वी से बिल्कुल अलग अनुभव होता है। शुभांशु ने स्पेशल स्लीपिंग बैग का उपयोग किया, जिससे वे किसी दीवार से बंधकर सो पाते थे, ताकि वह स्टेशन में इधर-उधर न तैरें। माइक्रोग्रैविटी में शरीर को रिलैक्स करना एक नया अहसास देता है।

व्यायाम है ज़रूरी

शरीर को फिट रखने के लिए हर अंतरिक्ष यात्री को रोज़ाना व्यायाम करना ज़रूरी होता है। शुभांशु ने ट्रेडमिल, साइक्लिंग और रेसिस्टेंस बैंड्स का उपयोग किया ताकि हड्डियों और मांसपेशियों की ताकत बनी रहे। क्योंकि शून्य गुरुत्व में शरीर की ताकत कम हो सकती है।

‘जॉय’ – उनका खास साथी

शुभांशु के साथ उनका एक छोटा खिलौना हंस ‘जॉय’ भी था, जो जीरो-ग्रैविटी इंडिकेटर के रूप में कार्य करता था। जब ‘जॉय’ तैरने लगता, तो यह संकेत होता कि स्टेशन अब माइक्रोग्रैविटी क्षेत्र में है। यह हंस शुभांशु के लिए भावनात्मक सहारा भी था।

कौन-कौन से प्रयोग किए गए?

इस मिशन के दौरान शुभांशु ने कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किए, जैसे:

  • कोशिका वृद्धि पर माइक्रोग्रैविटी का प्रभाव
  • पानी के अणुओं का व्यवहार
  • मानव हृदय गति पर गुरुत्वहीनता का असर
  • स्पेस फार्मिंग के संभावित उपाय

निष्कर्ष

शुभांशु शुक्ला की यह अंतरिक्ष यात्रा भारत के लिए गर्व का विषय है। न सिर्फ उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टि से योगदान दिया, बल्कि युवाओं के लिए भी प्रेरणा बने। उनकी यात्रा यह दिखाती है कि भारतीय युवा अब अंतरिक्ष अन्वेषण में भी अग्रणी भूमिका निभाने लगे हैं।

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