SATAT KHETI

क्या है सतत कृषि?

आज के समय में जब जलवायु परिवर्तन, रासायनिक प्रदूषण और भूमि की घटती उर्वरता जैसी समस्याएँ हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रही हैं, तब “सतत कृषि” या “सस्टेनेबल फार्मिंग” एक ऐसा समाधान बनकर उभर रहा है जो न सिर्फ वर्तमान पीढ़ी की जरूरतें पूरी करता है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को भी सुरक्षित करता है। यह खेती की वह पद्धति है जिसमें पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था – तीनों का संतुलन साधा जाता है।

क्यों ज़रूरी है सतत कृषि?

परंपरागत खेती में अत्यधिक रसायनों, जल की बर्बादी और मोनो-क्रॉपिंग ने भूमि की सेहत बिगाड़ दी है। ऐसे में अगर हम कृषि के वर्तमान तरीकों को नहीं बदलते, तो आने वाले समय में उपजाऊ ज़मीन और साफ पानी एक सपना बन जाएगा। सतत कृषि इस समस्या का समाधान देती है।

सतत कृषि की प्रमुख विशेषताएं

  • जैविक खाद और कंपोस्ट का उपयोग: मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को बनाए रखने में मदद करता है।
  • फसल चक्र (Crop Rotation): मिट्टी के पोषण को बनाएं रखने के लिए फसलों का नियमित परिवर्तन।
  • जल संरक्षण तकनीकें: ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग से पानी की बर्बादी कम होती है।
  • कृषि वानिकी: पेड़ और फसलों का साथ-साथ पालन, जिससे भूमि का क्षरण कम होता है।

किसानों के लिए लाभकारी

सतत कृषि न केवल भूमि को बचाती है बल्कि किसानों की लागत भी कम करती है। रासायनिक खाद व कीटनाशकों की जगह प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने से खर्च घटता है और उपज जैविक होने के कारण बेहतर कीमत मिलती है। इसके अलावा किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से लड़ने में भी सहायता मिलती है।

जैव विविधता और पर्यावरण की रक्षा

सतत खेती में कीटनाशकों का कम उपयोग और विविध फसलों की खेती जैव विविधता को बढ़ावा देती है। यह न केवल पौधों व जीव-जंतुओं की प्रजातियों को सुरक्षित करता है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में सहायक होता है।

सरकारी पहल और समर्थन

भारत सरकार द्वारा परमपरागत कृषि विकास योजना (PKVY), राष्ट्रीय जैविक कृषि मिशन और सार्वजनिक जलवायु स्मार्ट कृषि योजना जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जो किसानों को सतत कृषि अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। साथ ही, प्रशिक्षण, अनुदान और तकनीकी मार्गदर्शन भी प्रदान किया जा रहा है।

सतत कृषि का भविष्य

विश्व स्तर पर जैविक और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में सतत कृषि अपनाकर किसान न केवल पर्यावरण का संरक्षण कर सकते हैं, बल्कि वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रह सकते हैं। इसके साथ ही यह तरीका खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

निष्कर्ष

“आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बचाने वाली खेती” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। सतत कृषि से हम ना केवल अपनी ज़मीन, जल और हवा को शुद्ध रख सकते हैं, बल्कि अगली पीढ़ियों को एक सुरक्षित, समृद्ध और स्वस्थ जीवन भी दे सकते हैं। अब समय है कि हम अपने कृषि तरीकों में बदलाव लाएं और प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर खेती करें।

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