भारत सरकार की एक प्रमुख पहचान प्रणाली आधार कार्ड (Aadhaar Number) को लेकर एक आरटीआई (RTI) से जो जानकारी सामने आई है, वह चौंकाने वाली और चिंताजनक है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले 14 वर्षों में भारत में कुल 11.7 करोड़ मौतें दर्ज की गईं, लेकिन इस दौरान केवल 1.15 करोड़ आधार नंबरों को ही डिलीट किया गया। यह दर्शाता है कि मृत्यु के बाद अधिकतर लोगों के आधार रिकॉर्ड अभी भी सक्रिय हैं।
क्या कहती है RTI रिपोर्ट?
इस RTI को एक्टिविस्ट द्वारा UIDAI (भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण) से फाइल किया गया था, जिसमें पूछा गया कि मृत्यु के बाद आधार कार्ड को कितनी बार निष्क्रिय या डिलीट किया गया है। UIDAI के अनुसार, अब तक सिर्फ 1.15 करोड़ आधार नंबर ही सिस्टम से हटाए गए हैं, जबकि भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक 2009 से अब तक 11.7 करोड़ से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है।
आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर क्यों?
मृत्यु पंजीकरण की प्रक्रिया में खामियां
भारत में आज भी मृत्यु का पंजीकरण (death registration) हर राज्य में अनिवार्य और सुचारु रूप से लागू नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों और पिछड़े जिलों में बड़ी संख्या में मृत्यु का औपचारिक रजिस्ट्रेशन नहीं होता, जिससे UIDAI तक जानकारी नहीं पहुंच पाती।
आधार से मृत्यु का लिंक नहीं
अभी भी देश के अधिकांश हिस्सों में मृत्यु प्रमाण पत्र और आधार नंबर को आपस में लिंक नहीं किया गया है, जिससे UIDAI के पास यह जानकारी नहीं होती कि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है।
परिजनों की जानकारी न देना
अक्सर ऐसा होता है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो परिजन UIDAI को इस बारे में सूचित नहीं करते या उन्हें यह जानकारी ही नहीं होती कि ऐसा करना जरूरी है।
UIDAI का पक्ष: हम मृत्यु का रिकॉर्ड नहीं रखते
UIDAI का स्पष्ट कहना है कि वे किसी व्यक्ति की मृत्यु की जानकारी सीधे नहीं रखते। वे केवल वही रिकॉर्ड हटाते हैं जो उन्हें राज्य सरकारों, नगर निगमों या परिजनों द्वारा प्रमाणित दस्तावेजों के माध्यम से प्राप्त होता है।
इस प्रक्रिया में आवश्यक होता है:
- मृत्यु प्रमाण पत्र
- आधार संख्या
- परिजनों की पहचान
- फॉर्मल आवेदन
इन सबकी कमी के चलते अधिकांश मृत व्यक्तियों के आधार अब तक सिस्टम में जीवित हैं।
इस गड़बड़ी के गंभीर परिणाम
सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी
अगर मृत व्यक्ति का आधार नंबर सक्रिय रहता है, तो इसका इस्तेमाल करके कोई व्यक्ति सरकारी योजनाओं का लाभ गलत तरीके से उठा सकता है, जैसे कि राशन, पेंशन, DBT आदि।
पहचान चोरी (Identity Fraud) का खतरा
मृत व्यक्ति का सक्रिय आधार नंबर साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे पहचान चोरी और फर्जी लेन-देन की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
जनसंख्या आंकड़ों में भ्रम
सक्रिय आधार संख्या से सरकार को जनसंख्या की वास्तविक स्थिति का पता नहीं चलता, जिससे नीतियों की योजना बनाते समय गलत आँकड़ों पर आधारित फैसले लिए जा सकते हैं।
क्या है समाधान?
आधार और मृत्यु रजिस्ट्रेशन का एकीकरण
राज्य सरकारों और UIDAI को मिलकर मृत्यु रजिस्ट्रेशन और आधार सिस्टम को लिंक करना होगा ताकि जैसे ही मृत्यु प्रमाण पत्र जारी हो, संबंधित आधार नंबर स्वतः निष्क्रिय हो जाए।
जागरूकता अभियान
जनता को जागरूक करना होगा कि मृत्यु के बाद आधार निष्क्रिय करना क्यों ज़रूरी है। इसके लिए नगर निगम स्तर पर सरल प्रक्रिया और सुविधा केंद्र बनाए जाने चाहिए।
डिजिटल डैथ रजिस्ट्री
एक नेशनल डिजिटल डैथ रजिस्ट्री विकसित की जानी चाहिए, जिसमें मृत्यु का डेटा सीधे UIDAI और अन्य सरकारी संस्थानों से लिंक हो सके।
आधार से जुड़ी अन्य चुनौतियाँ
- बायोमेट्रिक डेटा अपडेट नहीं होने से वृद्ध नागरिकों को समस्या
- एक ही व्यक्ति के नाम से दो आधार की घटनाएं
- बच्चों के आधार में जन्मतिथि और फोटो अपडेट न होना
- नाम या पता बदलवाने में लंबी प्रक्रिया
ये समस्याएं आधार को एक अद्वितीय पहचान के रूप में उपयोग करने में व्यावहारिक दिक्कतें खड़ी करती हैं।
निष्कर्ष: पहचान प्रणाली को पारदर्शी बनाना समय की मांग
आधार प्रणाली भारत की एक महत्वाकांक्षी और क्रांतिकारी पहचान योजना रही है, लेकिन मृत्यु के बाद रिकॉर्ड डिलीट न होने की यह समस्या प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती है। जब 11.7 करोड़ लोगों की मृत्यु हो चुकी हो, और सिर्फ 1.15 करोड़ के आधार ही हटे हों, तो यह एक नीतिगत और तकनीकी सुधार की ज़रूरत को दर्शाता है।
सरकार, UIDAI और आम जनता को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा ताकि डिजिटल पहचान प्रणाली पारदर्शी और सुरक्षित बन सके।
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