भारत के कई राज्यों में किसान केले की खेती करके अच्छी आमदनी कर रहे हैं, लेकिन इस लाभदायक फसल को कई बीमारियाँ भी नुकसान पहुँचा सकती हैं। उन्हीं में से एक बेहद घातक बीमारी है – ‘रूट नॉट नेमाटोड’ (Root Knot Nematode)। यह रोग केले की जड़ों पर प्रभाव डालता है, जिससे पौधे की वृद्धि रुक जाती है, फल छोटे और कम मात्रा में बनते हैं। तमिलनाडु में हुए एक अध्ययन के अनुसार, केवल इस बीमारी के कारण पूवन किस्म की केले की फसल में 30% तक उपज का नुकसान देखा गया है।
क्या है रूट नॉट नेमाटोड रोग?
‘रूट नॉट नेमाटोड’, मेलोइडोगाइन प्रजाति के सूक्ष्म सूत्रकृमि होते हैं जो मिट्टी में रहते हुए केले की जड़ों में प्रवेश करते हैं और वहाँ पित्त या गाँठ बना देते हैं। यह गाँठें पौधे की पोषक तत्वों की आपूर्ति बाधित करती हैं, जिससे पीलापन, मुर्झाना, पौधों की वृद्धि में रुकावट और फलों की गुणवत्ता में गिरावट देखने को मिलती है।
रोग की पहचान कैसे करें?
हल्के पीले रंग की संकरी और झाड़ीदार पत्तियाँ
पत्तों का किनारा सूखना
पौधों का बौना रह जाना
फल की संख्या कम और आकार छोटा होना
जड़ों में गाँठें दिखना, विशेष रूप से अनुदैर्ध्य काटने पर
नई जड़ों की अत्यधिक शाखाएं संक्रमित जड़ों के ऊपर उग आना
माइक्रोस्कोपिक जांच के ज़रिए मिट्टी और जड़ के नमूनों से सूत्रकृमियों की पहचान संभव है।
प्रभावी प्रबंधन के लिए अपनाएँ ये उपाय
- एकीकृत नेमाटोड प्रबंधन (INM)
स्थायी समाधान के लिए Integrated Nematode Management का पालन करें। इसमें जैविक, भौतिक और रासायनिक उपायों का संतुलन होता है।
- फसल चक्र अपनाएँ
केले की खेती को धान, गन्ना या चना जैसी फसलों के साथ चक्रित करें।
गैर-मेज़बान पौधों के प्रयोग से नेमाटोड जीवनचक्र टूटता है।
- प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें
नेमाटोड-प्रतिरोधी केले की किस्मों को अपनाने से प्राकृतिक सुरक्षा मिलती है।
इससे जड़ संक्रमण की संभावना कम होती है।
- जैविक उपाय अपनाएँ
गेंदा और सरसों जैसी कवर फसलें नेमाटोड आबादी कम करने में सहायक हैं।
जैव नियंत्रक जैसे पेसिलोमाइसिस लिलासिनस, माइक्रोराईजा, ग्लोमस फैसिकुलेटम, ट्राइकोडर्मा आदि का उपयोग करें।
200 ग्राम नीम खल्ली + जैव नियंत्रक = जड़ों में सूत्रकृमि नियंत्रण।
- मिट्टी सुधार एवं सौरीकरण
गर्मी में पारदर्शी प्लास्टिक से मिट्टी को ढककर सूर्य की गर्मी से नेमाटोड मारे जा सकते हैं।
गर्मियों में गहरी जुताई करके खेत को खाली छोड़ने से भी प्रभावी नियंत्रण होता है।
रासायनिक नियंत्रण के उपाय
कार्बोफ्यूरान (10-20 ग्राम/पौधा) का प्रयोग रोपण के समय और बाद में करें।
नीम तेल 1-2% में सकर को 10 मिनट तक डुबोकर सूत्रकृमियों से बचाया जा सकता है।
मोनोक्रोटोफॉस 5% में 30 मिनट डुबोने और फिर 72 घंटे छाया में सुखाने से सकर संक्रमणमुक्त हो जाते हैं।
जड़ उपचार और पौध सामग्री की तैयारी
प्रत्यारोपण से पहले पौध सामग्री का जैव नियंत्रक या नेमाटाइसाइड से उपचार करें।
कॉर्म को निम्बू सिडिन (1.5%) में 30 मिनट डुबोने से नेक्रोटिक घाव साफ होते हैं और पौधा सुरक्षित रहता है।
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