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जब इलाज खुद की जेब से हो…

भारत जैसे देश में जहाँ बड़ी आबादी आज भी गरीबी की रेखा के करीब या उसके नीचे जीवन जी रही है, वहाँ बीमारी अक्सर सिर्फ एक शारीरिक संकट नहीं बल्कि एक आर्थिक आपदा भी बन जाती है। ऐसा तब होता है जब कोई मरीज अपनी बीमारी के इलाज के लिए सीधे अपनी जेब से पैसे खर्च करता है — इसे ही ‘आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर’ (OOPE) कहा जाता है।

ये खर्च डॉक्टर की फीस, दवाइयां, टेस्ट, अस्पताल में भर्ती, और यहाँ तक कि मरीज के आने-जाने, ऑक्सीजन या खून जैसी ज़रूरतों पर भी होता है। ये वह रकम होती है जिसे व्यक्ति सीधे भुगतान करता है, बीमा या सरकारी सहायता के बिना।

क्यों गरीब पर OOPE का सबसे बड़ा असर पड़ता है?

गरीब लोगों के लिए OOPE का बोझ बहुत ज्यादा होता है, क्योंकि उनके पास बचत नहीं होती। जब बीमारी आती है, तो उन्हें या तो उधार लेना पड़ता है या इलाज को ही टालना पड़ता है। इससे कई बार मरीज की हालत बिगड़ जाती है और स्थिति जानलेवा हो जाती है।

2011-12 के नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (NSSO) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 18% परिवारों ने ऐसे स्वास्थ्य खर्चों का सामना किया जिन्होंने उन्हें आर्थिक रूप से बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया।

जब इलाज के कारण परिवार को भोजन, शिक्षा, कपड़े जैसी ज़रूरतों पर कटौती करनी पड़े तब बीमारी सिर्फ शारीरिक ही नहीं, सामाजिक और मानसिक संकट भी बन जाती है।

नेशनल हेल्थ अकाउंट: OOPE में कितनी कमी?

नेशनल हेल्थ अकाउंट (NHA) के अनुसार, 2014-15 में भारत में OOPE कुल स्वास्थ्य खर्च का 62.6% था। लेकिन राहत की बात यह है कि 2021-22 तक यह घटकर 39.4% रह गया है। यह दिखाता है कि सरकार की ओर से स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ा है, जिससे लोगों की जेब पर सीधा बोझ कुछ हद तक कम हुआ है।

इसी अवधि में सरकारी खर्च स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़कर 48% तक पहुंच गया, जबकि 2014-15 में यह सिर्फ 29% था। केंद्र सरकार ने राज्यों को भी निर्देश दिए हैं कि वे अपने बजट का कम से कम 8% स्वास्थ्य पर खर्च करें।

केंद्र सरकार के प्रयास: क्या हैं बड़े कदम?

सरकार ने अपने स्वास्थ्य विभाग (DoHFW) का बजट लगातार बढ़ाया है — 2017-18 में 47,353 करोड़ रुपये से 2025-26 तक यह बढ़कर 95,957.87 करोड़ रुपये हो जाएगा।

15वें वित्त आयोग के तहत 2020-21 से 2025-26 के बीच पंचायतों को भी 70,051 करोड़ रुपये का आवंटन स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए किया गया है।

इसके अलावा, कोविड-19 महामारी ने सरकार को मजबूर किया कि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करे। इसके परिणामस्वरूप सरकारी अस्पतालों की हालत में सुधार और मुफ्त सेवाओं की उपलब्धता में वृद्धि देखी गई।

राज्यों में कहाँ सबसे ज्यादा और सबसे कम OOPE?

राज्यवार डेटा बताता है कि सभी राज्यों में 2019-20 से 2021-22 के बीच OOPE में कमी आई है। उत्तर प्रदेश में यह खर्च सबसे ज्यादा रहा, जबकि कर्नाटक में सबसे कम।

केरल, पश्चिम बंगाल, पंजाब, और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी OOPE का प्रतिशत अपेक्षाकृत अधिक है। दूसरी ओर असम, छत्तीसगढ़, और उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह खर्च बहुत कम है।

जम्मू-कश्मीर ने 2019-20 से 2021-22 के बीच सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की है। वहीं, मध्य प्रदेश में दो वर्षों तक कोई बदलाव नहीं हुआ।

स्वास्थ्य पर बढ़ता सरकारी खर्च: सकारात्मक संकेत

NHA के डेटा के अनुसार, सरकार ने GDP के मुकाबले स्वास्थ्य पर खर्च को 2014-15 में 1.13% से बढ़ाकर 2021-22 में 1.84% कर दिया है। कुल सरकारी खर्च में स्वास्थ्य का हिस्सा भी 3.94% से बढ़कर 6.12% हो गया है।

प्रति व्यक्ति सरकारी स्वास्थ्य खर्च भी तीन गुना बढ़ा है — 2014-15 में 1108 रुपये से बढ़कर 2021-22 में 3169 रुपये

ये आंकड़े दिखाते हैं कि सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता दे रही है, लेकिन क्या ये प्रयास गरीब की जेब का बोझ वास्तव में कम कर पाए हैं?

आगे का रास्ता: क्या किया जा सकता है?

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 का उद्देश्य है कि 2025 तक OOPE के कारण होने वाली आर्थिक बर्बादी में 25% की कमी लाई जाए। लेकिन इसके लिए केवल सरकारी आंकड़ों और बजट में बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं हैं।

सरकार को चाहिए ये ठोस कदम:

  • सभी नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण और मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं देना
  • निजी अस्पतालों की मनमानी फीस पर नियंत्रण
  • सस्ती और सरल स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का प्रचार और विस्तार
  • जनता को स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता और अधिकारों की जानकारी देना

यदि ये उपाय प्रभावी ढंग से लागू किए जाएँ, तो निश्चित ही ‘बीमारी के कारण गरीबी’ का चक्र टूट सकता है।

निष्कर्ष

‘आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर’ भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे बड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों में से एक है। सरकार की कोशिशें सही दिशा में हैं, लेकिन गरीब तबकों तक उनका प्रभाव सीमित है। जब तक हर नागरिक को सुलभ, सस्ता और समय पर इलाज नहीं मिलेगा, तब तक इस खर्च का बोझ गरीब की जेब पर भारी पड़ता रहेगा।

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