SAG

गड़हनी साग: गरीब आदिवासियों की थाली से अब आम रसोई की ओर

झारखंड के पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूमि में नदियों, तालाबों और खेतों के किनारे अपने आप उग आने वाला गड़हनी साग एक घास प्रजाति का पौधा है, जो वर्षों से आदिवासी समुदाय का प्रिय भोजन रहा है। इसकी खेती नहीं होती, फिर भी यह स्वाद और पोषण के मामले में किसी उगाए गए साग से कम नहीं है।

कैसा होता है गड़हनी साग?

लंबाई: 7–8 इंच तक

डंठल: हल्के हरे रंग का, रिफिल से थोड़ा मोटा

पत्तियां: 1 इंच से छोटी, गहरे हरे रंग की

जड़ें: पानी और मिट्टी दोनों में

उगने की जगह: नदी-नालों के किनारे, खेतों के किनारे, नमी वाले स्थान

कैसे पकाया जाता है?

इसका स्वाद चने के साग जैसा होता है।

इसे नाखूनों से तोड़कर, धोकर काटा जाता है

सरसों के तेल में मेथी की छौंक लगाकर तला जाता है

फिर कच्चा तेल, नमक और हरी मिर्च मिलाकर परोसा जाता है

चावल, रोटी या दाल-भात के साथ यह बेहद स्वादिष्ट लगता है

स्वास्थ्य के लिए लाभकारी

आंखों की रोशनी को बनाए रखता है

खून का संचार बेहतर करता है

पेट को ठंडा रखता है और कब्ज नहीं होने देता

बालों के झड़ने और सफेद होने से बचाव करता है

नियमित सेवन करने वाले आदिवासी लोग आमतौर पर चश्मे और गंजेपन से दूर रहते हैं

क्यों खास है गड़हनी साग?

मुफ्त में उपलब्ध: खेतों या जंगलों में स्वतः उगता है

खर्च नहीं, लाभ ज़्यादा: व्यावसायिक खेती संभव हो तो लागत लगभग शून्य

बाजार में संभावनाएं: शहरी लोग भी इसे खोजने लगे हैं

जलवायु अनुकूल: ठंड के मौसम में भरपूर होता है, गर्मी में भी कुछ मात्रा में मिलता है

गड़हनी साग की व्यवसायिक संभावना

हालांकि यह अभी बाजार में नहीं मिलता, लेकिन:

स्थानीय सब्जी विक्रेताओं से मांग बढ़ रही है

मध्यम वर्ग इसे पहचानने और मंगवाने लगा है

यदि इसकी संरक्षित खेती या नियंत्रित उत्पादन शुरू किया जाए तो यह कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसल बन सकती है।

Tumblr

Read More


Discover more from अपना रण

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Discover more from अपना रण

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading