जायद में ज्वार की खेती: कम पानी में अधिक चारा, किसानों के लिए फायदेमंद विकल्प
भारत में जायद मौसम (फरवरी से मई) के दौरान चारे की उपलब्धता में भारी कमी देखी जाती है। ऐसे में ज्वार (Sorghum) की वैज्ञानिक विधि से खेती कर किसान न सिर्फ हरे चारे की कमी पूरी कर सकते हैं, बल्कि अच्छा आर्थिक लाभ भी कमा सकते हैं। ज्वार एक ऐसी बहुउपयोगी फसल है जो अन्न, चारा और बायोफ्यूल तीनों के रूप में उपयोगी है।
ज्वार की खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्र और मिट्टी
ज्वार को देशभर में अलग-अलग नामों से जाना जाता है – जैसे यूपी में कर्बी, महाराष्ट्र में ज्वारी, कर्नाटक में जोर, तेलंगाना में जोन्ना। यह सूखे और कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फसल है।
- मिट्टी: दोमट, बलुई दोमट और औसत काली मिट्टी जिसमें जल निकासी ठीक हो, सर्वोत्तम मानी जाती है।
- पीएच: सामान्य स्तर (6.5 – 7.5) होना चाहिए, अत्यधिक अम्लीय या क्षारीय मिट्टी पर खेती न करें।
खेत की तैयारी और बोआई
- खेत की तैयारी: एक पलेवा करने के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करें, फिर 1-2 बार कल्टीवेटर से जुताई कर पाटा लगाएं।
- बोआई का समय: जायद के लिए फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च के अंत तक हरे चारे के लिए बोआई करें।
- बीज दर:
- मल्टी कट किस्म: 25–30 किग्रा/हेक्टेयर
- सिंगल कट किस्म: 30–40 किग्रा/हेक्टेयर
- बीज उपचार: 2.5 ग्राम थायरम या 2 ग्राम कार्बेंडाजिम प्रति किग्रा बीज से उपचारित करें।
बोआई विधि
अधिकतर किसान छिटकवां विधि अपनाते हैं, जो अनुशंसित नहीं है।
बेहतर तरीका: हल के पीछे कूड़ों में 30 सेंटीमीटर लाइन टू लाइन दूरी रखते हुए बीज बोएं।
खाद और उर्वरक प्रबंधन
- प्राकृतिक खाद: गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट को बोआई से 15–20 दिन पहले खेत में मिलाएं।
- उर्वरक (प्रति हेक्टेयर):
- सिंगल कट: 40–50 किग्रा नाइट्रोजन (बोआई के 1 महीने बाद)
- मल्टी कट:
- बोआई के समय: 60–70 किग्रा नाइट्रोजन + 40 किग्रा फॉस्फोरस
- प्रत्येक कटाई के बाद: 15–20 किग्रा नाइट्रोजन
सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण
- सिंचाई: हर 8–12 दिन में या जरूरत के अनुसार करें।
- खरपतवार नियंत्रण: बोआई के तुरंत बाद 1.5 किग्रा एट्राजिन (50%) या सिमेजिन को 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
कटाई और उपज
- सिंगल कट किस्म: 5% फूल आने पर या 60–70 दिनों में कटाई करें।
- मल्टी कट किस्म:
- पहली कटाई सामान्य किस्मों से 10 दिन पहले
- आगे की कटाई हर 30–35 दिन बाद, जमीन से 6–8 सेमी ऊपर से करें।
- उपज:
- मल्टी कट किस्म: 750–800 क्विंटल/हेक्टेयर
- सिंगल कट किस्म: 250–450 क्विंटल/हेक्टेयर
ज्वार की प्रमुख उन्नत किस्में
| किस्म | प्रकार | अवधि (दिन) | उपज (क्विंटल/हेक्टेयर) | विशेषता |
|---|---|---|---|---|
| यूपी चरी 1 | सिंगल कट | 115–120 | 330 | पत्ती रोग सहनशील, रसीला तना |
| एचसी 171 | सिंगल कट | 105–110 | 520 | रोग व कीट सहनशील, मीठा तना |
| पूसा चरी 1 | सिंगल कट | 105–110 | 280 | सफेद कठोर बीज, मध्यम तना |
| एसएल 44 | सिंगल कट | 75–100 | 320 | पतला तना, लंबी पत्तियां |
| पूसा चरी 23 | मल्टी कट | 95–100 | 550 | सूखा व जलभराव सहनशील, संकरी पत्तियां |
निष्कर्ष
जायद में ज्वार की खेती किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प है, खासकर तब जब चारे की भारी कमी होती है। यह फसल कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती है और बाजार में हरे चारे की मांग अधिक होती है। वैज्ञानिक विधियों और सही किस्मों के चयन से किसान अपनी आय कई गुना बढ़ा सकते हैं।
सुझाव: अपने क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी की जांच के अनुसार किस्म चुनें और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर खेती करें।
Read More
- Marigold cultivation: अप्रैल में शुरू करें गेंदे की अर्का भानु किस्म की खेती, सिर्फ 50 दिन में कमाएं
- Organic Farming: रासायनिक खेती छोड़ जैविक खेती अपनाने में क्या हैं चुनौतियां?
- Krishi Yatra: ऊंचे तापमान में बगीचे की देखभाल, फलों के पेड़ों को गर्मी से कैसे बचाएं
- Farmer ki Yatra: जीरे की खेती में झुलसा रोग से न हो नुकसान: तुरंत अपनाएं ये समाधान
- Kheti Ki Baat: खीरे में मोज़ेक वायरस का कहर? ये उपाय अपनाएं और फसल को सुरक्षित रखें
Discover more from अपना रण
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

