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UNICEF की रिपोर्ट “बच्चों की भलाई एक अनिश्चित दुनिया में” बताती है कि कोविड-19 के बाद दुनिया भर में बच्चों के मानसिक, शारीरिक और शैक्षणिक विकास पर गहरा असर पड़ा है। अमीर देशों में भी बच्चों में खुशी का स्तर गिरा है, पढ़ाई में कमजोर प्रदर्शन और मोटापे की समस्या बढ़ी है। इस रिपोर्ट में भारत की स्थिति को लेकर विशेष चिंता जताई गई है।

भारत में बच्चों की मानसिक स्थिति बेहद चिंताजनक

भारत में लाखों बच्चे मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, लेकिन 80-90% बच्चों को कोई इलाज नहीं मिल पाता। 2021 में UNICEF और Gallup के एक सर्वे में सामने आया कि सिर्फ 41% भारतीय युवा मानसिक स्वास्थ्य को लेकर मदद लेना चाहते हैं। इसकी मुख्य वजह है समाज में इससे जुड़ी शर्म और कलंक। यही वजह है कि 15–19 वर्ष के बच्चों में आत्महत्या मृत्यु का चौथा सबसे बड़ा कारण बन चुकी है

शारीरिक स्वास्थ्य: मोटापा और कुपोषण दोनों की चुनौती

रिपोर्ट में अनुमान है कि 2030 तक भारत में 2.7 करोड़ बच्चे मोटापे का शिकार होंगे, जो विश्व के 10% मोटे बच्चों के बराबर होगा। यह सिर्फ स्वास्थ्य नहीं बल्कि भविष्य में आर्थिक नुकसान की भी चेतावनी है। हालांकि 2014 से 2021 के बीच नवजात और 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है, लेकिन यह अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

पढ़ाई और कौशल में गिरावट

कोविड-19 महामारी के बाद बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ा है। स्कूल बंद होने से 10 साल के लगभग 70% बच्चे सरल पाठ नहीं पढ़ पाते, जबकि यह आंकड़ा 2019 में 55% था। इसके अलावा, 58% शिक्षकों ने माना कि महामारी के कारण बच्चे सामाजिक कौशल विकसित नहीं कर पाए, जिससे उनका ध्यान भटकता है और सीखने की क्षमता घटती है।

गरीबी, भेदभाव और हानिकारक परंपराएं

गरीब और हाशिए पर बसे बच्चों को शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और सुरक्षा नहीं मिल पाती। वे बाल श्रम, बाल विवाह और जातीय भेदभाव का सामना करते हैं। बेटों को वरीयता देना, बालिका भ्रूण हत्या और अन्य सामाजिक बुराइयाँ बच्चों की भलाई को नुकसान पहुँचाती हैं। प्रवासी बच्चों, युद्ध प्रभावित इलाकों और शरणार्थी शिविरों के बच्चों की स्थिति और भी दयनीय होती है।

डिजिटल असमानता और मानसिक खतरे

ग्रामीण क्षेत्रों में डिवाइस, बिजली और इंटरनेट की कमी से बच्चे डिजिटल शिक्षा से वंचित हो जाते हैं। माता-पिता और शिक्षकों की डिजिटल साक्षरता की कमी भी चिंता का विषय है। इसके अलावा, सोशल मीडिया का अनियंत्रित उपयोग साइबरबुलिंग, गलत सूचना, नशा और अश्लील सामग्री जैसे खतरों को बढ़ा रहा है, जिससे बच्चों का आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। 2022 में बच्चों के खिलाफ 1800 साइबर अपराध दर्ज किए गए।

जलवायु परिवर्तन का खतरा

जलवायु परिवर्तन बच्चों की भलाई पर सीधा असर डाल रहा है। बढ़ती गर्मी, प्रदूषण, पानी की कमी और खाद्य असुरक्षा से बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। जलवायु संकट के कारण विस्थापन, स्कूल से वंचित रहना और मानसिक अस्थिरता जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं।

UNICEF के सुझाए समाधान

  • स्वास्थ्य और पोषण सुधारें: ICDS को सशक्त बनाकर पोषण, टीकाकरण और प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए। किशोरों को माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की आपूर्ति और माता-बच्चे के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान जरूरी है।
  • मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें: स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू कर शिक्षकों को बच्चों की पहचान और सहायता के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। चाइल्डलाइन 1098, परामर्श केंद्र और पुनर्वास सेवाओं को मजबूत किया जाना चाहिए।
  • डिजिटल सुरक्षा और साक्षरता बढ़ाएं: स्कूलों में साइबर सुरक्षा का पाठ्यक्रम शामिल करें और अभिभावकों व शिक्षकों को ऑनलाइन खतरों के प्रति जागरूक बनाएं।
  • सामाजिक असमानता घटाएं: बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं को प्रभावी बनाएं और नकद हस्तांतरण के ज़रिए गरीबी से जुड़ी समस्याओं को कम करें।
  • शोषण और हिंसा की रोकथाम: POCSO एक्ट, बाल श्रम अधिनियम और किशोर न्याय अधिनियम को सख्ती से लागू कर, बच्चों के लिए एक सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करना होगा।

अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से क्या सीख सकते हैं?

ब्राजील की ‘बोल्सा फमिलिया’ योजना जो नकद सहायता को शिक्षा और स्वास्थ्य से जोड़ती है, भारत में प्रभावी हो सकती है। ‘पहले 1000 दिन’ जैसे वैश्विक अभियान बच्चों के शुरुआती विकास को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के असर को ध्यान में रखते हुए बच्चों के लिए विशेष जलवायु अनुकूलन रणनीति अपनानी चाहिए।

निष्कर्ष

भारत में बच्चों की भलाई आज एक गंभीर संकट में है। मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक विकास, शिक्षा, सुरक्षा और समानता – हर क्षेत्र में मजबूत सुधार की आवश्यकता है। UNICEF की रिपोर्ट हमें यह याद दिलाती है कि यदि हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो हम सिर्फ एक पीढ़ी नहीं, बल्कि देश का भविष्य खो सकते हैं।

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One thought on “भारत में बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य संकट, 80-90% को नहीं मिल रहा इलाज”

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